उसके शरीर से सड़ी हुई मांस की गंध आ रही थी। उसके हज़ारों हाथ मकड़ी के जाले की तरह फैले हुए थे, और उन हज़ारों हाथों के बिल्कुल बीच में फंसी हुई थी—मोनिका!
मोनिका: (घुटती हुई आवाज़ में) "रा... म... सृ... ष्टि... बचाओ..."
उस दानव ने मोनिका को चारों तरफ से जकड़ रखा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह हज़ारों हाथ मोनिका के शरीर के अंदर धंसना चाहते हों। दानव का कोई निश्चित चेहरा नहीं था, बस उन बालों और हाथों के बीच से दो अंगारे जैसी लाल आँखें चमक रही थीं, जो राम और सृष्टि को घूर रही थीं।
राम: (कांपते हुए) "नहीं! उसे छोड़ दो! मोनिका!"
राम ने अपनी आधी खुली चुनरी को हाथ में लिया और "जय माता दी!" चिल्लाते हुए उस दानव की तरफ दौड़ लगा दी। लेकिन वह दानव अपनी जगह से हिला भी नहीं। उसने एक ज़ोरदार दहाड़ मारी, जिससे राम और सृष्टि पीछे जाकर किसी पत्थर से टकराए।
सृष्टि: (चीखते हुए) "राम! देखो, वो उसे ऊपर खींच रहा है!"
वह दानव धीरे-धीरे हवा में ऊपर उठने लगा। मोनिका उन हज़ारों हाथों के जाल में तड़प रही थी। जैसे-जैसे दानव ऊपर जा रहा था, पहाड़ी की मिट्टी भी उसके साथ ऊपर की ओर खिंच रही थी।
राम ने देखा कि उसकी चुनरी का कालापन अब तेज़ी से बढ़ रहा था। उसे समझ आ गया कि अगर उसने अभी कुछ नहीं किया, तो मोनिका भी उन मरे हुए दोस्तों की तरह हमेशा के लिए इस घाटी का हिस्सा बन जाएगी।
शैतानी घाटी: मोनिका का खामोश अंत
सृष्टि की चीख उस ठहरी हुई रात के सन्नाटे को चीर रही थी, पर उस महा-दानव पर इसका कोई असर नहीं था। वह दानव अब हवा में किसी काले पहाड़ की तरह तैर रहा था। पहाड़ी की लाल मिट्टी उसके आकर्षण से खिंचकर ऊपर एक बवंडर की तरह नाच रही थी।
सृष्टि: (चीखते हुए) "राम! देखो, वो उसे ऊपर खींच रहा है! मोनिका के हाथ... वो छूट रहे हैं!"
मोनिका उन हज़ारों हाथों के जाल में फंसी हुई थी। उसकी आँखें राम और सृष्टि की तरफ टिकी थीं, जिनमें मौत का खौफ साफ़ झलक रहा था। राम ने अपनी मुट्ठी में कसी उस काली पड़ चुकी चुनरी को देखा। उसे समझ आ गया था कि यह चुनरी अब उसकी आख़िरी उम्मीद थी, पर इससे पहले कि वह मंत्र पढ़कर उसे फेंकता...
वक़्त जैसे एक पल के लिए ठहर गया।
उस महा-दानव के शरीर के हज़ारों बाल और सड़े हुए हाथ अचानक एक साथ फड़फड़ाए। मोनिका ने अपना मुँह खोलने की कोशिश की, शायद वह आखिरी बार अपने दोस्तों को पुकारना चाहती थी, पर उसके गले से सिर्फ़ एक सिसकी निकली।
मोनिका: (फुसफुसाते हुए) "रा... म..."
अगले ही पल, वह दानव किसी अजगर की तरह खुला। उसके शरीर के बीचों-बीच एक गहरा, काला शून्य (void) बना। हज़ारों हाथों ने एक साथ मोनिका को अंदर की तरफ धकेला। मोनिका का शरीर उस काली सड़ांध में धीरे-धीरे डूबने लगा।
राम: "नहीं! मोनिका! अपना हाथ बढ़ा!"
राम पागलों की तरह उस हवा में उठते दानव की तरफ झपटा, पर वह बहुत देर कर चुका था। मोनिका का चेहरा, उसकी आँखें और उसके कांपते हुए हाथ... सब उस दानव के अंदर समा गए। कोई चीख नहीं हुई, कोई संघर्ष नहीं हुआ। बस एक खौफनाक खामोशी के साथ मोनिका उस शैतान का हिस्सा बन गई।
जैसे ही मोनिका पूरी तरह अंदर समाई, वह दानव एक पल के लिए चमका और फिर धुएं की तरह गायब हो गया। पहाड़ी की जो मिट्टी ऊपर उड़ी थी, वह अब बारिश की तरह राम और सृष्टि पर गिरने लगी।
सृष्टि घुटनों के बल गिर पड़ी। उसका शरीर थर-थरा रहा था।
सृष्टि: (बदहवास होकर) "वो चली गई... राम, वो उसे ले गया। अब हम सिर्फ दो बचे हैं। सातों में से सिर्फ दो..."
राम पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा उस खाली आसमान को देख रहा था जहाँ अभी मोनिका तड़प रही थी। उसके हाथ में मौजूद वह चुनरी अब पूरी तरह कोयले जैसी काली हो चुकी थी। उसमें अब कोई रूहानी ताक़त महसूस नहीं हो रही थी।
राम: (धीमी और भारी आवाज़ में) "गिनती पूरी हो रही है, सृष्टि। चार नहीं, अब पाँच जा चुके हैं। विनोद, अनामिका, सौरभ, कालू और अब मोनिका। यह घाटी हमें मार नहीं रही... यह हमें एक-एक करके मिटा रही है।"
शैतानी घाटी: मौत से पहले का सन्नाटा
मैदान में पसरा हुआ वह सन्नाटा इतना गहरा था कि राम और सृष्टि को अपनी पलकों के झपकने की आवाज़ भी किसी धमाके जैसी लग रही थी। मोनिका के जाने के बाद, उस महा-दानव का धुएं की तरह गायब होना और भी खौफनाक था। ऊपर से गिरती हुई वह लाल मिट्टी राम के चेहरे और कपड़ों पर जम गई थी, जिससे वह किसी ज़िंदा लाश की तरह दिख रहा था।
सृष्टि ज़मीन पर बेजान पड़ी थी, उसकी आँखें पथरा गई थीं। वह न रो रही थी, न चिल्ला रही थी। वह बस खालीपन को घूर रही थी।
सृष्टि: (सुन्न आवाज़ में) "राम... अब क्या? क्या हम यहाँ बैठकर बस अपनी बारी का इंतज़ार करेंगे? देखो, समय अब भी रात के 8 ही बजा रहा है। यह रात कभी खत्म नहीं होगी। हम इस अंधेरे के कैदी हैं।"
राम ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके हाथ में वह काली पड़ चुकी चुनरी अब सिर्फ एक राख का टुकड़ा थी। उसने उसे हवा में छोड़ दिया। वह चुनरी उड़ने के बजाय ज़मीन पर एक भारी पत्थर की तरह गिरी। राम का अटूट विश्वास अब मलबे में तब्दील हो चुका था।
राम: (हताशा में हँसते हुए) "विश्वास... शक्ति... रूहानियत... सब ढोंग है सृष्टि। इस घाटी की भूख हमारे भगवान से ज़्यादा बड़ी साबित हुई है। पाँच जा चुके हैं। निर्दोष कालू से लेकर हमारी चुलबुली मोनिका तक। शैतान ने हमें चुन-चुन कर मारा है। अब हमें लड़ना नहीं है... शायद हमें बस मरना है।"
राम धीरे से सृष्टि के पास जाकर बैठ गया। उसने सृष्टि का हाथ पकड़ा, जो बर्फ की तरह ठंडा था।
राम: "सृष्टि, मुझे माफ़ कर देना। मैं तुम सबको एक अच्छे ट्रिप का वादा करके यहाँ लाया था। मुझे लगा था कि मैं सबका रक्षक बनूँगा, पर मैं तो खुद को भी नहीं बचा पा रहा।