Mitalika - Ek Adhuri Prem Kahani - Part 1 fiza saifi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Mitalika - Ek Adhuri Prem Kahani - Part 1

घना अंधेरा जंगल. रात का न जाने कौन- सा पहर था. चारों ओर ऐसा सन्नाटा पसरा हुआ था कि अपनी ही साँसों की आवाज किसी अनजान खतरे की आहट लग रही थी. आसमान को काले बादलों ने निगल लिया था और पेडों की ऊँची- ऊँची शाखाएँ किसी दानव की मुडी- तुडी उँगलियों की तरह हवा में झूल रही थीं.

अक्षय के पैरों की चमडी जगह- जगह से छिल चुकी थी. तलवों से रिसता खून सूखी पत्तियों पर लाल निशान छोडता जा रहा था, लेकिन उसे इस बात की परवाह नहीं थी. उसकी आँखों में सिर्फ एक ही सवाल था—इस अभिशप्त जंगल से बाहर निकलने का रास्ता कहाँ है?

वह पागलों की तरह भागता चला जा रहा था. उसकी साँसें बुरी तरह उखड चुकी थीं, सीना किसी धौंकनी की तरह ऊपर- नीचे हो रहा था. डर ने उसकी हालत ऐसी कर दी थी कि पैर कहीं पडते थे और वह गिर कहीं और जाता था. उसके कपडे जगह- जगह से फट चुके थे. काँटेदार झाडियों ने उसके शरीर पर अनगिनत खरोंचें बना दी थीं, मगर वह दर्द महसूस करने की हालत में नहीं था.

अचानक.

उसके कानों के बिल्कुल पास किसी की बर्फ जैसी ठंडी साँसों का स्पर्श हुआ.

अक्षय का पूरा शरीर सिहर उठा.

और फिर अंधेरे के सीने को चीरती हुई एक ऐसी आवाज उभरी, जिसने उसकी रूह तक को जमा दिया—

चले आओ. रणविजय.

आवाज किसी स्त्री की थी, लेकिन उसमें इंसानों जैसी कोई गर्माहट नहीं थी. वह आवाज मानो किसी कब्र की गहराइयों से निकलकर आ रही थी.

मैं. जमानों से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ.

तुम सिर्फ मेरे हो. हर जन्म में तुम्हें मेरा ही होना है.

मैं हूँ. तुम्हारी मितालिका.

अक्षय के शरीर में डर की एक भयानक लहर दौड गई. उसका गला सूख चुका था. काँपते हुए उसने धीरे- धीरे गर्दन उस दिशा में घुमाई, जहाँ से वह आवाज आ रही थी.

उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था.

लेकिन जैसे ही उसकी नजर उस तरफ पडी.

उसके मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई.

उसके चेहरे से महज एक इंच की दूरी पर एक भयानक स्त्री का चेहरा हवा में तैर रहा था.

उसका चेहरा कोयले की तरह काला था. आँखें खून से लबालब भरी हुई थीं और उनकी लाल चमक अंधेरे में अंगारों की तरह सुलग रही थी. उसके लंबे बिखरे बाल जमीन तक लटक रहे थे और उनमें जगह- जगह सूखा हुआ खून चिपका हुआ था.

उसके फटे हुए होंठों से ताजा खून टपक रहा था.

तभी वह चेहरा और करीब आया.

इतना करीब कि अक्षय को उसकी सडी हुई साँसों की दुर्गंध महसूस होने लगी.

और अगले ही पल.

उस स्त्री ने एक ऐसी भयावह चीख मारी कि जंगल का सन्नाटा चकनाचूर हो गया.

रणविजय.

मैं तुम्हें नहीं छोडूँगी.

इस जन्म में भी नहीं. और आने वाले किसी भी जन्म में भी नहीं.

तुम सिर्फ मेरे हो. सिर्फ मेरे.

उसकी चीख अक्षय के कानों को चीरती हुई उसके दिमाग में उतर गई.

अक्षय दर्द से कराह उठा. उसने दोनों हाथ अपने कानों पर रख लिए.

सब कुछ उसकी आँखों के सामने घूमने लगा.

और फिर.

एक भयानक चीख के साथ वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पडा.

नहीं.

अक्षय हडबडाकर बिस्तर पर उठ बैठा.

उसकी साँसें इतनी तेज चल रही थीं मानो अभी- अभी कई किलोमीटर दौडकर आया हो. उसके माथे से पसीना धारों की तरह बह रहा था.

काँपते हाथों से उसने साइड टेबल पर रखी घडी की ओर देखा.

रात के ठीक तीन बजे थे.

कमरे में ए. सी. पूरी रफ्तार से चल रहा था, फिर भी उसका शरीर पसीने से तर- बतर था.

उफ्फ. ये. ये सिर्फ सपना था. उसने खुद को समझाने की कोशिश की.

उसने घबराई हुई नजरों से पूरे कमरे को देखा.

वह अपने ही बेडरूम में था.

सब कुछ सामान्य था.

लेकिन फिर भी.

उसका दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि वह सिर्फ एक सपना था.

उसे अब भी ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह सचमुच उस जंगल में था. जैसे उन काँटों ने वास्तव में उसके शरीर को चीर डाला हो. जैसे वह आवाज अभी भी उसके कानों में फुसफुसा रही हो—

रणविजय.

अचानक उसके पैरों में तेज जलन हुई.

अक्षय ने फौरन कंबल हटाकर अपने पैर देखे.

और अगले ही पल.

उसके चेहरे का रंग उड गया.

उसके तलवों पर ताजे घाव थे.

जगह- जगह चमडी उधडी हुई थी. कुछ खरोंचों से तो अभी भी हल्का- हल्का खून रिस रहा था.

बिल्कुल वैसे ही घाव.

जैसे कोई घंटों तक किसी पथरीले और काँटों भरे रास्ते पर नंगे पैर चलता रहा हो.

अक्षय का गला सूख गया.

उसके हाथ काँपने लगे.

वह घावों को घूरता रह गया.

उसे अपने पूरे शरीर में दर्द महसूस हो रहा था. वही दर्द जो कई घंटों तक लगातार चलने के बाद होता है.

तभी.

कमरे में अचानक बर्फ जैसी ठंडी हवा का झोंका चला.

ए. सी. बंद था.

फिर भी पर्दे अपने आप हिलने लगे.

और उसी क्षण.

उसके कान के बिल्कुल पास एक जानी- पहचानी फुसफुसाहट गूँजी—

मैंने कहा था ना रणविजय.

मैं तुम्हें ढूँढ ही लूँगी.

अक्षय का खून मानो नसों में जम गया.

क्योंकि इस बार.

वह आवाज सपने में नहीं थी.

अक्षय का खून मानो उसकी नसों में जम गया.

उसका पूरा शरीर पत्थर की तरह जड हो चुका था. वह बिस्तर पर बैठा था, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी कि पीछे मुडकर देख सके. उसके कानों में अभी भी वही फुसफुसाहट गूंज रही थी—

मैंने कहा था ना रणविजय. मैं तुम्हें ढूँढ ही लूँगी.

कमरे का तापमान अचानक इतना गिर चुका था कि उसकी साँसों से धुंध निकलने लगी.

टप.

टप.

टप.

अचानक कमरे में किसी तरल चीज के गिरने की आवाज गूँजने लगी.

अक्षय ने काँपती नजरों से फर्श की ओर देखा.

और उसकी रूह काँप उठी.

छत से खून की लाल बूँदें टपक रही थीं.

वह घबराकर बिस्तर से नीचे उतरा और तेजी से पीछे हट गया. उसकी आँखें डर से फैल चुकी थीं.

टप.

टप.

टप.

खून की बूँदें अब तेजी से गिर रही थीं.

हिम्मत जुटाकर उसने गर्दन ऊपर उठाई.

लेकिन.

छत पर कुछ नहीं था.

एक भी निशान नहीं.

खून की एक भी बूँद नहीं.

अक्षय की साँस अटक गई.

उसने दोबारा नीचे देखा.

फर्श भी पूरी तरह साफ था.

जैसे अभी- अभी जो कुछ उसने देखा था, वह कभी हुआ ही न हो.

ये. ये क्या हो रहा है मेरे साथ.

वह बुदबुदाया.

तभी.

कमरे के कोने में रखे पुराने आईने से" ठक. की आवाज आई.

अक्षय की नजर अनायास ही आईने की तरफ चली गई.

आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था.

लेकिन.

अगले ही पल उसका दिल धडकना भूल गया.

आईने में खडा आदमी वह नहीं था.

वहाँ एक लंबा, राजसी वस्त्र पहने युवक खडा था.

चेहरे की बनावट अक्षय जैसी ही थी, मगर उसकी आँखों में अजीब- सी वीरता और दर्द था.

उसके माथे पर तिलक था और गले में भारी सोने की माला.

अक्षय स्तब्ध रह गया.

क. कौन हो तुम?

उसके मुँह से मुश्किल से शब्द निकले.

आईने में खडे युवक की आँखों में पीडा उभर आई.

धीरे- धीरे उसके होंठ हिले—

तुम मुझे भूल गए रणविजय.

अक्षय का दिल जोर से धडका.

न. नहीं. मेरा नाम अक्षय है.

अचानक आईने में दरार पड गई.

क्र्र्रैक.

एक लंबी दरार पूरे आईने में फैल गई.

फिर दूसरी.

फिर तीसरी.

और देखते ही देखते पूरा आईना मकडी के जाले की तरह टूट गया.

उसी क्षण कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं.

चारों तरफ घुप्प अंधेरा छा गया.

अक्षय का गला सूख गया.

उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाने के लिए जेब में हाथ डाला, लेकिन तभी.

उसे महसूस हुआ कि कमरे में वह अकेला नहीं है.

कोई उसके पीछे खडा था.

बहुत करीब.

इतना करीब कि उसके बिखरे हुए बाल अक्षय की गर्दन को छू रहे थे.

अक्षय की आँखों से डर के मारे आँसू निकल आए.

धीरे- धीरे उसके पीछे से किसी स्त्री की सिसकियाँ सुनाई देने लगीं.

पहले धीमी.

फिर तेज.

और फिर अचानक वे सिसकियाँ एक खौफनाक हँसी में बदल गईं.

हाहाहाहा.

आखिरकार.

मैंने तुम्हें ढूँढ लिया रणविजय.

अक्षय चीखते हुए पलटा.

लेकिन वहाँ कोई नहीं था.

कमरा पूरी तरह खाली था.

सिर्फ.

दीवार पर खून से लिखे कुछ शब्द चमक रहे थे—

अधूरा वचन.

अधूरा प्रेम.

अधूरी मृत्यु.

और उन शब्दों के नीचे धीरे- धीरे एक और पंक्ति उभरने लगी—

प्रतापगढ हवेली लौट आओ.

वहीं से सब शुरू हुआ था.

जैसे ही आखिरी शब्द उभरा, कमरे का दरवाजा अपने आप जोरदार धमाके के साथ बंद हो गया.

धडाम.

और उसी पल अक्षय के दिमाग में एक अजीब दृश्य कौंधा—

एक विशाल हवेली.

आग की लपटें.

सफेद लिबास में रोती हुई एक लडकी.

और तलवार लिए खडा एक युवक.

जिसका चेहरा बिल्कुल अक्षय जैसा था.

फिर सब कुछ गायब हो गया.

अक्षय घुटनों के बल जमीन पर गिर पडा.

उसकी साँसें बुरी तरह चल रही थीं.

लेकिन अब उसके मन में एक बात साफ हो चुकी थी—

यह कोई साधारण सपना नहीं था.

किसी पुराने जन्म का ऐसा रहस्य जाग चुका था, जो सदियों से दफन था.

और शायद. उस रहस्य का अंत उसकी मौत पर ही होने वाला था.

तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे जोर- जोर से झकझोरना शुरू कर दिया.

अक्षय. अक्षय उठो.

क्या हुआ तुम्हें? इतनी जोर से चीख क्यों रहे थे?

अक्षय ने घबराकर आँखें खोलीं.

उसकी साँसें अभी भी बुरी तरह उखडी हुई थीं.

कुछ पल के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है.

फिर उसकी नजर सामने खडे शख्स पर पडी.

स. समीर?

उसने हकलाते हुए कहा.

हाँ भाई, समीर! सामने खडा उसका रूममेट माथे पर बल डालकर बोला. और कौन होगा? यमराज?

अक्षय ने फटी- फटी आँखों से चारों तरफ देखा.

वह अपने ही कमरे में था.

खिडकी से आती धूप पूरे कमरे में फैली हुई थी.

न कोई खून.

न कोई टूटा हुआ आईना.

न दीवार पर लिखे हुए डरावने शब्द.

सब कुछ सामान्य था.

लेकिन. वो.

अक्षय बुदबुदाया.

वो- शो कुछ नहीं। समीर ने उसके माथे को छूकर देखा. सुबह के दस बज चुके हैं. आज ऑफिस नहीं जाना क्या?

अक्षय ने तुरंत साइड टेबल पर रखी घडी की तरफ देखा.

वाकई.

सुबह के दस बज रहे थे.

और ये कैसी शक्ल बना रखी है? समीर हँसते हुए बोला. ऐसे देख रहा है जैसे मैं कोई भूत- प्रेत हूँ. भाई, मैं समीर हूँ. तेरे सामने कोई चुडैल नहीं खडी।

समीर की बात सुनकर अक्षय के चेहरे पर एक फीकी- सी मुस्कान आई, लेकिन उसके मन का डर जरा भी कम नहीं हुआ.

क्योंकि उसे अब भी ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह अभी- अभी किसी भयानक जगह से लौटकर आया हो.

उसका सिर बुरी तरह भारी हो रहा था.

यार, पता नहीं मुझे क्या हो रहा है. अक्षय धीरे से बोला.

क्यों? क्या हुआ?

फिर वही सपना.

समीर ने आँखें घुमाईं.

ओह, तो फिर शुरू हो गया? पिछले एक हफ्ते से रोज यही सुन रहा हूँ मैं।

अक्षय कुछ नहीं बोला.

वह धीरे- धीरे बिस्तर से उठा और बाथरूम की तरफ बढ गया.

लेकिन तभी.

उसकी नजर अपने पैरों पर पडी.

और वह अचानक वहीं ठिठक गया.

उसके तलवों पर वही खरोंचें थीं.

वही ताजे घाव.

वही उधडी हुई चमडी.

ठीक वैसे ही जैसे उसने सपने में देखे थे.

अक्षय का दिल जोर से धडकने लगा.

उसने झुककर ध्यान से घावों को देखा.

यह कोई भ्रम नहीं था.

घाव सचमुच मौजूद थे.

न. नहीं.

उसके होंठ काँप उठे.

ये कैसे हो सकता है?

क्या हुआ? समीर ने पूछा.

अक्षय ने तुरंत अपने पैर छिपा लिए.

क. कुछ नहीं।

लेकिन उसके चेहरे का रंग उड चुका था.

समीर कुछ देर उसे देखता रहा, फिर कंधे उचकाकर कमरे से बाहर चला गया.

जल्दी तैयार हो जा. आज नई project Meeting है. बॉस पहले ही तेरे पीछे पडा हुआ है।

दरवाजा बंद हो गया.

अब कमरे में सिर्फ अक्षय था.

और उसका बढता हुआ डर.

वह धीरे- धीरे वॉशरूम के आईने के सामने पहुँचा.

ठंडे पानी के छींटे चेहरे पर मारे.

फिर सिर उठाकर आईने में देखा.

और उसी पल.

उसका दिल धडकना भूल गया.

आईने में उसका प्रतिबिंब नहीं था.

कुछ सेकंड के लिए वहाँ वही राजसी वेशभूषा पहने युवक खडा दिखाई दिया.

माथे पर तिलक.

आँखों में दर्द.

और होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान.

रणविजय.

एक धीमी फुसफुसाहट उसके कानों में गूँजी.

अक्षय चीखते हुए पीछे हट गया.

लेकिन अगले ही पल आईना सामान्य हो चुका था.

अब वहाँ सिर्फ वही खडा था.

उसका अपना डरा हुआ चेहरा.

अक्षय हाँफने लगा.

मैं पागल हो रहा हूँ.

उसने खुद से कहा.

लेकिन तभी.

उसकी नजर वॉशबेसिन के नीचे गिरे एक छोटे से कागज पर पडी.

वह कागज पहले वहाँ नहीं था.

काँपते हाथों से उसने उसे उठाया.

उस पर लाल रंग से सिर्फ चार शब्द लिखे थे—

प्रतापगढ हवेली लौट आओ.
और नीचे.

खून जैसी लाल स्याही से बना एक नाम—

मितालिका"
अक्षय के हाथ से वह कागज छूटकर जमीन पर गिर पडा.

क्योंकि यह नाम.

वही नाम था जो उसने सपने में सुना था। मैं हूँ. तुम्हारी मितालिका.

अक्षय के हाथ काँपने लगे.

उसने घबराकर वह कागज दोबारा उठाया. उसकी आँखें बार- बार उस नाम पर टिक जा रही थीं.

मितालिका.

उसके होंठ अनायास ही उस नाम को दोहरा बैठे.

अचानक.

उसके दिमाग में किसी हथौडे की तरह एक तेज दर्द उठा.

आह्ह.

अक्षय ने अपना सिर पकड लिया.

और अगले ही पल उसकी आँखों के सामने कुछ अजीब दृश्य चमकने लगे.

एक विशाल राजमहल.

चारों तरफ जगमगाते दीप.

संगीत की धुनें.

और लाल जोडे में सजी एक बेहद खूबसूरत युवती.

उसकी बडी- बडी आँखें प्रेम से किसी को निहार रही थीं.

फिर दृश्य बदला.

वही युवती अब रो रही थी.

उसकी आँखों से आँसुओं की जगह खून बह रहा था.

वह दोनों हाथ आगे बढाकर किसी से कह रही थी—

रणविजय. मत जाओ.

तुमने वचन दिया था.

अचानक दृश्य टूट गया.

अक्षय हाँफते हुए घुटनों के बल फर्श पर गिर पडा.

उसका पूरा शरीर पसीने में डूब चुका था.

ये सब क्या है.

उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ हो क्या रहा है.

तभी बाहर से समीर की आवाज आई.

ओए! ऑफिस नहीं जाना क्या? आज ही नौकरी से निकलवाने का इरादा है?

अक्षय ने जल्दी से वह कागज अपनी जेब में रख लिया.

कुछ देर बाद वह किसी तरह तैयार होकर समीर के साथ ऑफिस के लिए निकल गया.

पूरे रास्ते अक्षय का ध्यान कहीं और ही था.

सडक पर दौडती गाडियाँ.

लोगों की भीड.

हॉर्न की आवाजें.

सब कुछ उसे धुँधला- धुँधला सा महसूस हो रहा था.

बार- बार उसकी जेब में रखा वह कागज उसे बेचैन कर रहा था.

तभी उसकी नजर सडक किनारे लगे एक पुराने पोस्टर पर पडी.

और वह अचानक जम गया.

पोस्टर किसी पर्यटन प्रदर्शनी का था.

उस पर एक पुरानी, खंडहर बन चुकी हवेली की तस्वीर छपी थी.

तस्वीर देखते ही अक्षय का दिल जोर से धडक उठा.

क्योंकि वह हवेली वही थी.

बिल्कुल वही.

जो उसने सपने में देखी थी.

पोस्टर के नीचे लिखा था—

प्रतापगढ की रहस्यमयी हवेली"
अक्षय के हाथ से उसका मोबाइल लगभग छूट गया.

क्या हुआ? समीर ने पूछा.

वो. वो पोस्टर.

समीर ने एक नजर पोस्टर पर डाली.

अरे, ये? इसके बारे में तो मैंने भी सुना है. कहते हैं वहाँ भूत- प्रेतों का साया है. कई लोग रात में अजीब चीजें देखने का दावा करते हैं।

अक्षय ने चौंककर उसकी तरफ देखा.

तुम जानते हो इसके बारे में?

थोडा- बहुत। समीर बोला. सुना है करीब दो सौ साल पहले वहाँ कोई राजघराना रहता था. किसी राजकुमार और एक लडकी की प्रेम कहानी थी. फिर अचानक दोनों की मौत हो गई. उसके बाद से वो हवेली वीरान पडी है।

अक्षय का गला सूख गया.

राजकुमार का नाम. क्या था?

समीर ने कुछ पल सोचा.

शायद. रणवीर या रणविजय जैसा कुछ था।

धक्.

अक्षय का दिल मानो एक पल के लिए रुक गया.

उसके कानों में फिर वही आवाज गूँज उठी—

चले आओ रणविजय.

मैं तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ.

उसी क्षण उसकी जेब में रखा कागज अपने आप गर्म होने लगा.

इतना गर्म कि अक्षय की त्वचा जलने लगी.

उसने घबराकर कागज बाहर निकाला.

और उसे देखते ही उसकी आँखें फैल गईं.

क्योंकि उस पर पहले जो लिखा था, वह बदल चुका था.

अब वहाँ नए शब्द उभर आए थे—

तीन दिन शेष. पूर्णिमा की रात. प्रतापगढ लौट आओ. अन्यथा इस बार मृत्यु निश्चित है.