मौत का साया और रक्षक
वह काली गाड़ी किसी यमराज के वाहन की तरह मेरी तरफ बढ़ रही थी। उसकी हेडलाइट्स की चकाचौंध में मुझे कुछ पल के लिए सूझ ही नहीं रहा था कि मैं किस तरफ भागूँ। मौत मेरे सामने खड़ी थी, और गाड़ी के टायर सड़क के पानी को चीरते हुए भयानक आवाज़ कर रहे थे।
"मायरा!"
रुद्र की गूंजती हुई चीख हवा में तैर गई। गाड़ी जब मुझसे महज़ दो फीट की दूरी पर थी, तभी रुद्र ने हवा में एक लंबी छलांग लगाई। उसने पूरी ताकत से मुझे अपनी बाहों में समेटा और हम दोनों गोल घूमते हुए सड़क के किनारे की फुटपाथ पर जा गिरे।
उसी सेकंड वह बेकाबू गाड़ी हवा को चीरती हुई ठीक उसी जगह से निकल गई, जहाँ मैं खड़ी थी। अगर रुद्र ने एक पल की भी देरी की होती, तो आज मेरा बचना नामुमकिन था। गाड़ी की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि वह बिना रुके अंधेरे में ओझल हो गई।
हम दोनों की सांसें बहुत तेज़ चल रही थीं। मेरा सिर रुद्र के चौड़े सीने पर टिका था और उसने मुझे इतनी कसकर भींच रखा था, जैसे वह यकीन करना चाहता हो कि मैं सुरक्षित हूँ। उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
"तुम ठीक हो? मायरा, प्लीज बताओ, तुम्हें कहीं लगी तो नहीं?" रुद्र ने घबराते हुए मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया। उसकी आँखों में वो खौफ था, जो मैंने आज तक किसी के लिए नहीं देखा था।
"मैं... मैं ठीक हूँ, रुद्र," मैंने हांफते हुए कहा। मेरी कोहनी और घुटनों पर सड़क से रगड़ खाने की वजह से हल्की खरोंचें आई थीं, लेकिन रुद्र की बाहों की वजह से मैं एक बहुत बड़े हादसे से बच गई थी।
रुद्र धीरे से खड़ा हुआ और उसने मुझे भी सहारा देकर उठाया। उसकी घबराहट अब एक भयंकर गुस्से में बदल चुकी थी। उसने अपनी मुट्ठियाँ इतनी ज़ोर से भींच लीं कि उसकी उंगलियों के जोड़ सफेद पड़ गए।
"यह कोई हादसा नहीं था, मायरा। यह ताऊ जी की साज़िश थी। उन्होंने मेरी चेतावनियों को हल्के में लिया," रुद्र की आवाज़ में एक ऐसा ठंडा गुस्सा था जो किसी भी गुनहगार को ज़िंदा जला देने के लिए काफी था। "उन्होंने तुम पर हाथ डाला है... अब रुद्र प्रताप सिंह उनके साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा देगा।"
रुद्र मुझे वापस मेरे घर लेकर आया। उसने खुद मेरे ज़ख्मों पर दवा लगाई। उसके हाथों की वो नरमी देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह वही खूंखार बिजनेस टाइकून है।
"तुम आज रात यहीं आराम करोगी। बाहर मेरे चार सबसे भरोसेमंद गनमैन तैनात रहेंगे," रुद्र ने मेरे माथे को चूमते हुए कहा। "मुझे कुछ काम निपटाना है।"
"रुद्र, तुम कहाँ जा रहे हो? प्लीज कुछ गलत मत करना," मैंने उसका हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश की। मुझे डर था कि गुस्से में वह कानून अपने हाथ में न ले ले।
"मैं सिर्फ वही करने जा रहा हूँ मायरा, जो मुझे बहुत पहले कर देना चाहिए था," रुद्र ने एक शातिर मुस्कान के साथ कहा। "ताऊ जी भूल गए हैं कि अगर तुम 'द मिस्टीरियस क्वीन' हो, तो मैं भी इसी खेल का राजा हूँ। उन्होंने हमारे प्यार पर वार किया है, अब वो सिंह परिवार का असली तांडव देखेंगे।"
वह कमरे से बाहर निकल गया। मुझे पता था कि अब चुप बैठने का समय ख़त्म हो चुका था। भले ही मैं रुद्र के प्यार में थी, लेकिन मेरी रगों में अभी भी उस जासूस का खून था जो ख़तरों से खेलना जानती थी। दिग्विजय सिंह ने मुझ पर हमला करके 'द मिस्टीरियस क्वीन' को ललकारा था।
मैंने अलमारी से अपना वही पुराना ब्लैक लेदर सूट निकाला, अपने चेहरे पर मास्क लगाया और रात के सन्नाटे में खिड़की के रास्ते बाहर कूद गई। अब जंग सिर्फ रुद्र की नहीं थी, यह मेरी भी थी। दिग्विजय सिंह ने जिस खेल की शुरुआत की थी, उसका अंत मैं अपने हाथों से करने वाली थी।