बेनकाब सच और तड़प
उस रात के बाद से रॉयल कॉर्पोरेशन का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। रुद्र के केबिन की वो खिड़की अब हमेशा के लिए बंद कर दी गई थी, ठीक उसी तरह जैसे रुद्र ने अपने दिल के दरवाजे बंद कर लिए थे।
सुबह के दस बज रहे थे। रुद्र अपने केबिन की बड़ी सी कांच की दीवार के सामने खड़ा था। उसकी नजरें बाहर शहर की ऊँची इमारतों पर टिकी थीं, लेकिन उसका दिमाग उस रात के चक्रव्यूह में ही उलझा हुआ था। उसकी आँखों में इस वक्त गुस्से से ज़्यादा एक गहरा सन्नाटा था। मायरा पिछले दो दिनों से ऑफिस नहीं आई थी। वह बिना बताए गायब थी, और रुद्र को अब उसकी वजह बहुत अच्छी तरह पता थी।
तभी केबिन का दरवाज़ा धीरे से खुला। रुद्र को लगा शायद विक्रम होगा, लेकिन जब कोई आवाज़ नहीं आई, तो उसने मुड़कर देखा।
दरवाज़े पर मायरा खड़ी थी। लेकिन आज उसके चेहरे पर वो पुरानी मासूमियत या डर का मुखौटा नहीं था। वह बहुत ही शांत और गंभीर दिख रही थी। उसने फॉर्मल सूट नहीं, बल्कि एक साधारण सी ब्लैक कुर्ती पहनी हुई थी। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक अजीब सा दर्द था।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ दोबारा कदम रखने की?" रुद्र की आवाज़ इतनी ठंडी और भारी थी कि कोई भी कांप जाए। वह धीरे-धीरे चलकर उसके पास आया। "तुम एक चोर हो, मायरा। मैंने तुम्हें रंगे हाथों पकड़ा था। मैं चाहूँ तो तुम्हें इसी वक्त पुलिस के हवाले कर सकता हूँ।"
मैंने अपनी नज़रें नहीं झुकाईं। मैंने सीधे उसकी सुलगती हुई आँखों में देखा। "आप पुलिस को बुला सकते हैं मिस्टर रुद्र प्रताप सिंह। लेकिन पुलिस के आने से पहले, इस पेन ड्राइव का सच पूरी दुनिया के सामने आ जाएगा। वो सच... जो आपके पिता ने मेरे परिवार के साथ किया था।"
रुद्र पल भर के लिए ठिठक गया। "क्या बकवास कर रही हो तुम?"
"यह बकवास नहीं है!" मेरी आवाज़ में बरसों का दर्द और गुस्सा एक साथ बाहर आ गया। "सात साल पहले, रॉयल कॉर्पोरेशन को खड़ा करने के लिए आपके पिता ने मेरे पापा की कंपनी को धोखे से बर्बाद कर दिया था। मेरे पापा वो सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने दम तोड़ दिया। मैं यहाँ सिर्फ एक चोर बनकर नहीं आई थी... मैं यहाँ अपना हक और इंसाफ लेने आई थी!"
रुद्र के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे इस अतीत के बारे में कुछ नहीं पता था। वह जिस सच को अपनी जीत समझ रहा था, वह दरअसल उसके परिवार का एक काला दाग था।
"मायरा... यह सच नहीं हो सकता," रुद्र ने बेहद धीमी आवाज़ में कहा। उसकी पकड़ अपनी ही मेज पर ढीली पड़ गई।
"सच इस पेन ड्राइव में है, रुद्र। आप खुद देख लीजिए," मैंने पेन ड्राइव उसकी टेबल पर रख दी। "मुझे जो सबूत चाहिए थे, वो मुझे मिल चुके हैं। मैं आपके केबिन में चोरी छुपे घुस सकती हूँ, तो इस कंपनी को बर्बाद भी कर सकती हूँ। लेकिन..." मैं रुक गई, मेरी सांसें भारी होने लगी थीं।
"लेकिन क्या?" रुद्र ने तड़पते हुए पूछा। उसकी आँखों में अब मायरा को खोने का डर साफ़ दिख रहा था।
"लेकिन मैं आपके जैसा पत्थर दिल नहीं बन पाई," मैंने अपनी आँखों में आए आँसू को छुपाते हुए कहा। "इन दो हफ्तों में मैंने आपके अकेलेपन को देखा है। मुझे आपसे नफ़रत करनी थी रुद्र... लेकिन न जाने कब, मुझे इस नफ़रत के पीछे छुपे इंसान से..." मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
मैंने मुड़कर दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ा दिए। रुद्र अपनी जगह पर बेजान खड़ा था। उसका दिल चीख-चीख कर मायरा को रोकना चाहता था, उसे अपनी बाहों में भींच लेना चाहता था, लेकिन उसके पिता का गुनाह उनके बीच एक बहुत बड़ी दीवार बनकर खड़ा हो चुका था। क्या दुश्मन से हुआ यह पहला प्यार इस नफ़रत की आग में जलकर राख हो जाएगा?