और अगली साल
1972 में। मेरे होने वाले साले कमल की शादी थी। और मेरे पास भी कार्ड आया और मैं गया था। फिर मेरे संबंध इंचार्ज मेहताजी से बहुत अच्छे हो गए। इसकी वजह थी, मेरा उनके हर काम में हाथ बंटना। इससे मुझे भी बहुत फायदा हुआ। मैं वो सारे काम जो इंचार्ज बनने पर करने पड़ते हैं। मे सिख गया था। जिसका फायदा आने वाले समय में मुझे मिला।
और मे हर काम में जो थे माहिर हो गया।बुकिंग का माहौल अच्छा था। बाबूलाल झा जो हेड बुकिंग क्लर्क थे। छोटे कद के काले रंग के थे। मजाकिया और हंसमुख स्वभाव के थे।वह और जे सी शर्मा हमेशा मजाक करते रहते थे। मजाक भी द्विअर्थी। बाबूलाल की पत्नी लंबी चौड़ी थी जबकि वह पांच फुट से भी कम उन दिनों एक ही ट्रेन अहमदाबाद जाया करती थी छोटी लाइन की 5अप
शादी के दिनों में लोग आते जाते हैं। नई शादी हो या विदा कराने जाए या बहु को लेकर आए तो पता चल जाता है
एक युवक जिसकी नई शादी हुई थी युवक छोटे कद का और बहू लंबी तगड़ी उसे देखकर जे सी बोला। बड़े बाबू यह मशीन तो तुम्हारी तरह बड़ी है। जब वह आदमी टिकट लेने आया तो बाबू लाल उससे भीओला
लल्लू मशीन तो तू बहुत बड़ी ले आया तू चला लेगा
और भर बोला"हां"
वह युवक भी कुछ ऐसा ही मुझे लगा। जब कई महीनों बाद वह वापस पत्नी के साथ आया तो उस दिन भी मेरे साथ जे सी और बाबूलाल ड्यूटी पर थे। उन्हें देखते ही वह युवक उनके पास पहुंचा और बोला
बाबूजी बड़ी मशीन चला रहा हूँ।
मेरे समय में ही 1974की रेल हड़ताल हुई थी। उस समय देश का माहौल कुछ ऐसा ही था। इंद्रा के राज में महंगाई काफी थी। जरूरत की चीजें चीनी, तेल, घी, गेहूं सब की दिक्कत थी। हड़ताल की तैयारी हो रही थी।
रेलवे की उस हड़ताल में रेल की सभी यूनियन कांग्रेस की मजदूर संघ भी शामिल थी। जबकि केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी। इस हड़ताल को सफल स्वय सरकार ने ही करा दिया। रोड साइड स्टेशन बंद कर दिए गए। यूनियनों के नेता गिरफ्तार कर लिए गए। उस समय आगरा फोर्ट छोटी लाइन से सिर्फ एक ट्रेन चली जिसकी बुकिंग mene की थी । रेल हड़ताल को असफल दिखाने के लिए लंबी दूरी की ट्रेनें दौड़ाई ललेकिन यात्री कम ही निकले।
और उसके बाद एक दौर आया आपातकाल का। मैं सिर्फ रेल की बात करूंगा। उस समय रेलवे में भी आए दिन विजिलेंस चेकिंग होती थी। आए दिन कही से टीम आ जाती। यह हाल था कि कोई भी अजनबी बुकिंग की तरफ आता तो वह विजिलेंस का ही नजर आता।
उन दिनों यू पी में आए दिन कर्फ्यू लगते रहते और ड्यूटी पर जाने में काफी परेशानी आती थी। साधन तो मिलते नहीं थे, सो मैं गलियों में से निकलकर रेल लाइन पर चला जाता और स्टेशन पहुंच जाता। हालांकि डर तो लगा ही रहता कि कोई हमला न कर दे।
साल दर साल से काम नहीं चलेगा
और उस हड़ताल में ड्यूटी करने वाले के बेटे को नौकरी या vetan वृद्धि मिली।