वैन के टायर जैसे ही रुके, अयान का शरीर एक झटके के साथ लोहे की जाली से जा टकराया। बाहर से किसी ने भारी कुंडी खोली और दरवाज़ा 'धड़ाक' से खुला। सीधी धूप चेहरे पर पड़ते ही उसकी आँखें खुद-ब-खुद सिकोड़ गईं।
"चल, बाहर आ!" एक सिपाही ने उसकी शर्ट का कॉलर पीछे से दबोचा और उसे नीचे की तरफ झटक दिया।
अयान के जूतों ने जब पुलिस चौकी की ऊबड़-खाबड़ जमीन को छुआ, तो उसके पैर लड़खड़ाए, लेकिन जैसे ही उसने खुद को सँभालकर सीधा होना चाहा, घेरा इतना तंग हो गया कि खाकी वर्दियाँ उसके कंधों से आकर सट गईं। उसने अपनी गर्दन झटककर कॉलर छुड़ाने की कोशिश की, पर खाकी वर्दी वालों की पकड़ और मज़बूत हो गई।
अयान को पीछे से दिए जा रहे ज़ोरदार धक्कों ने उन पुरानी सीढ़ियों पर गिरते-पड़ते चढ़ने पर मजबूर कर दिया।
जैसे ही उसने उस थाने की काली दहलीज के अंदर कदम रखा, दीवारों पर चिपके सड़े-गले पोस्टरों और सीलन की उस भारी सड़ांध ने उसकी नाक में दम कर दिया।
पीछे से एक और ज़ोरदार धक्का पड़ा, तो अयान ने खुद को सँभाला, अपनी गर्दन को ज़रा सा टेढ़ा किया और अपनी आँखों के कोनों से उस सिपाही को ऊपर से नीचे तक, ऐसे देखा जैसे उसकी औकात नाप रहा हो।
अयान की आँखों में रत्ती भर भी खौफ नहीं था, बल्कि एक ऐसी चमक थी जो सामने वाले को बता रही थी कि उसने गलत बंदे पर हाथ डाल दिया है।
अपने चेहरे पर एक ठंडी और बेखौफ मुस्कान लाते हुए उसने बस इतना कहा—
"धक्के उतने ही मार हवलदार जितना ये वर्दी और तुम्हारा ये थाना झेल सके, क्योंकि ये सीलन की बदबू और तुम्हारी ये गर्मी... दोनों ज़्यादा दिन टिकने वाली नहीं हैं।”
अफ़सर खिलखिलाकर हँस पड़ा, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा चुटकुला सुन लिया हो। हँसते-हँसते ही उसने बड़े आराम से अपनी कमर से पिस्तौल निकाली और 'ठक' से उसकी नली अयान के माथे पर टिका दी। अयान को अपनी खाल पर उस ठंडे लोहे का अहसास हुआ।
उसने अयान की आँखों में आँखें डालीं और मज़े लेते हुए बोला—
"हाँ-हाँ, सुन लिया भाई... बस कर अब। हमें बहुत पता है कि तू कितनी बड़ी तोप है। पर बेटा, एक बात याद रखना... विवेक राय से पंगा लेकर तूने अपनी इस तोप की नाल में खुद ही कचरा भर लिया है।”
जिस विवेक राय के नाम से ये पूरा शहर थर-थर काँपता है, उससे टकराने चला था तू? मेरी ये एक गोली तो बाद में चलेगी, विवेक राय का साया ही तेरी सारी अकड़ सुखाने के लिए काफी है। ले जाओ इसे अंदर!”
अफ़सर की धमकी भरी बातें सुनकर और माथे पर पिस्तौल की ठंडी नली का दबाव महसूस करते हुए भी अयान की पलक तक नहीं झपकी। उसने अपनी फथरीली नज़रें अफ़सर की आँखों में गाड़ दीं। चेहरे पर खौफ का एक कतरा भी नहीं था, बस एक गहरी नफरत थी।
हवलदार ने एक भारी मेज़ के बगल से अयान को धक्का दिया और उस संकरी गैलरी की तरफ ले गया जहाँ अंधेरा बढ़ता जा रहा था। सन्नाटे में जूतों की आवाज़ गूँजी—'खट... खट... खट'।
एक आखिरी कोने में पहुँचते ही हवलदार रुका। उसने अपनी बेल्ट से भारी चाबियों का गुच्छा निकाला। ताले में चाबी घूमने की वो 'कर्र-कर्र' की आवाज़ अयान के कानों को चीरती हुई गुज़री।
हवलदार ने एक ज़ोरदार लात मारी और अयान उस काली कोठरी के भीतर जा गिरा।
अयान के सँभलने से पहले ही लोहे का वो भारी दरवाज़ा गूँज के साथ बंद हुआ— 'खटाक!'।
ताला लगने की आखिरी खनक के साथ ही बाहर की रोशनी एक पतली लकीर बनकर रह गई।
अयान ने अपनी पीठ उस ठंडी दीवार से टिकाई और अंधेरे से उसकी आवाज़ एक गरज की तरह निकली—"देख लेना साहेब... जिस दिन मैं इस अंधेरे से बाहर आया, उस दिन तुम्हारी ये वर्दी भी उतारूँगा और तुम्हारे उस विवेक राय की हस्ती उखाड़ कर उसे उसकी सही जगह भी दिखा दूँगा। तुम दोनों का हिसाब एक साथ लूंगा मैं।
अफ़सर अपने केबिन की तरफ लपका और मेज़ पर रखा फोन उठाकर एक नंबर डायल किया। दो-तीन घंटियों के बाद फोन उठा, पर उधर से कोई कुछ नहीं बोला। अफ़सर को दूसरी तरफ से बस एक भारी साँस सुनाई दे रही थी।
उसने अपनी टोपी उतारी और कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया। उसने गला साफ किया और दबी आवाज़ में कहा, "सर... प्रणाम!
वो... उसे पकड़ लिया है सर। वही लड़का, अयान। अभी लॉक-अप में डाला है। दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। केबिन में इतनी खामोशी थी कि अफ़सर को अपनी खुद की धड़कन सुनाई दे रही थी।
कुछ पलों बाद विवेक राय की ठंडी आवाज़ आई—"रुको, मैं खुद आता हूँ। तब तक... उसकी इतनी अच्छे से खातिरदारी करो कि जब मैं पहुँचूँ, तो उसके पास बोलने के लिए जुबान और खड़े होने के लिए पैर न बचें। समझ गए?"
अफ़सर ने फोन रखा, और उसने अपनी टोपी उठाई, और उसे पूरी ठसक के साथ अपने माथे पर जमा लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी दरिंदगी उतर आई। उसकी नज़रों का वो बदला हुआ रंग साफ़ बता रहा था।
अब वह किसी कायदे-कानून की परवाह नहीं करने वाला। केबिन के बाहर खड़ी खाकी वर्दियों को उसने ऐसे देखा, जैसे उन्हें किसी खूनी खेल का इशारा मिल गया हो।
बाहर निकलकर उसने बस एक खूंखार इशारा किया, "पट्टा निकालो, और डंडे तेल में भिगो दो। विवेक राय साहब आ रहे हैं, उससे पहले इस हीरो की सारी हेकड़ी निकाल दो। शुरू हो जाओ!”
( लेखक की कलम से...)
थाने की उस सीलन भरी दीवारों के पीछे आज सिर्फ़ एक मुजरिम कैद नहीं है, बल्कि एक ऐसा लावा दबा है जो फटने को बेकरार है। अफ़सर की वर्दी की ठसक और विवेक राय की ताकत अयान के जिस्म को तो तोड़ सकती है, मगर उस नफरत को नहीं, जो उसकी रगों में खून बनकर दौड़ रही है।
इतिहास गवाह है, जब-जब किसी बेगुनाह को अंधेरी कोठरियों में कुचला गया है, तब-तब एक ऐसा इंतकाम पैदा हुआ है जिसने सल्तनतों को मिट्टी में मिला दिया।
पर सवाल अब भी वही है...
अंधेरा गहरा है, और बाहर डंडे तेल में भीग रहे हैं... अफ़सर की दरिंदगी और विवेक राय का खौफ़ अयान को तोड़ने के लिए तैयार है। पर क्या ये वर्दी की 'गर्मी' उस आग को बुझा पाएगी जो अयान के सीने में सुलग रही है?
याद रखना, जब ज़ुल्म अपनी हदें पार करता है, तो खामोशियाँ अक्सर तूफ़ान का रूप ले लेती हैं। अयान की ये फथरीली नज़रें किसी तबाही का आगाज़ हैं या उसकी आखिरी चीख की आहट?
जानने के लिए बने रहिए हमारे साथ... 'नफ़रत की आग' — चैप्टर 32 में।"