रश्मि ने भी अपने डर को छुपाते हुए कृष्ण की हाँ में हाँ मिलाया। उसने आकृति का हाथ पकड़कर उसे खड़ा किया और कहा, "सही कह रहे हैं कृष्ण। चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं यहाँ सफाई करवा देती हूँ और दूसरे कमरे में तुम लोगों का सामान शिफ्ट करवा देती हूँ। ऐसे कमरे में बंद रहोगे तो डर और बढ़ेगा। चलो, मैं तुम्हें अपने बगीचे और फार्महाउस की सैर कराती हूँ। तुम हमारी प्रॉपर्टी देखोगे तो दंग रह जाओगे, इतनी हरियाली और सुकून तुम्हें शहर में कहीं नहीं मिलेगा।"
मानव और आकृति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए थे, लेकिन अपने दोस्तों की बातों में आकर उन्होंने इसे अपना 'वहम' मान लेने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि शायद थकान की वजह से उन्हें कुछ गलत दिख गया होगा।
जैसे ही वे सब कमरे से बाहर निकलने लगे, किसी ने ध्यान नहीं दिया कि ज़मीन पर बिखरे कांच के टुकड़ों में से एक टुकड़ा अचानक हिला, जैसे किसी अदृश्य पैर ने उस पर दबाव डाला हो। और कमरे के उस कोने से, जहाँ अंधेरा सबसे घना था, एक ठंडी और सड़ी हुई महक उठी, मानो कोई दुल्हन का पुराना जोड़ा सदियों से किसी संदूक में सड़ रहा हो।
रश्मि सबको लेकर अपने विशाल बाग-बगीचों की ओर चल दी, यह सोचकर कि प्रकृति के करीब जाकर उनका डर खत्म हो जाएगा। उसे क्या पता था कि वह अपने दोस्तों को सुरक्षित नहीं, बल्कि 'भूखी दुल्हन' के और भी करीब ले जा रही है।
अध्याय: खंडहर की दहलीज और खून का चढ़ावा
रश्मि की ज़मीन इतनी विशाल थी कि चलते-चलते दोपहर बीत गई। चारों तरफ ऊंचे आम के बगीचे, लहलहाती फसलें और दुर्लभ औषधियों के पौधे लगे थे। लेकिन जैसे-जैसे वे खेत की आख़िरी मेढ़ पर पहुँचे, झाड़ियों के पीछे से वह काली परछाईं नुमा खंडहर हवेली नज़र आने लगी।
उस हवेली की दीवारों पर पीपल की जड़ें किसी अजगर की तरह लिपटी हुई थीं। सूरज की रोशनी भी वहाँ पहुँचकर फीकी पड़ रही थी। रश्मि के एक दोस्त ने हाथ उठाकर पूछा, "अरे रश्मि, वह क्या है? वह खंडहर तो बड़ा 'एडवेंचरस' लग रहा है!"
रघु काका का चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "साहब, उधर मत देखिए! वह मनहूस जगह है। आज हम जो अपनी खुशियाँ नहीं मना पाते, वह उसी की बदौलत है। वह इस इलाके का नासूर है, उधर मत जाइए!"
लेकिन सृष्टि और उसके दोस्तों पर जैसे पागलपन सवार था। सृष्टि ने हँसते हुए कहा, "काका, आप और आपकी ये दकियानूसी बातें! हम 21वीं सदी के लोग हैं। भूत-प्रेत सिर्फ कहानियों में होते हैं। चलो दोस्तों, आज इस खंडहर का 'एक्सप्लोर' करते हैं!"
रघु काका चिल्लाते रह गए, लेकिन वे छहों दोस्त उस काली चौखट को लांघकर अंदर घुस गए। अंदर का नज़ारा खौफनाक था—सड़ी हुई लकड़ियों की महक और चमगादड़ों की गूँज। वे पूरी हवेली में घूमते रहे, मज़ाक उड़ाते रहे, मानो वे किसी पिकनिक पर आए हों।
जब वे लौटने लगे, तब अचानक हवा का एक ठंडा झोंका चला। सृष्टि सबसे पीछे थी। अचानक उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने बहुत ज़ोर से उसकी पीठ पर धक्का दिया हो।
"आह!"
सृष्टि चीखी और औंधे मुँह पथरीले फर्श पर गिर पड़ी। उसके घुटने और हाथ छिल गए। किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन सृष्टि के घाव से खून की एक गाढ़ी बूंद टपक कर उस पुरानी हवेली की सूखी मिट्टी में समा गई। जैसे ही वह बूंद ज़मीन के अंदर गई, पूरी हवेली में एक हल्की सी थरथराहट हुई—मानो किसी सोए हुए राक्षस को उसका पसंदीदा भोजन मिल गया हो।
सभी दोस्त वापस अपने घर आ जाते हैं उसी गांव पर और श्याम हो चुके थे सूरज ढल चुका था सभी दोस्त आकर फ्री होते हैं अब रात का समय भोजन का हो गया तब सभी लोग खाना खाते हैं और खाना खाने के बाद हंसी मज़ाक करते हैं इतने में समय बीत जाता है और समय का पता ही नहीं चलता कि कब इतना समय हो जाए और सभी दोस्त अपने पार्टनर के साथ सोने चले जाते हैं अपने अपने रूप में
अध्याय: आधी रात का बुलावा और खौफनाक सफर
रात का सन्नाटा देवपुर की वादियों में किसी ज़हर की तरह फैला हुआ था। हवेली के भीतर सभी दोस्त अपनी-अपनी थकान मिटाने के लिए गहरी नींद में डूबे थे। सुमित बेखबर सो रहा था, लेकिन उसके बगल में लेटी सृष्टि की आँखों में नींद नहीं, बल्कि एक अजीब सी शून्यता थी।
जैसे ही घड़ी की सुइयों ने रात के 12 बजाए, हवेली की दीवारों के बीच एक धीमी सी फुसफुसाहट गूँजी। वह आवाज़ सिर्फ सृष्टि को सुनाई दे रही थी—एक सुरीली लेकिन रूह कपा देने वाली पुकार। सृष्टि की आँखें अचानक खुल गईं, पर उन आँखों में अब वह चमक नहीं थी। उसकी पुतलियाँ पत्थर जैसी ठंडी और स्थिर हो चुकी थीं।
मानो किसी अदृश्य डोर से बँधी हुई, सृष्टि बिस्तर से उठी। उसने एक बार भी अपने पति सुमित की ओर मुड़कर नहीं देखा। वह किसी रोबोट की तरह चलती हुई कमरे के दरवाज़े तक पहुँची। उसकी चाल में एक अजीब सी लचक थी, जैसे वह ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में तैर रही हो।
उसने हवेली का भारी मुख्य द्वार खोला। बाहर काली रात का घना अंधेरा उसका इंतज़ार कर रहा था। नंगे पैर, बिना किसी रोशनी के, सृष्टि उसी सुनसान पगडंडी पर चल पड़ी जो सीधे उस खंडहर हवेली की ओर जाती थी।
रास्ते में पड़ने वाले काँटों और पत्थरों से उसके पैरों में चोट लग रही थी, लेकिन उसे कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था। जंगल के जानवर जो रात में शोर मचाते थे, आज सृष्टि को देख कर खामोश हो गए। दूर से वह खंडहर हवेली अब काली परछाईं जैसी नहीं, बल्कि किसी जिदा राक्षस की तरह दिख रही थी जिसकी खिड़कियाँ उसकी आँखों की तरह चमक रही थीं।
सृष्टि जैसे ही उस खंडहर की चौखट पर पहुँची, हवेली का सड़ा हुआ दरवाज़ा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।
आप मानो सृष्टि किसी के बस में पूरी तरह से हो गई थी और उसका हर एक कदम मानो किसी रॉबिन की तरह चल रहा था अब ऐसा लग रहा था कि कोई पूरी तरह से नियंत्रण कर रहा है
सृष्टि बीज दरवाज़े से निकल कर खंडार हवेली की पहली मंजिल दूसरी मंजिल ज्योति मंजिल पहुंची मंजिल पर पहुंच जाती है और छत के कुने पर खड़ी हो जाती है
अध्याय: मौत की कगार और रूहानी जंग