काश हम अजनबी होते तो खुश होते - 1 Avinash द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

काश हम अजनबी होते तो खुश होते - 1

काश हम अजनबी होते तो खुश होते


रात के दो बज चुके थे। दिसंबर की सर्द हवाएं खिड़की के कांच से टकराकर एक सिहरन पैदा कर रही थीं। कमरे के भीतर का सन्नाटा उस बाहरी ठंड से भी ज्यादा सर्द और भारी था। गीता बेड के एक कोने में सिमटी हुई खिड़की से बाहर देख रही थी। सड़क की पीली लाइट में कोहरे की बूंदें तैरती हुई साफ दिख रही थीं। उसने अपने कांपते हाथों से शॉल को और कसकर लपेट लिया।

उसने नजरें घुमाकर बेड के दूसरी तरफ देखा। प्रवीन पीठ फेरे सो रहा था। उनके बीच महज दो फीट की दूरी थी, लेकिन गीता को लगा जैसे यह फासला दो अलग-अलग छोरों जितना लंबा हो। यह दूरी शारीरिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक थी। एक ही छत, एक ही कमरा, एक ही दांपत्य जीवन, लेकिन दो बिल्कुल अजनबी इंसान।

गीता को याद आने लगे वो दिन, जब प्रवीन उसकी हर छोटी बात पर ध्यान देता था। कॉलेज के दिनों में जब प्रवीन ने उसे पहली बार देखा था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। गीता की एक मुस्कान के लिए प्रवीन कॉलेज की कैंटीन में घंटों इंतजार करता था। प्रवीन एक सीधा-साधा, अपनी दुनिया में रहने वाला बैंक कर्मचारी था और गीता एक बेहद संवेदनशील, शब्दों और कविताओं में सुकून ढूंढने वाली गृहणी। दोनों की शादी को पाँच साल हो चुके थे। शुरुआत के दो साल किसी ख्वाब जैसे थे, लेकिन धीरे-धीरे समय बदला, प्रवीन की जिम्मेदारियां बढ़ीं और उनके बीच की बातचीत कम होने लगी।

"मोहब्बत जब नई होती है, तो हर खामोशी में एक लफ्ज होता है। पर जब वही मोहब्बत पुरानी और थकी हुई हो जाती है, तो हजार लफ्ज भी एक गहरी खामोशी में बदल जाते हैं।"
आज उनकी शादी की पाँचवीं सालगिरह थी। गीता ने सुबह से ही तैयारियां की थीं। उसने प्रवीन के पसंदीदा मटर-पनीर और खीर बनाई थी। खुद नीले रंग की वह साड़ी पहनी थी जो प्रवीन ने उसे पहली सालगिरह पर तोहफे में दी थी। वह शाम छह बजे से प्रवीन का इंतजार कर रही थी। आठ बजे, फिर दस बजे और आखिरकार रात के बारह बजे प्रवीन घर लौटा।

जब वह आया, तो उसके चेहरे पर न तो कोई पछतावा था और न ही कोई उत्साह। उसने आते ही अपना बैग सोफे पर फेंका और कहा, "बहुत थक गया हूँ गीता, आज ऑडिट था बैंक में। खाना खाकर आया हूँ, तुम सो जाओ।"

गीता ने उस नीली साड़ी को देखा, टेबल पर सजे ठंडे हो चुके खाने को देखा और उसकी आँखों से एक आंसू टपक कर फर्श पर गिर गया। कोई झगड़ा नहीं हुआ, कोई चीख-पुकार नहीं मची। बस एक सन्नाटा था जो दोनों के बीच की खाई को और गहरा कर गया।
तभी बेड पर प्रवीन ने करवट बदली। उसकी आँखें खुली थीं। उसने गीता को अंधेरे में खिड़की के पास बैठे देखा। उसने एक गहरी और ठंडी सांस ली, फिर उठकर बैठ गया।

"सोयी नहीं अब तक? तबीयत ठीक है न?" प्रवीन की आवाज में एक अजीब सी औपचारिकता थी, जैसे वह किसी सहकर्मी से बात कर रहा हो।
"नींद नहीं आ रही," गीता ने बिना उसकी तरफ देखे, रूखे स्वर में कहा।

प्रवीन कुछ देर चुप रहा। उसे अहसास था कि वह आज के खास दिन को भूल चुका था या यूं कहें कि काम के बोझ तले उसने इसे नजरअंदाज कर दिया था। उसने धीमे से कहा, "गीता, मैं जानता हूँ आज हमारी एनिवर्सरी थी। पर समझो, बैंक का काम, लोन के पेंडिंग केसेस... मैं सच में बहुत व्यस्त था।"

गीता धीरे से मुड़ी। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसा खालीपन था जिससे प्रवीन को पहली बार डर लगा। उसने कहा, "प्रवीन, मैं तुम्हारी व्यस्तता से परेशान नहीं हूँ। मैं इस बात से परेशान हूँ कि अब तुम्हें फर्क ही नहीं पड़ता। हम दोनों इस घर में क्या हैं? दो ऐसे लोग जो सिर्फ एक समझौता जी रहे हैं। सुबह तुम ऑफिस जाते हो, रात को आते हो। हम दोनों के पास एक-दूसरे के लिए सिर्फ 'हाँ', 'हूँ' और 'ठीक है' जैसे चंद लफ्ज बचे हैं।"
"तो तुम क्या चाहती हो गीता? मैं काम छोड़ दूँ? यह सब मैं हमारे भविष्य के लिए ही तो कर रहा हूँ," प्रवीन का स्वर थोड़ा ऊंचा हुआ।

"भविष्य?" गीता ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा। "जिस भविष्य को सजाने के लिए तुम हमारा आज मार रहे हो, क्या वो भविष्य सच में खूबसूरत होगा? प्रवीन, कभी-कभी मुझे लगता है... काश हम अजनबी होते तो खुश होते।"
यह शब्द सुनते ही प्रवीन सुन्न रह गया। कमरे का सन्नाटा और गहरा हो गया।

गीता ने अपनी बात जारी रखी, "सोचो प्रवीन, अगर हम अजनबी होते, तो आज हम अपने-अपने रास्तों पर खुश होते। तुम अपनी फाइलों और बैंक की दुनिया में मगन होते, और मैं अपनी कविताओं में। अगर हम अजनबी होते, तो हमारे दिल में एक-दूसरे के लिए यह कड़वाहट, यह उपेक्षा और यह रोज घुटने वाला दर्द तो नहीं होता। कम से कम हम किसी मोड़ पर मिलते, तो एक-दूसरे को देखकर एक औपचारिक मुस्कान तो दे सकते थे। आज तो हम एक-दूसरे को देखकर अपनी नजरें चुरा लेते हैं।"
प्रवीन ने गीता के इन शब्दों को महसूस किया। उसे याद आया कि कैसे धीरे-धीरे उसने गीता की छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था। उसने सोचा था कि शादी के बाद प्यार जताने की जरूरत नहीं होती, वह तो मान लिया जाता है। पर वह गलत था। प्यार को रोज सींचना पड़ता है, संवाद से, वक्त से।
प्रवीन ने आगे बढ़कर गीता का हाथ थामना चाहना, "गीता, मुझे माफ कर दो..."

पर गीता ने धीरे से अपना हाथ पीछे खींच लिया। वह उठी और कमरे से बाहर बालकनी की तरफ चली गई। प्रवीन बेड पर अकेला बैठा रह गया। उसने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ रात ढल रही थी और सुबह का धुंधला उजाला दस्तक दे रहा था।

वे दोनों एक ही घर में थे, पर उनके दिल मीलों दूर जा चुके थे। गीता बालकनी में खड़ी सोच रही थी कि क्या यह खामोशी कभी टूटेगी, या वे ताउम्र एक-दूसरे के लिए सबसे करीबी अजनबी बने रहेंगे।