चित्तौड़ का तीसरा साका : अकबर का पैशाचिक रूप, मेवाड़ सदा के लिए आहत
(25 फरवरी, 1568)
यदि किसी दिन, मानव समाज, अपनी झूठी सहिष्णुता और उन मध्यकालीन धर्मांध हत्यारों के अंधे तुष्टीकरण की मरीचिका से बाहर निकलेगा, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में 1400 वर्षों से हिंदुओं का सतत नरसंहार किया है, तो केवल राजस्थान के हिंदू ही होंगे, जिनका नाम इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध निरंतर संघर्ष और बलिदान हेतु सर्वाधिक सम्मान से लिया जाएगा।
निश्चित रूप से इन लोगों का नेतृत्व करने वाले अद्भुत शौर्यवान राजाओं, जैसे मेवाड़ के सिसोदिया, अजमेर के चौहान, जालौर के सोनगरा, जैसलमेर के भाटी इत्यादि का यशगान तो सर्वोपरि होगा ही, तथापि ये राजस्थान के आमजन ही थे, जिन्होंने अपने राजाओं के धर्मध्वज के नीचे एकत्र होकर उनका साथ दिया और हिंदू धर्म की रक्षार्थ सर्वोच्च बलिदान देने में भी विचलित नहीं हुए।
राजस्थान में उस महान बलिदान की घटना को ‘साका’ कहा जाता है, जब इस्लामी आक्रांता हिंदुओं के किलों को चारों ओर से घेर लेते थे। हिंदू सैनिक अपनी महिलाओं को अग्नि में समर्पित कर देते थे, जिसे ‘जौहर’ कहा जाता था। अपनी पत्नियों, माँओं व बेटियों की चिता की राख को ये सैनिक अपने शरीर पर मल कर किले से बाहर आत्मोत्सर्ग के लिए निकल पड़ते थे।
इस्लामी काल से पूर्व कभी भी ‘साका’ शब्द का उपयोग नहीं हुआ था, क्योंकि इस्लाम के आगमन से पर्व के सैन्य अभियानों में मानवता और करुणा के सिद्धांतों का ध्यान रखते हुए, केवल सैनिकों से ही सैनिकों का युद्ध होता था। निःशस्त्र आमजन, व्यापारी, पुजारी, कलाकार, कृषक और सबसे महत्त्वपूर्ण, महिलाओं और बच्चों पर आक्रमण करना या उन्हें सताना कभी किसी के विचार में भी नहीं आता था। भारत पर गत 2500 वर्षों से हूण, शक, कुषाण, ग्रीक, यहाँ तक कि मंगोल भी आए थे, किंतु इस्लामी आक्रांताओं से पूर्व साका-जौहर की भयावह घटना का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता।
सातवीं शताब्दी में अरब के मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के राजा दाहिर पर आक्रमण किया।
उससे पूर्व के काल में हिंदुओं में परस्पर युद्ध होते थे। किंतु महिलाओं को कभी भी बंदी बनाकर यौन दासी नहीं बनाया गया था। हिंदुओं के आपस के युद्धों के लिखित या मौखिक इतिहास में स्त्रियों के साथ ऐसे घृणित व्यवहार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
यह अमानवीय परिपाटी सर्वप्रथम, मुहम्मद बिन कासिम ने अपने खलीफा, हज्जाज बिन यूसुफ के लिए राजा दाहिर की दो पुत्रियों को भोग-दासी बनाकर, आरंभ की। कासिम द्वारा राजा दाहिर की हत्या के बाद उनकी पत्नी, रानी देवी ने रोर के दुर्ग से कुछ दिनों तक संघर्ष किया, किंतु चारों ओर से घिर जाने के बाद रानी देवी ने जौहर कर लिया। लिखित इतिहास में कदाचित् यह पहली जौहर की घटना थी।
सिंध की हिंदू महिलाओं को इस्लामी विजेताओं को निर्वस्त्र होकर भोजन एवं मदिरा परोसने के लिए बाध्य किया गया और भाड़े के इस्लामी सैनिकों को सिंध की महिलाओं के साथ अपनी इच्छानुसार दुर्व्यवहार करने दिया गया। हिंदू शासित भारत में कभी दास प्रथा नहीं थी। जब राजा दाहिर व उनके परिवार की स्त्रियों की दुर्गति का मेवाड़ के बाप्पा रावल को पता चला तो बाप्पा को अरब से आए इन बर्बर इस्लामी आक्रांताओं का वास्तविक स्वरूप व मंतव्य तुरंत समझ आ गया। उन्होंने तुरंत अपने निकटतम हिंदू राजाओं के साथ मैत्री संबंध स्थापित करके एक सशक्त हिंदू सेना संघ का निर्माण किया, जो इन राक्षसों के विरुद्ध प्रतिकार कर सकता था।
बाप्पा के जीवनकाल और अरबों पर उनके विजय अभियान के विषय में इस पुस्तक में विभिन्न स्थानों पर लिखा गया है। बाप्पा और उनके योद्धाओं द्वारा अरबों की पराजय व उनका पीछा करके उन्हें खदेड़ने और अफगानिस्तान तथा सिंध को इस्लामी आक्रमणकारियों से मुक्त करवाकर वहाँ पुनः हिंदू साम्राज्य की स्थापना करने हेतु, विश्व भर के हिंदू व सभ्य समाज उनके सदैव ऋणी रहेंगे।
बाप्पा को पता था कि भविष्य में इस्लामी आक्रमण सिंध के रास्ते से ही होगा। अतः ईरान से अपनी विजय-यात्रा संपन्न करके आते हुए बाप्पा ने भिन्न भिन्न स्थानों पर राजपूतों की चौकियों का निर्माण किया, ताकि भविष्य में होने वाले आक्रमणों के बारे में मेवाड़, पंजाब और सिंध के राजाओं को पहले ही पता चल जाए।
बाप्पा की दूरदर्शिता और व्यवस्थाओं से भारत आने वाले पाँच सौ वर्षों तक इस्लामी आक्रमणों से सुरक्षित रहा। आज इतने आधुनिक संसाधनों इत्यादि के बाद भी हम इस प्रकार के हत्यारे आक्रमणकारियों से बचने में उतने सक्षम नहीं हैं, जैसे कि 1400 वर्ष पूर्व बाप्पा ने अपने संकल्प व दूरदृष्टि से सहज ही हमें बचाया।
हम इन महान योद्धाओं के कौशल की विस्मयपूर्ण सराहना ही कर सकते हैं, जिन्होंने इन अमानवीय, क्रूर, करुणाहीन एवं अनैतिक हत्यारों से हिंदू धर्म की रक्षा की। एक ऐसे समूह से हमारे धर्म व राष्ट्र को बचाया, जो अपनी धर्मांधता के चलते काफिरों की महिलाओं एवं संपत्ति को लूटने का एकमात्र लक्ष्य लेकर आए थे। अरबों के बाद हिंदुओं पर दूसरा आक्रमण 1000 ईसवी में अफगान लुटेरे महमूद गजनी द्वारा हुआ।
आज के पश्चिमी पंजाब में तब शाहिया वंश के जयपाल, आनंदपाल तथा त्रिलोचनपाल ने इस आक्रमण का पूरी शक्ति से प्रतिकार किया। इसके पश्चात् मध्य भारत के चंदेल राजाओं ने भी महमूद का सामना किया। महमूद ने हिंदू धर्म की आस्था के स्थल सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त किया और मंदिर की रक्षा में समर्पित 50,000 हिंदू योद्धाओं को भी निर्ममतापूर्वक मार दिया।
डॉक्टर रामगोपाल मिश्र के अनुसार, हिंदू राजा चालुक्य भीमदेव प्रथम ने महमूद का पीछा किया था और सिंध के जाट योद्धाओं ने सोमनाथ के नरसंहार से लौट रही महमूद की सेना को बुरी तरह परास्त किया। डॉक्टर मिश्रा इस्लामी इतिहासकार गर्दिजी को उद्धृत करते हुए लिखते हैं, “महमूद भारत से निकलने को उतावला था। हिंदुओं का बादशाह भीमदेव उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। महमूद को भय था कि उसकी विजय कहीं पराजय में न बदल जाए ! इसलिए वह मनशूरा के रास्ते मुलतान लौटा। उसकी लौटती सेना को पानी व भोजन भी नहीं मिला। फिर सिंध के जाटों ने नरसंहार किया। इस्लाम के बहुत से सैनिक यूँ मारे गए।
भारतवर्ष के हिंदू राजाओं को अब यह बोध हो चुका था कि ये इस्लामी आक्रांता केवल हिंदुओं के धन के पीछे ही नहीं थे, वरन् उनके पावन हिंदू धर्म पर भी आक्रमण कर उन्हें बलात् अपने धर्म में परिवर्तित करना चाहते थे।
हिंदू धर्म का समूल नाश करने के लिए हिंदू स्त्रियों का प्रदूषण आवश्यक था। इसीलिए हिंदू स्त्रियों का बलात्कार व यौन शोषण इस्लामी आक्रांताओं का नियम बन गया। तराई के दूसरे युद्ध में अफगान लुटेरे मोहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान की हत्या तीसरा बड़ा आघात थी। तराई के पहले युद्ध में पृथ्वीराज के द्वारा पराजय व क्षमादान के उपरांत भी गौरी ने बार-बार पृथ्वीराज को इस्लाम स्वीकार करने के लिए पत्र भी लिखे।
पृथ्वीराज की पत्नी संयोगिता की जो दुर्गति मुसलमानों ने की, उसका वर्णन लेखक के लिए संभव नहीं। उस महान नारी ने अपमान से बचने के लिए आत्महत्या कर ली। गौरी की सेना ने हिंदू स्त्रियों से खुलकर व्यभिचार किया।
निश्चित ही यह मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है कि यह कैसी नैतिक व्यवस्था है, जो मनुष्य को इतना बर्बर तथा क्रूर बना देती है?
ये कैसी सोच है जो स्त्रियों को इतनी निर्ममता से कुचलने में रस प्राप्त करती है। जो स्त्री, सुख व सृजन का आधार है, जिसे हिंदू समाज देवी के समान पूजता आया है, उसके साथ इतना घृणित व्यवहार करने की सीख कोई समाज क्यों और कैसे दे सकता है ?
हिंदू मानसिकता पर चौथा प्रहार था, बिना किसी युद्ध के भी मुस्लिम सेनाओं द्वारा हिंदुओं से लूटपाट, विध्वंस तथा बलात्कार की घटनाएँ।
इससे सिद्ध होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप पर इस्लामी आक्रमणों का मूल उद्देश्य बलपूर्वक हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन कराना ही था। मुसलमानों द्वारा आम लोगों की हत्याएँ व बलात्कार अकारण नहीं थे। यह एक मनोवैज्ञानिक चाल थी। भय के वातावरण में मानव मस्तिष्क विवेकहीन हो जाता है। शताब्दियों में, लाखों की संख्या में जो हिंदुओं के धर्मांतरण हुए तथा कई राजाओं ने इन राक्षसों के आगे बिना लड़े ही समर्पण कर दिया, उसका वास्तविक कारण यह भय ही था, जिसे उर्दू में ‘दहशत’ कहते हैं। एक भयाक्रांत समाज को दास बनाना अत्यंत सरल काम था।
भय एक सम्मोहन जैसा होता है। एक ऐसा सम्मोहन जिसमें व्यक्ति या समाज केवल जीवित रहने की सोचता है। इसलिए, इस सम्मोहन से स्मृति का विस्मरण हो जाता है। स्मृति जाने से बुद्धि का नाश होता है। और बुद्धिनाश के बाद मनुष्य को पशु की भाँति दासत्व में जकड़ जाना बहुत सरल है।
यदि हम मध्य-पूर्व में इस्लामी विस्तार की बात करें तो उन्हें मैसोपोटामिया तथा फारस को इराक और ईरान बनाने में अधिक उद्योग नहीं करना पड़ा, मात्र दशकों में ही यह कार्य संपन्न हो गया। इसी प्रकार से बाइजेंटाइन तथा मिस्त्र की सभ्यताओं का भी विध्वंस कर पूरे समाज का बलात् धर्म परिवर्तन कर दिया गया। इस्लामी हमलावरों की ‘दहशत’ के चलते ये समाज बिना लड़े ही झुकते गए।
इस्लामियों का पश्चिम की ओर विस्तार रोकने में साहसी ईसाइयों का, तथा पूर्व में उनके विस्तार को रोकने में निर्भीक हिंदुओं का बहुत बड़ा योगदान है। तर्कों, अरबों, उज्बेकों, अफगानों, कजाकियों और तातारियों के सतत आक्रमणों का निडर एवं शौर्यवान हिंदू राजाओं ने पूरी शक्ति से प्रतिकार किया।
हिंदू विरोध एवं संघर्ष से क्षुब्ध होकर इस्लामी शक्तियों ने अपनी धार्मिक विचारधारा पर चलते हुए निःशस्त्र और निरीह आमजनों को भी हानि पहुँचाना आरंभ किया। इस्लामी विचार के अनुसार गैर-मुस्लिम महिलाओं का बलात्कार करना न्यायोचित माना गया है। युद्ध में जीती गई गैर-मुस्लिम महिलाओं को इनके धर्मगुरु ‘लौंडी’ कहकर भी संबोधित करते हैं और यही इस्लामी अभियानों की आधारभूत अवधारणा भी थी।
यों तो किसी भी मनुष्य का दूसरे मनुष्य को दास बनाना महापाप है, किंतु स्त्री और बच्चों की यौन-दासता तो दासता का भी निम्नतम प्रकार है। दुर्भाग्य से इसे इस्लामी लुटेरों के अनुसार न्यायोचित ठहराया गया है और वर्तमान में भी इसे इस्लामी शिक्षा में पढ़ाया जाता है। 1400 वर्षों तक घृणित तथा अमानवीय यौन दासता की कुत्सित प्रथा के लिए क्षमा माँगने के विपरीत आज भी साप्ताहिक आयोजनों में दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा में यौन दासता को सिखाया जाता है और उसकी वकालत भी की जाती है।
अब यह सत्य, विश्व के सभ्य समाज से छुपा भी नहीं है।
सहस्रों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदू, बौद्ध एवं जैन समाज की चेतना में इस प्रकार की घृणित प्रथा का कभी कोई विचार नहीं उपजा था। इसलिए इस बर्बर और निकृष्ट प्रथा से निपटने हेतु, हिंदुओं को कालांतर में एक समाज के रूप में स्वयं में बदलाव करने पड़े।
मुसलमान आक्रांताओं द्वारा किए जाना वाला एक और घृणित कृत्य था, मृत शरीर के साथ संभोग। इसे अंग्रेजी में ‘नैक्रोफीलिया’ कहते हैं। इस्लामी आक्रांताओं द्वारा महिलाओं और बच्चों के मृत शरीरों के साथ ऐसा घृणित कार्य होते देख हिंदुओं के मन उद्वेलित हो उठे और इस्लाम के अनुयायियों के प्रति उनका मन घृणा से भर गया।
सातवीं से सत्रहवीं शताब्दी, अर्थात् एक हजार वर्ष तक राजस्थान ही एकमात्र ऐसा भूभाग हैं, जहाँ इस्लामी आक्रमणों का वीरतापूर्वक सामना किया गया और हिंदुत्व के ध्वज को स्वतंत्रतापूर्वक सदैव ऊँचा रखा गया। राजस्थान के राजाओं एवं प्रजाजनों ने एक ऐसी सुरक्षा-तकनीक का प्रयोग किया, जिससे न केवल उनका सम्मान बच गया, वरन् उससे अन्य हिंदुओं को भी संदेश गया कि चाहे मृत्यु का वरण ही क्यों न करना पड़े, हम इस्लामी शक्तियों के सामने नतमस्तक नहीं होंगे।
राजस्थान के हिंदुओं की उच्चतम आध्यात्मिक शक्ति के कारण ही उन्होंने विरोधस्वरूप ‘साका-जौहर’ जैसी बलिदानी प्रथा की शुरुआत की, जिससे हिंदुओं की अस्मिता पर हमला करने वाले इस्लामी आक्रांताओं की आत्माएँ भी उद्वेलित हो गईं।
साका वस्तुतः उस प्रथा को कहा जाता है, जब हिंदू राजा अपने-अपने दुर्गों के द्वार खोलकर, केसरिया बाना पहनकर शत्रु का तब तक सामना करते थे, जब तक कि वे स्वयं अथवा शत्रु, मृत्यु को प्राप्त न हो जाए। जौहर की प्रथा में हिंदू महिलाएँ-बालिकाएँ और बच्चे स्वयं को अग्नि को समर्पित कर देते थे, ताकि शत्रु उनके मृत शरीर के साथ कोई भी अभद्रता न कर पाए और केवल उनकी भस्म ही उनके हाथ लगे।
कुछ लेखकों ने बड़ी ही निर्लज्जता के साथ जौहर जैसी बलिदानी प्रथा की तुलना सती प्रथा के साथ की है। इन दोनों ही प्रथाओं को समान मानना न केवल अज्ञान है, वरन् इससे इस्लामियों के समक्ष अपनी अस्मिता को बचाने के लिए जौहर के बलिदानी स्वरूप को विकृत करने की कुत्सित मंशा भी है।
जौहर, इस्लामी आक्रांताओं से महिलाओं-बालिकाओं एवं बालकों की अस्मिता की रक्षा के लिए होता था, जबकि सती प्रथा एक रूढ़ि थी, जिस पर सर्वथा भिन्न बहस होनी चाहिए।
एक रूढ़िवादी सामाजिक कुरीति की, एक महान बलिदान से तुलना करना केवल त्रुटिपूर्ण ही नहीं, वरन् एक दुर्भावनापूर्ण और निंदनीय कार्य है।
कई मित्रों का मत है कि इतनी हृदयविदारक मृत्यु की अपेक्षा उन्हें विष पीकर अथवा स्वयं को शस्त्राघात से मृत्यु का चुनाव करना चाहिए था। हमारी महान माताओं और भगिनियों ने अग्निस्नान से अपने शरीर को समाप्त करने का इतना पीड़ादायक मार्ग क्यों चुना? इसके दो कारण हैं।
पहला तो यह कि इस्लामी युद्ध नीति में, शत्रु की मृत महिलाओं के साथ भी बलात्कार किया जा सकता है। कौन सती महिला अपनी मृत्यु के बाद भी अपने साथ ऐसा घिनौना कुकृत्य सहन कर सकती थी? जब शरीर ही राख हो चुका होगा तो बात ही समाप्त हो गई। यदि हमारी पूर्वजा स्त्रियों ने जौहर नहीं किया होता, और किसी भी कारण से उनकी मृत देह यवनों के हाथ पड़ जाती तो वे राक्षस भारत के नगरों और मार्गों में हमारी रानियों के शवों के साथ संभोग करते। पूरे हिंदू समाज का मनोबल, उनकी लडने की इच्छा ही टूट जाती, यदि दरिंदगी का यह नंगा नाच खुले में होता। हमारे पूर्वजों ने जौहर करके वह संभावना ही समाप्त कर दी। और दूसरा यह कि जौहर से इस्लामी आक्रमण के विरुद्ध संघर्ष करने का एक सशक्त संदेश जाता था कि हम अपने शरीर का अंत हो जाने तक इस्लाम का प्रतिकार करेंगे।
हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि राजस्थान के उन दुर्गों से कैसा भयावह काला धुआँ उठा होगा, जिसे कई-कई कोस दूर तक आमजनों ने देखा होगा। हम सोच सकते हैं कि उस समय के आमजनों पर अपने राजाओं, रानियों और योद्धाओं द्वारा धर्म हेतु किए गए इस महान बलिदान का क्या प्रभाव पड़ा होगा। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि राजस्थान के दुर्गों से उठती कालस्वरूपा ज्वालाओं को देखकर हर हिंदू का इस्लामी हत्यारों से लड़ने का संकल्प कितना सघन हो गया होगा।
अपने सतीत्व की रक्षा हेतु अग्नि को समर्पित हुई उन महिलाओं व बच्चों की भीषण चीत्कारों का आमजनों के मनो-मस्तिष्क पर कैसा वीभत्स प्रभाव पड़ा होगा, हम सोच सकते हैं। राजस्थान में उस समय बह रही पवन में मिश्रित घी और चंदन के धुएँ की गंध जौहर स्थल से कई कोस तक फैल गई होगी और जहाँ-जहाँ तक भी इस गंध का प्रभाव हुआ होगा, वहाँ तक इस्लामी बर्बरता की कथा लोगों की नासिका से होते हुए उनके हृदय में बस गई होगी।
‘दहशत’ का सम्मोहन एक उच्चतर सत्ता के आह्वान से ही तोड़ा जा सकता है। और वह सत्ता है दासता के विरोध में आत्मोत्सर्ग का संकल्प। जो व्यक्ति या समाज, स्वतंत्र रहने के लिए आत्मोत्सर्ग को भी स्वीकार कर ले, वह भय से मुक्त हो जाता है। उसकी चेतना भौतिक जगत के नियमों का अतिक्रमण करके मुक्त हो जाती है। यही घटना साका-जौहर का मूल आध्यात्मिक आधार थी।
पूरे विश्व में कहीं पर भी जौहर और साका जैसा एक भी उदाहरण नहीं है, जिसमें शत्रु द्वारा अपमान अथवा मृत्यु के विरोधस्वरूप ऐसा महाबलिदानी कृत्य किया गया हो। यह अत्यंत गर्वीले लोगों द्वारा दी गई चुनौती थी, जिन्होंने इस्लामी आक्रांताओं की विजय को भी खोखला कर दिया। हिंदुओं ने जौहर कर एक ऐसा प्रत्युत्तर दिया, जिसने देश भर के प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया तथा उन्हें भी किसी साम्राज्यवादी के समक्ष कभी न झुकने हेतु प्रेरित किया।
साका-जौहर से केवल राजस्थान ही नहीं, वरन् पूरे भारतवर्ष के हिंदू समाज में एक नए संकल्प व इच्छाशक्ति का संचार हुआ कि हम कभी इस्लामीकरण के प्रयासों के आगे नहीं झुकेंगे।
यद्यपि राजस्थान ने एक हजार वर्षों में एक दर्जन से अधिक साके और जौहर देखे हैं, किंतु 25 फरवरी, 1568 को हुआ चित्तौड़ का तीसरा साका सर्वाधिक वीभत्स और हृदय विदारक था, जब अकबर ने चित्तौड के दुर्ग पर आक्रमण किया था।
मुगलों द्वारा हिंदुओं के भीषण नरसंहार की इस गाथा को न केवल हिंदू वरन् मुस्लिम लेखकों ने भी लिपिबद्ध किया है, जो स्वयं इस हत्याकांड के साक्षी थे। उन्हीं से उल्लेख करते हुए हम यहाँ बात करने वाले हैं। हम प्रयास करेंगे कि हम चित्तौड़गढ़ के इतिहास के उस काले दिन के एक-एक क्षण को जीवंत अनुभव कर सकें।
चित्तौड़ के तीसरे साका-जौहर ने मेवाड़ के इतिहास को बदलकर रख दिया और इसी के साथ न केवल राजस्थान, वरन् पूरे भारतवर्ष के हिंदुओं ने इस्लाम के अनुयायियों का एक ऐसा विकृत और वीभत्स मुख देखा, जिसने धर्मांधता के नाम पर असंख्य लोगों को निर्ममता से लील लिया था। तीसरे साका का महाराणा प्रताप के मानस पर भी एक गहन और कभी न मिटने वाला प्रभाव पड़ा था।
एक अनुमान के अनुसार, प्रताप के लगभग 500 निकट व दूर के संबंधी इस साका-जौहर में वीरगति को प्राप्त हुए। प्रताप ने साके के बाद ही इन विक्षिप्त हत्यारों द्वारा किए गए हिंदुओं के नरसंहार का उचित प्रत्युत्तर देने की शपथ ली थी।
सबसे पहले चित्तौड़ के तीसरे साका से पूर्व की घटनाओं तथा अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण की पृष्ठभूमि पर हम चर्चा कर लेते हैं।
जैसा कि हमने प्रताप के यौवनकाल वाले अध्याय में जाना कि प्रताप ने अनुज शक्तिसिंह को उनके क्रोध एवं असंगत व्यवहार के कारण मेवाड़ से निष्कासित कर दिया था। शक्ति सिंह ने मेवाड़ छोडने के पश्चात् अकबर के दरबार में जगह बना ली थी, किंतु उनके मन में सदैव मेवाड़ ही था। यदि हम उनके जीवनवृत्त पर ध्यान दें तो ऐसा प्रतीत होता है कि शक्तिसिंह अकबर के दरबार में मेवाड़ के एक भेदिए (गुप्तचर) थे, जो मेवाड़ को अकबर की कुत्सित योजनाओं से समय-समय पर अवगत करवाते रहे।
इस पुस्तक में इस विषय पर कई ऐसे बिंदु आते हैं, जो इस बात को किसी सीमा तक सत्यापित भी करते हैं। 1567 में अकबर के साथ मध्य भारत में उसके अभियानों पर धौलपुर में शक्तिसिंह को चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण की योजनाओं का पता चल गया।
अकबर ने व्यंग्य में शक्ति सिंह से पूछा, “मेवाड़ के अतिरिक्त सब हिंदू राजा मेरे अधीन हो चुके हैं। मैं उस पर आक्रमण करूँगा। तुम मेरी सहायता करोगे?”
एक रात शक्तिसिंह अपने कुछ विश्वस्त मित्रों के साथ चित्तौड़ की ओर निकल गए। वे अपने पिता उदय सिंह के पास पहुँचे और वहाँ जाकर उन्होंने अकबर द्वारा 80,000 की सेना के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण की योजना के विषय में बताया। मेवाड़ के युद्ध नीतिकारों की सभा ने एकत्र होकर इस बात पर विचार-विमर्श किया।
मेवाड़ के सामंतों की सभा ने निर्णय लिया कि बहादुर शाह से संघर्ष के बाद मेवाड़ अभी सैन्य रूप से सबल नहीं है। उदय सिंह, प्रताप के साथ चित्तौड़ छोड़कर दक्षिण-पूर्व मेवाड़ की ओर निकल जाएँगे, जबकि 8,000 योद्धा जयमल राठौड़ और पत्ता चूँडावत के नेतृत्व में, चित्तौड़ दुर्ग और उसमें बसे 30,000 प्रजाजनों की रक्षा करेंगे। प्रताप ने बहुत आग्रह किया कि वे चित्तौड़ में रहकर मुगलों से युद्ध करेंगे, किंतु सामंतों ने प्रताप सहित पूरे राजपरिवार को उदयपुर की ओर रवाना कर दिया। राजपरिवार के साथ ही मेवाड़ का राजकोष भी बहुत चतुराई से स्थानांतरित कर दिया गया।
चित्तौड़ दुर्ग की गहन सुरक्षा में मेवाड़ की सेना ही नहीं, तीस हजार आम प्रजाजन भी रहते थे।
15 अक्तूबर, 1567 को अकबर ने चित्तौड़ से छह मील दूर नागरी गाँव में अपना पड़ाव डाला और इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध अटल खड़े हिंदुओं के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण केंद्र चित्तौड़गढ़ का घेराव कर दिया। राजपूतों के दो मुख्य योद्धा थे–जयमल राठौड़ और पत्ता चूँडावत। दुर्ग के भीतर साईंदास रावत, बल्लू सोलंकी, डोडिया ठाकुर साँड़ा और ईसरदास चौहान सरीखे योद्धा भी तैनात थे।
मुगल तोपों को चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों पर प्रभावहीन देखकर अकबर ने दुर्ग की दीवार तक दो सुरंगें खुदवाने का आदेश दिया।
इन सुरंगों के माध्यम से वह बारूद लगाकर दर्ग की दीवारों को गिराना चाहता था। मुगलों को दुर्ग में बैठे शत्रु से युद्ध का कोई भी अनुभव नहीं था और न ही दुर्ग को जीतने का। इस विषय में अकबर के दो हिंदू सलाहकारों, आमेर के भगवानदास और राजा टोडरमल ने मुगलों की सहायता की थी।
दीवारों को ध्वस्त करने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था– दुर्ग की दीवार के निकट ढकी हुई खाइयाँ खोदना, जिन्हें ‘सबात’ कहा जाता था।
खाई खोदकर निकाली गई एक टोकरी मिट्टी के बदले स्थानीय मजदूरों को एक चाँदी की मोहर दी जाती थी।
किंतु ये मजदूर जैसे ही खाइयाँ खोदने जाते तो दुर्ग में उपस्थित योद्धा बंदूकों और तीरों से उन्हें परलोक पहुँचा देते। ऐसा आकलन है कि चित्तौड़ के राजपूत इसी तरह प्रतिदिन 200 मजदूरों को मौत के घाट उतार देते थे। अकबर चित्तौड़ के लिए कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार था। अतः उसने उन्हीं मृत मजदूरों के शवों से एक दीवार बनाई, जिसकी आड़ में मुगल खुदाई का कार्य जारी रख पाए।
तीन माह के पश्चात् दुर्ग के योद्धाओं ने अकबर को शांति संदेश भेजने का विचार किया। अतः डोडिया के ठाकुर साँड़ा तथा ईसरदास चौहान को अकबर से वार्ता करने हेतु भेजने का प्रस्ताव हुआ। ठाकुर साँड़ा ने अकबर से कहा, “हम आपको उपहार इत्यादि देने को राजी हैं और आपसे अनुरोध करते हैं कि आप अपनी महानता का परिचय देते हुए इस घेराबंदी को हटाएँ और युद्ध को यहीं समाप्त करें।”
अकबर ने प्रत्युत्तर में कहा, “मैं बादशाह हूँ और मैं केवल सम्राट् से ही उपहार ले सकता हूँ। उदयसिंह को स्वयं यहाँ आकर समर्पण करना होगा, अन्यथा इस युद्ध का अंत नहीं होगा। तुम एक साहसी और स्वामिभक्त योद्धा हो, अतः तुम्हारे लिए मैं कुछ भी करूँगा, किंतु युद्ध का अंत नहीं।”
साँडा ने उत्तर दिया, “यदि युद्ध होना ही है तो हमारी केवल एक विनती है कि हिंदू योद्धाओं के शवों का हिंदू रीति से ही अंतिम संस्कार किया जाए।” अकबर ने राजपूतों की इस प्रार्थना को ससम्मान स्वीकार किया।
जब वे वहाँ से निकलने लगे, तो अकबर की सेवा में लगे आमेर के राजा भगवानदास ने व्यंग्य में कहा, “तुमने बादशाह को मुजरा पेश नहीं किया?”
इस पर ईसरदास चौहान ने कहा, “ये मेरे बादशाह नहीं हैं, इन्हें मैं अपना मुजरा युद्धस्थल में ही पेश करूँगा।”
अकबर राजपूतों की इस निर्भीकता से बहुत प्रभावित हुआ था। अकबर ने ईसरदास चौहान को अपनी ओर मिलने का प्रस्ताव दिया, जिसे ईसरदासजी ने अस्वीकार करते हुए साँडा ठाकुर की ही माँग दोहराकर विदा ली।
मेवाड़ के योद्धा कहीं ये आशा लेकर आए थे कि हिंदू राजा भगवान दास व टोडरमल उनकी कुछ सहायता तो करेंगे। कोई सम्माजनक मार्ग निकालने में अकबर को प्रभावित करेंगे। किंतु दोनों हिंदू राजाओं के इस कायरतापूर्ण व्यवहार से मेवाड़ के वीरों की अंतिम आशा भी समाप्त हो गई।
अकबर ने उत्तरी छोर की दीवार को 4800 किलो बारूद लगाकर ध्वस्त करने का प्रयास किया, किंतु दुर्ग के योद्धाओं ने इस आक्रमण को विफल कर दिया और टूटी हुई दीवार को रातोरात ठीक भी करवा लिया। इसी प्रकार 17 दिसंबर, 1567 को दक्षिणी छोर की दीवार पर भी बारूद लगाकर तोड़ने का प्रयास किया गया, किंतु इस कार्य में कुछ गड़बड़ी फैलने के कारण कुछ मुगल सैनिक मारे गए।
मुगल इतिहासकार अल बदायूँनी ने अपनी पुस्तक, ‘मुंतखब-उल-तवारीख’ में लिखा है– “बारूद से जो धमाका हुआ, उसमें दोस्त और दुश्मन दोनों ही मारे गए। इस्लाम के योद्धा पत्थरों के नीचे दब गए, कुछ चट्टानें तो चार-चार हजार किलो की रही होंगी, जिनके साथ पत्थरदिल काफिर इस तरह उड़े, जैसे आतिशी बरसात में पतंगे उड़ा करते हैं। इस धमाके की गरमी और धुआँ, जन्नत और दोजख दोनों तक पहुँचा होगा। चुनांचे आग से खेलने वाले मोमिनों और काफिरों, दोनों का ही खून एक जगह बहा। और यह दिन खासतौर पर गिद्धों और कौवों की दावत का दिन बन गया।”
अकबर ने दुर्ग पर तोपें तैनात कर दीं और सामने से हमला करना शुरू किया, जिससे दुर्ग की दीवार को हर जगह से हानि हुई, किंतु मुगल तोपची, चित्तौड़ की अजेय दीवारों को भेद नहीं पाए। वहाँ इतने शिलाखंड बिखर गए थे कि मुगल उन्हीं की आड़ में छिपकर हमला करने लगते। एक दिन अकबर ने ‘संग्राम’ नाम की अपनी बंदूक से निशाना साधकर गोली चलाई, जो दुर्ग की बुर्ज पर खड़े एक योद्धा को लगी। दुर्भाग्य से यह योद्धा थे, दुर्ग के स्वामी जयमल राठौड़।
अकबर की गोली से उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई और जयमल चलने-फिरने में अक्षम हो गए।
इस घटना से दुर्ग में उपस्थित सैनिकों का मनोबल टूटने लगा था और मेवाड़ की सेना अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो चली थी। जयमल ने अन्य सरदारों के साथ विमर्श किया कि मुगल सेना के पास असीमित साधन हैं। हमारे यहाँ साधन भी कम हैं, भोजन सामग्री भी अब समाप्त होने लगी है। अब समय आ गया है कि हम दुर्ग के द्वार खोल दें और जितना हो सके, मुगलों का संहार करें, ताकि हमें देवलोक में स्थान प्राप्त हो सके। महिलाओं को जौहर का आदेश दे दिया गया।
निजाम-उद-दीन-बख्शी अपनी पुस्तक ‘तबाकत-ए-अकबरी’ में लिखता है– “दुर्ग की सेना में अपने सेनापति के घायल होने से निराशा व्याप्त हो गई। हर पुरुष अपने घर की ओर भागा। उन्होंने अपनी पत्नियों व बच्चों को एक स्थान पर एकत्र कर उन्हें लकड़ियों पर बिठाकर आग लगा दी। काफिरों के यहाँ इस कृत्य को जौहर कहा जाता है।”
जैसा कि इस अध्याय के प्रारंभ में बताया गया है, चंदन की लकड़ियों की बड़ी-बड़ी चिताएँ जलाई जाती थीं और इन चिताओं में महिलाएँ, बालिकाएँ तथा छोटे बालक अग्नि में प्रवेश करके अपनी पवित्रता की रक्षा करते थे। चारणों ने दुर्ग की महिलाओं को जौहर का महत्त्व समझाया। चंडी पाठ किया गया तथा सर्वोच्च बलिदान के लिए छोटे बच्चों को माँओं के साथ बाँध दिया गया, ताकि वे छटपटाकर अग्निकुंड न छोड़ दें।
अबुल फजल जौहर के लिए लिखता है–“अकबर ने शुजात खाँ व भगवान दास को प्रसन्नतापूर्वक बताया कि उसने एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को मार डाला है। एक घंटे के बाद जब्बार कुली ने सूचित किया कि दुर्ग की प्राचीर से सब पुरुष कहीं चले गए हैं। तभी दुर्ग में कई स्थानों पर एक साथ अग्नि की लपटें उठने लगीं। भगवान दास बोला कि यह जौहर हो रहा है। कल सुबह राजपूत आक्रमण करेंगे।
चंदन की लकड़ी की एक विशाल चिता बनाई गई, जिसमें घी, धूप आदि डाला गया। फिर ये अपनी स्त्रियों को कुछ पाषाण मना (पत्थरदिल) हठी लोगों के संरक्षण में छोड़कर लड़ने निकल गए। जब पराजय निश्चित हो गई तो इन हठी पुरुषों ने असहाय स्त्रियों को राख बना दिया।
ये हठी लोग दुर्ग के चारण हुआ करते थे। ये स्त्रियों व बच्चों को पुरखों की कथाएँ सुनाकर उनका तेज जाग्रत् करते थे। संकेत आने पर ये चिताओं को अग्नि दे देते थे।
यह इन चारणों के लिए असह्य वेदना की घड़ी होती थी। जिन रानियों व बच्चियों को इन्होंने शिक्षित व संस्कारित किया था, उन्हें अपने हाथों से यूँ मिटा देना कोई सरल बात नहीं थी।
अंतिम स्त्री के राख हो जाने पर ये चारण सिर पर केसरिया बाँधकर मरने चले जाते।
यह भयानक उपक्रम किसलिए? केवल धर्म व स्वतंत्रता के लिए ! हमें अबुल फजल का नैतिक दिवालियापन भी दिखता है, जिसे अपने लोगों की दरिंदगी नहीं दिख रही, बल्कि, महान राजपूतों को पाषाण हृदय तथा उनके चारण मित्रों को हठी कह रहा है।
जिन प्रमुख रानियों व सामंतों की महिलाओं ने जौहर किया, उनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैं–
1. रानी सज्जन बाई सोनगरा – पत्ता चूँडावत की माताश्री।
2. रानी जीवा बाई सोलंकिनी – पत्ता की पत्नी, जो लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।
3. रानी भगवती देवी चौहान – ईसरदास चौहान की पुत्री।
4. रानी मदालसा बाई कच्छावा – सहसमल्ल की पुत्री।
5. रानी पद्मावती बाई झाला।
6. रानी रतन बाई राठौड़।
7. रानी बालेसा बाई चौहान।
8. रानी बगड़ी बाई चौहान – डूंगर सिंह परमार की पुत्री।
9. रानी आशा बाई परमार।
10. पत्ता चूँडावत के दो बेटे और पाँच बेटियाँ।
उस दिन धरती की छाती क्या फटी न होगी ?
क्या आकाश उस दिन पिघल न गया होगा ?
क्या इंद्र का आसन उस दिन डोला न होगा ?
क्या देवताओं ने मानवों की वेदना पर आँसू न बहाए होंगे ?
क्या चित्रगुप्त के कर्मों की बही, रक्त से नहाई न होगी ?
क्या ब्रह्मा सोच में न पड़े होंगे कि इस दिन के लिए सृष्टि रची थी ?
क्या बुद्ध की अकंप चेतना उस दिन कँपी न होगी ?
क्या कृष्ण का स्थिर चित्त भी उस दिन डोला न होगा ?
क्या अपने खप्पर से रक्त पीती काली के हाथ न काँपे होंगे ?
क्या अपना त्रिशूल, महादेव उस दिन उठा पाए होंगे ?
सर्वप्रथम जयमल राठौड़ व पत्ता चूँडावत की हवेलियों से जौहर के धुएँ उठे। तत्पश्चात् पूरे चित्तौड़ में जगह-जगह जीवित चिताएँ धधक उठीं।
आकाश में उठते धुएँ और लपटों को देखकर मुगल समझ नहीं पाए कि क्या हो रहा है ? आमेर के राजा भगवानदास ने अचंभित अकबर एवं मुगल सेना को बताया कि दुर्ग की स्त्रियाँ सामूहिक आत्मदाह कर रही हैं।
मेवाड़ की सेना अब अंतिम आक्रमण करने वाली है। अर्थात् अब योद्धाओं ने स्वयं और परिवार के मोह को अग्नि में समर्पित कर दिया है। अब मेवाड़ के सभी योद्धा एक-दूसरे को अंतिम बीड़ा खिलाएँगे तथा केसरिया बाना पहनकर वीरगति के लिए रण में उतरेंगे।
अगली सुबह, चित्तौड़ दुर्ग के कपाट खोल दिए गए।
अबुल फजल लिखता है, “आज तक किसी ने ऐसा युद्ध नहीं देखा। आज तक किसी ने ऐसा युद्ध न तो सुना है और न ही कभी लड़ा है। इस युद्ध के विषय में कुछ भी कहना मेरे सामर्थ्य से बाहर है। मैं इस युद्ध में घटित हजारों शौर्यपूर्ण कृत्यों में से एक का भी उचित वर्णन नहीं कर पाऊँगा।”
जयमल चल नहीं पा रहे थे, अतः उनके भाई कल्ला राठौड़ ने उन्हें अपने कंधे पर बैठा लिया, ताकि जयमल अधिकाधिक मुगलों का संहार करने की अपनी अंतिम इच्छा को पूरा कर सकें।
कल्ला राठौड़ ने अपने भाई से उस समय कहा था, “मेरे कंधों पर बैठ जाइए और अपनी तलवार की प्यास इन म्लेच्छों के रक्त से बुझाइए।”
दर्जनों मुगल सैनिकों का संहार करने के पश्चात् दुर्ग की ‘हनुमान पोल’ और ‘भैरव पोल’ के मध्य दोनों ही योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। अकबर ने गोली लगने से मृत जयमल का सिर, स्वयं अपने हाथों से काटा, ऐसा मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने अपने संस्मरणों में लिखा है। डोडिया साँड़ा अपने अश्वारोहियों के साथ मुगलों से लड़ते हुए गंभीरी नदी के तट पर वीरगति को प्राप्त हुए। दुर्ग के द्वार खुलने के बाद अकबर ने मेवाड़ की सेना पर अपने उन्मत्त हाथी छोड़ दिए। मेवाड़ की शौर्यशाली सेना को कुचलने हेतु 300 हाथियों को छोड़ा गया था। इनमें से मुख्य हाथी थे मधुकर, जांगिया, सब्दिलिया और कादिरा। राजपूतों ने हाथियों को भी आड़े हाथों ले लिया।
ईसरदास चौहान ने मधुकर नाम के हाथी पर चढ़कर हाथी का नाम पूछा और फिर ईसरदास ने हाथी की सूँड़ काटते हुए महावत से कहा, “अपने गुणग्राहक बादशाह से कहना, ईसरदास ने मुजरा भेजा है।” और इस तरह सरदार ईसरदास चौहान ने चित्तौड़ की तलहटियों में मुगल खेमे में शांति वार्ता के पश्चात् आमेर के राजा भगवानदास को दिया हुआ अपना वचन निभाया।
ईसरदास को इसी मधुकर के नीचे दबकर वीरगति प्राप्त हुई, क्योंकि सूँड़ काटने से बिलबिलाया हाथी पलटकर उन्हीं पर आ गिरा।
मुगल हाथियों की सूँड़ों को राजपूत योद्धा इस प्रकार काट रहे थे कि अबुल फजल ने उसकी उपमा देते हुए लिखा है, “आसमान से साँपों की बारिश हुई जा रही थी।”
यह एक ऐसा दृश्य था, जिसे देखकर अकबर को मेवाड़ के योद्धाओं के शौर्य और शक्ति दोनों का ही भलीभाँति बोध हो गया था। जांगिया नाम के हाथी ने रक्तस्त्राव से मृत्यु से पूर्व 45 हिंदू योद्धाओं को कुचलकर मार डाला। तीन घंटों तक निरंतर युद्ध के पश्चात् अकबर ने हाथियों की सेना की सुरक्षा में चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश किया।
पत्ता चूँडावत ने मुगल सेनाओं पर अंतिम प्रहार किया, जब वे चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश कर रहे थे। युद्ध करते समय पत्ता को एक हाथी ने घायल कर दिया था और उसी हाथी की सूँड़ में उठाकर पत्ता को अकबर के पास लाया गया। अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग के ‘रामपोल’ पर पत्ताजी का सिर काट दिया।
मुगल इतिहासकार स्वयं मुगल सेना पर मेवाड़ी सैनिकों के आक्रमण, उनके शौर्य, निर्भीकता और शक्ति के विषय में लिखते हैं, “जब एक राजपूत मरकर गिरता था, तो दस और राजपूत उसकी जगह ले लेते थे। उन्होंने हमारे हाथियों पर मधुमक्खियों की तरह आक्रमण कर दिया, जब एक राजपूत गिरता था तो दूसरा हाथी पर घात करने लगता था। वे निष्कपट युद्ध करते थे।”
एक मेवाड़ी सैनिक केवल एक समय पर एक ही मुगल सैनिक से लड़ता था और मारा जाता था। एक युवा मेवाड़ी सैनिक ने अकबर को सामने से आकर चुनौती दी, जिसे अकबर ने स्वीकार किया और उसने अकेले ही उस युवा योद्धा से लड़ाई की। दोनों में तुमुल युद्ध हुआ, लेकिन लंबे द्वंद्व के बाद, अकबर ने उस युवा योद्धा को थका दिया और फिर उसका शीश काट दिया। अकबर बार-बार उसका नाम पूछता रहा, किंतु युवक ने अपना नाम नहीं बताया। उसके वीरगति प्राप्त होने के पश्चात् भी अकबर को उस योद्धा का नाम ज्ञात नहीं हो सका, जिसने इतनी वीरतापूर्वक युद्ध किया था।
आठ हजार मेवाड़ी योद्धाओं को मारकर अकबर ने दुर्ग में रहने वाले 30,000 आमजनों के रोष का सामना किया। इनमें कलाकार, मजदूर, महावत, सईस, नाई, लोहार, कलाल, दर्जी, नायक, वाल्मीकि, सभी जातियों के लोग थे, जो अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ शस्त्र उठाए और मुगल सेना से युद्ध करते हुए अकबर और उसकी सेना के हाथों निर्ममता से मारे गए।
इस संबंध में ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड लिखते हैं– “अकबर ने अपनी सफलता का मानक मृत हिंदू शरीरों से उतारे गए जनेऊ के भार को माना था। चित्तौड़ के नरसंहार के बाद उतारे इन जनेऊ का कुल भार साढ़े चौहत्तर मण बताया गया है। एक मन 40 किलो का होता है, अतः 2,980 किलो जनेऊ एकत्र हुए। हम सोच सकते हैं कि उस काले दिन पर कितने हिंदुओं का रक्तपात किया गया होगा? साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ की ढेरियाँ बनाकर यह दिखाने के लिए आगरा ले जाया गया कि मेवाड़ पर अब मुगलों का अधिकार था।”
इस नरसंहार की स्मृति को सदैव याद रखने के लिए आज तक साढ़े चौहत्तर का यह अंक मेवाड़ के वैश्य लोग अपनी बहियों में नहीं लिखते।
जब तक साढ़े चौहत्तर का यह अंक हिंदुओं को याद रहेगा, हम विपरीत समय में भी कुछ अच्छा कर पाएँगे।
हम जीवित रहेंगे, क्योंकि जिस कारण से, जिस अमर त्याग के चलते इस अंक का जन्म हुआ था, वह महान कारण ही हमें जीवित रखेगा।
आज भी मेवाड़ में यह मान्यता है कि कोई पत्र, जिस पर साढ़े चौहत्तर लिखा है, उसे अनधिकृत रूप से खोलने वाले को चित्तौड़ के नरसंहार के समान पाप लगेगा।
25 फरवरी, 1568 की उस दुःखद दोपहर में चार महीनों की घेराबंदी के पश्चात् अकबर ने चित्तौड़ के दुर्ग को अपने अधीन कर लिया और वहाँ पर मुगल ध्वज फहरा दिया।
इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष में हिंदुओं के लिए यह सबसे काला दिन था, जब 20,000 आमजन और 8,000 योद्धाओं ने अपना जीवन मातृभूमि पर न्योछावर कर दिया, साथ ही 10,000 महिलाओं एवं बच्चों ने जौहर कर अपने सम्मान की रक्षा की। इन सबका हत्यारा अकबर, निर्ममता से इनके शवों पर पैर रखकर चित्तौड का विजेता बना।
इतिहासकार श्री के. एस. लाल ने इस दुर्भाग्यपूर्ण दिन में हुए हिंदुओं के नरसंहार के विषय में लिखा है– “अकबर ने क्रूरतापूर्ण मानस के साथ दुर्ग में प्रवेश किया। 1398 ईसवी में तुर्क-मंगोल हत्यारे तैमूर लंगड़े ने अपनी म्यान से तलवार बाहर निकालकर वापस म्यान में तभी रखी, जब उसकी सेना ने एक लाख असैनिक, आम हिंदुओं की निर्मम हत्या कर दी थी। अकबर भी ठीक उसी प्रकार, नंगी तलवार लेकर चितौड़गढ़ की एक बुर्ज पर खड़ा हो गया। यह नरसंहार अकल्पनीय निर्ममता के साथ कुल साढ़े नौ घंटे तक चला। निःशस्त्र और निरीह हिंदू पुरुष, महिलाओं एवं बच्चों को तलवारों व भालों से मौत के घाट उतार दिया गया। ये हत्याएँ करते समय मुगल सैनिक समवेत स्वर में अपने परमात्मा की विजय ‘अल्लाह हू अकबर’ का नारा जोर-जोर से लगा रहे थे। यहाँ तक कि उन्होंने अबोध बालकों को भी नहीं छोड़ा। बदले की भावना में भालों की नेजों से उन्हें जीवित ही अग्नि में भून दिया गया। कुछ को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया गया।”
अबुल फजल के अनुसार, 40,000 हिंदुओं के अस्तित्व को तथाकथित महान मुगलों का विरोध करने के दंडस्वरूप एक दिन में धूल में मिला दिया गया। अकबर ने अपनी रत्नजड़ित तलवार बारंबार लहराते हुए अपने सेनानायकों से कहा कि जो कोई भी उसके आदेशों की अनुपालना न करते हुए महान मुगलों का विरोध करे, उसे मौत के घाट उतार दो।
उसने आदेश दिया कि इस दुर्ग की हवा में साँस लेने वाले प्रत्येक प्राणी, पशु-पक्षी सभी को मार दो, क्योंकि उन्होंने भी इस दुर्ग की विद्रोही हवा में साँस ली है।
एक बहुत लज्जाजनक बात पूरे विश्व को ज्ञात हो कि जब मुगल हिंदुओं का नरसंहार कर रहे थे, हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर रहे थे, तब हिंदू राजा भगवानदास तथा टोडरमल और उनकी हिंदू सेनाएँ, वहीं जड़वत्, मुँह बाए, दुर्ग के हिंदुओं का नरसंहार देख रही थीं! मृत्यु के इस तांडव के मध्य, अपने देवी-देवताओं के मंदिरों को यूँ खंडित होते देखकर भी कोई क्षत्रिय हिंदू कैसे तटस्थ रह सका था, यह समझ से परे है।
बहुत अधिक संभावना है कि अकबर ने जयपुर की हिंदू सेना को किले के बाहर ही या आरक्षित रखा था। यह असंभव है की जयपुर के राजपूत अपने सहोदरों का हत्याकांड नपुंसकों की भाँति देखते और विद्रोह नहीं करते।
एक दो व्यक्तियों की निष्ठा तो अकबर खरीद सकता था, पूरी हिंदू सेना की नहीं।
राजा टोडरमल ने अपनी मीठी वाणी और बुद्धिमानी भरे शब्दों से दुर्ग में विध्वंस देखकर आनंदित हो रहे अकबर को समझाने का प्रयास अवश्य किया, किंतु वह विफल रहा।
अकबर आँखें मूंदकर जैसे किसी अज्ञात सत्ता से जुड़कर इस कुत्सित कृत्य का आनंद ले रहा था ! वह टोडरमल से बोला, “मुझे अभी तुम्हारी अक्लमंदी की बातें और मीठे शब्दों की कोई जरूरत नहीं है। मेरे कान फिलहाल सिर्फ तलवारों की झनकार और मरने वालों की चीख-चिल्लाहट सुनना चाहते हैं। मुझे अकेला छोड़ दो, मैं अमीर से एकाकार हो रहा हूँ। एक अच्छे वाचक को बुलवाओ, जो मुझे शाहनामा के कुछ अच्छे अध्याय पढ़कर सुनाए, जिनमें कुछ कमाल की बातें लिखी हों, जिनमें रक्त हो, रस नहीं, और जिनमें मेरे साम्राज्य को सुदृढ़ करने की कुंजी छुपी हो। मुझे केवल युद्ध चाहिए-शांति नहीं।”
इतना कहकर अकबर पुनः अपनी उन्माद की अवस्था में चला गया और यदा-कदा अपनी आँखें खोलकर कुछ अनर्गल प्रलाप कर क्रूर मुस्कान बिखेरने लगता। नौ घंटे तक वह ऐसे ही खड़ा रहा, जब तक असहाय हिंदुओं को निर्दयी मुगल सैनिक अपनी तलवार का ग्रास बनाते रहे।
इस रक्त की होली के बीच एक रोचक बात यह घटी कि मेवाड़ के दर्जनों बंदूकची व लगभग एक सहस्र आमजन, मुगल सैनिकों का भेस बनाकर चित्तौड़ से निकल गए। सब उच्च श्रेणी के योद्धा इस साके में वीरगति को प्राप्त हुए। केवल एक राजपूत योद्धा, ग्वालियर के राजकुमार, शालिवाहन तंवर, इन आमजनों के साथ बचकर निकल पाए। जयमल ने शालिवाहन को साके से रोक दिया था, क्योंकि वे मेवाड़ के अतिथि थे।
शालिवाहन ने प्रताप को अकबर के वीभत्स रूप व सेना की पूरी जानकारी दी। ये महान योद्धा, हल्दी घाटी के युद्ध में प्रताप की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
यह मेवाड़ के इतिहास का सर्वाधिक काला दिवस था, जब मातृभूमि के रक्षार्थ सहस्रों बेटों ने अपने प्राणों का निस्स्वार्थ बलिदान दे दिया।
यह एक ऐसा दिन था, जिसका प्रभाव मेवाड़ और मुगलों के बीच होने वाले विभिन्न संघर्षों पर सदा के लिए सघनता के साथ पड़ने वाला था।
यह एक ऐसा दिन था, जिसे मेवाड़ के धर्म-रक्षकों के साहस और शक्ति का परिचायक कहा जाएगा, जब उन्होंने एक बर्बर, धर्मांध सेना के सामने अपना शौर्य दिखाया और वीरगति पाई।
यह दिन हमारे उन महान पूर्वजों की सदैव याद दिलाएगा, जिन्होंने समर्पण के स्थान पर मृत्यु का वरण किया। उन्होंने किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होने के स्थान पर अपने हिंदू धर्म को उचित समझा।
जब मृत्यु उन्हें ग्रसने को तैयार खड़ी थी, तब भी उन्होंने अपने महान पूर्वजों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। आखिर किस तत्त्व के बने थे, वे महिलाएँ, बालक, जिन्होंने स्वेच्छा से अग्नि में प्रवेश कर अपने सम्मान को अक्षुण्ण रखा ? वह क्या कारण था कि महारानी पद्मिनी से आरंभ होकर जौहर की यह प्रथा, शताब्दियों तक विभिन्न कालखंडों में हिंदुओं ने अपनाई, किंतु कभी भी उन्होंने अपने धर्म और स्वतंत्रता को किसी के आगे समर्पित नहीं किया ?
कितने दृढ़ निश्चयी होंगे वे पुरुष, जो अपनी पत्नी और अपने बच्चों को अग्नि को समर्पित होने भेज देते थे, क्योंकि वे अपना धर्म नहीं छोड़ सकते थे ? आखिर वे पुरुष किस शक्ति से ओत-प्रोत होते थे कि स्वयं को एक हिंसक सैन्य हाथी के समक्ष खड़ा कर देते थे? आखिर उन असहाय और संख्या में कम हिंदुओं की कौन सी ऐसी आशा थी, जिसके बल पर वे इस्लाम में परिवर्तित होने के स्थान पर युद्ध में वीरगति को अधिक सम्मानजनक मानते थे ?
इन महान लोगों में कैसा आध्यात्मिक बल था कि वे मृत्यु का सामना केवल इसलिए हँसते-हँसते कर लेते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि कहीं-न-कहीं उनके महाराणा जीवित हैं और वे इन तुर्क हत्यारों से युद्ध जारी रखेंगे ?
यदि हम उनके साहस, उनकी आशा, उनके दृढ़ निश्चय का लेशमात्र भी अपने भीतर भर पाएँ तो कदाचित् हम चारों ओर से घिरे अपने इस राष्ट्र को एक विदेशी धर्म के साथ शताब्दियों से चले आ रहे संघर्ष से बचा पाएँगे।
यदि हम उस साढ़े चौहत्तर के अंक को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात् कर सकें, हमारे परिवार में हर आध्यात्मिक गतिविधियों में सम्मिलित कर लें तो कदाचित्, हम निरीह हिंदुओं के साथ उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन हुए नरसंहार को कभी नहीं भूलेंगे और न ही उन लोगों को, जिन्होंने मृत्यु के सम्मुख खड़े होते हुए भी अपनी पलक तक नहीं झपकाई।
एक भागीरथ प्रश्न, जिस पर हमारे देश के सभी हिंदुओं और शिक्षाविदों को लज्जा आनी चाहिए, वह यह है कि एक विदेशी साम्राज्यवादी हत्यारा, जिसने निर्दोष जनता को इस निर्ममता के साथ मारा, उसे हम अपने विद्यालयों में ‘अकबर महान’ किस मुँह से पढ़ा लेते हैं?
क्या हिंदी सिनेमा जगत् को इस राक्षसी प्रवृत्ति के व्यक्ति के गुणगान करने वाली फिल्में बनानी चाहिए, जिसने अपनी धर्मांधता के चलते 40,000 निरपराध आमजनों और बच्चों को मारने का आदेश दिया ?
हिंदू मानस को इस निकृष्ट व्यक्ति को एक अच्छे सहिष्णु व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए या अपने पूर्वजों की हत्या करने वाले घृणित व्यक्ति के रूप में? एक हिंदू होने के नाते हमें यह प्रश्न स्वयं से प्रतिदिन पूछना चाहिए और इसका उत्तर भी हमें स्वयं ही खोजना चाहिए; क्योंकि यदि हम इसी तरह अकबर को एक महान राजा के रूप में महिमामंडित करते रहे तो हम मेवाड़ के उन महान बलिदानियों, उन हुतात्माओं का भद्दा उपहास ही कर रहे हैं।
एक क्षण के लिए अकबर का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो हमें समझ आएगा कि सहिष्णुता के बुर्के के नीचे कितना निर्मम हत्यारा छुपा था।
कोई भी संवेदनशील व्यक्ति होता तो इतनी स्त्रियों व बच्चों के आर्तनाद से पिघल कर इस नरसंहार को रोक देता। किंतु यही जेहाद का सत्य है।
व्यक्ति चेतनाशून्य होकर जड़वत् हो जाता है। स्वयं की काल्पनिक जन्नत और स्वयं के मजहब के विस्तार के लिए कोई भी यातना स्वीकार कर लेता है। अब यह हिंदू समाज सोच ले कि ऐसे निष्ठुर व्यक्ति को घृणा से देखना है या सम्मान से।
अतीत कभी मरता नहीं, क्योंकि अतीत की स्मृति व चेतना वर्तमान को परिभाषित करती है। इसलिए अतीत ही वर्तमान है।
यदि जौहर की लपटें हमारा अंतर्मन सतत जलाती रहें, तो अतीत ही वर्तमान है। धातु से धातु की टंकार यदि अब भी हमारे कानों में गूँज रही है, तो अतीत ही वर्तमान है।
अग्निकुंड में जलती हुई स्त्रियों व बच्चों की चीखें यदि हमारे हृदय को आज भी छेद रही हैं, तो अतीत ही वर्तमान है।
वही अमर चेतना यदि आज भी स्पंदित है, वही अजेय चेतना हमें संघर्ष करने का आह्वान कर रही है, तो अतीत ही वर्तमान है। पाँच तत्त्वों का यह नश्वर शरीर आज नहीं तो कल मिटेगा ही। किंतु मेवाड़ के साका-जौहर ने हमें बता दिया कि शरीरों के मिटने से स्वतंत्रता की अभीप्सा नहीं मिट जाती, बल्कि दुगने वेग से वह उभरकर आती है।
अकबर की तीन पीढ़ियों के पश्चात् मुगलों की सत्ता का नाश हो गया और आज अकबर के कुल का कोई बीज धरती पर नहीं बचा। किंतु वे हिंदू, जो उस बर्बर धर्मांध सेना के सम्मुख बिना शस्त्रों के भी पूरी जीवटता के साथ लड़े थे, उनके वंशज आज भी जीवित हैं।
वे महान राजपूत योद्धा, जिन्होंने अपने परिवार को अग्नि को समर्पित किया और स्वयं को खड्ग की धार को, अपनी पीढ़ियों में वे आज भी जीवित हैं। वे विलक्षण लोग, जिनके बलिदान के कारण हम आज भी हिंदू हैं और पृथ्वी के सबसे पुरातन सनातन धर्म के प्रणेताओं एवं पालकों के वंशजों के रूप में जीवित हैं।
जब तक पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, साका-जौहर के अमर बलिदानी, हिंदुओं के हृदय में जीवित रहेंगे।
जब तक सूर्य अपनी ऊष्मा से धरती पर जीवन प्रवाहित कर रहा है, वे बलिदानी जीवित रहेंगे।
जब तक इस धरती का पुण्य इतना क्षीण नहीं हो जाता कि हिंदू धर्म ही समाप्त हो जाए, वे बलिदानी जीवित रहेंगे।
क्योंकि, धर्म वह तत्त्व है, जो हमें धारण करता है, किंतु 25 फरवरी, 1568 के उस अभूतपूर्व दिन, 40,000 हिंदुओं ने धर्म को अपने वक्ष पर धारण किया था।
अब देखना यह है कि क्या हम हिंदुओं में वह सामर्थ्य, साहस और निष्ठा है कि हम अपने धर्म को धारण कर अपने पुरखों की स्मृति के साथ न्याय कर पाते हैं? यह धारणा ही हमारे महान पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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