थाने की उस कालकोठरी में जहाँ अयान का खून फर्श की धूल में मिलकर धीरे-धीरे ठंडा पड़ रहा था, वहीं बाहर की दुनिया में एक दूसरा तूफ़ान करवट ले रहा था।
होटल के अंदर मचे उस कोहराम और अयान के सिर पर लगी गहरी चोट के खौफ़ ने नितिन के पैरों में जैसे पहिए लगा दिए थे।
नितिन बिना पीछे मुड़े, नंगे पैर बस्ती की उन तंग और घुटन भरी गलियों की तरफ दौड़ रहा था।
उसके हाथों में लगा हुआ साबुन का सफेद झाग अब सूखकर उसकी खाल पर पपड़ी बन चुका था, और छाती में सांसें इस कदर फूल रही थीं मानो फेफड़े अभी फट जाएंगे।
वह रास्ते में आने वाले लोगों से टकराता, गिरता-संभलता हुआ सीधा करीम चाचा की झोपड़ी के सामने जाकर रुका।
"चाचा... ओ करीम चाचा! अनर्थ हो गया चाचा!" नितिन ने झोपड़ी के जर्जर दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से पीटते हुए चीखना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ में ऐसा खौफ़ था कि अंदर बैठी माहिरा का दिल किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा।
दरवाज़ा झटके से खुला और करीम चाचा अपनी लाठी के सहारे बाहर आए। उनके पीछे माहिरा भी खड़ी थी, जिसकी आँखों में अभी से आँसू तैरने लगे थे।
नितिन को इस हालत में हाँफते और कांपते देख चाचा की घनी भौंहें सिकुड़ गईं।
"क्या हुआ नितिन? ठहर... पहले सांस ले और साफ़-साफ़ बता, अयान कहाँ है?" चाचा की आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट घुल गई।
नितिन ने अपने सूखे होंठों पर ज़बान फेरी और रोते हुए बोला, "चाचा... अयान भाई को... पुलिस ले गई!
होटल में सुबह-सुबह दो पुलिस वाले आए और मैनेजर के इशारे पर भाई को हथकड़ी पहनाकर वैन में डाल दिया।
चाचा, वो पुलिस वाले बहुत खूंखार थे... वे कह रहे थे कि अयान ने विवेक रॉय से पंगा लेकर अपनी कब्र खुद खोद ली है!"
'विवेक रॉय' का नाम सुनते ही माहिरा के पैरों तले से जैसे ज़मीन खिसक गई।
उसने अपनी चीख को दबाने के लिए अपने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए, और उसका पूरा वजूद कांपने लगा। "अयान..." उसके हलक से सिर्फ एक दबी हुई कराह निकली।
लेकिन उस पल, करीम चाचा के चेहरे पर एक बहुत ही बारीक बदलाव आया। 'विवेक रॉय' का नाम सुनते ही उनके बढ़ते हुए कदम एक पल के लिए वहीं ठिठक गए।
उनकी आँखों में अयान के लिए जो हड़बड़ाहट दिखनी चाहिए थी, उसकी जगह एक गहरी और ठंडी खामोशी ने ले ली।
उन्होंने अपनी लाठी की पकड़ को कुछ पलों के लिए ढीला किया और आसमान की तरफ देखकर एक गहरी साँस ली, जैसे वे मन ही मन वक्त के इस मोड़ का आकलन कर रहे हों।
पर अगले ही पल, खुद को संभालते हुए उन्होंने माहिरा की तरफ देखा। उनकी आवाज़ में वही पुराना, चट्टान जैसा हौसला लौट आया, "माहिरा, रोना बंद कर बेटी!
मैंने अयान को अपनी अमानत कहा था, और करीम की अमानत पर आँख उठाने वाले की उंगलियां काट दी जाती हैं। इस विवेक रॉय को लगता है कि शेर बूढ़ा हो गया है, तो दहाड़ना भूल गया है?"
चाचा ने तुरंत आगे बढ़कर नितिन के कंधे को दबोचा और बोले, "नितिन, चल! आज इस खाकी वर्दी और विवेक रॉय को दिखाते हैं कि मछुआरा बस्ती के लोगों का खून पानी नहीं हुआ है।
पूरी बस्ती को इकट्ठा कर, आज थाना भी घेरेगा और हिसाब भी होगा!"
करीम चाचा अपनी लाठी टेकते हुए पूरी ताकत से आगे बढ़ चले, लेकिन उस ठिठके हुए एक पल की खामोशी के पीछे क्या चल रहा था, यह सिर्फ वही जानते थे।
उधर दूसरी तरफ, शहर की वीआईपी सड़क पर दौड़ती उस काली गाड़ी के भीतर दिया अयान का मैसेज देखकर बेचैन हो चुकी थी। मोबाइल की स्क्रीन पर अयान का वो छोटा सा मैसेज चमक रहा था—"दिया, तुम तुरंत पास वाली पुलिस चौकी पर आ जाओ।"
दिया का दिमाग बिजली की तरह दौड़ने लगा। उसे अच्छी तरह अंदाज़ा था कि अयान को किसी बड़ी साज़िश के तहत फंसाया गया है।
उसने गाड़ी की पिछली सीट पर रखा अपना लैपटॉप अपनी जांघों पर खींचा और उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर पागलों की तरह चलने लगीं।
"नहीं... मैं अयान सर को कुछ नहीं होने दूंगी। उस गोदाम में उन्होंने मेरी जान बचाई थी, आज मेरा फर्ज़ है।" दिया की आँखों में एक अजीब सी ज़िद थी।
लैपटॉप की स्क्रीन पर वो करप्टेड वीडियो फाइल खुली हुई थी, जिसमें आर्यन अयान को इंजेक्शन दे रहा था, लेकिन उसके बाद विवेक रॉय का चेहरा धुंधला और करप्ट था।
दिया ने अपनी डिजिटल कोडिंग और डेटा रिकवरी की आखिरी हद तक जाकर उस फाइल के बाइनरी कोड को री-राइट करना शुरू किया। स्क्रीन पर 'डेटा रिकवरी: 85%... 90%... 95%...' की लकीर बढ़ रही थी।
दिया का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। तभी लैपटॉप ने एक तेज़ बीप की आवाज़ की और स्क्रीन पर लिखा आया—'डेटा रिकवरी सक्सेसफुल'।
जैसे ही वो वीडियो साफ़ हुआ, दिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। वीडियो में न सिर्फ विवेक रॉय का चेहरा साफ़ दिख रहा था, बल्कि वह पुलिस अफ़सरों को रिश्वत देने और अयान के वजूद को मिटाने की पूरी साज़िश को खुद अपने मुँह से कुबूल कर रहा था।
यह सिर्फ बेगुनाही का सबूत नहीं था, यह विवेक रॉय की पूरी सल्तनत को तबाह करने वाला डिजिटल बम था।
दिया ने बिना एक पल गंवाए गाड़ी के ड्राइवर से कहा, "गाड़ी सीधे पुलिस चौकी की तरफ मोड़ो! और शहर के बड़े मीडिया चैनलों और हमारे लीगल वकीलों को यह फाइल तुरंत फॉरवर्ड करो। आज तमाशा बीच सड़क पर होगा।"
इधर थाने के अंदर, कालकोठरी के ठीक बाहर का सन्नाटा अचानक भारी जूतों की धमक से गूँज उठा। अफ़सर और हवलदार, जो अयान के सिर से बहते खून को देखकर अभी-अभी घबराने लगे थे, तुरंत सीधे तानकर खड़े हो गए।
बाहर सड़क पर एक नहीं, बल्कि पाँच काली गाड़ियों का काफिला आकर रुका था। गाड़ियों के दरवाज़े खुलने और बंद होने की 'धड़ाधड़' आवाज़ें अंदर तक आ रही थीं।
केबिन का दरवाज़ा खुला और पूरे शहर को अपने पैरों तले दबाकर रखने वाला विवेक रॉय अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर महंगी सिगार का धुआँ तैर रहा था और आँखों में एक ज़हरीला घमंड था। उसके पीछे उसके अंगरक्षक और खाकी वर्दी के बड़े अधिकारी चल रहे थे।
विवेक रॉय ने सीधे उस अंधेरी गैलरी की तरफ कदम बढ़ाए जहाँ अयान बेसुध पड़ा था। अफ़सर ने लपककर ताला खोला। विवेक रॉय लॉक-अप की सलाखों के पार जाकर खड़ा हुआ और नीचे फर्श पर पड़े लहूलुहान अयान को देखा।
अयान के सिर के पीछे से निकला खून अब विवेक रॉय के महंगे जूतों की नोक को छू रहा था। विवेक रॉय ने अपनी सिगार का धुआँ अयान के चेहरे पर छोड़ते हुए एक ठंडी, क्रूर हँसी हँसी,
"तो... यही है वो कीड़ा, जिसने मेरे बेटे आर्यन पर हाथ उठाने की जुर्रत की थी? क्यों रे अयान, कहाँ गई तेरी वो दबंगई? अब तो उठने के लिए पैर भी नहीं बचे तेरे पास।"
अयान, जिसका शरीर पूरी तरह बेजान लग रहा था, उसके कानों में जब उस दुश्मन की आवाज़ पड़ी, तो उसकी बंद आँखों के कोनों से खून की एक बूंद और टपकी। उसने होश और बेहोशी के धुंधलके के बीच, अपनी भारी और लहूलुहान पलकों को धीरे-धीरे ऊपर उठाया।
उसकी आँखों की पुतलियाँ जो सफेद हो चुकी थीं, वे दोबारा विवेक रॉय के चेहरे पर टिक गईं। दर्द से उसका पूरा जबड़ा कांप रहा था, पर अयान ने अपने दाँतों के बीच फंसे खून को सीधा विवेक रॉय के जूतों पर थूक दिया।
उसकी आवाज़ भले ही धीमी थी, पर उस कालकोठरी की दीवारों को हिला देने के लिए काफी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा—
"विवेक रॉय... जूता साफ़ रखने का शौक है न तुझे? सँभाल के रख... क्योंकि बहुत जल्द, इसी थाने की मिट्टी में तेरी हस्ती और तेरा घमंड दोनों मिलकर खाक होने वाले हैं। हिसाब... अब शुरू हुआ है।"
विवेक रॉय के चेहरे का रंग गुस्से से काला पड़ गया। उसने अपनी पिस्तौल निकाली ही थी कि तभी थाने के बाहर एक साथ दो महातूफ़ान आकर टकराए।
बाहर मछुआरा बस्ती के सैकड़ों लोगों की चीख-पुकार और करीम चाचा की लाठी की धमक गूँज उठी, और दूसरी तरफ दिया की गाड़ियों के साइरन और मीडिया के कैमरों की फ्लैश लाइट ने पूरे थाने को घेर लिया।
** (लेखक की कलम से...)**
"कालकोठरी की दीवारें हिल चुकी हैं और नफ़रत की ये आग अब थाने की हदों को पार करके पूरे शहर में फैलने के लिए बेकरार है। एक तरफ करीम चाचा बस्ती की ताकत बनकर अयान के हक में खड़े हैं, तो दूसरी तरफ दिया का वो डिजिटल धमाका विवेक रॉय के पैर उखाड़ने के लिए तैयार है।
लेकिन क्या सब कुछ वैसा ही है जैसा सामने दिख रहा है, या फिर इस खौफनाक खेल के पीछे कोई और ही बिसात बिछाई जा रही है?
मेरे प्यारे दोस्तों, अब सवाल आप सबके लिए—
क्या करीम चाचा और बस्ती के लोग अयान को विवेक रॉय की गोली से बचा पाएंगे?
दिया का वो वीडियो जब दुनिया के सामने आएगा, तो क्या विवेक रॉय अपनी ताकत के दम पर उसे दबा पाएगा?
और सबसे बड़ी बात... क्या अयान इस जानलेवा चोट के बाद दोबारा उठ खड़ा हो पाएगा?
अपनी राय कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं दोस्त, क्योंकि सस्पेंस अभी बाकी है! फॉलो करना न भूलें और बने रहिए अगले पार्ट 34 में।"