नया दुश्मन, नई साज़िश**
रुद्र की बाहों के घेरे में मुझे दुनिया का सबसे बड़ा सुकून महसूस हो रहा था। उसकी धड़कनें साफ़ कह रही थीं कि उसके दिल में अब मेरे लिए नफ़रत की कोई जगह नहीं बची है। लेकिन मेरा दिल अभी भी आने वाले कल को सोचकर घबरा रहा था। जब दुश्मनी इतनी गहरी हो, तो इतनी आसानी से प्यार मुकम्मल नहीं होता।
"रुद्र... मुझे डर लग रहा है," मैंने उसका सीना छूते हुए बहुत धीरे से कहा।
रुद्र ने मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और मेरी आँखों में देखते हुए बोला, "जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम्हें किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है, मायरा। कल सुबह मैं तुम्हें पूरी इज़्ज़त के साथ वापस रॉयल कॉर्पोरेशन लेकर आ रहा हूँ। वो भी किसी असिस्टेंट की तरह नहीं, बल्कि उस कंपनी की आधी मालकिन के तौर पर।"
अगली सुबह, जब रुद्र की काली चमचमाती कार रॉयल कॉर्पोरेशन के सामने रुकी, तो पूरे ऑफिस का स्टाफ गेट पर खड़ा था। रुद्र ने खुद उतरकर मेरे लिए दरवाज़ा खोला। जैसे ही मैंने कार से बाहर कदम रखा, सभी लोग हैरान रह गए। जो मायरा दो दिन पहले तक एक साधारण कर्मचारी थी, आज वह रुद्र प्रताप सिंह के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थी।
हम जैसे ही कॉन्फ्रेंस रूम में पहुँचे, वहाँ का माहौल बहुत तनावपूर्ण था। बड़ी सी टेबल के मुख्य हिस्से पर एक बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था, जिसके चेहरे पर शातिर मुस्कान थी। वह कोई और नहीं, बल्कि रुद्र के बड़े ताऊ जी—**दिग्विजय सिंह** थे।
"तो... रुद्र बाबू आ गए," दिग्विजय सिंह ने सिगार का धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा। उसकी बूढ़ी और चालाक आँखें मुझ पर टिक गईं। "मैंने सुना है कि तुम इस मामूली सी लड़की के नाम हमारी पुश्तैनी कंपनी का आधा हिस्सा करने जा रहे हो? वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि यह उस मरे हुए शर्मा की बेटी है?"
'मरे हुए शर्मा' शब्द सुनते ही मेरा खून खौल उठा, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, रुद्र ने गुस्से में टेबल पर हाथ मारा।
"ताऊ जी! अपनी ज़बान को लगाम दीजिए," रुद्र की आवाज़ किसी दहाड़ की तरह गूंजी। "मायरा के परिवार के साथ जो हुआ, उसमें मेरे पिता के साथ-साथ आपका भी हाथ था। मैं सिर्फ अपना फर्ज़ निभा रहा हूँ और इंसाफ़ कर रहा हूँ।"
दिग्विजय सिंह अपनी जगह से खड़ा हुआ। उसकी आँखों में एक ख़तरनाक चमक थी। "इंसाफ़? बिजनेस में सिर्फ मुनाफ़ा होता है, इंसाफ़ नहीं। तुम प्यार के चक्कर में अंधे हो चुके हो रुद्र। लेकिन याद रखना, दिग्विजय सिंह को बर्बाद करना इतना आसान नहीं है। मैं इस लड़की को एक कौड़ी भी नहीं लेने दूंगा।"
वह गुस्से में पैर पटकता हुआ कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर निकल गया। जाते-जाते उसने मुझे एक ऐसी नज़र से देखा, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे समझ आ गया था कि हमारा असली दुश्मन रुद्र के पिता नहीं, बल्कि यह इंसान है।
उसी रात।
ऑफिस का काम ख़त्म करके मैं अपने घर के लिए ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। सड़क बिल्कुल सुनसान थी और बारिश की हल्की फुहारें गिर रही थीं। तभी अचानक एक तेज़ हेडलाइट की रोशनी सीधे मेरी आँखों पर पड़ी।
एक काले रंग की बिना नंबर प्लेट वाली एसयूवी (SUV) गाड़ी बहुत तेज़ी से मेरी तरफ बढ़ रही थी। उसकी रफ्तार इतनी ज़्यादा थी कि मुझे संभलने का मौका ही नहीं मिला। गाड़ी सीधे मुझे कुचलने के इरादे से आ रही थी।
"मायरा! हटो वहाँ से!" अचानक दूर से रुद्र की चीखने की आवाज़ आई।
मैंने मुड़कर देखा, रुद्र अपनी कार से उतरकर मेरी तरफ पागलों की तरह भाग रहा था। गाड़ी मेरे बिल्कुल करीब पहुँच चुकी थी। क्या दिग्विजय सिंह का वार खाली जाने वाला था, या आज 'द मिस्टीरियस क्वीन' के सफर का यहीं अंत होने वाला था?