हरि ॐ 🙏🏻
पिछले अध्याय से हम यह समझ रहे है कि ईश्वर कण कण में है । अब यह पढ़कर विचार प्रकट होता है कि यदि ईश्वर कण कण में है अर्थात् हम सभी प्राणी, जीवो में भी परमात्मा का ही अंश है। और यदि ऐसा ही है तो यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या दुराचारी, पापी, चोर, जैसे व्यक्ति में भी ईश्वर है ??
ईश्वर तो कण कण में है अर्थात् पाप कर्म करने वाले व्यक्ति में भी ईश्वर है ??? और क्या यदि ऐसा है तब तो ईश्वर ही हमे प्रेरित कर रहे है अनुचित कर्म करने के लिए ??
इन प्रश्नों का उत्तर समझने के लिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि "ईश्वर कण कण में है" इस बात का आध्यात्मिक अर्थ क्या है ??
ईश्वर कण-कण में है" का अध्यात्मिक अर्थ यह है कि परमात्मा (ब्रह्म) सिर्फ किसी मूर्ति या मंदिर में ही सीमित नहीं है, बल्कि इस सृष्टि के हर जीवित और निर्जीव कण में उसी परम ऊर्जा या चेतना का वास है। यह सर्वव्यापकता का सिद्धांत है, जो बताता है कि प्रकृति और संपूर्ण ब्रह्मांड उसी परम शक्ति का विस्तार है। मुख्य आध्यात्मिक भावार्थ:
•समान दृष्टि (समभाव): जब ईश्वर हर व्यक्ति और वस्तु में मौजूद है, तो अध्यात्म में इसका अर्थ यह है कि हमें हर जीव, चाहे वह पशु हो या इंसान, के साथ एक जैसा सम्मान और प्रेम का व्यवहार करना चाहिए।
•अहंकार का नाश: अक्सर लोग अज्ञान या अहंकार के कारण कण-कण में मौजूद इस दिव्य ऊर्जा को देख नहीं पाते। जब मन अहम और विकारों से मुक्त होता है, तभी इस सर्वव्यापी ईश्वर का अनुभव किया जा सकता है।
•भीतर की खोज: इस वाक्य का यह अर्थ भी है कि परमात्मा को बाहर मंदिरों या जंगलों में खोजने के बजाय अपने भीतर (आत्मा के रूप में) खोजना चाहिए।
•एकता का बोध: सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर के अंश को देखने से मन में भेदभाव, नफरत और द्वेष खत्म हो जाता है और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना जागृत होती है। "सनातन धर्म और उपनिषदों के अनुसार, सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर से उत्पन्न हुई है, उसी में स्थित है और अंततः उसी में लीन हो जाती है। इसलिए प्रत्येक कण में उसी परम सत्ता का आधार माना गया है।"
अब हम सब यह समझते है कि क्या पापी दुराचारी प्राणी में भी ईश्वर का वास है ??
तो इसका उत्तर यह है कि ...
"हाँ, ईश्वर सर्वव्यापी हैं, इसलिए प्रत्येक प्राणी के भीतर आत्मा के रूप में उनका ही अंश विद्यमान है। पापी व्यक्ति भी इससे अलग नहीं है।" हालांकि, ईश्वर पापी व्यक्ति के भीतर मौजूद उसकी आत्मा में रहते हैं, लेकिन उनके बुरे कर्मों या 'पापों' में नहीं।
इसे दर्शन और आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार इस प्रकार समझा जा सकता है:
•आत्मा और कर्म का अंतर: हिंदू और वैदिक दर्शन के अनुसार, परमात्मा हर प्राणी के हृदय में आत्मा के रूप में स्थित हैं। शरीर और आत्मा अलग-अलग हैं। पापी का शरीर और उसके बुरे कर्म अज्ञानता के कारण होते हैं, लेकिन उसके भीतर की आत्मा शुद्ध और ईश्वरीय होती है।
•बिजली का उदाहरण: इसे आप बिजली (करंट) के उदाहरण से समझ सकते हैं। बिजली हर उपकरण में होती है—चाहे वह हीटर हो या एसी। बिजली का काम ऊर्जा देना है, यह तय करना नहीं कि वह गर्मी दे या ठंड। इसी तरह, ईश्वर की ऊर्जा (आत्मा) सभी में समान रूप से है, लेकिन व्यक्ति अपनी बुद्धि और कर्मों से उसका उपयोग अच्छे या बुरे कार्यों के लिए करता है।
•भक्ति और अहंकार: ज्ञानियों और संतों का मत है कि ईश्वर कण-कण में है। पापी इसलिए पापी है क्योंकि उसके अंदर अहंकार और अज्ञानता है। जब कोई व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार को मिटा देता है और पश्चाताप करता है, तब उसे उस पापी शरीर में भी ईश्वर का अनुभव होने लगता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर कभी भी पापकर्मों के कर्ता नहीं होते। वे प्रत्येक जीव को विवेक, अंतरात्मा और सत्य के मार्ग की प्रेरणा प्रदान करते हैं। मनुष्य अपने कर्मों का चयन स्वयं करता है।"
निष्कर्ष:
"इस अध्याय से यह स्पष्ट होता है कि 'ईश्वर कण-कण में हैं' का अर्थ यह नहीं कि ईश्वर पापकर्मों के कर्ता हैं। वे प्रत्येक जीव की आत्मा में चेतना रूप से विद्यमान हैं, जबकि शुभ और अशुभ कर्मों का चुनाव मनुष्य अपने विवेक और स्वतंत्र इच्छा से करता है। इसलिए ईश्वर की सर्वव्यापकता हमें समभाव, करुणा और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है।"
हरि ॐ 🙏🏻