जैसे ही वे दिल्ली के पॉश इलाके में दिग्विजय सिंह के सरकारी बंगले के पास पहुंचे, उन्होंने देखा कि वहाँ सुरक्षा का घेरा कोलकाता से भी कहीं ज्यादा सख्त था। अग्निश ने ठान लिया था कि वह सीधे दिग्विजय से भिड़ेंगे।
उन्हें पता था कि अगर अपराजित बैंकॉक में होने का नाटक कर रहा है, तो उसका कोई न कोई सुराग इसी बंगले में मिलेगा।
अग्निश ने अपने फोन से एक नंबर डायल किया—यह उनका एक पुराना मुखबिर था जो दिल्ली के इमिग्रेशन विभाग (Immigration Department) में काम करता था।
उन्होंने धीमी और भारी आवाज़ में कहा, "मुझे अगले आधे घंटे में अपराजित सिंह के पासपोर्ट की डिटेल्स चाहिए। वह पिछले एक महीने में देश से बाहर गया भी है या नहीं, मुझे एक-एक मिनट की खबर चाहिए।"
यह खबर सुनते ही अग्निश के माथे की नसें तन गईं। उनके मुखबिर ने साफ कर दिया था कि अपराजित सिंह पिछले 6 महीने से भारत से बाहर गया ही नहीं है।
बैंकॉक वाली कहानी सिर्फ एक सफ़ेद झूठ थी, जिसे जनता और पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के लिए गढ़ा गया था।
झूठ का पर्दाफाश: दिल्ली की सर्द रात
अग्निश गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे थे, उनके हाथ में फोन था और दूसरी तरफ उनका खबरी।
"सर, रिकॉर्ड्स एकदम साफ़ हैं। अपराजित सिंह का पासपोर्ट पिछले छह महीनों से हिला तक नहीं है। उसका आखिरी इमिग्रेशन स्टैंप पिछले साल का है। वह यहीं इंडिया में है, और पूरी संभावना है कि वह दिल्ली में ही कहीं छिपा है।"
अग्निश ने फोन काटा और समीर की ओर देखा। उनकी आँखों में अब एक क्रूर चमक थी।
"दिग्विजय सिंह ने मुझसे झूठ बोला। उसने मेरे मरे हुए बेटे का अपमान किया है। वह समझता है कि सत्ता की चादर ओढ़कर वह अपने कातिल बेटे को बचा लेगा।"
अग्निश ने सीधे ड्राइवर को आदेश दिया, "गाड़ी रोको नहीं, सीधे दिग्विजय के बंगले के गेट को पार करा दो। आज फैसला होकर रहेगा।"
जैसे ही उनकी गाड़ी दिग्विजय सिंह के दिल्ली वाले बंगले के भारी लोहे के गेट पर पहुँची, सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
लेकिन अग्निश का रसूख और उनका चेहरा देखकर संतरी घबरा गए। अग्निश गाड़ी से उतरे और सीधे अंदर की ओर बढ़े।
हॉल में कदम रखते ही उनका सामना दिग्विजय सिंह से हुआ, जो हाथ में वाइन का गिलास लिए किसी से फोन पर हंसकर बात कर रहे थे।
अग्निश को देखते ही उनके चेहरे की हंसी गायब हो गई और फोन उनके हाथ से धीरे-धीरे नीचे आ गया।
अग्निश ने कड़कती आवाज़ में कहा, "दिग्विजय! तुम्हारा बेटा बैंकॉक में है या इसी बंगले के किसी कोने में चूहे की तरह छिपा है?
मेरे मुखबिर ने अभी बताया है कि उसका पासपोर्ट पिछले 6 महीने से अलमारी में सड़ रहा है। अब बोलो, सच क्या है?"
दिग्विजय सिंह के चेहरे पर शिकन तो आई, पर वह मंझे हुए खिलाड़ी थे। उन्होंने गिलास मेज़ पर रखा और बोले, "अग्निश, तुम हद पार कर रहे हो। मेरे घर में घुसकर मुझ पर चिल्लाने की हिम्मत मत करो।"
अग्निश ने अपनी पिस्तौल मेज़ पर पटक दी और बोले, "हिम्मत की बात तो तुम करो ही मत। अगर अगले 5 मिनट में मुझे अपराजित यहाँ नहीं मिला,
तो मैं तुम्हारी इस पूरी सियासत को आग लगा दूँगा। बताओ, कहाँ है वो? और नजीमा को कहाँ छिपा रखा है?"
सफेद झूठ और कड़वा सच
अग्निश का गुस्सा और पिस्तौल की ठंडी नली, दिग्विजय सिंह के माथे के पसीने को और बढ़ा रही थी। दिग्विजय की आवाज़ लड़खड़ाई, "अग्निश... तुम सच जानना चाहते हो ना? आओ मेरे साथ।"
दिग्विजय सिंह उन्हें बंगले के सबसे पिछले हिस्से में ले गए, जहाँ एक भारी लकड़ी का दरवाज़ा था। जैसे ही दरवाज़ा खुला,
अंदर का नज़ारा देखकर अग्निश और समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कमरा किसी अस्पताल के आईसीयू (ICU) जैसा था।
मशीनों की बीप-बीप की आवाज़ और दवाइयों की तीखी गंध हवा में घुली थी।
सामने बेड पर अपराजित सिंह लेटा हुआ था। वह अपराजित नहीं लग रहा था—हड्डियों का एक ढांचा, चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क और शरीर से जुड़ी अनगिनत ट्यूब्स।
दिग्विजय सिंह की आँखों में आंसू आ गए, उन्होंने रुंधे गले से कहा, "यही है मेरा कातिल बेटा?
अग्निश, मेरा बेटा पिछले 6 महीने से कोमा में है। उस रात कोलकाता में जब वह अपने घर लौट रहा था, तब कुछ अनजान नकाबपोशों ने उस पर इतना बेरहम हमला किया कि उसके सिर पर गहरी चोट आई। तब से वह इसी हालत में है।"
अग्निश सन्न रह गए। दिग्विजय आगे बोले, "मैंने यह बात पूरी दुनिया से छुपाई। अगर जनता को पता चलता कि एक ताकतवर मंत्री का बेटा सड़क पर मरणासन्न हालत में मिला है,
तो मेरी राजनीति और सरकार की साख मिट्टी में मिल जाती। लोग मुझे कमज़ोर समझते। इसलिए मैंने बैंकॉक का नाटक रचा और यहाँ गुपचुप इसका इलाज करवा रहा हूँ।"
अग्निश ने मशीन पर चल रही धड़कनों को देखा। उन्हें यकीन हो गया कि अपराजित तो किसी का कत्ल करना दूर, खुद अपनी ज़िंदगी की जंग हार रहा है।
अग्निश की आवाज़ धीमी पड़ गई, "अगर अपराजित कोमा में है... तो एक हफ्ते पहले क्लब में भवनीश से झगड़ा किसने किया था? और नजीमा ने किसका नाम लिया था?"
दिग्विजय ने चौंककर देखा, "झगड़ा? अग्निश, जब मेरा बेटा यहाँ मौत से लड़ रहा है, तो वह क्लब में कैसे हो सकता है? कोई है जो अपराजित बनकर खेल खेल रहा है... और उसी ने शायद भवनीश को मारा है।"
यह खबर सुनते ही मानो वक्त थम गया। अग्निश के हाथ से पानी का गिलास छूटकर ज़मीन पर चकनाचूर हो गया। कमरे में एक डरावनी खामोशी फैल गई।
हुगली का खूनी राज़
अग्निश की आँखें पथरा गई थीं। फोन की दूसरी तरफ से वही भारी आवाज़ फिर गूँजी, "सर, नजीमा की लाश हुगली नदी के किनारे मिली है। पुलिस ने उसे अभी बाहर निकाला है... हालत बहुत खराब है, सर।"
अग्निश ने कांपते हुए हाथों से फोन काटा और दिग्विजय सिंह की तरफ देखा। दिग्विजय भी सन्न रह गया था।
जो लड़की इस पूरे राज़ की आखिरी कड़ी थी, जो यह बता सकती थी कि उस रात क्लब में 'अपराजित' बनकर कौन आया था, अब वह हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थी।
अग्निश ने दहाड़ते हुए कहा, "पहले मेरा बेटा, और अब नजीमा! दिग्विजय, यह कोई मामूली हमला नहीं है। कोई है जो हम दोनों के खानदान को जड़ से मिटा देना चाहता है।
नजीमा को इसलिए मारा गया क्योंकि वह उस 'बहुरूपिये' का चेहरा पहचान चुकी थी!"
समीर ने तुरंत कोलकाता की फ्लाइट तैयार करवाई। अग्निश अब पहले से कहीं ज़्यादा खतरनाक हो चुका था। अब यह सिर्फ एक बेटे की मौत का बदला नहीं था,
अब यह उस शातिर दुश्मन का खात्मा था जो अंधेरे में बैठकर ये सारी चालें चल रहा था।
जैसे ही अग्निश कोलकाता वापस पहुँचा, पूरे शहर में कोहराम मचा हुआ था। हुगली नदी के उस घाट पर जहाँ लाश मिली थी, वहाँ की मिट्टी अब एक नई और भयानक दुश्मनी की गवाह बनने वाली थी।
कोलकाता: तीन ताकतों का संगम और महा-रहस्य
नजीमा की मौत की खबर ने दुबई तक ज़लज़ला ला दिया था।
अब्दुल हकीम और उनकी पत्नी अपने निजी विमान से बदहवास होकर कोलकाता पहुँचे। जब उन्होंने हुगली के ठंडे किनारे पर अपनी इकलौती बेटी का सफेद कपड़े में लिपटा बेजान जिस्म देखा, तो वे चीख भी न सके।
अब्दुल हकीम, जिसने आधे कोलकाता को खड़ा किया था, अपनी बेटी के जनाज़े के सामने टूटकर बिखर गया।
अपराजित सिंह अगर पिछले 6 महीने से कोमा में अस्पताल के बेड पर है, तो क्लब में भवनीश से झगड़ा करने वाला वह शख्स कौन था, जिसे सबने 'अपराजित' समझा?