दुश्मन से पहला प्यार: द मिस्टीरियस क्वीन - भाग 10 Pihu Patel द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मन से पहला प्यार: द मिस्टीरियस क्वीन - भाग 10

 दो शिकारी, एक शिकार**

रात के दो बज रहे थे। दिग्विजय सिंह के आलीशान फार्महाउस के चारों तरफ सन्नाटा था, लेकिन अंदर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे। हथियारबंद गार्ड्स हर कोने पर गश्त लगा रहे थे। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि आज रात उनके सामने एक नहीं, बल्कि दो सबसे ख़तरनाक शिकारी आने वाले थे।
मैं (मायरा) ब्लैक लेदर सूट और नकाब पहने, फार्महाउस की छत के रास्ते अंदर दाखिल हुई। मेरा मकसद साफ़ था—दिग्विजय सिंह के पर्सनल लॉकर से वो बेनामी संपत्तियों के कागज़ात चुराना, जिससे वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए।
मैं दबे पांव चलते हुए उसके खुफिया केबिन के पास पहुँची। जैसे ही मैंने दरवाज़ा थोड़ा सा खोला, अंदर का नज़ारा देखकर मेरे होश उड़ गए।
केबिन के अंदर दिग्विजय सिंह अपनी आलीशान चेयर पर बंधा हुआ था। उसके चेहरे पर खौफ साफ़ दिख रहा था, और उसके ठीक सामने खड़ा था—रुद्र प्रताप सिंह। रुद्र का सूट इस वक्त थोड़ा अस्त-व्यस्त था, आँखों में कयामत जैसा गुस्सा था और उसके हाथ में वही पिस्तौल थी जो कभी उसने मुझ पर तानी थी।
"रुद्र... छोड़ दे मुझे! मैं तेरा ताऊ हूँ," दिग्विजय सिंह हांफते हुए भीख मांग रहा था।
"ताऊ? रिश्ता तो तुम उसी पल भूल गए थे दिग्विजय सिंह, जब तुमने मायरा पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की थी," रुद्र ने ठंडे और बर्फीले लहजे में कहा। उसने पिस्तौल का निशाना सीधे दिग्विजय के माथे पर लगा दिया। "मैंने कहा था न... उस पर आंच भी आई, तो मैं तुम्हारा पूरा साम्राज्य मिटा दूँगा।"
मैं दरवाजे के पीछे छिपी यह सब देख रही थी। रुद्र का यह रूप देखकर मेरा दिल कांप उठा। वह मेरे प्यार में इस कदर अंधा हो चुका था कि एक मर्डरर बनने के लिए तैयार था। मैं उसे एक गुनहगार नहीं बनने दे सकती थी।
"रुद्र! रुको!" मैंने अपनी असली आवाज़ में चिल्लाते हुए केबिन का दरवाज़ा खोल दिया।
रुद्र ने झटके से पीछे मुड़कर देखा। नकाबपोश मिस्टीरियस क्वीन को अपने सामने देखकर उसकी आँखों में अचरज के भाव आए, लेकिन वह तुरंत पहचान गया कि इस मास्क के पीछे कौन है।
"मायरा? तुम यहाँ क्या कर रही हो? मैंने तुम्हें घर पर रहने के लिए कहा था!" रुद्र ने गुस्से और फ़िक्र से कहा।
"मैं तुम्हें एक कातिल बनते हुए देखने के लिए यहाँ नहीं रुक सकती थी, रुद्र," मैंने आगे बढ़कर उसके पिस्तौल वाले हाथ को धीरे से नीचे किया। "यह इंसान मौत के लायक ज़रूर है, लेकिन इसके खून से तुम्हारे हाथ गंदे हों, यह मुझे मंज़ूर नहीं। इसे सज़ा कानून देगा, और उसके पुख्ता सबूत मेरे पास हैं।"
मैंने अपनी जेब से वो रिकॉर्डर निकाला, जिसमें दिग्विजय सिंह के गुर्गे की वो कॉल रिकॉर्डिंग थी, जिसने मायरा को मारने की सुपारी ली थी।
दिग्विजय सिंह हमें देखकर ज़ोर से हंसा, "तुम दोनों बच्चे मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते! बाहर मेरे पचास आदमी खड़े हैं। तुम दोनों यहाँ से ज़िंदा बाहर नहीं जाओगे।"
तभी अचानक पूरे फार्महाउस में पुलिस के सायरन की आवाज़ गूंज उठी—**'टूँ... टूं... टूं...'**। लाल और नीली बत्तियाँ खिड़की के कांच को चीरती हुई अंदर आने लगीं।
"तुम्हारे वो पचास आदमी अब पुलिस की कस्टडी में हैं, ताऊ जी," रुद्र ने एक शातिर मुस्कान के साथ कहा। "मैंने यहाँ आने से पहले ही कमिश्नर को सारे सबूत भेज दिए थे। मैं तो बस तुम्हें यह बताने आया था कि सिंह साम्राज्य का असली राजा कौन है।"
पुलिस ने कमरे में घुसकर दिग्विजय सिंह को गिरफ्तार कर लिया। जब उसे ले जाया जा रहा था, तो उसने रुद्र और मुझे एक आख़िरी नफ़रत भरी नज़र से देखा।
फार्महाउस के बाहर ठंडी हवा चल रही थी। पुलिस की गाड़ियाँ जा चुकी थीं। रुद्र ने मुड़कर मुझे देखा, उसने आगे बढ़कर धीरे से मेरे चेहरे से वह मास्क हटा दिया। मेरी आँखों में आँसू थे और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान।
"तो... मिस्टीरियस क्वीन का मिशन पूरा हुआ?" रुद्र ने शरारत से पूछा।
"हाँ... और दुश्मन से पहला प्यार भी मुकम्मल हुआ," मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
रुद्र ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। दुश्मनी की आग अब पूरी तरह बुझ चुकी थी, और उस राख से जनम ले चुका था एक ऐसा प्यार, जो अब हमेशा के लिए अमर होने वाला था।

**[कहानी समाप्त]**