केंट रोड का कमरा नंबर 3 - अध्याय 4 sapna द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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केंट रोड का कमरा नंबर 3 - अध्याय 4

अध्याय 4: आखिरी पन्ना और इंसाफ

कांच टूटने की आवाज और अंधेरे में बढ़ते कदमों की आहट से अमित का दिल हलक में आ गया। उसने अपने फोन की फ्लैशलाइट ऑन की और दरवाजे की तरफ घुमाया। सामने मकान मालिक, वो बुजुर्ग सज्जन, हाथ में एक पुरानी टॉर्च लिए खड़े थे।

उनके चेहरे पर अजीब सी घबराहट और डर था।

"बेटा अमित! तुम ठीक तो हो?" बुजुर्ग ने हांफते हुए पूछा। "मैंने मना किया था न कि इस मेज को मत छूना!"

अमित ने खुद को संभाला और सीधे उनकी आंखों में देखते हुए पूछा, "मकान मालिक अंकल, आप पैंतीस साल पहले की वो बात छुपा रहे हैं न? राघव की हत्या हुई थी इसी कमरे में... क्या आप जानते थे?"

बुजुर्ग के हाथ से टॉर्च छूटते-छूटते बची। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, "मुझे माफ कर देना बेटा।

मैं राघव का छोटा भाई हूँ। उस रात जब सुचित्रा के पिता के गुंडे आए, तो मैं डरकर छिप गया था। उन्होंने राघव को मार दिया और पुलिस को पैसे देकर इस बात को दबा दिया। मैं डर के मारे कभी किसी को कुछ नहीं बता पाया। लेकिन मुझे पता है कि राघव की आत्मा आज भी इसी कमरे में भटक रही है।"

अमित ने बुजुर्ग को दिलासा दिया, "अंकल, अब डरने का वक़्त नहीं, राघव को इंसाफ दिलाने का वक़्त है। राघव का आखिरी खत कहाँ है?"

राघव के भाई ने स्टोर रूम की एक पुरानी, ढीली पड़ी ईंट की तरफ इशारा किया। अमित ने तुरंत आगे बढ़कर उस ईंट को निकाला। उसके पीछे एक छोटा सा गड्ढा था, जिसमें पीले पड़ चुके कागजों का एक पुलिंदा रखा था— यह राघव का वही आखिरी खत था!

जैसे ही अमित ने उस खत को छुआ, कमरे की हवा में एक अजीब सा सुकून तैर गया।

अगली सुबह, अमित सीधे 'शांति वृद्धाश्रम' पहुँचा। वहां एक कोने में सफेद साड़ी पहने एक बुजुर्ग महिला बैठी थीं, जिनकी आंखों में गहरा सूनापन था। वही सुचित्रा थीं। अमित उनके पास गया और बड़े आदर से वह पीला पड़ चुका खत उनके हाथों में थमा दिया।
सुचित्रा ने कांपते हाथों से खत खोला। उसमें लिखा था:

"सुचित्रा, अगर यह खत तुम तक पहुँचे, तो यह मत सोचना कि राघव हार गया या मुकर गया। मैं केंट रोड के कमरा नंबर 3 में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ और हमेशा करता रहूंगा। हमारा प्यार वक्त और मौत से बहुत आगे है।"

खत पढ़ते ही सुचित्रा की बूढ़ी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और मुस्कान आ गई। पैंतीस साल का वो इंतजार और अधूरापन आज खत्म हो चुका था।

उसी शाम, अमित वापस अपने कमरे में आया। स्टोर रूम की उस मेज पर रखा कोरा कागज अब पूरी तरह से खाली था, लेकिन उसके नीचे सोने जैसी चमकती नीली स्याही से सिर्फ एक आखिरी लाइन लिखी हुई थी:

"धन्यवाद अमित। आज मेरी कहानी और मेरा सफर दोनों पूरे हो गए। अब मैं आजाद हूँ।"

अमित ने मुस्कुराकर अपना पेन उठाया और उस कागज के अंत में बड़े अक्षरों में लिखा— "समाप्त"।

उस रात के बाद से केंट रोड के कमरा नंबर 3 का वो खौफ हमेशा के लिए खत्म हो गया, और अमित को उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी बेस्ट-सेलर कहानी मिल गई।

[कहानी पूरी तरह समाप्त]