1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 3 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 3



लहू से लथपथ रूपमती को संदूक पर गिरता देख महाराज देववर्धन और मंत्री बुक्का सोलंकी के चेहरे का रंग उड़ गया। कुछ पल के लिए दोनों सन्न रह गए।



तहखाने की दीवारों पर उनकी परछाइयां खौफ से कांपती हुई लग रही थीं।


बुक्का सोलंकी ने अपनी तलवार म्यान में डाली और घबराते हुए राजा के पास आया। "राजा साहब! चलिए... जल्दी चलिए यहाँ से!



" उसने हांफते हुए कहा। "अच्छा हुआ जो इस दासी ने खुद ही अपनी जान दे दी। हमारा कोई भी राज़ बाहर नहीं आया।


सोचिए महाराज, अगर यह आज आपके झांसे में आ जाती और कल को लालची हो जाती... और अगर आप इसकी लालच पूरी नहीं कर पाते, तो यह आपके सारे राज़ पूरी प्रजा के सामने खोल देती! 


आपका राज्य भी हथिया सकती थी। जो हुआ, अच्छे के लिए हुआ। चलिए यहाँ से!"


राजा देववर्धन ने अपने चेहरे पर लगे रूपमती के खून को पोंछा। उसकी आँखों में अभी भी खौफ था, लेकिन मंत्री की बात सुनकर उसने राहत की सांस ली। 


दोनों तेज़ी से पलटे और तहखाने के दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगे।


जैसे ही राजा और मंत्री ने बाहर निकलने के लिए दरवाज़े पर हाथ रखा, अचानक पूरे तहखाने की मशालें एक साथ फड़फड़ाकर बुझने लगीं। हवा बर्फीली ठंडी हो गई।


सीलन भरी बदबू की जगह हवा में जलते हुए मांस और खून की गंध तैरने लगी।


तभी, उस संदूक के ऊपर से, जहाँ रूपमती मरणासन्न हालत में पड़ी थी, एक ऐसी भयंकर और गूंजती हुई आवाज़ आई जो इंसानी नहीं लग रही थी—


"रुक जा... रुक जा बुक्का सोलंकी! रुक जा देववर्धन!"
राजा और मंत्री के कदम ज़मीन में जैसे जम गए। उन्होंने कांपते हुए पीछे मुड़कर देखा।


लहू से सनी रूपमती तड़पते हुए उठ बैठी थी। उसके पेट में धंसी तलवार के चारों ओर से काला खून बह रहा था, उसकी आँखें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं और उन आँखों से खून के आंसू बह रहे थे।


उसकी आवाज़ में एक अजीब सा गूंजता हुआ भारीपन था, जैसे एक साथ कई रूहें चीख रही हों।



"तुमने मेरा हंसता-खेलता, खुशहाल जीवन मुझसे छीन लिया!" रूपमती ने अपने दोनों हाथों को हवा में फैलाया, उसके नाखून काले पड़ चुके थे। 


"मेरे बूढ़े माता-पिता को इस बुढ़ापे में बेसहारा कर दिया! पर याद रखना दरिंदों... आज अमावस की रात है! 



आज की काली रात गवाह है कि तुमने एक गरीब, बेसहारा लड़की को, जो अपने माता-पिता के बुढ़ापे का इकलौता सहारा थी, आत्महत्या करने पर मजबूर किया है!"



तहखाना अचानक किसी भूकम्प की तरह हिलने लगा। कंकालों के ढेर से हड्डियां आपस में टकराने लगीं।


रूपमती ने चीखते हुए राजा और मंत्री की तरफ देखा, "मैं तुम्हें, तुम्हारी इस गद्दी को और इस पूरे राजमहल को श्राप देती हूँ!


जिस तरह मेरे वियोग में मेरे बूढ़े माता-पिता तड़पेंगे... मैं इस राजमहल में कभी कोई खुशी नहीं आने दूँगी! मैं इस देवपुर राज्य के सिंहासन पर कभी तुम्हारे किसी वारिस को राजा नहीं बनने दूँगी!"



उसने अपने पेट से खून निकालकर फर्श पर फेंका और दहाड़ते हुए बोली, "मैं नहीं चाहती कि कोई दूसरी गरीब दासी रूपमती फिर से इस महल में अपनी इज्जत गंवाए या आत्महत्या करने पर मजबूर हो! 


इसलिए... मैं इस राजमहल में जन्म लेने वाले हर एक वारिस, हर एक मर्द को चुन-चुनकर मार डालूँगी! 


मैं तो मर रही हूँ, लेकिन मेरी ये तड़पती हुई आत्मा हमेशा-हमेशा के लिए इसी राजमहल में भटकती रहेगी... और तुम्हारे इस घमंड के महल को एक खौफनाक खंडहर बना देगी! खंडहर बना देगी!!!"



यह अंतिम शब्द चीखते ही रूपमती की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई। उसकी देह शांत हो गई। लेकिन उसकी सफेद आँखें अभी भी खुली थीं, जो सीधे राजा और मंत्री को घूर रही थीं।


उसी पल, तहखाने के ऊपर लगे विशाल झरोखे से बादलों को चीरती हुई बिजली कड़की, जिसकी रोशनी ने उस खौफनाक दृश्य को और भी डरावना बना दिया।


राजा और मंत्री डर के मारे पागलों की तरह सीढ़ियों की तरफ भागे, मानो साक्षात यमराज उनके पीछे पड़ा हो।


तहखाने के उस नरक से किसी तरह जान बचाकर महाराज देववर्धन और मंत्री बुक्का सोलंकी बाहर निकल आए। 


उन्होंने उस गुप्त दरवाज़े को हमेशा के लिए बंद कर दिया, मानो वे अपने पाप को भी वहीं दफ़्न कर आए हों। लेकिन खौफ उनके साए की तरह उनके साथ चिपक चुका था।


दो दिन बीत गए। महल में रूपमती की गैरमौजूदगी पर सवाल उठने लगे।



तीसरे दिन, महारानी रुक्मिणी बेहद चिंतित अवस्था में महाराज के कक्ष में आईं। "राजा साहब... दो दिन बीत गए, लेकिन रूपमती का कहीं कोई अता-पता नहीं है," महारानी ने परेशान होते हुए कहा। 


"वह बिना कुछ कहे कहाँ चली गई? मैंने पूरे राजमहल का कोना-कोना छनवा मारा, पर वह कहीं नहीं मिली। नगर के लोगों को भी कुछ नहीं मालूम।"


महारानी की आँखों में आंसू आ गए, "आज सुबह उसके बूढ़े माता-पिता भी रोते-बिलखते महल के द्वार पर आए थे। वे कह रहे हैं कि रूपमती उनके पास भी नहीं पहुंची। आखिर कहाँ चली गई मेरी रूपमती?"


महाराज देववर्धन ने अपने चेहरे पर एक झूठी हमदर्दी का मुखौटा ओढ़ा और महारानी का हाथ थामते हुए बोले, "महारानी, आप इतनी चिंता मत कीजिए। वह दो दिन पहले मुझसे मिलकर गई थी। 


उसने कहा था कि वह अपने माता-पिता के घर जा रही है। मैंने तो उससे यहाँ तक कहा था कि हमारे सैनिकों को भी साथ ले जाओ, पर उसने मना कर दिया।"


राजा ने बात को घुमाने के लिए एक नया जाल बुना, "हो सकता है... रास्ते में किसी क्रूर अंग्रेज सैनिक ने उसे अपनी हवस का शिकार बना लिया हो? 


या फिर जंगल के किसी खूंखार जानवर ने उस पर हमला कर दिया हो? या फिर जंगली डाकुओं ने उसे अगवा कर लिया हो! 


पर आप परेशान मत होइए, मैंने अपने सबसे काबिल सैनिकों और गुप्तचरों को उसकी खोज में लगा दिया है। अब रात काफी हो चुकी है, आप विश्राम कीजिए।"


राजा की बातों में आकर महारानी भारी मन से अपने कक्ष में सोने चली गईं। रात के गहराते ही पूरे राजमहल में सन्नाटा पसर गया। सभी लोग खाना खाकर गहरी नींद में सो गए।


जैसे ही रात की घड़ी की सुइयां आपस में मिलीं और ठीक 12:00 बजे, राजमहल के विशाल और सुनसान गलियारों में एक आवाज़ गूंजी—

'छन... छन... छनक...'


वह किसी के चलने की आवाज़ थी... पायल की खनक! महल के पहरेदारों ने चौंककर इधर-उधर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। 


तभी, हवा का एक बर्फीला झोंका आया और महल के मुख्य गलियारे से एक लाल रंग की चुनरी लहराती हुई गुज़री। यह ठीक वैसी ही लाल चुनरी थी, जैसी रूपमती हमेशा ओढ़ा करती थी।



सैनिकों को लगा कि उनका वहम है, और वे वापस अपनी ड्यूटी पर लग गए। उन्हें क्या पता था कि मौत उनके सिर पर मंडरा रही है।