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Last Bench Wali Love Story

**Last Bench Wali Love Story** ❤️🎓

बारिश की पहली बूँदें लखनऊ की धूल पर गिर रही थीं। राजधानी इंजीनियरिंग कॉलेज का कैंपस नई शुरुआत की खुशबू से महक रहा था। नई यूनिफॉर्म पहने लड़के-लड़कियाँ इधर-उधर भाग रहे थे, कुछ हँस रहे थे, कुछ घबराए हुए थे। लेकिन क्लासरूम नंबर 3C में हलचल कुछ खास थी। 

आरव सिंह दौड़ता हुआ दरवाज़े पर पहुँचा। उसके बाल बिखरे हुए थे, शर्ट आधी बाहर निकली हुई, बैग एक कंधे पर लटक रहा था। साँसें फूली हुईं। “सर... सॉरी सर! बस... रास्ते में ट्रैफिक...”

प्रोफेसर शर्मा ने घड़ी देखी, फिर मुस्कुराते हुए कहा, “पहला दिन है बेटा, अंदर आ जा। लेकिन अगली बार पंक्चुअल रहना।”

आरव ने पूरी क्लास में नज़र दौड़ाई। हर बेंच पर दो-दो लोग बैठे थे। सिर्फ़ आखिरी बेंच पर एक जगह खाली थी। और वहाँ पहले से ही एक लड़की शांत बैठी हुई थी—सफ़ेद सलवार सूट, बाल कंधों तक, हल्का क्लिप लगाए, किताब खोले हुए। उसकी आँखें किताब पर टिकी थीं, जैसे बाकी दुनिया से कोई मतलब ही नहीं।

आरव ने हिचकिचाते हुए पूछा, “क्या... मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”

लड़की ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में हल्की नाराज़गी झलकी। बिना कुछ बोले उसने सिर हिला दिया।

प्रोफेसर शर्मा ने आवाज़ लगाई, “आरव और प्रिया, आज से तुम दोनों लास्ट बेंच पर साथ बैठोगे। कोई प्रॉब्लम?”

दोनों ने एक साथ “जी सर” कहा, लेकिन अंदर से दोनों ने सोचा—**बहुत बड़ी प्रॉब्लम**।

क्लास शुरू होते ही आरव फुसफुसाया, “सर कितने बोरिंग लग रहे हैं ना? लगता है इनकी उम्र कॉलेज से ज़्यादा है।”

प्रिया ने उसे घूरा। “चुप करो। मुझे शांति से पढ़ना है।”

आरव मुस्कुराया, “अरे मैं तो बस बात कर रहा था...”

“बात मत करो।”

पहले हफ़्ते यही सिलसिला चला। आरव का बोलना, प्रिया का चिढ़ना। नोट्स माँगने पर भी झगड़ा। “तेरा हैंडराइटिंग तो किसी डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन लगता है,” प्रिया ने एक दिन कहा।

आरव हँसा, “और तेरा? प्रिंटर की तरह बिल्कुल परफेक्ट, लेकिन बोरिंग।”

धीरे-धीरे यह नोक-झोंक उनकी आदत बन गई।

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दूसरे हफ़्ते लाइब्रेरी में प्रिया रोज़ शाम को जाती। एक दिन आरव भी वहाँ पहुँच गया। उसने प्रिया के पास ही जगह ली। प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन अंदर से चिढ़ रही थी। दो घंटे बाद आरव ने कहा, “चल, कैंटीन चलते हैं। चाय पीते हैं। भूख लग रही है।”

प्रिया ने मना किया, लेकिन आरव की जिद के आगे हार गई। कैंटीन में दो चाय और दो समोसे के साथ पहली बार वे बिना लड़ाई के बैठे। आरव ने अपनी कहानी सुनाई—दिल्ली से आया हूँ, पापा आर्मी में थे, अब रिटायर्ड। मम्मी स्कूल टीचर। “और तू?” उसने पूछा।

प्रिया ने हिचकिचाते हुए बताया, “लखनऊ की ही हूँ। पापा सरकारी ऑफिस में, छोटा भाई 10th में।”

उस दिन से कैंटीन उनकी डेली मीटिंग पॉइंट बन गई।

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फिर आया वो बारिश वाला दिन। क्लास खत्म होते ही आसमान फट पड़ा। सब भागे। प्रिया के पास छाता नहीं था। आरव ने अपना बैग सिर पर रख लिया और बोला, “चल, मैं छोड़ देता हूँ।”

“तुम्हारे पास छाता है?”

“नहीं, लेकिन बाइक है।”

प्रिया हँसी, “पागल हो क्या? भीग जाऊँगी।”

“तो भीग। याद रहेगा ना पहला दिन।”

प्रिया ने आखिरकार मान लिया। बाइक पर बैठते ही बारिश तेज़ हो गई। प्रिया ने आरव की शर्ट को पीछे से पकड़ रखा था। पानी उनके चेहरे पर गिर रहा था। आरव ने गाना शुरू कर दिया—“बरसात में भीगे... हम सावन में भीगे...”

प्रिया ने पीठ पर हल्का थप्पड़ मारा, “चुप करो ना!” लेकिन वह खुद भी हँस रही थी। उस पल उसे अहसास हुआ कि आरव के साथ चुप्पी भी अच्छी लग सकती है।

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समय बीतता गया। फर्स्ट ईयर के एंड सेमेस्टर से पहले ग्रुप स्टडी शुरू हुई। उनकी ग्रुप में आरव, प्रिया, रिया, विक्रम और नेहा थे। रातें हॉस्टल की छत पर चाय पीते, नोट्स शेयर करते, गप्पें मारते बीतने लगीं। आरव के मज़ाक, प्रिया की समझदारी, रिया की शरारतें—सब कुछ परफेक्ट लगने लगा।

कॉलेज फेस्ट आया। प्रिया ने डांस कॉम्पिटिशन में एंट्री ली। आरव रात-रात भर उसे प्रैक्टिस करवाता। “आरव, पैर दर्द कर रहे हैं...”

“बस एक बार और। तू बहुत अच्छा करेगी, विश्वास रख।”

फेस्ट के दिन स्टेज पर प्रिया जब डांस कर रही थी, आरव सबसे आगे खड़ा तालियाँ बजा रहा था। जब प्रिया जीती, ट्रॉफी लेकर सबसे पहले आरव के गले लग गई। उस पल दोनों को कुछ अजीब सा महसूस हुआ। दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो गई।

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प्रिया का जन्मदिन आया। आरव ने प्लान बनाया। रात 12 बजे हॉस्टल गेट पर बुलाया। प्रिया नीचे आई तो देखा—आरव, रिया, विक्रम के साथ छोटा सा केक, कैंडल जल रही थीं, और कुछ गुब्बारे। “हैप्पी बर्थडे प्रिया!”

प्रिया की आँखें भर आईं। “तुम लोग... इतनी रात को...?”

आरव ने केक काटवाया और सबसे पहले प्रिया को खिलाया। फिर छत पर बैठकर वे घंटों गाने गाते रहे। आरव ने उसके लिए स्पेशल प्लेलिस्ट बनाई थी—हर गाना उनकी यादों से जुड़ा। उस रात प्रिया सोच रही थी—**ये लड़का मेरे लिए इतना करता क्यों है?**

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दूसरे साल में दोनों हर जगह साथ थे। क्लास में लास्ट बेंच, लाइब्रेरी, कैंटीन, कभी सिनेमा, कभी साइकिल पर लखनऊ घूमना। इमामबाड़ा के पास एक शाम वे बैठे थे। हल्की हवा चल रही थी।

प्रिया ने धीरे से कहा, “आरव, तुम इतने अच्छे क्यों हो?”

आरव ने उसकी तरफ देखा, “क्योंकि तुम अच्छी हो, प्रिया।”

दोनों की नज़रें मिलीं। कुछ सेकंड। फिर दोनों ने नज़रें फेर लीं। दिल में कुछ अनकहा पनप रहा था। बिना बोले प्यार हो रहा था।

फ्रेंड्स के साथ मस्ती, टीचर्स से डाँट, फैमिली से फोन पर बातें—सब कुछ अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था। आरव की मम्मी प्रिया से बात करने लगी थीं। प्रिया के पापा आरव को “बेटा” कहने लगे थे।

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फाइनल ईयर आया। प्लेसमेंट की तैयारी में दोनों रात-दिन लगे थे। फिर रिजल्ट आया। आरव को बेंगलुरु में TCS में अच्छी जॉब मिल गई। प्रिया को लखनऊ में ही एक अच्छी कंपनी में।

रात भर दोनों ने बात की। प्रिया की आवाज़ भारी थी, “दूर चले जाओगे...”

आरव ने कहा, “तुम्हारे बिना ये जॉब भी बेकार लग रही है प्रिया।”

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ट्रेन का दिन। प्लेटफॉर्म पर पूरा ग्रुप था। ट्रेन आने वाली थी। सबने गले मिले। जब ट्रेन की सीटी बजी, आरव ने प्रिया का हाथ पकड़ा और थोड़ा अलग ले गया।

उसकी आँखें नम थीं। “प्रिया... मैं जाता हूँ। लेकिन एक बात कहना चाहता हूँ। अगर करियर के लिए दूर जाना पड़े तो चले जाना... बस मेरी ज़िंदगी से मत जाना। मैं तुझे बहुत... बहुत प्यार करता हूँ।”

प्रिया की आँखों से आँसू बह निकले। वह मुस्कुराई, “डिस्टेंस से रिलेशनशिप मुश्किल होता है... नामुमकिन नहीं। मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, आरव।”

ट्रेन चल पड़ी। आरव खिड़की से हाथ हिलाता रहा। प्रिया प्लेटफॉर्म पर खड़ी रोती हुई भी मुस्कुरा रही थी।

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एक साल बाद।

लखनऊ। वही कॉलेज। वही क्लासरूम 3C। कॉलेज का एनिवर्सरी फंक्शन चल रहा था। आरव और प्रिया दोनों छुट्टी लेकर आए थे।

वे दोनों लास्ट बेंच के पास गए। वही पुरानी बेंच। वही कोना।

आरव ने प्रिया का हाथ थामा। “याद है? पहला दिन कितना चिढ़ी थी तुम। मैं कितना बोलता था।”

प्रिया हँसी, आँखों में नमी, “और आज भी तुम बोलते ही रहते हो।”

आरव अचानक घुटनों पर बैठ गया। पॉकेट से छोटी सी रिंग निकाली। पूरा ग्रुप और कुछ टीचर्स भी वहाँ इकट्ठे हो गए थे।

“प्रिया शर्मा... इस लास्ट बेंच ने हमें मिलाया था। अब इसी बेंच के सामने मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ—क्या तुम मेरी ज़िंदगी की हर बेंच पर, हर सफर में, हर खुशी और ग़म में, हमेशा के लिए मेरी बनोगी?”

प्रिया रो पड़ी। खुशी के आँसू। उसने आरव को उठाया और गले लगा लिया। “हाँ... हज़ार बार हाँ, आरव।”

पूरी क्लास तालियों से गूँज उठी। प्रोफेसर शर्मा भी मुस्कुरा रहे थे।

**Last Bench Wali Love Story** पूरी हो चुकी थी। लेकिन असली कहानी तो अब शुरू हो रही थी।

❤️

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Thankyou 🥰🙏