प्रताप का राज्यारोहण और मेवाड़ की किलेबंदी
चित्तौड़ को खोने के चार वर्ष के बाद, 1572 ईसवी में, पचास वर्ष की आयु में महाराणा उदय सिंह की मृत्यु गोगूँदा में हुई। उनके कुल पच्चीस पुत्र थे, जो सभी राजपुत्र थे। यही कारण बना मेवाड़ में संभावित गृहयुद्ध का।
उदय सिंह ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही भाटी रानी, धीर बाई के पुत्र जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित करके इस गृहयुद्ध का बीज बो दिया। यह निश्चित रूप से मेवाड़ की जनतंत्रवादी परंपरा और सामंतों की दूरदर्शिता ही थी, जिसके कारण महाराणा उदय सिंह द्वारा हुए इस अन्याय के विरोध में सभी सामंत तुरंत ही मंत्रणा के लिए एकत्रित हुए।
निम्नलिखित विवरण के आधार पर हम उदय सिंह की मृत्यु से लेकर प्रताप के राज्यारोहण तक की सभी घटनाओं पर चर्चा करेंगे–
मेवाड़ में सिंहासन कभी रिक्त नहीं रखा जाता था। मृत राजा का अंतिम संस्कार और नए राजा का राज्याभिषेक एक ही समय पर होता था, एक ही पुरोहित के घर पर। जब प्रताप के भाई और सामंत, मृत उदय सिंह का अंतिम संस्कार कर रहे थे, तब जगमाल को अनुपस्थित देख ग्वालियर के राजा रामशाह तँवर ने कुँवर सगर से पूछा, “जगमाल कहाँ है ?”
सगर ने उत्तर दिया, “क्या आप नहीं जानते ? वैकुंठवासी महाराणा ने उनको राज्य का मालिक बनाया है।”
सोनगरा राजकुमार और जालौर के राव, दोनों ने ही मेवाड़ के वृद्ध और सम्माननीय चूँडावतों के सरदार किस्तना से पूछा कि जगमाल को राजसिंहासन पर बैठाकर उन्होंने इतना बड़ा अन्याय कैसे होने दिया ?
किस्तना ने उत्तर दिया, “जब एक बीमार व्यक्ति जीवन के अंत समय में हो और वह दूध माँगे, तो मना क्यों करना?”
किस्तना ने यह भी कहा कि सोनगरा का भानजा मुझे पसंद है और मैं भी प्रताप के ही नाम का समर्थन करता हूँ।
सभी सामंत एकत्रित हुए और उनके बीच इस विषय को लेकर काफी उग्र विचार-विमर्श होने लगा। अक्षय राज सोनगरा ने रावल कृष्णदास और रावल सांगा से कहा कि यदि जगमाल को राजा बनाना है, तो इसमें आप लोगों का समर्थन आवश्यक है।
“एक तरफ हमारे सामने अकबर जैसा विकट शत्रु है, चित्तौड़ हमारे हाथ से जा ही चुका है, मेवाड़ बंजर हो चुका है, यदि राजपरिवार में गृहयुद्ध होता है तो मेवाड़ का नाश निश्चित है और शीघ्र ही हम सब मुगलों के दास होंगे।” सोनगरा ने कहा।
दोनों ही सामंतों ने सोनगरा की बात का समर्थन किया और कहा कि प्रताप ज्येष्ठ हैं, योग्य हैं और वीर हैं, तो इन्हें किस दोष के कारण राज्याभिषेक से वंचित किया जा रहा है?
उधर, प्रताप कभी भी परिवार में रक्तपात नहीं चाहते थे। उन्होंने इसे नियति का लेख मान, अपने प्रिय चेतक पर बैठकर सुदूर सिंध में जाने के लिए काठी चढ़ा दी। तब सामंत उनके पास आए और उन्हें बताया कि सभी ने एकमत से उन्हें ही मेवाड़ का उत्तराधिकारी चुना है। प्रताप अपने पिता की इच्छा का अपमान नहीं करना चाहते थे, सो बोले, “दाजीराज सा का आदेश है जगमाल ही गद्दी पर बैठे। मैं उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकता।”
मेवाड़ के सामंत बोले, “अवहेलना आप नहीं, हम कर रहे हैं। जगमाल के राजा बनने से मेवाड़ का विनाश निश्चित है।”
भारी मन से प्रताप ने स्वीकृति दे दी।
रावल किस्तना, अक्षय राज और ग्वालियर के रामशाह तँवर के साथ वहाँ पहुँचे, जहाँ जगमाल सिंहासन पर बैठकर इतरा रहा था। उन्होंने जगमाल के शस्त्र उससे ले लिये और थोड़े बहुत विवाद के बाद जगमाल को सिंहासन से हटा दिया गया।
राजवंश के बड़े किस्तना ने कहा, “आपसे गलती हुई है महाराज, यह जगह आपके बड़े भाई की है।”
रामशाह तँवर ने जगमाल की बाँह पकड़कर उसे सिंहासन से उतार दिया।
फिर प्रताप को तलवार के घेरे में लेकर रावल किस्तना ने तीन बार जमीन से तलवार को छूकर उन्हें मेवाड़ का अगला महाराणा घोषित किया।
क्या कोई मूल्य है, जो हम हिंदू चुका सकते हैं उन सामंतों की निष्ठा का, जिन्होंने देशहित में अपने राजा की आज्ञा की भी अवहेलना कर दी ?
यदि मेवाड़ के सामंत उस दिन दुर्बलता या अन्यमनस्कता दिखाते तो प्रताप सदा के लिए खो जाते। प्रताप के खोने का अर्थ केवल एक होता– हिंदू समाज का दासत्व।
उस महिमाशाली दिन, मेवाड़ के देवतुल्य सामंतों ने अपनी दूरदर्शिता व साहस से हिंदू धर्म व देश बचा लिया।
प्रताप के राज्यारोहण का प्रकरण हिंदू समाज में जनतांत्रिक मूल्यों की गहरी पैठ की भी पुष्टि करता है। यद्यपि हिंदू समाज में राजा को भगवान् विष्णु का प्रतिनिधि माना गया है तथा मेवाड़ में महाराणा को भगवान् शिव का दीवान, तथापि, राजा या राणा को धर्म से च्युत होने की स्वतंत्रता नहीं थी।
सस्ती भावुकता व खोखली राज्यनिष्ठा में न पड़कर मेवाड़ के सामंतों ने उस दिन धर्म व देश को सर्वनाश से बचा लिया।
दूसरी बार प्रताप का राज्याभिषेक मेवाड़ के सामंतों द्वारा कुंभलगढ़ में गाजे-बाजे के साथ किया गया। बत्तीस वर्ष की आयु में, महाराणा प्रताप सिंह, सिसोदिया वंश के मुसलमानों के साथ चल रहे अस्तित्व के संघर्ष के ठीक बीच में मेवाड़ के शासक बने।
प्रताप का राज्यारोहण, सर्वाधिक कठिन समय में एक ओर मनुष्य की दुर्बलता तथा दूसरी ओर उसकी संकल्पशक्ति का विचित्र मिश्रण है। उदय सिंह के कठिन व हिंसा से सने बाल्यकाल से मेवाड़ के महाराणा बनने तक की यात्रा ने उन्हें (उदय सिंह जी) शक्की और अस्थिरचित्त व्यक्ति बना दिया था। संभावना है कि वे स्वयं को परिस्थितियों से पीड़ित व्यक्ति मानते रहे और उन्होंने चाटुकारों के कहने पर कई अनुचित निर्णय लिये।
वहीं दूसरी ओर प्रताप ने अपने अपमान और बाल्यकाल के कड़वे अनुभवों को अपने चारित्रिक बल से उत्थान की सीढ़ी बनाया और सभी शंकाओं पर विजय प्राप्त करके स्थिरचित्त और दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व का निर्माण किया। प्रताप के बाल्यकाल से ही उनका जीवन अस्थिर था, किंतु उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मुनि रूपनाथ की आध्यामिक शिक्षा तथा पथ-प्रदर्शन से प्रताप कभी अपनी मातृभूमि की सेवा के लक्ष्य से विमुख नहीं हुए।
कर्नल टॉड के कथनानुसार, प्रताप प्रायः दुःखी होकर कह बैठते थे–“मेरे और दादो सा, राणा सांगा के बीच में यदि दाजीराज सा (उदय सिंह) नहीं होते, तो किसी तुर्क की क्या सामर्थ्य कि राजस्थान को आदेश दे!”(टॉड, खंड 1-पृष्ठ 266)
प्रताप से पूर्व बीती शताब्दी में हिंदू समाज ने एक नूतन स्वरूप धारण किया था। गंगा और यमुना के बीच के बिखरे हुए राज्य फिर से उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर बढ़ने लगे थे। आमेर और मारवाड़ का प्रभुत्व और सत्ता इतनी शक्तिशाली हुई कि वे साम्राज्यवादी शेरशाह सूरी से अकेले ही भिड़ गए। हिंदुओं को अब एक ऐसा राजा चाहिए था, जो इस्लाम से उन्हें पूर्ण मुक्ति दिला सके।
हिंदुओं को ऐसा ही नायक राणा सांगा में मिला, जिनमें हर वह गुण था, जिसके कारण लोग सहज ही उनके आज्ञाकारी हो जाते थे और जिनके कुल की महिमा तथा गौरव हिमालय से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक सभी को ज्ञात था। इन हिंदू राज्यों के पास ऐसे नायक की आज्ञा मानने के पीछे बडे कारण थे, क्योंकि ऐसे ही नायकों के अभाव में उनका पैठक सम्मान धूमिल हुआ था। और ऐसा ही नायक हिंदू राजाओं ने सांगा के पौत्र प्रताप में भी पाया होता, यदि उदय सिंह, सांगा व प्रताप के बीच में न जन्मे होते या उनका शत्रु, अकबर से थोड़ा कम चालाक व नृशंस होता।
भाग्य ने प्रताप को एक ऐसी विषम परिस्थिति में ला खड़ा किया था, जैसी उस समय के किसी भी हिंदू राजा को नहीं देखनी पड़ी थी। प्रताप व सांगा के बीच का समय मेवाड़ राजघराने में गृहयुद्ध का काल था। निष्ठाएँ बँट चुकीं थीं। राजस्व व व्यापार बुरी तरह से नष्ट हो चुके थे। स्वेच्छाचारी लुटेरे व सामंत उभर आए थे। प्रताप को न केवल अपने परिवार की अंतर्कलह को सुलझाना था, बल्कि सामंतों को भी फिर से एकजुट कर, उस समय के सबसे हिंसक व दुर्दात हत्यारे अकबर से भी मेवाड़ को बचाना था।
उधर अपने अपमान के बाद, मेवाड़ के अयोग्य राजकुमार जगमाल ने दिल्ली की ओर मुँह किया और मेवाड़ के सामंतों के निर्णय को उचित ठहराते हुए अपने ही वंश के सबसे बड़े शत्रु अकबर की शरण में जा पहुँचा।
यह मेवाड़ के सामंतों और सरदारों की दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने राज्यादेश के विपरीत जाकर, अयोग्य जगमाल के स्थान पर योग्य प्रताप को राजा बनाया।
अकबर द्वारा जगमाल को भीलवाड़ा में जहाजपुर की जागीर प्रदान की गई। जगमाल का विवाह सिरोही के राजा मान सिंह की पुत्री से हुआ था, वह नहीं जो वंशहीन 1571 ईसवी में मृत्यु को प्राप्त हुआ।
जगमाल ने सिरोही को वहाँ के उत्तराधिकारी सुरताण सिंह से छीनने के लिए अकबर की सहायता माँगी। तब अकबर ने जगमाल की सहायता हेतु अपने दो सेनानायकों के साथ सेना रवाना की।
17 अक्तूबर, 1583 को इस सेना ने आबू पर आक्रमण किया, जहाँ सुरताण ने अपनी किलेबंदी कर रखी थी और इसी जगह राजस्थान का एक बहुत गौरवशाली युद्ध हुआ। अकबर की शक्तिशाली सेना को राव सुरताण की छोटी सी सेना ने बुरी तरह पराजित किया। अकबर की ओर से आए दोनों सेनानायक राय सिंह और कोली सिंह, इस युद्ध में जगमाल के साथ सुरताण द्वारा मारे गए और इसके बाद सुरताण, सिरोही के निर्विवाद राजा बने। इसी के साथ प्रताप और मेवाड के लिए उत्पन्न होने वाली एक चुनौती का अंत हुआ।
प्रताप मेवाड के राजा बने और उन्होंने इस वंश की पद्वियों इत्यादि को धारण किया। किंतु उन्हें एक ऐसा राज्य प्राप्त हुआ था, जिसकी कोई राजधानी नहीं थी, संसाधन नहीं थे। सामंत उदासीन थे और प्रजा हतोत्साहित थी। फिर भी प्रताप के पास अपने वंश के संस्कार और किसी भी चुनौती का सामना करने की दृढ़ इच्छाशक्ति थी।
प्रताप ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार करने का मन बनाया और अपने वंश के गौरव तथा प्रभुत्व को दोबारा प्राप्त करने पर बहुत सोच-विचार किया। अकबर स्वयं दिल्ली में अस्थिर था, किंतु उसने अपने मित्रों और संधियों के आधार पर अपना वर्चस्व बहुत जल्दी बढ़ा लिया था।
आमेर, बीकानेर और बूँदी के राजाओं ने अकबर के साथ संधि कर ली। प्रताप को यह स्वीकार करना पड़ा कि अब उनका संघर्ष केवल अधर्मी तुर्कों से ही नहीं, वरन् अपने स्वधर्मी भाइयों से भी होगा। यह एक ऐसा तथ्य था, जो तुर्कों के साथ प्रताप के सभी युद्धों के समय प्रताप के मन पर भारी था। जगमाल का भाई सगर भी प्रताप से अलग हो तुर्कों से जा मिला।
चित्तौड़ के तीसरे साके के घावों ने मेवाड़ की चेतना को विदीर्ण कर दिया था तथा मेवाड़ की प्रजा भी जौहर की स्मृति से आहत व हतोत्साहित थी। प्रताप को घायल मेवाड़ विरासत में प्राप्त हुआ था। किंतु साथ ही उनके सहयोग के लिए वीर जयमल राठौर और पत्ता चूँडावत के पुत्रों सरीखे योद्धा भी आ गए थे। सलूंबर, देवगढ़, आमेट इत्यादि के सामंतों ने भी प्रताप के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।
ग्वालियर के राजा रामशाह तँवर उनके मुख्य सेनानायक बने और देलवाड़ा के ठाकुर उनके विश्वासपात्र नायकों में से एक थे। मेवाड़ के मुख्य कोषाध्यक्ष, ओसवाल जैन भामाशाह केवल एक योग्य कोषपाल ही नहीं, वरन् एक वीर योद्धा भी थे। उन्होंने अपने वीर भाई ताराचंद के साथ प्रताप के प्रति निष्ठा रखने की शपथ ली। तुर्क साम्राज्यवाद के विरुद्ध हल्दीघाटी तथा दिवेर दोनों ही युद्धों में वित्तीय व्यवस्था तथा युद्ध नीति का प्रभार भामाशाह व ताराचंद ने सँभाला।
प्रताप के भाई शक्ति सिंह का भी उनके जीवन में विशेष स्थान था। चाहे वे युवावस्था में प्रताप को छोड़कर चले गए थे, किंतु प्रताप की यशोगाथा में उनका विशेष व अविस्मरणीय स्थान है। शक्ति सिंह के विषय में इसी पुस्तक में भिन्न-भिन्न स्थानों पर विवरण दिया गया है। शक्ति सिंह जीवनपर्यंत प्रताप व मेवाड़ के प्रति निष्ठावान रहे। बहुत अधिक संभावना इस बात की है कि वे अकबर के दरबार में प्रताप की गुप्तचरी करते थे। हर बार मेवाड़ पर होने वाले आक्रमणों की पूर्व सूचना वे प्रताप तक पहुँचाते थे।
हल्दीघाटी में प्रताप की जीवनरक्षा के प्रकरण के बाद अकबर ने शक्ति सिंह से बहुत सवाल-जवाब किए। तब शक्ति सिंह अपने परिवार व सैनिकों सहित प्रताप से आ मिले। शक्ति सिंह के 17 पुत्र हुए, जो कि ‘शक्तावत’ कहलाए तथा पीढ़ियों तक प्रताप व उनके वंशजों के साथ मुगलों से लड़े।
1572 में राज्यारोहण से लेकर 1597 में उनके महाप्रयाण तक, अपने जीवन के पच्चीस वर्षों तक प्रताप ने एक बड़े साम्राज्यवादी शत्रु के सामने पूर्ण दृढ़ता से संघर्ष कर अंततः उसे पराजित किया। उनके अपने लोगों ने सुख व सत्ता के लोभ में उन्हें छोड़ दिया, किंतु प्रताप ने अपनी भूमि व संकल्प नहीं छोड़ा और वनों में केवल भीलों के आसरे ही संघर्ष किया।
प्रताप ने मातृभूमि हेतु युद्ध लड़े, अपने शत्रुओं का विनाश किया, काल और कपट ने उनके मित्र छीन लिये, एक शिला से दूसरे शिला पर दौड़ते फिरे, मैदानों में भीषण युद्ध से लेकर पर्वतीय घाटियों में गुरिल्ला छापामार युद्ध किया, अपने परिवार और सेना का वन के कंद-मूल फलों से पोषण किया और बालक अमर सिंह को उन्हीं वनों में पाला, घातक जीव-जंतु और निर्मम मानवों से भी सामना हुआ। प्रताप ने तब भी अपने अद्भुत नेतृत्व-कौशल और संकल्प-शक्ति से तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष में अपनी प्रजा और सेना का मनोबल बनाए रखा।
जितनी उन पर विपत्तियाँ बढ़ीं, उसी मात्रा में उनका संकल्प भी बढ़ता गया, क्योंकि वे उस वचन से बँधे थे, जो उन्होंने स्वयं से ही लिया था, “अपनी माँ के दूध को मैं लज्जित नहीं होने दूँगा।”
बाप्पा रावल का वंशज, किसी नश्वर मनुष्य के आगे झुक जाएगा, यह विचार ही अतर्क्य था। यहाँ मेवाड़ के महान सामंतों और साधारण प्रजाजनों को भी श्रेय देना आवश्यक है, जो हर परिस्थिति में अपने राजा के साथ खड़े रहे।
असहनीय विपत्तियाँ, भयंकर विपन्नता व साक्षात् मृत्यु ही जब मुँह बाए खड़ी थी, मेवाड़ के लोग अनजान श्रद्धा से भरे अपने महाराणा के पीछे खड़े रहे। मेवाड़ ने 25 फरवरी, 1568 को चित्तौड़ के तीसरे साके-जौहर में अकबर द्वारा किए गए नरसंहार को सहन किया था, लेकिन फिर भी वह उस राख, अवशेष और मृत शरीरों के ढेर से मुक्त होकर अपनी स्वाधीनता और गौरव के लिए उठ खड़ा हुआ।
कालजयी, महान योद्धा, महाराणा प्रताप सिंह के कारण ही भारतीय उपमहाद्वीप में मेवाड़, हिंदुओं के आशादीप के समान प्रज्वलित हुआ।
एक ऐसे व्यक्ति, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और दृढ़-संकल्प से भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी दमन के प्रयासों की पूरी पटकथा को ही बदल दिया।
एक ऐसे व्यक्ति, जो न तो उतावले थे, न ही दीर्घसूत्री।
एक ऐसे सचरित्र पुरुष, जिन्हें प्रजा के धन और परिश्रम पर स्वयं विलासितापूर्ण जीवन जीना स्वीकार नहीं था।
वे एक महायोगी थे, जिन्होंने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए एक योद्धा का दायित्व निभाया और भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदुओं पर जो दासता के काले बादल छाए थे, उनसे लड़ने में अपना जीवन स्वाहा कर दिया।
एक ऐसे वैरागी व्यक्ति, जिन्होंने एक महाराणा को प्राप्त सभी सुखों और ऐश्वर्य को सहज ही त्याग दिया। वे तुर्कों के साथ संधि कर सकते थे, किंतु उन्होंने कुछ वर्षों के दासतापूर्ण जीवन के स्थान पर संघर्ष भरा जीवन चुना।
एक सच्चे नायक, जिन्होंने अपने बुद्धिमान और निष्ठावान सामंतों का सम्मान किया और नए युवाओं को मेवाड़ के भविष्य के लिए तैयार किया। एक सच्चे स्पार्टन जो रात को अपने सिर के नीचे मलमल के तकिए के स्थान पर भाला रखकर सोते थे।
मेवाड़ के राजा बनते समय प्रताप ने चार प्रतिज्ञाएँ ली थीं, जो मेवाड़ की लोककथाएँ बन गईं और मेवाड़ जैसे छोटे से राज्य को मुगल उपद्रवियों से संघर्ष हेतु तैयार किया–
1. चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने तक सभी भोग-विलास की वस्तुओं का उपभोग बंद किया जाएगा।
2. सोने-चाँदी के थाल इत्यादि के स्थान पर पत्तों से बनी पत्तलों का उपयोग होगा।
3. बिस्तरों पर कपड़े और नरम मलमल के स्थान पर पत्ते और घास बिछाकर सोया जाएगा।
4. युद्ध में बजने वाले नगाडे राजसी सवारी के आगे के स्थान पर पीछे की ओर बजाए जाएँगे।
मेवाड़ की विपरीत स्थिति और उसको सुधारने के लक्ष्य को सतत स्मरण रखने के लिए ऐसा किया गया। मेवाड की प्रजा को बोध था कि उनका राजा इतना कष्टपूर्ण जीवन जी रहा है, इसीलिए वे भी उस यात्रा में प्रताप के साथ रहे।
राज्यारोहण : प्राथमिक किलेबंदी
सर्वप्रथम प्रताप ने राजस्व उत्पन्न करने और उसके सम्यक् नियोजन पर विशेष ध्यान दिया। सामंतों को नए नियमानुसार व्यय करने के लिए निर्देशों के साथ नए अनुदान दिए गए। कुंभलगढ़ को राजधानी बनाया गया और सुदृढ़ किया गया। इसी प्रकार गोगँदा और पर्वतों पर बने अन्य दुर्गों का भी पुनर्निर्माण कर उन्हें सुदृढ़ किया गया। मैदान में परिस्थितियाँ सही नहीं होने के कारण प्रताप ने अपने पूर्वजों के पुरातन तरीके को अपनाया और अपनी प्रजा को पर्वतीय क्षेत्रों में जाने के लिए कहा।
प्रताप अपने निरंतर प्रयासों एवं कुशल क्रियान्वयन से राजाज्ञाओं का पालन करवाते हुए स्वयं को भी तुर्क साम्राज्यवादियों से लंबा युद्ध लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे।
बनास और बेड़च के बीच की उपजाऊ भूमि खाली की जा रही थी, उसे ‘बे-चिराग’ अर्थात् बिना दीपक के, अंधकार में छोड़ने का आदेश दिया गया।
इससे मेवाड़ पर आक्रमण करते मुगलों को अपने साथ ढेरों खाद्य सामग्री इत्यादि साथ लाने पर मजबूर होना पड़ा। न तो मुगलों को स्थानीय रसद सामग्री मिलती और न ही स्थानीय लोगों की निर्मम हत्या का अवसर, जो उस समय तुर्कों के लिए सहज बात थी। प्रताप ने मेवाड़ की जनता पर कठिन नियम पूरी कठोरता से स्वयं लागू किए।
एक बार प्रताप अपने कुछ अश्वारोहियों के साथ अपने आदेशों की अनुपालना का निरीक्षण करने गए। मेवाड़ की हरी-भरी धरती पर मरुस्थल जैसी भयावह शांति फैली हुई थी, मक्के के खेतों में जंगली घास उग आई थी, कँटीले बबूल के पेड़ राज्य के मुख्य मार्गों का गला दबा रहे थे, गाँवों में घर, जंगली जानवरों का निवास स्थान बन गए थे। जहाँ-तहाँ जंगली जीव-जंतु विचरने लगे थे।
इस जंगल के बीच एक अकेला चरवाहा अपने पशुओं को लेकर बनास के किनारे किसी समय हरे-भरे रहे ऊँटाला के चरागाहों में लेकर निकला, जहाँ अब इक्के-दुक्के ही हरे पेड़ थे। थोड़ी-बहुत पूछताछ के बाद उस चरवाहे को मारकर उसके शव को पेड़ पर लटका दिया गया।
प्रताप का यह हर उस व्यक्ति को संदेश था, जो मेवाड़-मुगल संघर्ष के प्रति उदासीन था या उसे हलके में ले रहा था।
कर्नल टॉड के अनुसार– “इतनी कठोर देशभक्ति से प्रताप ने राजस्थान के उपवन को मुसलमान विजेताओं के लिए किसी काम का नहीं छोड़ा।”
मुगल शासन और यूरोपियन व्यापारियों के बीच स्थापित व्यापार-विपणन का रास्ता मेवाड़ होकर सूरत तथा अन्य समुद्र तटों तक जाता था और इसका लाभ उठाकर मेवाड़ी सैनिक उनके सामान व धन को लूट लेते थे। हम केवल उस सेना व प्रजा के संकल्प की दृढ़ता की कल्पना कर सकते हैं, जो प्रताप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर, तुर्क आक्रमणकारियों के जीवन को नरक बना रही थी।
1572 ईसवी में मेवाड़ का सिंहासन सँभालने और 1583 ईसवी में दिवेर के युद्ध के मध्य मेवाड के आमजन, पर्वतीय क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके थे। हजारों नए गाँवों की बसावट शुरू हुई। इसका एक परिणाम रहा, मेवाड के आमजन तथा पर्वतीय वनों में रहने वाले आदिवासी भीलों के बीच संपर्क। महिमाशाली भीलों ने खुले हृदय से जनता का स्वागत किया, उन्हें पर्वतीय वनों से प्राप्त भोजन उपलब्ध करवाया और उनकी रक्षा भी की।
मेवाड़ के जनसमुदाय को मैदानों से पर्वतों में बसाने में भीलों ने भरपूर मदद की, इसीलिए शताब्दियों से मेवाड़ के राजचिह्न पर भील जनजाति को भी अंकित होने का गौरव प्राप्त है।
प्रताप से प्रेरणा लेकर सामंतों और सरदारों ने भी अपने इन असमर्थ प्रजाजनों को कर-संग्रह में छूट दे दी। आम जनों के हृदय में प्रताप के लिए जितना प्रेम और निष्ठा थी, वह मानव इतिहास में अन्य किसी राजा के लिए कभी नहीं हुई। सेनाएँ युद्ध लड़ती हैं, सैनिक मरते और मारते हैं कि सम्मान व संपत्ति मिले, किंतु एक विशाल राज्य की पूरी प्रजा एकजुट होकर, एक विदेशी आक्रांता के विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भागीदारी निभाए, ऐसा केवल मेवाड़ में हुआ है।
यदि अन्य किसी राजा ने ऐसे कठोर नियम प्रजा पर लगाए होते तो निश्चित रूप से मेवाड़ में विश्वासघातियों और विद्रोहियों की संख्या इतनी बढ़ जाती कि चारों ओर केवल अराजकता का राज होता। इससे ज्ञात होता है कि प्रताप एक नायक, नीतिकार और दयालु राजा के रूप में कितने असाधारण थे !
प्रताप इतने बुद्धिमान तथा दूरदर्शी थे कि इस संघर्ष में स्वयं पर और प्रजाजनों पर आने वाली विपदाओं को पहले से ही जानकर उसके अनुसार तैयार रहते थे। सेना को स्पष्ट आदेश थे कि कर संकलन व आवागमन में नागरिकों के साथ विनम्रता व सहानुभूति से व्यवहार किया जाए।
प्रताप ने न केवल तुर्क साम्राज्यवाद के विरोध में अभियान की योजना बनाई, वरन् अपने प्रजाजनों तक अपने संदेश को भी भली-भाँति पहुँचाया। 1576 ईसवी में हल्दीघाटी का युद्ध, सात वर्ष तक गुरिल्ला युद्ध तथा दिवेर में हुई निर्णायक विजय से ज्ञात होता है कि प्रताप ने अपनी बुद्धि और रणकौशल से अपने जीवनपर्यंत तुर्क आक्रमणकारियों को मेवाड़ में पैर नहीं जमाने दिया।
प्रताप ने अपने पितामह सांगा की भूल से सीख ली। उन्होंने सेना को मुगलों के आग्नेयास्त्रों से बचाने के लिए गुरिल्ला युद्ध नीति को अपनाया। प्रताप ने चित्तौड़ के तीसरे साके से समझ लिया कि उनका शत्रु एक निर्मम हत्यारा है, जो राजपूतों को राजपूतों से लड़वाएगा और बिना किसी शंका के हिंदुओं का रक्त बहाएगा। प्रताप ने देखा कि आमेर के भगवानदास जैसे हिंदू राजा, चित्तौड के युद्ध में हिंदुओं का रक्तपात देखकर भी मूकदर्शक बने रहे।
प्रताप भली-भाँति समझ चुके थे कि उन्हें अकेले ही अपने गौरव और स्वाधीनता की रक्षा के लिए लड़ना होगा।
प्रताप इस्लामी साम्राज्यवादियों की नीच और घृणित प्रवृत्ति को जान चुके थे और उन्हें पता था कि इन बर्बर पागलों के साथ युद्ध ही एक अंतिम उपाय है। इनके साथ सह-अस्तित्व संभव ही नहीं है।
प्रताप ने अकबर को पराजित करने के लिए एक विस्तृत योजना बनाई थी, जिसका क्रियान्वयन कर, वे तुर्कों को मेवाड़ से समूल उखाड़ फेंकना चाहते थे। अतः उन्होंने संधियाँ कीं, विद्रोहों का दमन किया, तटस्थ राजाओं व सामंतों से उनकी निष्ठा खरीदी। और मेवाड़ की सभी जातियों एवं जनजातियों के साथ उन्होंने एक सामाजिक सामंजस्य बिठाया। हम हिंदू, महाराणा प्रताप सिंह की सैन्य कुशलता और सर्वोच्च बलिदान के महत्त्व को वास्तव में कभी समझ ही नहीं पाए। वामी-जिहादी, प्रताप के जीवन व शौर्य को तो ढक नहीं सकते थे, सो उनके विवेक व युद्ध कौशल पर उन्होंने उल्टी-सीधी बातों का प्रचार किया, जिनका सत्य से कोई लेना-देना ही नहीं था। जैसे प्रताप को भगोड़ा व अदूरदर्शी सेनानायक कहना।
जब मुसलमान युद्ध में पीछे हटे तो सामरिक दाँव, किंतु जब हिंदू राजा पीछे हटे तो भगोड़ा!
जब मुसलमान युद्ध हारे, तो उसके विजय अभियान को झटका, जब हिंदू राजा हारे, तो निर्णायक पराजय!
जब मुसलमान छापामार युद्ध लड़ें तो विलक्षण युद्ध शैली, जब हिंदू गुरिल्ला युद्ध लड़ें तो विवशता !
जब मुसलमान राजा हिंदू स्त्रियों का यौन शोषण करें तो उनके मजहब की दुहाई, जब हिंदू राजा मुसलमानों की स्त्रियों को शालीनता से लौटाएँ, तो चुप्पी!
जब मुसलमान संधि करें तो सामरिक बुद्धिमत्ता, जब हिंदू संधि करें तो समर्पण ! जब मुसलमान निर्मम संहार करें तो उनका मजहब, जब हिंदू संहार करें तो हत्यारे! जब मुसलमान युद्ध जीतें तो गाजी, जब हिंदू युद्ध जीतें तो संयोग!
ऐसे ही असत्यों को इस देश के व्यभिचारी बुद्धिजीवियों ने आविष्कार करके प्रचारित किया।
इसका परिणाम यह हुआ कि इस्लाम से हिंदू समाज के गौरवपूर्ण विरोध की पूरी गाथा ही इतनी मलिन हो गई कि हम मूल विषय से ही भटक गए।
जहाँ हिंदू समाज एवं विश्व के अन्य प्रबुद्धजनों को यह विवेचना करनी चाहिए थी कि इस्लाम एक विचार के रूप में समाज के लिए कितना उपयोगी है, वहाँ सारा ध्यान हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के आस-पास लिखे मिथ्या प्रचार पर चला गया।
हिंदुओं के संघर्ष हेतु, वैश्विक समुदाय द्वारा हिंदुओं का आभार व्यक्त करने की बजाय उन्हीं के विरुद्ध मिथ्याचार से सारा विमर्श व्यर्थ के तकों में उलझकर रह गया।
एक ऐसी सभ्यता, जिसने विश्व को अत्याचार, नरसंहार, अंधानुकरण और तर्कविहीन निष्ठा के अतिरिक्त कुछ नहीं दिया, उस विचारधारा के विरुद्ध हिंदुओं के विलक्षण संघर्ष को आच्छादित करने का भौंडा प्रयत्न किया गया।
ये सब इसलिए किया गया, ताकि इस्लामी विस्तारवाद की समीक्षा को भूलकर सारा ध्यान इस्लाम के विरुद्ध हिंदू संघर्ष के आस-पास ही केंद्रित हो जाए। कौन हारा, कौन जीता, के विवाद में मूल विषय से ही हिंदुओं को भ्रमित कर दिया गया कि आखिर ये सब नरसंहार किया क्यों जा रहा था? अरब, तुर्क और अफगान लुटेरे मजहब का नाम लेकर मृत्यु का तांडव कर क्यों रहे थे ?
इस पर अंतिम दो अध्यायों में विस्तार से लिखा गया है।
प्रताप को भगोड़ा बताना ऐसा ही है, जैसे कोई सिंह को सियार से भयभीत माने! प्रताप मेवाड़ की युद्ध परिषद् व रणनीति के आधार पर हर युद्ध लड़े और जीते। पीठ दिखाना उनका स्वभाव ही नहीं था। हाँ, शत्रु से घिर जाने पर व्यर्थ जीवन गँवाना कहाँ की बुद्धिमत्ता होती! मेवाड़ के भूगोल का सम्यक् उपयोग प्रताप ने मुगलों को पराजित करने में किया। मित्र को मित्र व शत्रु को शत्रु मानकर व्यवहार किया।
एक और असत्य जिसका प्रतिकार आवश्यक है, वह यह है कि प्रताप बहुत विपन्नता में जिए। मेवाड़ का महाराणा, जो अकबर जैसे शत्रु से युद्ध कर रहा था, वो निर्धन होगा ? यह प्रस्तावना जितनी भ्रांत है उतनी ही मूर्खतापूर्ण भी है।
प्रताप सहज प्रकृति के अवश्य थे, पर वे परम वैभवशाली राज्य के स्वामी थे। प्रताप के पास पूरी तरह से सुसज्जित पैदल, अश्व व हाथियों की सेना थी। प्रताप को यूँ दयनीय दिखाना भी वामी-जहादियों की एक चाल थी हिंदुओं को हतोत्साहित करने की।
कुछ भूल हमारे अपने साहित्यकारों से भी हुई जिन्होंने प्रताप के वनों में निवास को प्रताप के जीवन का कष्टपूर्ण अध्याय लिखा। प्रताप के पुत्र, कुँवर अमर सिंह की घास की रोटी की कहानी मार्मिक तो हो सकती है, पर सत्य नहीं। प्रताप ऐश्वर्यवान राजा थे, तथा उनका सरल जीवन, उनका चुनाव था, उनकी विवशता नहीं।
राणा प्रताप एक महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की रूपरेखा का अपनी समझ के अनुसार निर्माण किया। उसी आधार पर इस्लामी साम्राज्यवादियों के साथ वीरतापूर्वक संघर्ष किया तथा मृतप्राय स्थिति में पहुँच चुके हिंदू समाज के मन में क्षात्रधर्म को पुनः जाग्रत् किया।
प्रताप के इस एकाकी विरोध से कालांतर में कई हिंदू राजाओं ने प्रेरणा लेकर अकबर की तीन पीढ़ियों तक मुगलों के विरुद्ध विद्रोह किया। अंततः प्रताप की लगाई इस लौ से ही मुगलों का नाश हुआ, जबकि महिमाशाली मेवाड़ आज भी अपने गौरव के ध्वज को लिये खड़ा है। मेवाड़ इस विलक्षण इतिहास का भग्नावशेष मात्र नहीं है, बल्कि शक्ति, समर्पण, प्रेम और क्षत्रिय धर्म की एक गौरवमयी स्मृति है। मेवाड़, मनुष्यता के सबसे मूल्यवान् नियमों व उत्कृष्ट मूल्यों का वाहक है। हम परम भाग्यशाली हैं कि हम भी इस आश्चर्यजनक रूप से सुंदर व गरिमामयी धरोहर के उत्तराधिकारी हैं।