बर्बाद इश्क
एपिसोड 9 — जब दुश्मन क़रीब आया
मुंबई में रात का एक अजीब चेहरा होता है।
दिन में यह शहर काम करता है। शाम को साँस लेता है। लेकिन रात को — रात को यह शहर अपना असली रूप दिखाता है। जब सड़कें सुनसान होती हैं। जब रोशनियाँ कम होती हैं। जब वह लोग निकलते हैं जो दिन में छुपे रहते हैं।
और आज की रात — कुछ होने वाला था।
💥 रणवीर — ज़ाफ़र का पहला वार
सुबह के पाँच बजे।
रणवीर का फ़ोन बजा।
उसने आँखें खोलीं। नंबर देखा।
अपने सबसे भरोसेमंद आदमी — सलीम का नंबर था।
"हाँ।"
"भाई।" सलीम की आवाज़ में घबराहट थी। "पोर्ट पर — हमारा माल नहीं आया।"
रणवीर उठकर बैठ गया।
"क्या मतलब?"
"भाई — जहाज़ आया। लेकिन माल नहीं था। किसी ने पहले ही उठा लिया।"
"कौन?"
सलीम ने एक पल रुककर कहा — "ज़ाफ़र के आदमी।"
रणवीर के चेहरे पर एक ठंडा भाव आया।
"कितना नुकसान?"
"भाई — करोड़ों में।"
रणवीर ने फ़ोन रखा।
उठा। कपड़े पहने। बाहर निकला।
आदित्य का कमरा खटखटाया।
आदित्य दरवाज़ा खोलते ही समझ गया — कुछ हुआ है।
"ज़ाफ़र।" रणवीर ने एक शब्द में सब कह दिया।
आदित्य ने कपड़े उठाए।
दानिश का कमरा खटखटाया।
दस मिनट में तीनों नीचे थे।
गाड़ियाँ निकलीं।
पोर्ट पर पहुँचकर रणवीर ने अपनी आँखों से देखा।
जहाज़ खाली था। माल गायब।
उसके आदमी सिर झुकाए खड़े थे।
रणवीर ने एक-एक का चेहरा देखा।
"किसने बताया उन्हें?"
कोई नहीं बोला।
"किसने बताया?" इस बार आवाज़ धीमी थी। और इसीलिए और भी डरावनी।
एक आदमी आगे आया — काँपते हुए।
"भाई — मुझे नहीं पता। लेकिन — शायद — अंदर से किसी ने—"
रणवीर ने उसे रोका।
"आदित्य।"
"हाँ भाई।"
"पता लगाओ। अंदर से कौन है।"
आदित्य ने सिर हिलाया।
रणवीर ने एक बार पूरे पोर्ट को देखा।
दानिश उसके पास आया — "भाई — ज़ाफ़र ने सीधे वार किया है। अब?"
रणवीर ने दूर समुद्र को देखा।
"अब — हम भी सीधे जवाब देंगे।"
उसी दिन दोपहर को।
रणवीर बेकरी में था।
नायरा ने उसे देखा।
आज कुछ अलग था उसके चेहरे पर। वह ठंडापन — और भी गहरा था।
नायरा ने चुपचाप चाय बनाई। सामने रखी।
रणवीर ने देखा।
"पूछोगी नहीं?"
"क्या?"
"कि क्या हुआ।"
नायरा ने काउंटर साफ़ करते हुए कहा — "तुम बताना चाहोगे तो बताओगे।"
रणवीर ने चाय का कप उठाया।
एक पल रुका।
"दुश्मन ने वार किया।"
नायरा ने हाथ रोके।
"ठीक हो?"
"हाँ।"
"और तुम्हारे भाई?"
रणवीर ने उसे देखा।
यह लड़की — उससे पहले उसके भाइयों के बारे में पूछ रही थी।
"ठीक हैं।"
"तो ठीक है।" नायरा ने वापस काम शुरू किया।
रणवीर ने उसे देखा।
"बस? कुछ और नहीं पूछोगी?"
"क्या पूछूँ?"
"कि — डरो नहीं? कि — यह छोड़ दो? कि — यह सब ग़लत है?"
नायरा ने रुककर उसे देखा।
"रणवीर — मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ। और तुम्हारी ज़िंदगी के फ़ैसले तुम्हारे हैं।" उसने सीधे कहा। "लेकिन एक बात कहूँगी।"
"क्या?"
"जब भी थको — यहाँ आ जाना। चाय मिलेगी।"
रणवीर चुप रहा।
यह इतना छोटा सा जवाब था।
लेकिन इसमें इतना कुछ था।
उसने चाय पी।
और पहली बार किसी जगह — उसे सुकून मिला।
💔 आदित्य और रिया — वह सच जो सामने आया
आदित्य उस दिन बहुत व्यस्त था।
ज़ाफ़र के मामले में दिमाग़ लगा था। लेकिन शाम को — शाम को उसके क़दम उस गली की तरफ मुड़ गए।
रिया घर के बाहर नहीं थी।
वह जाने वाला था।
तभी अंदर से आवाज़ें आईं।
एक औरत की आवाज़ — रो रही थी।
आदित्य रुक गया।
फिर रिया की आवाज़ आई — "माँ — रो मत। हो जाएगा सब।"
"रिया — भाई की फ़ीस। दवाइयाँ। किराया। कैसे होगा बेटा? तू अकेली—"
"माँ।" रिया की आवाज़ में थकान थी लेकिन उसने दबा लिया। "मैं हूँ ना। चुप हो जाओ।"
आदित्य दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा।
दिल में कुछ भारी हो गया।
तभी दरवाज़ा खुला।
रिया बाहर निकली।
और आदित्य को देखकर चौंक गई।
"आप — यहाँ?"
"हाँ।" आदित्य ने कहा।
रिया की आँखें लाल थीं। उसने जल्दी से नज़र हटाई।
"कब से हो यहाँ?"
"अभी आया।" आदित्य ने झूठ बोला।
रिया ने उसे देखा। शायद समझ गई।
"क्या काम था?"
"बस — आया था।"
रिया ने एक पल उसे देखा।
फिर दरवाज़े पर बैठ गई।
"बैठोगे?"
आदित्य बैठ गया।
दोनों चुप रहे।
फिर आदित्य ने कहा — "कितने पैसे चाहिए?"
रिया ने उसे देखा।
"क्या?"
"फ़ीस। दवाई। किराया। कितने पैसे चाहिए?"
रिया का चेहरा सख़्त हो गया।
"तुमने सुना।"
"हाँ।"
"यह मेरा — मेरा घर है। मेरी बात है।"
"जानता हूँ।"
"तो फिर—"
"रिया।" आदित्य ने उसे देखा। "मैं मदद करना चाहता हूँ।"
"क्यों?" रिया की आवाज़ में गुस्सा था। "तुम कौन होते हो मेरी मदद करने वाले? मैं भिखारी नहीं हूँ।"
"मैंने यह नहीं कहा।"
"लेकिन मतलब यही था।"
"नहीं था।" आदित्य की आवाज़ शांत थी।
रिया उठ गई।
"चले जाओ।"
आदित्य उठा।
दरवाज़े पर रुका।
"रिया — मैं तुम्हें भिखारी नहीं समझता। मैं बस — देख नहीं सकता कि तुम अकेले इतना उठाओ।"
रिया ने पीठ से जवाब दिया — "मैं उठाती आई हूँ। अकेले।"
"जानता हूँ। लेकिन — अकेले उठाना ज़रूरी नहीं है।"
ख़ामोशी।
आदित्य चला गया।
रिया दरवाज़े पर खड़ी रही।
उसकी आँखों में आँसू थे।
गुस्से के। और कुछ और के भी।
"यह आदमी क्यों आता रहता है?"
तभी फ़ोन बजा।
मेघा का नंबर था।
रिया ने फ़ोन उठाया।
"हाँ मेघा।"
"रिया — आज मिलना है। ज़रूरी बात है।"
रिया ने आँसू पोंछे। "हाँ। आ जा।"
आधे घंटे बाद।
मेघा आई।
दोनों छत पर बैठी थीं।
मेघा चुप थी। जो उसकी आदत नहीं थी।
रिया ने देखा।
"क्या हुआ?"
मेघा ने एक पल सोचा।
फिर रिया का हाथ थामा।
"रिया — मुझे तुमसे कुछ कहना है।"
रिया ने उसे देखा।
"कहो।"
"मुझे — मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है।"
रिया की साँस रुक गई।
"क्या?"
"हाँ।" मेघा ने कहा। उसकी आँखों में डर था। "तुम नाराज़ हो?"
रिया ने एक पल लिया।
दिल में — कुछ टूटा।
लेकिन चेहरे पर उसने मुस्कान लाई।
"नाराज़ क्यों होऊँगी?"
"क्योंकि — मैंने पहले नहीं बताया।"
"कौन है?"
मेघा ने नाम बताया।
रिया ने सुना।
और दिल के उस कोने में — जहाँ मेघा के लिए कुछ था — एक दरवाज़ा बंद हो गया।
हमेशा के लिए।
"वह अच्छी लड़की है।" रिया ने कहा।
"सच में ठीक है तुम्हें?"
"हाँ।" रिया ने उसका हाथ दबाया। "तू खुश रह। बस।"
मेघा ने उसे गले लगाया।
रिया ने भी लगाया।
लेकिन आँखें बंद कीं।
और एक आँसू गाल पर आया — जो मेघा को नहीं दिखा।
रात को।
रिया अकेली छत पर थी।
आसमान में तारे थे।
उसने सोचा — "मेघा को किसी और से प्यार है।"
और फिर — अचानक — आदित्य का चेहरा आया।
"अकेले उठाना ज़रूरी नहीं है।"
रिया ने आँखें बंद कीं।
दिल में पहली बार — एक दरवाज़ा खुला।
बहुत धीरे से।
बहुत डरते हुए।
😏 दानिश और ईशानी — वह रात जब सब बदला
दानिश उस रात देर से घर आया।
पोर्ट वाले मामले में वह दिन भर लगा था। थका हुआ था।
लेकिन घर आते ही उसने फ़ोन उठाया।
ईशानी का नंबर।
घंटी बजी।
दो बार। तीन बार।
फिर आवाज़ आई — "हाँ?"
"सो गई थी?"
"नहीं। काम कर रही थी।"
"इस वक़्त?"
"हाँ।"
दानिश सोफ़े पर बैठ गया।
"क्या काम?"
"कल की presentation है।"
"रुको।"
दानिश ने कपड़े बदले। पानी पिया। वापस फ़ोन उठाया।
"अब बताओ। क्या problem है presentation में?"
"तुम्हें क्या—"
"ईशानी। बताओ।"
एक पल की ख़ामोशी।
फिर ईशानी ने बताया। काम की बात। presentation की structure।
दानिश ने सुना। सोचा।
"यह हिस्सा पहले रखो। और यह numbers — इन्हें visual बनाओ। लोग देखकर समझते हैं।"
"तुम्हें यह सब पता है?"
"बिज़नेस करता हूँ। थोड़ा बहुत आता है।"
ईशानी चुप रही।
"हो गया?" दानिश ने पूछा।
"हाँ। शुक्रिया।"
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आज — ठीक हो?"
ईशानी ने एक पल लिया।
"हाँ। क्यों?"
"बस — पूछना था।"
"दानिश।" ईशानी की आवाज़ धीमी हुई। "तुम — अच्छे हो।"
"यह अभी पता चला?"
"पहले नहीं मानती थी।"
दानिश हल्के से हँसा।
"और अब?"
"अब — थोड़ा मानती हूँ।"
"थोड़ा।" दानिश ने दोहराया। "ठीक है। थोड़े से शुरू करते हैं।"
ईशानी ने भी हल्के से हँसी।
वह हँसी — जो दानिश ने पहली बार सुनी थी।
और वह हँसी — उसने दानिश के दिल में कुछ कर दिया।
"सो जाओ।" दानिश ने कहा। "कल presentation अच्छी होगी।"
"हाँ।"
"और ईशानी—"
"हाँ?"
"वह आदमी ग़लत था। तुम काफ़ी से ज़्यादा हो। यह याद रखना।"
लंबी ख़ामोशी।
"दानिश — तुम मुझे यह रोज़ क्यों कहते हो?"
"क्योंकि — लगता है तुमने ख़ुद से यह सुनना बंद कर दिया है।"
ईशानी की आँखें भर आईं।
"रात को फ़ोन मत करो।" उसने कहा। आवाज़ थोड़ी काँपी।
"ठीक है।" दानिश ने कहा। "लेकिन अगर ज़रूरत हो — करना।"
फ़ोन बंद हुआ।
ईशानी अपने कमरे में थी।
फ़ोन सीने से लगाया।
और पहली बार तीन साल बाद — उसकी आँखों से आँसू निकले।
लेकिन यह दर्द के नहीं थे।
यह कुछ और था।
कुछ — जो वह अभी पहचान नहीं पा रही थी।
रात के तीन बजे।
रणवीर अपने कमरे में था।
उसके सामने ज़ाफ़र की फ़ाइल थी।
लेकिन आँखें फ़ाइल पर नहीं थीं।
दिमाग़ में नायरा थी।
"जब भी थको — यहाँ आ जाना।"
रणवीर ने फ़ाइल बंद की।
उसने पहली बार सोचा —
"क्या होगा अगर ज़ाफ़र ने उस तरफ वार किया?"
"क्या होगा अगर नायरा बीच में आ गई?"
उसके चेहरे पर एक सख़्त भाव आया।
उसने सलीम को फ़ोन किया।
"हाँ भाई।"
"नायरा'ज़ बेकरी। बांद्रा। वहाँ दो आदमी रखो। चौबीस घंटे। चुपचाप। वह लड़की को पता नहीं चलना चाहिए।"
"जी भाई।"
फ़ोन बंद।
रणवीर ने खिड़की से बाहर देखा।
मुंबई की रातें जाग रही थीं।
और एक गैंगस्टर — पहली बार — किसी के लिए डर रहा था।
रणवीर ने पहली बार किसी के लिए डरना सीखा।
आदित्य के लिए एक दरवाज़ा बंद हुआ — और दूसरा खुला।
दानिश ने पहली बार किसी को यह एहसास दिलाया कि वह काफ़ी है।
और मुंबई में — ज़ाफ़र अपना अगला वार सोच रहा था।
बर्बाद इश्क — जारी है।
(एपिसोड 10 जल्द आएगा...) 🔥