अध्याय 5 : पहली लड़ाई और अनन्या का फैसला
पेड़ों के बीच से आती ठंडी हवा और लाल आँखों वाले वैम्पायरों की सरसराहट ने पूरे माहौल को भयानक बना दिया था। अनन्या का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, लेकिन आदित्य की आँखों में अब डर नहीं, सिर्फ़ गुस्सा और दृढ़ निश्चय था।
पहला वैम्पायर तेजी से आदित्य की ओर झपटा। इतनी गति कि अनन्या की आँखें कुछ देख भी नहीं पाईं। लेकिन आदित्य ने उसे बीच में ही पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया।
दूसरा वैम्पायर पीछे से वार करने आया, लेकिन आदित्य ने उसके हाथ को थामकर उसे पेड़ से टकरा दिया।
“तुम सोचते हो मैं इंसानों से प्यार करके कमज़ोर हो गया हूँ?” – आदित्य गरजा।
“नहीं… मैं अब पहले से भी ज्यादा मज़बूत हूँ।”
उनकी टक्कर से पेड़ों की डालियाँ टूटने लगीं। ज़मीन पर दरारें तक पड़ गईं।
अनन्या दूर खड़ी सब देख रही थी। उसके दिल में डर था – अगर आदित्य हार गया तो? अगर ये वैम्पायर उसे भी मार देंगे तो?
लेकिन फिर उसके अंदर से एक आवाज़ आई – *नहीं! मैं डर के पीछे नहीं छिप सकती। अगर मैं सच में आदित्य से प्यार करती हूँ, तो मुझे उसका साथ देना होगा।*
उसने पास पड़ी लकड़ी उठाई। उसे पता था कि यह वैम्पायरों को रोकने के लिए काफी नहीं होगी, लेकिन कम से कम वह अकेला नहीं लड़ेगा।
तभी एक वैम्पायर ने मौका पाकर अनन्या की ओर छलाँग लगाई। उसकी आँखें खून की प्यास से भरी हुई थीं।
अनन्या चीखी –
“आदित्य!”
आदित्य ने पलक झपकते ही वैम्पायर का रास्ता रोका। वह गरजते हुए बोला –
“अगर किसी ने उसे छुआ… तो वो मेरी मौत से भी बुरी सज़ा पाएगा।”
उसने पूरी ताक़त लगाकर उस वैम्पायर को पीछे धकेला।
लड़ाई लंबी चली। आखिरकार, आदित्य ने दोनों वैम्पायरों को इतनी बुरी तरह घायल किया कि वे भाग खड़े हुए। जाते-जाते उन्होंने आदित्य को चेतावनी दी –
“ये इंसान तुम्हें बर्बाद कर देगी, आदित्य। और जब हमारी जाति को पता चलेगा… तब तुम दोनों का अंत तय है।”
आसमान में काले बादल उमड़ आए। लड़ाई खत्म हो चुकी थी, लेकिन ख़तरा अभी खत्म नहीं हुआ था।
आदित्य भारी साँसें लेता हुआ अनन्या की ओर बढ़ा।
“क्या तुम ठीक हो?”
अनन्या की आँखों में आँसू थे, लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।
“मैं ठीक हूँ… क्योंकि तुम हो।”
आदित्य ने गहरी साँस ली।
“अनन्या… अब तुम्हें सच में फैसला लेना होगा। अगर तुम मेरे साथ रहोगी, तो तुम्हें हर पल मौत और खून के साए में जीना होगा। शायद पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ हो जाएगी। क्या तुम ये ज़िंदगी चाहती हो?”
अनन्या ने बिना हिचकिचाए कहा –
“हाँ। मैं डरते-डरते जीने से अच्छा तुम्हारे साथ मरना पसंद करूँगी। प्यार सिर्फ़ खुशियों का नाम नहीं है, आदित्य… ये तो जंग भी है। और मैं तुम्हारी इस जंग में हमेशा साथ रहूँगी।”
आदित्य की आँखें नम हो गईं। पहली बार उसने महसूस किया कि इंसान और वैम्पायर के बीच प्यार सिर्फ़ मुमकिन ही नहीं, बल्कि अमर भी हो सकता है।
अध्याय 6 : वैम्पायरों की सभा और अनन्या का इम्तिहान
रात और भी गहरी हो चुकी थी। जंगल में फैली खामोशी अब तूफ़ान से पहले की चुप्पी जैसी लग रही थी। आदित्य जानता था कि यह छोटी सी लड़ाई असली खतरे की शुरुआत भर थी।
सभा का बुलावा
अचानक आसमान में काले चमगादड़ों का झुंड उमड़ पड़ा। उनकी परछाइयाँ चाँद की रोशनी को ढक रही थीं। हवा में एक अजीब-सी सनसनाहट थी।
आदित्य ने तुरंत समझ लिया –
“ये बुलावा है… वैम्पायरों की सभा का। उन्होंने हमारे बारे में जान लिया है।”
अनन्या घबरा गई।
“सभा? मतलब सब वैम्पायर एक साथ?”
आदित्य ने गंभीर स्वर में कहा –
“हाँ। हमारी जाति का कानून बहुत सख़्त है। इंसान और वैम्पायर का रिश्ता वर्जित है। अगर हम उनके सामने गए, तो वे तुम्हें मौत की सज़ा देंगे… और शायद मुझे भी।”
अनन्या ने उसका हाथ थाम लिया।
“तो हम भाग जाते हैं। कहीं दूर चले चलते हैं।”
आदित्य ने सिर हिलाया –
“नहीं। उनसे भागना मुमकिन नहीं। वे पूरी दुनिया में हमें ढूँढ लेंगे। हमें उनका सामना करना ही होगा।”
कुछ देर बाद दोनों एक प्राचीन खंडहर जैसी जगह पर पहुँचे। पत्थरों की दीवारों पर अजीब-सी नक़्क़ाशी थी। चारों ओर मशालें जल रही थीं। और बीच में, गोल घेरे में खड़े थे दर्जनों वैम्पायर – उनकी आँखें खून जैसी लाल और चेहरे पर क्रूर मुस्कान।
बीच में खड़ा था सभा का मुखिया – राजवंत, जो आदित्य से भी कहीं ज़्यादा ताक़तवर था। उसकी उपस्थिति से ही हवा भारी हो गई थी।
राजवंत की आवाज़ गूँजी –
“आदित्य! हमारी जाति का बेटा होकर तूने हमारे कानून की सबसे बड़ी बेअदबी की है। एक इंसान से प्यार? क्या तुझे हमारी ताक़त, हमारे राज की परवाह नहीं?”
अनन्या काँप गई। लेकिन आदित्य दृढ़ खड़ा रहा।
“मुझे परवाह है… लेकिन मुझे प्यार की भी परवाह है। मैं अनन्या को छोड़ नहीं सकता।”
सभा में खुसर-पुसर होने लगी। कुछ वैम्पायर गुस्से से दहाड़े, तो कुछ हँस पड़े।
अनन्या का इम्तिहान
राजवंत ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा –
“ठीक है। अगर ये इंसान सच में तुझसे प्यार करती है, तो इसे अपनी हिम्मत साबित करनी होगी। हम इसे एक इम्तिहान देंगे।”
अनन्या ने घबराते हुए पूछा –
“कैसा इम्तिहान?”
राजवंत ने जवाब दिया –
“तीन परिक्षाएँ। अगर ये उन्हें पार कर लेती है, तो हम इसे स्वीकार करेंगे। लेकिन अगर हार गई… तो इसका खून यहीं बहा दिया जाएगा।”
अनन्या का दिल धड़क उठा। लेकिन उसने गहरी साँस ली और बोली –
“मैं तैयार हूँ।”
आदित्य ने घबराकर कहा –
“नहीं अनन्या, ये बहुत खतरनाक है। मैं तुम्हें खो नहीं सकता।”
अनन्या ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा –
“अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो मुझे भी अपना साहस साबित करना होगा। मैं डरकर पीछे नहीं हटूँगी।”
सभा में सन्नाटा छा गया। सब हैरान थे कि एक नाज़ुक-सी इंसान लड़की इतनी हिम्मत दिखा रही है।
राजवंत ने हाथ उठाया और बोला –
“पहली परिक्षा… डर की घाटी। इस इंसान को उस सुरंग से गुजरना होगा, जहाँ हर किसी का सबसे गहरा डर जीवित हो जाता है। अगर यह अपने डर पर काबू पा लेगी, तो इसे अगली परिक्षा दी जाएगी।”
अनन्या ने घबराकर आदित्य का हाथ थाम लिया।
आदित्य ने धीरे से कहा –
“याद रखना… चाहे जो भी दिखे, वो असली नहीं होगा। तुम्हारा डर ही तुम्हारा दुश्मन है।”
अनन्या ने गहरी साँस ली और अंधेरी सुरंग की ओर कदम बढ़ा दिए।
और यहीं से शुरू होगा पहली परिक्षा : डर की घाटी– जहाँ अनन्या को अपने सबसे गहरे डर का सामना करना होगा।