अयान एक नफ़रत की आग या वजूद की तलाश - 32 Irfan ayan Khan द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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अयान एक नफ़रत की आग या वजूद की तलाश - 32

अयान उस ठंडी और गीली दीवार से सटकर बैठा था। वो सीलन शर्ट को पार करके सीधा पीठ में चुभ रही थी। हवा में भी वही पुरानी धूल और सड़ी हुई बदबू बसी थी, जो हर सांस के साथ गले में काँटे की तरह फँस रही थी।

तभी बाहर ताले में चाबी घूमने की आवाज़ आई। हवलदार ने भारी दरवाज़े को एक ज़ोरदार धक्का दिया। लोहे का वो पल्ला जैसे ही फर्श को रगड़ता हुआ पीछे हटा, उसकी 'चर्ररर' वाली चीख से पूरा गलियारा दहल गया।

दरवाजा जैसे-जैसे खुल रहा था, बाहर की वो पीली लाइट अंदर की तरफ फैलने लगी। वो रोशनी पहले अयान के धूल भरे जूतों पर पड़ी, फिर धीरे-धीरे उसके घुटनों से होती हुई सीधा उसकी आँखों में जा चुभी। 

अचानक हुई उस तेज़ रोशनी से अयान की पलकें हल्की सी मिचमिचाईं, पर गर्दन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।

उस खुलते हुए दरवाज़े के बीच अब विवेक रॉय के दो पालतू कुत्ते वर्दी पहने खड़े थे। उनके हाथों में तेल से सने मोटे डंडे थे। रोशनी में उनकी चमक एक अजीब सी दहशत पैदा कर रही थी

तभी एक भारी जूते ने लॉक-अप के अंदर कदम रखा। जूते के तलवे और मिट्टी की वो रगड़ साफ़ बता रही थी कि अब हिसाब शुरू होने वाला है।

उनमें से एक ने पास की सलाखों पर डंडा खींचकर मारा—'खनन'। उस थमी हुई हवा में वो आवाज़ किसी चाबुक की तरह कान फाड़ गई।

तभी दूसरे वर्दी वाले ने अयान के पास जाकर हाथ का मोटा डंडा पूरी ताकत से उसके पैर पर दे मारा—'तड़ाक' 
और साथ ही बड़े नीच अंदाज़ में बोला, "बहुत अकड़ है न तुझमें? आज विवेक सर ने तेरी इस गुरुर की हड्डियाँ गिनने को कहा है।”

पैर पर पड़ी उस चोट की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि अयान ने एक ठंडी आह भरी। उस दर्द को जैसे उसने एक पल में पी लिया हो।

उसने पीछे की गीली दीवार का सहारा लिया और बिना नज़रे झुकाए, धीरे-धीरे अपनी पूरी ताक़त के साथ उनके सामने तनकर खड़ा हो गया।

उसने सीधे हवलदार की आँखों में देखा और बोला— "अपने आका से कह देना कि जीतने का वादा तो नहीं करता, लेकिन हारने वाला भी नहीं हूँ।”

अयान के उस जवाब पर हवलदार के चेहरे का रंग उड़ गया। इससे पहले कि वो डंडा दोबारा उठाता, पीछे से एक कड़कती हुई आवाज़ आई— "बहुत ज़बान चल रही है इसकी।"

हवलदार तुरंत एक तरफ हट गया। सामने बड़ा अफसर खड़ा था, जिसकी ठंडी नज़रें सीधा अयान के चेहरे पर जमी थीं। उसने अयान की बेखौफ आँखों को कुछ पल तक घूरा और फिर अपने आदमियों को हुक्म दिया— 

इसे अभी के अभी उल्टा लटका दो। देखता हूँ ये तेवर और कितनी देर टिकती है।”

अफसर का इशारा होते ही दोनों हवलदारों ने अयान को दबोच लिया। एक ने अयान के हाथ पीछे खींचकर मरोड़ दिए और दूसरे ने उसके पैर पकड़ लिए। अयान ने बहुत जोर लगाया, तड़पा भी, पर उन्होंने उसे हिलने तक का मौका नहीं दिया।

तभी एक हवलदार ने मोटा और खुरदरा रस्सा अयान के टखनों पर लपेटकर कसना शुरू किया। गांठ बांधकर उन्होंने रस्से को सलाखों के ऊपर से डाला और उसे ऊपर खींचने लगे।

रस्से की रगड़ इतनी तेज़ थी कि अयान के पैरों पर गहरे लाल निशान उभर आए। उसका पैर हवा में उठा और पूरा शरीर उल्टा लटक गया।

रस्सी के खिंचाव की वजह से अयान के शरीर का जोड़-जोड़ दुखने लगा। चेहरा नीचे की तरफ झूल रहा था और आँखों में दबाव सा महसूस होने लगा। दर्द तो बहुत था, पर अयान ने अपने होंठ जोर से दबा लिए ताकि उसके मुँह से कोई आवाज़ न निकले।

अफ़सर ने अपनी ठंडी नज़रों से उल्टा लटके अयान को देखा और फिर एक कदम और पास आकर झुक गया। उसने अपनी लोहे जैसी मज़बूत मुट्ठी अयान के बिखरे हुए बालों में फँसाई और  अपनी पकड़ मजबूत कर दी, जैसे वो उसकी खोपड़ी ही खाल से अलग कर देगा। 

अयान के चेहरे की नसें तन गई थीं। दर्द के बावजूद, उसके होंठों पर एक अजीब सी, डरावनी मुस्कान उभर आई। उसने अपने गले में अटकते खून को थूका। फिर सीधे अफसर की आँखों में देखते हुए, अपनी भारी आवाज़ में बस इतना कहा—

बाल पकड़कर सिर तो ऊपर उठा लिया साहब... लेकिन जमीर गिराने के लिए, आपको अभी बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे। 

अयान की वो मुस्कान... उस कालकोठरी के अंधेरे में अफसर को किसी जलते हुए कोयले जैसी चुभी। उसकी आंखों में जैसे खून उतर आया। उसने डंडे को फेंककर पास खड़े हवलदारों की तरफ देखा और चिल्लाया— "इसे और ऊपर खींचो! बिल्कुल छत से सटा दो इसे! हवलदारों ने पूरी ताकत लगाकर रस्सा खींचा।

अयान का शरीर हवा में और ऊपर उठने लगा, यहाँ तक कि उसके बंधे हुए पैर सलाखों के बिल्कुल ऊपर पहुँच गए। उसका पूरा भार अब सिर्फ उसके टखनों पर था, जो रस्से की रगड़ से छिल चुके थे। अयान दर्द से तड़प रहा था, पर उसका चेहरा अभी भी बेखौफ था।

अफसर अयान के झूलते हुए चेहरे के करीब आया और बड़े नीच अंदाज़ में बोला— "बहुत ऊँचा उड़ रहा था न? अब देख नीचे गिरने का मज़ा।

इतना कहते ही, अफसर ने रस्सा थामे हवलदार के हाथ से झटके के साथ रस्सा छुड़ा दिया। सड़ाक!             

रस्सा छूटते ही अयान का शरीर एक मरे हुए जानवर की तरह ऊपर से नीचे की तरफ लहराया। वो सीधा सिर के बल गिर रहा था। हवा में उसे संभलने का मौका तक नहीं मिला।

'धप!'
अयान का सिर उस सख्त, पथरीले फर्श पर पूरी ताकत से जा लगा। एक ऐसी सूखी और कच्ची आवाज़ आई— जैसे कोई कच्चा घड़ा पत्थर पर पटक दिया गया हो। सिर के पीछे से खून की एक मोटी धार फूटकर काली मिट्टी और फर्श की धूल में मिलने लगी। 

अयान का पूरा शरीर एक बार जोर से झटका खाकर तड़पा, जैसे मछली को पानी से बाहर निकाल दिया हो। उसकी आँखों की पुतलियाँ ऊपर चढ़ गईं और सफेद हिस्सा बाहर निकल आया। 

एक पल के लिए पूरा कमरा अयान की उस आखिरी दबी हुई कराह से दहल गया, और फिर... जेल की उस काल कोठरी में एक खामोशी पसर गई।

( लेखक की कलम से..)
हिसाब बराबर होने में अभी वक्त है। आज जो खून फर्श पर गिरा है, उसकी एक-एक बूंद का जवाब मांगा जाएगा। अयान की खामोशी को उसकी हार मत समझना, क्योंकि जब शेर पीछे हटता है, तो वो छलांग मारने की तैयारी कर रहा होता है।

अगले चैप्टर में पता चलेगा कि क्या अयान की ये आखिरी सांस थी या उसकी नई जिंदगी की शुरुआत। जुड़े रहिए, क्योंकि आग अभी और भड़केगी!

पाठकों लिए सवाल..
क्या आपको लगता है कि अयान ने अधमरी हालत में भी अफसर की आँखों में आँखें डालकर सही किया, या उसे अपनी जान बचाने के लिए थोड़ा झुक जाना चाहिए था?

फर्श पर फैले खून और अयान की इस हालत को देखकर, आपको क्या लगता है—क्या विवेक रॉय की दरिंदगी अयान की हिम्मत को तोड़ पाएगी?

अयान अब मौत और जिंदगी के बीच खड़ा है। क्या लॉक-अप के इस सन्नाटे को चीरकर कोई अयान की जान बचाने आएगा, या यहाँ से कहानी कोई नया मोड़ लेगी? जानने के लिए बने रहिए अयान एक नफ़रत की आग या वजूद की तलाश पार्ट 33 में।