स्त्री का “पुरुष बनना”: एक संतुलन की खोज
वेदांत 2.0 के नज़रिए से
आज का समाज एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रहा है। हम विकास की अंधी दौड़ में इतनी दूर निकल आए हैं कि हमने अपनी सामाजिक जड़ों, प्राकृतिक स्वभाव और जीवन के अंतर्निहित संतुलन को ही गौण कर दिया है। इसी परिप्रेक्ष्य में, स्त्री का “पुरुष बनना” या स्त्री-पुरुष के कार्य-क्षेत्रों का एकरूप हो जाना केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि एक दार्शनिक विचलन है। यह लेख किसी लिंग के विरोध में नहीं, बल्कि जीवन की उस अनिवार्य 'समंता' (समानता नहीं, बल्कि पूरकता) की खोज में लिखा गया है, जो हमारी सभ्यता की नींव है।
सामाजिक संतुलन और कर्म-विभाजन
प्रकृति ने पुरुष और स्त्री को अलग-अलग जैविक और ऊर्जावान इकाइयों के रूप में रचा है। जब हम 'समानता' की बात करते हैं, तो अक्सर हम 'समान कार्य' को ही उसका पैमाना मान लेते हैं। लेकिन समाज में जनशक्ति का एक बड़ा हिस्सा आज पुरुष के पारंपरिक कार्य-क्षेत्रों में ही केंद्रित हो गया है। यदि नारी भी पुरुष के ही समान बाहर के कठोर कार्य-क्षेत्रों में पूरी तरह खप जाएगी, तो समाज की उस धुरी का क्या होगा जिसे हम 'परिवार' कहते हैं?
भारत जैसे देश में, जो आज भी अपने सांस्कृतिक संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों के लिए जाना जाता है, घर की व्यवस्था एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। घर केवल चार दीवारें नहीं है, वह संस्कारों का केंद्र है। स्कूल शिक्षा दे सकते हैं, ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन संस्कार केवल माँ के सानिध्य में मिलते हैं। यदि स्त्री स्वयं को पुरुष के कार्य-क्षेत्र में पूरी तरह ढाल लेती है, तो वह घर का वह रिक्त स्थान कौन भरेगा जिसे संभालने वाला कोई नहीं बचेगा? यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर बुद्धिजीवियों को गंभीरता से विचार करना होगा।
"नींव" और "मंजिल" का भेद
वेदांत 2.0 के दृष्टिकोण से, स्त्री 'नींव' है और पुरुष 'मंजिल'। यहाँ ऊँच-नीच का कोई भाव नहीं है, बल्कि कार्यों के विभाजन का स्पष्ट दर्शन है। पुरुष का स्वभाव गति है, उसका कर्म बाहर की चुनौतियों से लड़ना है। उसे नौकरी और कार्य-क्षेत्र की पहली प्राथमिकता देना एक संतुलन है, ताकि वह सुरक्षा और संसाधन जुटा सके। स्त्री का धर्म घर की गरिमा, ममता, और संस्कारों की बुनावट है।
आज के समाज में, समानता के नाम पर स्त्री को सेना, राजनीति और कठोर व्यावसायिक प्रतिस्पर्धाओं में धकेला गया है। निश्चित रूप से स्त्री में सामर्थ्य है, वह ईमानदारी से काम करती है, लेकिन क्या यह उसके मौलिक स्वभाव (स्वधर्म) के साथ न्याय है? स्त्री को यदि 'बेल' बनाकर पुरुष की तरह हर क्षेत्र में जुतने के लिए मजबूर किया जाएगा, तो यह समाज के लिए एक बड़ा अधर्म है।
स्त्री कोई कमजोर इकाई नहीं है; वास्तव में वह 'लक्ष्मी' है, वह 'ऊर्जा' है। उसे समान दिखने की नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट तत्वों के साथ 'सम्मानित' होने की आवश्यकता है।
आत्मनिर्भरता की भ्रामक छवि
आज के दौर में स्त्री को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर जो प्रक्रिया चल रही है, उसके परिणाम दूरगामी और घातक हैं। एक तरफ स्त्री बाहर के काम में व्यस्त है, दूसरी तरफ घर के मूल्य बिखर रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि संतानें आत्मिक रूप से सूनी हो रही हैं। जब घर में माँ का सानिध्य नहीं होता, तो घर केवल 'मकान' बन जाता है।
विकसित देशों का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ 70 साल पहले स्त्री-प्रधान घर हुआ करते थे।
आज वहां आत्मनिर्भरता के नाम पर स्त्री-पुरुष का जो भेद मिटाया गया, उसका परिणाम यह हुआ कि पारिवारिक ढांचा चरमरा गया। पुरुष के लिए कोई सार्थक कार्य नहीं बचा, और वह अपनी कुंठा को अपराध, नशा और हिंसा के माध्यम से निकाल रहा है।
क्या हम वास्तव में ऐसी ही आत्मनिर्भरता चाहते हैं?
वेश्यावृति और देह का बाजारीकरण
सबसे भयावह पक्ष है स्त्री की लाज और गरिमा का बाजारीकरण। समानता के नाम पर आज देह को एक व्यापारिक वस्तु बना दिया गया है। गुप्त रूप से बढ़ रही वेश्यावृति, नशा, और पारिवारिक विघटन इस बात के प्रमाण हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। जब स्त्री अपना स्त्री-तत्व छोड़कर पुरुष के सांचे में ढलती है, तो उसके भीतर का वह शांत भाव नष्ट हो जाता है जो समाज को प्रेम और ममता प्रदान करता था।
आज राजनैतिक भीड़ और पाखंड का जन्म हो रहा है। समानता का नारा उत्तेजना तो देता है, लेकिन इसके परिणाम समाज की आत्मा को नष्ट कर रहे हैं। यदि दोनों ही पक्ष अशान्ति में रहेंगे, तो घर और प्रेम का निर्माण असंभव है।
निष्कर्ष:
समंता की ओर
मेरा यह संकेत किसी आदेश के रूप में नहीं है, बल्कि एक द्रष्टा के रूप में है। मैं किसी राजनीतिक या धार्मिक पंथ से बंधा हुआ नहीं हूँ, मेरा सरोकार केवल अस्तित्व और मानव-जाति के भविष्य से है।
हमें 'समानता' (Equality) की अंधी दौड़ से निकलकर 'समंता' (Complementarity) की ओर आना होगा। स्त्री को कमाने का अधिकार है, मशीनें और आधुनिक सुविधाएँ उसके समय को थोड़ा खाली कर सकती हैं, जिसे वह अपने आनंद, संगीत और सृजन में लगा सकती है, लेकिन घर की मालकिन के रूप में उसका अस्तित्व सर्वोपरि है। पुरुष व्यवसाय का मालिक है, स्त्री घर की मालकिन। यह विभाजन नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का एक अद्भुत दर्शन है।
भारत को यदि विश्व गुरु बनना है, तो उसे बाहर की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ अपने भीतर के संस्कारों को भी बचाना होगा। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, वह भले ही आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाए, लेकिन वह भीतर से खोखला हो जाता है। समय आ गया है कि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करें और समाज के उस संतुलन को पुनः स्थापित करें, जहाँ स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनकर जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर सकें।
Independent Researcher & Philosopher Vedanta 2.0 © ORCID: 0009-0000-8083-0685 (Internationally registered – Synthesis of Science