अपने घर पहुंच जाती हैं
घर की बेरुखी और रोशनी की तन्हाई
रोशनी हाँफती हुई घर पहुँची थी, उसका शरीर कांप रहा था और आँखों में खौफ था। उसने सोचा था कि दादी भले ही उसे पसंद न करती हों, लेकिन एक औरत होने के नाते उसकी इज़्ज़त की रक्षा ज़रूर करेंगी।
उसने रोते हुए सब बताया, "दादी, वीर प्रताप सिंह की नीयत अच्छी नहीं है। उसने आज मुझ पर हाथ डालने की कोशिश की। मैं कल से उस हवेली में नहीं जाऊंगी!"
दादी उमा देवी ने अपनी माला छोड़ी और अपनी धुंधली आँखों से रोशनी को घूर कर देखा। उनके चेहरे पर सहानुभूति की जगह गुस्सा था। वे चीखकर बोलीं, "चुप कर हरामजादी! अपनी ज़बान को लगाम दे। ठाकुर साहब का खानदान ऊँचा है, वो तुझे हाथ लगाएंगे? ज़रूर तूने ही अपनी चाल-ढाल से उन्हें उकसाया होगा। तू तो पैदा ही हम सबको बर्बाद करने के लिए हुई है। पहले अपने बाप-माँ को निगल गई, अब हमारी रोटी भी छीनना चाहती है?"
मेहूल का दर्द:
पास ही बैठा मेहूल अपनी दीदी की सिसकियाँ सुन रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि 'इज़्ज़त' और 'नीति' क्या होती है, पर वह यह देख पा रहा था कि उसकी दीदी बहुत डरी हुई है। वह चुपके से रोशनी के पास आया और अपना छोटा सा हाथ उसके हाथ पर रख दिया। रोशनी ने उसे गले लगा लिया, लेकिन उसके कान दादी के ज़हरीले शब्दों से छलनी हो रहे थे।
दादी ने साफ़ कह दिया— "कल सुबह फिर से हवेली जाएगी। अगर नहीं गई, तो इस घर का दरवाज़ा तेरे लिए हमेशा के लिए बंद है। और सुन, भूखे पेट मरेगा ये मेहूल, अगर तूने काम छोड़ा।"
दादी की ये सब बात सुनकर और मेहुल की चिंता करने के बाद फिर से सुबह हवेली में काम करने चली जाती है
रोशनी हवेली में काम करती है तभी एक हवेली की मालकिन जमींदार की पत्नी कहती है जहां छोटे जमींदार साहब का कमरा काफी दिनों से साफ नहीं हुआ तो ठीक कर और कमरा साफ कर दे रोशनी डरते-डरते कमरे में पहुँचती है
बंद दरवाज़ा और खौफनाक सन्नाटा
रोशनी वीर प्रताप सिंह के कमरे में झाड़ू लगा रही थी। कमरा शराब की बदबू और सिगरेट के धुएँ से भरा हुआ था। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, वह बस जल्दी से काम खत्म करके बाहर निकलना चाहती थी।
तभी... "चटाक!"
पीछे से दरवाज़े की कुंडी गिरने की आवाज़ आई। रोशनी का खून जम गया। उसने मुड़कर देखा, वीर प्रताप सिंह चेहरे पर एक दरिंदगी भरी मुस्कान लिए खड़ा था। उसने अपनी शर्ट के ऊपर के बटन खोल दिए थे और उसकी आँखें नशे में लाल थीं।
"कल तो तू बड़ी-बड़ी बातें कर रही थी छोरी... आज कहाँ जाएगी?" वीर प्रताप लड़खड़ाते हुए उसकी तरफ बढ़ा।
रोशनी घबराकर पीछे हटी, उसका हाथ एक मेज से टकराया। "साहब... दरवाज़ा खोलिए। मुझे जाने दीजिए। मैं यहाँ बस काम करने आई हूँ।" उसकी आवाज़ थरथरा रही थी।
वीर प्रताप ठहाका मार कर हँसा, "इस कमरे की आवाज़ बाहर नहीं जाती। और तेरी दादी? उसे तो मैंने पहले ही चांदी के चंद सिक्कों से चुप करा दिया है। अब तू है और मैं हूँ।"
उसने झपट्टा मारकर रोशनी का हाथ पकड़ लिया। रोशनी ने पूरी ताकत से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर वीर प्रताप की पकड़ मजबूत थी। वह उसे बिस्तर की तरफ खींचने लगा।
रोशनी का पलटवार:
तभी रोशनी की नज़र मेज़ पर रखे एक भारी पीतल के फूलदान (Flower Vase) पर पड़ी। उसे अपने पिता की धुंधली सी आवाज़ याद आई— "डरना नहीं बिटिया, अपनी रक्षा खुद करना।" जैसे ही वीर प्रताप ने उसे दबोचने की कोशिश की, रोशनी ने अपनी पूरी जान लगाकर वह फूलदान उठाया और ज़ोर से वीर प्रताप के सिर पर दे मारा।
ये सब होने के बाद रौशनी बहुत घबरा जाती है और दरवाज़े की कुंडी खोलती है और वहां से अपने घर के लिए भाग जाती है
रोशनी का सांस फूल रहा था, उसके हाथ कांप रहे थे। वह बदहवास हालत में घर पहुँचती है और अपनी दादी को सब सच बता देती है। उसे लगा था कि मौत के मुँह से बचकर आने के बाद शायद दादी का दिल पसीज जाए, लेकिन यहाँ तो मंज़र और भी भयानक निकला।
दादी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, पर वह गुस्सा वीर प्रताप पर नहीं, बल्कि रोशनी पर था। दादी ने रोशनी के बाल पकड़कर उसे झकझोरा और चिल्लाईं:
"अरी कलमुंही! ये क्या कर आई तू? ठाकुर खानदान के लड़के पर हाथ उठाया? अब वो हमें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे! तूने तो हमारी मौत का सामान तैयार कर दिया।"
तभी बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज़ और लोगों का शोर सुनाई दिया। गाँव के लोग और जमींदार के लठैत (आदमी) हाथों में लाठियां और मशालें लेकर शंकर के घर को घेर चुके थे।
घर का घेराव और दादी का धोखा
दादी ने डर और लालच में आकर एक ऐसा कदम उठाया जिसकी उम्मीद रोशनी को नहीं थी। दादी घर के बाहर निकलीं और हाथ जोड़कर ज़मींदार के आदमियों से बोलीं, "हुजूर! मेरा इसमें कोई हाथ नहीं है। इस छोरी ने ही सब किया है। आप इसे ले जाइये और जो सज़ा देनी है दीजिए, बस हमें और इस मासूम मेहूल को छोड़ दीजिए!"
रोशनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसकी अपनी दादी ने उसे भेड़िये के सामने फेंक दिया था।
मेहूल का साहस:
5 साल का मेहूल अपनी दीदी के सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी नन्ही हथेलियाँ फैला दीं और उन गुंडों से बोला, "मेरी दीदी को हाथ मत लगाना! भाग जाओ यहाँ से!" लेकिन एक लठैत ने मेहूल को धक्का देकर दूर गिरा दिया।
अनपेक्षित मोड़ - इंसाफ या कुछ और?
मेहूल ज़मीन पर गिरा हुआ था और गुंडा उसे दोबारा उठाने ही वाला था कि तभी हवा में एक भारी और कड़क आवाज़ गूँजी— "रुक जाओ!"
सबके कदम जहाँ के तहाँ थम गए। भीड़ छँटी और सामने से खुद बड़े जमींदार साहब आते दिखे। उनके पीछे उनका पूरा परिवार था और सबसे पीछे उनका छोटा भाई वीर प्रताप सिंह था, जिसके माथे पर सफेद पट्टी बँधी थी और नज़रें शर्म से ज़मीन की ओर झुकी थीं।
हैरानी की बात यह थी कि जमींदार के हाथ में कोई हथियार नहीं, बल्कि एक थाली थी, जिसमें कुछ कागज़ात, कपड़े और मिठाइयाँ रखी थीं।
दादी का डर और जमींदार का न्याय:
दादी कांपते हुए हाथ जोड़कर सामने आईं, "हुजूर, इस लड़की की खता माफ़ कर दें, ये नादान है..."
पर जमींदार ने उन्हें हाथ के इशारे से चुप करा दिया। वह सीधे रोशनी के पास पहुँचे, जो डर के मारे दीवार से चिपकी खड़ी थी।
जमींदार ने अपनी पगड़ी उतारी और रोशनी के पैरों के पास रख दी। पूरा गाँव सन्न रह गया।
जहाँ एक पल के लिए लगा था कि न्याय हो रहा है, वहाँ जमींदार ने अपनी चाल चल दी। वह अपने भाई के गुनाह को छुपाने और रोशनी को हमेशा के लिए अपनी मुट्ठी में रखने के लिए उसे "शादी" की बेड़ियों में जकड़ना चाहता है।
न्याय का मुखौटा और नया षडयंत्र
जमींदार की बातें सुनकर गाँव वालों को लगा कि वह कितना महान है, लेकिन जैसे ही उसने आखिरी शर्त रखी, सन्नाटा पसर गया।
जमींदार मुस्कुराते हुए बोला, "दादी माँ, इस ज़ख्म को भरने का एक ही तरीका है। हमारे खानदान की बहू बनकर यह लड़की हमारे घर की इज़्ज़त बन जाएगी। मेरा भाई वीर प्रताप अब सुधरना चाहता है और वह रोशनी से निकाह (शादी) करेगा। ये शगुन की थाली स्वीकार करो। दो दिन बाद शहनाई बजेगी और हम बारात लेकर आएँगे।"
दादी की लालची खुशी:
दादी उमा देवी की आँखों में चमक आ गई। उनकी नफरत लालच में बदल गई। उन्होंने फौरन थाली हाथ में ले ली और बोलीं, "अरे ठाकुर साहब! इससे बड़ी बात और क्या होगी? मेरी बिटिया की तो किस्मत खुल गई। आपका बहुत-बहुत अहसान!"
रोशनी और मेहूल का खौफ: