आश्रम की रामकथा Kapil Tiwari द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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आश्रम की रामकथा

मैं ऋषिकेश की सड़कों पर भटक ही रहा था कि अचानक मेरी नज़र एक पोस्टर पर पड़ी और उसे देखकर मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ गई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उस पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— "मासिक श्रीराम कथा"। पोस्टर में कथा स्थल (आश्रम) के नाम के साथ-साथ, पूरे एक महीने तक भक्तों के लिए रहने और भंडारे की निःशुल्क व्यवस्था का भी उल्लेख था।

फिर क्या था! ऋषिकेश को और करीब से समझने का मुझे एक बेहतरीन मौका मिल गया था। मैंने बिना देर किए अपने कदम आश्रम की ओर मोड़ दिए। ऋषिकेश के भव्य बाज़ार और गंगा तट से आती ठंडी हवाएँ मुझे मंत्रमुग्ध कर रही थीं। इसी आनंदमयी अवस्था में मैं जल्द ही आश्रम के मुख्य द्वार पर पहुँच गया।

मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना विशाल आश्रम देखा था। उसे देखकर मैं यह समझ ही नहीं पा रहा था कि इस आश्रम की शुरुआत कहाँ से हो रही है और इसका अंत कहाँ पर है। जैसे ही मैंने अंदर प्रवेश किया, मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। वहाँ वीआईपी एसी कमरे, कॉर्पोरेट जैसे बड़े-बड़े ऑफ़िस और भोजन की अत्यंत उत्तम व्यवस्था थी। मंच से संन्यास, वैराग्य और सादगी के उपदेश गूँज रहे थे, लेकिन आँखों के सामने पाँच-सितारा होटल जैसा यह चौंधिया देने वाला वैभव साफ़ दिखाई दे रहा था। इस विरोधाभास ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

पूरे आश्रम में जगह-जगह विशाल पोस्टर लगे हुए थे। उन पोस्टरों के पीछे कुछ गुप्त रास्ते भी दिखाई दे रहे थे। दरअसल, उन रास्तों में कुछ निर्माण कार्य चल रहा था, इसलिए वे मेरी नज़र में आ गए; अन्यथा किसी की क्या मजाल जो वहाँ तक पहुँच सके या यह समझ पाए कि वे भव्य पोस्टर वास्तव में गुप्त रास्तों के दरवाज़े हैं!

आश्रम के मुख्य गुरु जी का नाम पोस्टरों पर इस तरह महिमामंडित करके लिखा गया था, मानो वह कोई साधारण नाम न होकर कोई ऐसा गूढ़ वाक्य हो जिसमें दुनिया की सभी श्रुतियों और स्मृतियों का सार समाया हुआ हो। तत्कालीन सरकारों के राजनेताओं के साथ गुरु जी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें दीवार पर सुसज्जित थीं। साथ ही, विदेशी पर्यटकों को प्रभावित करने के लिए कुछ अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरें भी शान से टंगी थीं।

यह सब देखकर मेरे मन में कई अनुत्तरित प्रश्न सिर उठाने लगे— क्या यह धर्म है या विशुद्ध व्यापार? धर्म और राजनीति का यह कैसा गठनजोड़ है? धर्म का भोजन और अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग से क्या संबंध है? ऐसे अनेक सवाल मेरे अंतर्मन में घूमने लगे और धीरे-धीरे मुझे इनके उत्तर भी मिलने लगे। जब धर्म में आत्मज्ञान के बजाय 'अहंकार' और 'मुफ़्त का रहना-खाना' ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, तब धर्म व्यापार बन जाता है। जब धर्म अपनी सत्ता और स्वार्थ के लिए राजनीति पर निर्भर हो जाता है, तब वह स्वयं राजनीति का एक हिस्सा बन जाता है। और जब धर्म केवल विदेशी लोगों को आकर्षित करने और दिखावे का जरिया मात्र रह जाता है, तब वह भीतर से खोखला होने लगता है। इसके विपरीत, वास्तविक धर्म तो वह है जो मनुष्य को अशांति से पूर्ण शांति की ओर ले जाए; जो किसी मान्यता को आँख मूँदकर मानने या ठुकराने वाले अहंकार को तटस्थ होकर देख सके।

मैंने गौर किया कि जो लोग वहाँ महीने भर की कथा सुनने आए थे, उन्हें कथा के आध्यात्मिक रस से ज़्यादा आनंद समय काटने और मुफ्त का भंडारा खाने में आ रहा था। उनकी दिनचर्या भी अजीब थी— सुबह उठकर जहाँ मन किया वहाँ गंदगी फैलाई, जहाँ जगह मिली वहाँ कपड़े टांग दिए और फिर कथा में आकर बैठ गए। कथा पंडाल में भी यदि किसी को पंखे की हवा कम या ज़्यादा मिल जाए, तो रामायण के बीच कब 'महाभारत' शुरू हो जाए, पता ही नहीं चलता। कथा समाप्त होते ही भंडारे के सारे नियम-कायदे तोड़ते हुए, बस किसी भी तरह पेट भरने की आपाधापी मच जाती थी।

इसी पावन कथा के बीच कुछ युवा युगल अपने लिए जोड़ी बनाने की जुगत में लगे दिखाई दे जाते। वहीं कुछ विचित्र वेशभूषा वाले बाबा अपने चेलों के साथ घूमते हुए, नए 'ग्राहक' तैयार करने के लिए फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलते आसानी से मिल जाते थे। इन बाबाओं का अहंकार भी सातवें आसमान पर था; सिर्फ इसलिए कि वे वहाँ लंबे समय से रह रहे थे, उन्होंने खुद को परम ज्ञानी मान लिया था।

कर्मकांड की इस अंधी पराकाष्ठा में ऋषिकेश की पवित्र नदी कब गंदगी में बदल गई और ईश्वर की आराधना कब पाखंड बन गई, इसका भान ही नहीं हुआ। विडंबना देखिए कि जो श्रद्धालु यहाँ गंगा को 'पाप धोने वाली माँ' कहकर पूजने आते हैं, वही अपने पीछे अज्ञानता और स्वार्थ का प्लास्टिक और कचरा छोड़ जाते हैं। नदी का पवित्र आंचल इंसानी ढोंग की भेंट चढ़ चुका है।

वहाँ छोटे-छोटे बच्चों को बिना यह समझाए कि राम नाम क्या है और क्यों है, बस लगातार 'राम-नाम' लिखने के काम में लगा दिया गया है। यह उन्हें बिना सोचे-समझे एक बंधी-बंधाई लीक पर ढालने जैसा है।

अंततः, मन इस विचार से भर गया कि जो ऋषिकेश कभी अपनी 'योग साधना' के लिए विश्व प्रसिद्ध था, वह धीरे-धीरे कब 'भोग की नगरी' में परिवर्तित हो गया, पता ही न चला। हालांकि, इस बाज़ारीकरण के बीच भी मन को यह ढाढस रहता है कि ऋषिकेश के किसी सुदूर कोने या एकांत में आज भी कोई सच्चा साधक बिना किसी ढोंग के साधना में लीन होगा। यह नगरी आज भी अपने उस खोए हुए असली आध्यात्मिक स्वरूप में लौटने का इंतज़ार कर रही है।

शुभ योगनगरी ऋषिकेश!

कपिल तिवारी “यथार्थ”