1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 2 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 2




महाराज देववर्धन ने रूपमती की आँखों में झांका। उनके चेहरे पर छाई वह क्रूर मुस्कान और गहरी हो गई। रूपमती की बातें सुनकर उनका दिल पिघलने के बजाय, उनकी आँखों में एक अजीब सी सनक तैरने लगी।



उन्होंने रूपमती को झटके से पीछे धकेला। रूपमती फर्श पर जा गिरी।



महाराज पागलों की तरह हंसे। उनकी आवाज़ उस बंद तहखाने की दीवारों से टकराकर और भी भयानक लग रही थी।


"रूपमती, तू मर्यादा और रिश्तों की दुहाई किसे दे रही है?


उस देववर्धन को? जो इस देवपुर की गद्दी पर बैठने के लिए अपने सगे माता-पिता को ज़हर देने से भी नहीं हिचकिचाया!"



रहा के मुख से यह सुनते ही रूपमती के मुंह से एक चीख निकल गई। उसने खौफ से अपनी दोनों हथेलियां अपने मुंह पर रख लीं। 


जो राजा पूरी दुनिया के लिए न्याय का देवता था, वह अपने ही माता-पिता का कातिल था!



महाराज उसके और करीब आए, अपनी उंगली से तहखाने के उस गहरे, अंधेरे कोने की तरफ इशारा किया जहां मशाल की रोशनी भी नहीं पहुंच रही थी।



"देख... अपनी इन कँपकँपाती आँखों से उधर देख!" महाराज की कड़कती आवाज़ गूंजी।


बुक्का सोलंकी ने तुरंत दीवार पर लगी एक मशाल उठाई और उस अंधेरे कोने की तरफ बढ़ा। जैसे ही मशाल की पीली रोशनी उस कोने पर पड़ी, रूपमती का कलेजा कांप उठा। डर के मारे उसका गला सूख गया।



वहां चारों तरफ इंसानी कंकालों का एक ढेर लगा हुआ था! कई खोपड़ियां और सूखी हड्डियां एक के ऊपर एक लावारिस पड़ी थीं।


कुछ कंकाल लोहे की ज़ंजीरों से जकड़े हुए दीवारों से लटके थे।


महाराज देववर्धन ने चीखते हुए कहा, "जब मैं अपने उन माता-पिता का नहीं हुआ जिन्होंने मुझे जन्म दिया... तो फिर तेरा क्या होगा दासी?


अपनी ये गर्दन घुमा और देख, कितने कंकाल पड़े हैं यहाँ पर!"


रूपमती फटी आँखों से उन खोपड़ियों को देख रही थी, मानो वे कंकाल चीख-चीखकर अपनी बदकिस्मती की दास्तान सुना रहे हों।



महाराज ने गरजना जारी रखा, "यह देवपुर रियासत का वो काला सच है जिसे दुनिया नहीं जानती। 


इस राजमहल में जो कोई भी मेरे खिलाफ गया, जिसने भी मेरी मर्जी के आगे सिर उठाने की जुर्रत की... उसका ठिकाना यही तहखाना बना। 


उन्हें तो मरने के बाद पवित्र अग्नि तक नसीब नहीं हुई! वे यहीं तड़प-तड़प कर मरे और यहीं गल गए।"



महाराज देववर्धन के मुंह से उनके अपने ही माता-पिता की हत्या का खौफनाक सच सुनकर रूपमती के भीतर का डर अचानक गायब हो गया।


अब डर की जगह एक भयानक गुस्से और घृणा ने ले ली थी। जिस राजा को वह कल तक पूजती थी, आज उसके प्रति उसके मन में रत्ती भर भी सम्मान नहीं बचा था।



रूपमती अपनी पूरी ताकत समेटकर खड़ी हुई। उसने महाराज की तरफ कदम बढ़ाया। महाराज को लगा कि वह डरकर उनके पैरों में गिरने आ रही है, लेकिन तभी...
"थू...!"



रूपमती ने सीधे महाराज देववर्धन के मुंह पर थूक दिया।
तहखाने में जैसे सन्नाटा पसर गया। मंत्री बुक्का सोलंकी की आँखें फटी की फटी रह गईं। 


किसी दासी की इतनी जुर्रत कि वह देवपुर के अधपति के मुंह पर थूक दे? 


महाराज का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, पर रूपमती अब रुकने वाली नहीं थी।


वह चीखकर बोली, "महाराज! मैंने आपको और आपके पूरे परिवार को हमेशा इस राज्य का भगवान माना था। देवपुर की भोली-भाली जनता आपको पूजती है



महाराज... पर उन बेचारों को क्या मालूम कि जिसे वो अपना भगवान मानकर शीश झुकाते हैं, असल में वो एक बहुत बड़ा, घिनौना शैतान है!"



उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन आवाज़ में शेरनी जैसी दहाड़ थी।


"और आपको क्या लगा महाराज? कि आप मुझे इन सूखी हड्डियों और कंकालों से डरा-धमकाकर मेरे इस शरीर को अपना बना लेंगे?


नहीं... कभी नहीं महाराज! आप जीते जी कभी मुझे अपना नहीं बना सकते। मैं मर जाऊंगी, अपने प्राण त्याग दूँगी, 



पर एक ऐसे जल्लाद और शैतान की बाहों में कभी नहीं आऊंगी जो अपने ही जन्म देने वाले माता-पिता का सगा नहीं हुआ! जो अपनों का नहीं हुआ, वो भला मेरा क्या होगा?"


इससे पहले कि महाराज या बुक्का सोलंकी उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ते, रूपमती बिजली की फुर्ती से पीछे घूमी।


तहखाने के एक कोने में लकड़ी और लोहे की पट्टियों से बना एक बहुत बड़ा, भारी संदूक रखा हुआ था।


रूपमती ने बिना एक पल गंवाए अपने घाघरे को संभाला और उस बड़े से संदूक के ऊपर चढ़ गई।


ऊपर चढ़कर उसने नीचे खड़े महाराज और मंत्री को ऐसे देखा जैसे वो राजा-मंत्री नहीं, बल्कि नाली के कीड़े हों।


संदूक के ठीक ऊपर, तहखाने की छत को सहारा देने वाली एक भारी लकड़ी की बीम (शहतीर) थी, जिससे एक पुरानी, मोटी लोहे की ज़ंजीर लटक रही थी।


महाराज देववर्धन ने गुस्से में अपने चेहरे को पोंछा और चिल्लाए, "बुक्का! पकड़ो इस दासी को! इसकी ये हिम्मत..."


बुक्का सोलंकी अपनी तलवार तानकर संदूक की तरफ लपका, लेकिन रूपमती के चेहरे पर अब मौत का कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक आत्मसम्मान की चमक थी।



जैसे ही मंत्री बुक्का सोलंकी अपनी घिनौनी मुस्कान के साथ रूपमती को पकड़ने के लिए संदूक की तरफ कदम बढ़ाता है, 


तहखाने की हवा अचानक भारी हो जाती है। रूपमती के भीतर जैसे किसी दैवीय शक्ति का संचार हो जाता है। वह अपनी पूरी ताकत से चिल्लाती है—
"रुक जा बुक्का सोलंकी!"



उसकी आवाज़ में ऐसी कड़क थी कि बुक्का सोलंकी के कदम वहीं के वहीं ठिठक गए। रूपमती ने उंगली उठाकर कहा, "अब तुम दोनों में से कोई भी मेरे पास नहीं पहुंच सकता! 


तुझे क्या लगता है सोलंकी, कि तुम दोनों मिलकर मुझे हासिल कर लोगे? मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि तुम जीते जी मेरे इस पवित्र शरीर को छू भी नहीं सकते!"



तभी राजा ने कहा "बुक्का! इस मामूली दासी की बकवास क्या सुन रहा है?" राजा देववर्धन गुस्से से पागल होकर चिल्लाया, उसकी आँखों में खून उतर आया था।


"जा! खींचकर नीचे ला इसे! पहले तो मैं इसे अपनी महारानी बनाने वाला था, पर अब इसकी वो हालत करूँगा कि इसने सपने में भी नहीं सोची होगी!"


राजा का आदेश मिलते ही बुक्का सोलंकी के कदम फिर से संदूक की तरफ बढ़ने लगे।


मौत को अपने करीब आते देख रूपमती की नज़रें उस संदूक के ऊपरी हिस्से पर घूमने लगीं। तभी धूल और जालों के बीच उसे एक पुरानी, जंग लगी हुई भारी तलवार दिखाई दी। वह तलवार शायद बरसों से वहां लावारिस पड़ी थी।



रूपमती ने बिना एक पल गंवाए फुर्ती से उस जंग लगी तलवार को उठा लिया। तलवार हाथ में आते ही उसने उसे राजा और मंत्री की तरफ तान दिया।


"मेरे पास आने की कोशिश मत करना! मैं कुछ भी कर सकती हूँ!" रूपमती हांफते हुए चिल्लाई। 


"अभी भी वक्त है महाराज, अपनी इस गंदी ज़िद को छोड़िए और यहाँ से चले जाइए, वरना मैं इतना शोर मचाऊँगी कि पूरा राजमहल जाग जाएगा!"


रूपमती की यह बात सुनकर महाराज देववर्धन और बुक्का सोलंकी दोनों ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। उनकी वह शैतानी हंसी तहखाने की दीवारों से टकराकर गूंज रही थी, मानो दो भेड़िए किसी लाचार हिरण का मज़ाक उड़ा रहे हों। 


उन्हें पूरा भरोसा था कि एक कमज़ोर दासी कभी तलवार नहीं चला पाएगी।


जब रूपमती ने देखा कि इन दरिंदों पर किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा है, और अब उसका मरना तय है, तो उसके चेहरे पर डर की जगह एक अजीब सी शांति छा गई।


"तुम मेरी बातों को मज़ाक समझ रहे हो न महाराज..." रूपमती ने ठंडे स्वर में कहा।


उसने तलवार को घुमाया। दोनों हाथों से उसकी मूठ को कसकर पकड़ा और तलवार की पैनी, जंग लगी नोक को सीधे अपने पेट की तरफ कर लिया।


"नहीं महाराज... मुझे अच्छे से पता है कि तुम दरिंदों के हाथों से मैं बच नहीं पाऊँगी। तुम नीच लोग मुझे जीते जी कभी नहीं छोड़ोगे।


इसलिए मेरे पास खुद को बचाने का सिर्फ एक ही रास्ता है, जिससे मेरा चरित्र भी कलंकित न हो, मेरा राजधर्म भी खतरे में न पड़े और मेरे माता-पिता भी समाज में अपनी शान से जी सकें!"


"रूपमती रुक...!" बुक्का सोलंकी कुछ समझ पाता और आगे बढ़ता, उससे पहले ही इतिहास का सबसे खौफनाक मंज़र घटा।


रूपमती ने अपनी आँखें बंद कीं, अपने माता-पिता और महारानी रुक्मिणी का चेहरा याद किया और अपनी पूरी ताकत लगाकर उस जंग लगी भारी तलवार को सीधे अपने पेट के आर-पार घोंप दिया!


"हर... हर... महादेव!!!"

यह गगनभेदी जयघोष उस बंद तहखाने में गूंज उठा। बुक्का सोलंकी के कदम जहाँ के तहाँ जम गए, उसकी तलवार हाथ से छूटते-छूटते बची।


जैसे ही तलवार रूपमती के पेट के पार हुई, उसके शरीर से खून की एक भयानक पिचकारी छूटी। लाल तप्त लहू की कुछ बूंदें उड़कर सीधे नीचे खड़े महाराज देववर्धन के चेहरे पर जा गिरीं। रूपमती का गोरा शरीर खून से लथपथ हो गया। 


उसकी आँखों की रोशनी धीरे-धीरे धुंधली होने लगी, और वह उसी भारी संदूक के ऊपर ढह गई। चारों तरफ सिर्फ खून ही खून बिखर गया था।