रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 2 RAAHULL SHARMA द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 2

फिर वह पागलों की तरह कमला की ओर मुड़ा। उसने अपनी माँ का पल्लू खींचते हुए कहा, "माँ, मुझे भूख लगी है... आपने कहा था शहर से लौटकर रोटी खिलाओगी। माँ, चुप क्यों हो? कुछ बोलो ना माँ!" जब कमला की तरफ से भी कोई जवाब नहीं मिला, तो वह सहम गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो माँ-बाप उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ते थे, आज वो उसे इस तरह अनसुना क्यों कर रहे हैं।
अंत में, वह अपनी बड़ी बहन रोशनी की ओर भागा। उसने रोशनी का कुर्ता पकड़कर उसे झकझोरा, "दीदी! ये बापू और माँ सो क्यों रहे हैं? ये उठ क्यों नहीं रहे? इन्हें क्या हुआ दीदी? आप तो डॉक्टर बनने वाली हो ना... जल्दी से इन्हें ठीक कर दो! देखो, बापू को चोट लगी है, उन्हें दर्द हो रहा होगा।"
रोशनी की खामोशी:
रोशनी, जो अब तक पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी, मेहूल के इन मासूम सवालों से अंदर तक टूट गई। उसने मेहूल को कसकर गले लगा लिया। उसकी आँखों से पहली बार आँसू का एक कतरा टपका और शंकर के खून से सने एडमिशन वाले कागजों पर गिरा। उसने मेहूल के सिर पर हाथ फेरते हुए मन ही मन कहा— "मेहूल, बापू का सपना अब मेरी ज़िम्मेदारी है। मैं तुझे और इस गाँव को अब कभी बेसहारा नहीं होने दूँगी।"
कुछ देर बाद घर के सारे काम कर घर वाले अंतिम संस्कार के लिए शमशान घाट जाते हैं
एक 5 साल का बच्चा, जिसके हाथों में खिलौने होने चाहिए थे, आज उन्हीं नन्हे हाथों में अपने माता-पिता की अंतिम विदाई की आग (मुखाग्नि) है।
यहाँ इस दृश्य का चित्रण है:
श्मशान का सन्नाटा और मासूम के कंधे
घर का कोहराम:
घर से जब दो अर्थियाँ एक साथ उठीं, तो मेहनूपुर की गलियों में चीख-पुकार मच गई। दादी उमा देवी ज़मीन पर सिर पटक-पटक कर रोशनी को कोस रही थीं, "तू क्यों बच गई? क्यों ले गई मेरे कुल के चिराग को?" रोशनी पत्थर की मूरत बनी अर्थियों के पीछे चल रही थी। उसके कानों में दादी के शब्द नहीं, बल्कि पिता के वो आखिरी शब्द गूँज रहे थे— "बिटिया, डॉक्टर बनना है।"
श्मशान का मंज़र:
गंगा किनारे श्मशान घाट पर पूरा गाँव उमड़ पड़ा था। हर आँख नम थी। जब अंतिम संस्कार की बारी आई, तो गाँव के पंडित ने कहा, "पुत्र ही मुखाग्नि देगा।"
5 साल का मेहूल, जो ठीक से 'मौत' का मतलब भी नहीं जानता था, कांपते हाथों में जलती हुई लकड़ी (लूका) लिए खड़ा था। वह रोशनी की तरफ देख रहा था, उसकी आँखों में डर था। रोशनी ने आगे बढ़कर मेहूल का हाथ थामा और उसे सहारा दिया। जैसे ही मेहूल ने अपने माता-पिता की चिता को अग्नि दी, पूरा श्मशान घाट 'राम नाम सत्य है' और लोगों की सिसकियों से गूँज उठा।
सूरज ढल रहा था और उस ढलते सूरज की लालिमा में दो जिंदगियाँ राख हो रही थीं। गाँव वालों ने फुसफुसाते हुए कहा, "अभागे बच्चे हैं, अब इनका क्या होगा? दादी तो बूढ़ी है और
कहानी का अगला पड़ाव
अंतिम संस्कार के बाद, जब ये तीनों (दादी, रोशनी और मेहूल) खाली घर लौटते हैं, तो असली 'ज़िंदगी की कश्मकश' शुरू होती है:
घर आने के बड़ी दादी रोशनी को बहुत भला बुरा सुनाती है कहती है तू मेरे घर के चिराग को खा गई तो कुलछनी है तो मनहूस है तो क्यों नहीं मारी
सपनों की राख और दादी का कहर
किताबों की होली:
घर पहुँचते ही उमा देवी का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। उन्होंने रोशनी के बस्ते से उसकी सारी किताबें निकालीं और आँगन के बीचों-बीच फेंक दीं। रोशनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही दादी ने माचिस की तीली जलाकर उन किताबों में आग लगा दी।
"नहीं दादी! मत जलाओ... ये मेरे बापू का सपना है!" रोशनी चिल्लाई और जलती हुई किताबों को बचाने के लिए आगे बढ़ी, पर दादी ने उसका हाथ पकड़कर उसे पीछे ढकेल दिया। रोशनी की आँखों के सामने उसकी बायोलॉजी की किताबें, उसके नोट्स और उसके सुनहरे भविष्य के पन्ने धू-धू कर जल रहे थे।
बेबस मेहूल:
5 साल का मासूम मेहूल कोने में खड़ा काँप रहा था। वह कभी अपनी जलती हुई किताबों को देखता, तो कभी रोती हुई दीदी को। उसकी आँखों में इतना डर था कि वह चीख भी नहीं पा रहा था। वह मूक दर्शक बना बस अपनी दीदी की बेबसी देख रहा था।
दादी का फरमान:
धुआं अभी थमा भी नहीं था कि दादी ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी और कठोर आवाज़ में कहा—
"आज से इस घर में पढ़ाई का नाम भी लिया तो घर से बाहर निकाल दूंगी। कल सूरज निकलने से पहले तुझे जमींदार साहब की हवेली पहुँचना है। वहाँ जूठे बर्तन मांज, गोबर उठा या खेतों में मजदूरी कर... मुझे नहीं पता! अब इस घर का चूल्हा तेरे इन्हीं हाथों की कमाई से जलेगा।"
दादी ने कहा अब तो काम करेगी और गांव के जमींदार के यहां मैंने बात की थी तो उनकी हवेली में काम करेगी
हवेली की गुलामी और रोशनी का संघर्ष
अपमान की सुबह:
सूरज अभी निकला भी नहीं होता कि रोशनी को जमींदार की हवेली पहुँचना पड़ता है। वह विशाल हवेली, जिसकी ऊँची दीवारों को देखकर कभी वह डरती थी, आज उसी के आँगन में वह झाड़ू लगा रही है। जमींदार की पत्नी और बहुएँ उसे तुच्छ नज़रों से देखती हैं। उसे पीने के लिए पानी भी ऊपर से गिराकर दिया जाता है, मानो वह कोई अपराधी हो।
2. वह गंदा कचरा और कचोटता मन:
हवेली का सारा कूड़ा-कचरा और पशुओं का गोबर उठाना अब रोशनी की रोज़ की नियति बन गई है। जब वह अपने हाथों को गंदगी में डालती है, तो उसे अस्पताल की वह सफेद चादरें और साफ-सुथरा माहौल याद आता है जो उसके पिता ने उसे दिखाया था। उसके हाथों की खाल फटने लगती है, पर वह उफ़ तक नहीं करती। उसके मन में बस एक ही चेहरा घूमता है—उसके छोटे भाई मेहूल का, जिसे घर पर दादी के भरोसे छोड़ कर आई है।
हवेली में एक उम्मीद की किरण:
काम करते-करते रोशनी अक्सर हवेली के बच्चों के कमरे के बाहर रुक जाती है। वहाँ से आती पढ़ाई की आवाज़ें उसे बेचैन कर देती हैं। एक दिन, जब वह बर्तन मांज रही थी, उसने कूड़े के ढेर में एक पुरानी, फटी हुई साइंस की किताब देखी जिसे जमींदार के बेटे ने फेंक दिया था। रोशनी ने चारों तरफ देखा और चुपके से उस किताब को अपने फटे हुए आंचल में छुपा लिया।प्रति उपयोग पुस्तक को उतारे हुए जमींदार का छोटा भाई देख लेता है
दृश्य: हवेली का अंधेरा कोना और वीर प्रताप की गंदी नज़र
वीर प्रताप का सामना:
रोशनी जैसे ही उस फटी हुई किताब को अपने आंचल में छुपाकर मुड़ने वाली थी, सामने वीर प्रताप सिंह खड़ा था। उसकी आँखों में शराब का नशा और चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। वह हाथ में शराब की बोतल लिए डगमगाते हुए रोशनी की तरफ बढ़ा।
"तो... जमींदार की हवेली में चोरी हो रही है?" उसकी भारी और लड़खड़ाती आवाज़ गूँजी।
रोशनी डर के मारे कांपने लगी। उसने कांपते हाथों से वह किताब बाहर निकाली और ज़मीन की तरफ देखते हुए बोली, "नहीं सरकार! ये तो रद्दी में पड़ी थी... मैं बस इसे देख रही थी। मुझे लगा ये किसी के काम की नहीं है।"
हवस का साया:
वीर प्रताप ने किताब की तरफ देखा भी नहीं। उसकी भूखी नज़रें रोशनी के चेहरे और उसके मासूम वजूद पर टिकी थीं। उसने एक कदम और आगे बढ़ाया, जिससे रोशनी दीवार से जा लगी।
"किताबों में क्या रखा है छोरी? इस हवेली में बहुत कुछ है जो तुझे रानी बना सकता है। बस ज़रा प्यार से पेश आया कर..." उसने रोशनी के चेहरे की तरफ हाथ बढ़ाया।
रोशनी की कश्मकश:
रोशनी का दम घुटने लगा। एक तरफ उसका सपना और भाई की भूख थी, जिसके लिए उसे इस हवेली में काम करना ज़रूरी था, और दूसरी तरफ उसकी अपनी इज़्ज़त। उसने हिम्मत जुटाई और वीर प्रताप का हाथ झटक दिया।
"साहब, मैं यहाँ मज़दूरी करने आती हूँ, अपनी इज़्ज़त बेचने नहीं। आइंदा ऐसी बात की तो मैं पुलिस के पास जाऊंगी!" रोशनी की आवाज़ में भले ही डर था, पर ज़िद भी थी।
वीर प्रताप जोर से हंसा, "पुलिस? इस इलाके की पुलिस मेरी जेब में रहती है। तू आज तो बच गई, पर याद रखना... इस हवेली के हर कोने पर मेरी नज़र है।"
आप रोशनी बहुत जोर से घबरा जाती हैं और घबरा जाती हैं अपने घर पहुंच जाती हैं अब