अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 15 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 15

अधूरी किताब – सीजन 2

एपिसोड 15: पहले लेखक का उत्तराधिकारी

पूरा शहर अंधेरे में डूब चुका था।

आकाश में फैली विशाल दरार लगातार बड़ी होती जा रही थी।

उस दरार के भीतर दो सुनहरी आँखें चमक रही थीं।

इतनी विशाल...

कि पूरा शहर उनके सामने एक खिलौने जैसा लग रहा था।

अनन्या स्तब्ध खड़ी थी।

उसके कानों में बस एक ही वाक्य गूँज रहा था—

"तुम मेरी खोई हुई उत्तराधिकारी हो।"

घनहीं..."

उसके मुँह से निकला।

"यह सच नहीं हो सकता।"

आकाश में मौजूद विशाल आकृति धीरे-धीरे हँसी।

उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी।

बस एक अजीब-सी शक्ति थी।

ऐसी शक्ति जिसने पूरे शहर को काँपने पर मजबूर कर दिया।

वृद्ध संरक्षक तुरंत अनन्या के सामने आ गया।

"उसकी बात मत सुनना।"

उसने कठोर स्वर में कहा।

"वह तुम्हें अपने जाल में फँसाना चाहता है।"

लेकिन सुनहरी आँखों वाली आकृति फिर हँसी।

"जाल?"

"मैं उसे सच बता रहा हूँ।"

अचानक आकाश में बिजली चमकी।

और पहली बार उस आकृति का चेहरा दिखाई दिया।

अनन्या की साँस रुक गई।

क्योंकि वह चेहरा इंसान का नहीं था।

वह लगातार बदल रहा था।

हर सेकंड।

हर पल।

कभी बूढ़ा।

कभी जवान।

कभी पुरुष।

कभी स्त्री।

मानो हजारों चेहरे एक साथ उसके भीतर मौजूद हों।

"कौन हो तुम?"

अनन्या ने हिम्मत करके पूछा।

आकृति कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

"मैं वही हूँ जिसने पहला शब्द लिखा था।"

"मैं वही हूँ जिसने पहली कहानी बनाई थी।"

"मैं वही हूँ जिसे आज सब..."

"पहला लेखक"

"कहते हैं।"

पूरा शहर सन्नाटे में डूब गया।

यह वही नाम था जिसके बारे में अभी-अभी उसने सुना था।

वह रहस्य...

जो हर कहानी के पीछे छिपा हुआ था।

संरक्षक ने अपना विशाल ग्रंथ खोला।

उसके पन्नों से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

"तुम्हें यहाँ आने की अनुमति नहीं है।"

उसने कहा।

पहला लेखक मुस्कुराया।

"अनुमति?"

"यह संसार मेरी रचना है।"

"मुझे अनुमति की जरूरत नहीं।"

अचानक उसके एक इशारे पर आसमान से काले शब्द गिरने लगे।

वे शब्द जमीन से टकराते ही राक्षसों में बदलने लगे।

कुछ विशाल भेड़ियों जैसे थे।

कुछ धुएँ से बने सैनिकों जैसे।

कुछ बिना चेहरे वाले मनुष्यों जैसे।

पूरा शहर चीख उठा।

लोग भागने लगे।

कहानियों के पात्र अपनी जान बचाने लगे।

"युद्ध शुरू हो गया।"

संरक्षक ने धीमे स्वर में कहा।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

"कौन-सा युद्ध?"

संरक्षक का चेहरा गंभीर हो गया।

"आरंभ से पहले से चल रहा युद्ध।"

फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

उसकी हथेली पर एक छोटी-सी सुनहरी चाबी प्रकट हुई।

"यह क्या है?"

अनन्या ने पूछा।

"उत्तर।"

संरक्षक बोला।

"और शायद..."

"उद्धार भी।"

अचानक जमीन काँपने लगी।

पूरे शहर के बीचोंबीच एक विशाल मीनार उभरने लगी।

वह इतनी ऊँची थी कि बादलों के पार चली गई।

उसकी दीवारों पर अनगिनत शब्द लिखे हुए थे।

अनन्या ने ऊपर देखा।

मीनार की सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ चमक रहा था।

एक किताब।

संरक्षक बोला—

"वह मूल ग्रंथ है।"

"पहली किताब।"

"जिसके टुकड़ों से बाकी सारी किताबें बनीं।"

अनन्या की आँखें फैल गईं।

"क्या वह...?"

"हाँ।"

"आरंभ की वास्तविक पुस्तक।"

पहला लेखक अचानक गरजा—

"उसे उससे दूर रखो!"

उसकी आवाज इतनी शक्तिशाली थी कि कई इमारतें टूट गईं।

संरक्षक पहली बार मुस्कुराया।

"अब मुझे यकीन हो गया।"

"तुम अभी भी उससे डरते हो।"

पहला लेखक चुप हो गया।

लेकिन उसकी आँखों में क्रोध चमक उठा।

अनन्या को कुछ समझ नहीं आ रहा था।

अगर वह पहला लेखक था...

तो अपनी ही किताब से डर क्यों रहा था?

संरक्षक उसकी तरफ झुका।

और धीरे से बोला—

"क्योंकि वह सच छिपा रहा है।"

"कैसा सच?"

संरक्षक ने उत्तर दिया—

"पहला लेखक कभी अकेला नहीं था।"

अनन्या चौंक गई।

"जब पहली कहानी लिखी गई थी..."

"तब दो लेखक थे।"

पूरा वातावरण शांत हो गया।

"दो?"

"हाँ।"

"एक ने सृजन किया।"

"दूसरे ने संतुलन।"

"लेकिन इतिहास में सिर्फ एक का नाम बचा।"

अनन्या की धड़कनें तेज हो गईं।

उसे महसूस हो रहा था कि कोई बहुत बड़ा रहस्य सामने आने वाला है।

तभी अचानक उसकी जेब में कुछ चमकने लगा।

वह चौंक गई।

क्योंकि उसकी जेब में कुछ था ही नहीं।

उसने हाथ अंदर डाला।

और एक पुराना लॉकेट निकाला।

वही लॉकेट...

जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।

लेकिन जैसे ही उसने उसे खोला—

उसकी आँखें फैल गईं।

अंदर एक तस्वीर थी।

बहुत पुरानी।

बहुत धुँधली।

तस्वीर में दो लोग खड़े थे।

एक को उसने तुरंत पहचान लिया।

वह पहला लेखक था।

लेकिन दूसरा चेहरा देखकर उसका दिल रुक गया।

क्योंकि वह चेहरा...

बिल्कुल उसकी तरह था।

वही आँखें।

वही चेहरा।

वही मुस्कान।

अनन्या के हाथ काँपने लगे।

"यह..."

संरक्षक ने गंभीर स्वर में कहा—

"वह दूसरा लेखक था।"

"और वह तुम्हारा पूर्वज नहीं था।"

"वह तुम थीं।"

पूरा संसार जैसे थम गया।

"नहीं..."

अनन्या पीछे हट गई।

"यह असंभव है।"

संरक्षक की आँखों में करुणा थी।

"तुम उत्तराधिकारी नहीं हो, अनन्या।"

"तुम लौटी हुई लेखिका हो।"

उसी क्षण उसके सिर में असहनीय दर्द उठा।

हजारों दृश्य उसकी आँखों के सामने चमकने लगे।

असंख्य दुनियाएँ।

असंख्य कहानियाँ।

असंख्य जन्म।

और उन सबके बीच...

वह खुद खड़ी थी।

एक विशाल पुस्तक के सामने।

कुछ लिखते हुए।

आकाश में मौजूद पहला लेखक अचानक चीख उठा—

"उसे याद मत आने दो!"

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

आरंभ की किताब अपने आप खुल चुकी थी।

और उसके पहले पन्ने पर नए शब्द उभर रहे थे—

"दूसरी लेखिका जाग रही है..."

"और उसके साथ..."

"सारी भूली हुई कहानियाँ भी..."

आकाश फटने लगा।

धरती काँपने लगी।

और अनन्या की सुनहरी आँखें पहली बार चमक उठीं।