शहर की रङ्गीन रोशनियाँ - 3 H.k Bhardwaj द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहर की रङ्गीन रोशनियाँ - 3

💘शहर की रंगीन रोशनियाँ💘 भाग – 03

        (यादों के उस पार) 

✍️ Written by H. K. Bharadwaj

__________________________________________________________________________________________          कॉलेज छूटे हुए अब कई वर्ष बीत चुके थे।

आसफपुर की वे सड़कें,

त्रिवेणी सहाय इंटर कॉलेज का वह प्रांगण,

पुस्तकालय की सीढ़ियाँ,

प्रार्थना स्थल और वह पुराना बरगद का पेड़ अब केवल स्मृतियों का हिस्सा रह गए थे। 

      जीवन अपनी गति से आगे बढ़ रहा था।लेकिन किशोर का मन कहीं पीछे छूट गया था।वहीं...

▪️जहाँ एक दिन मधु अपनी सहेलियों आभा और मिथलेश के साथ गलियारे से गुजर रही थी।

▪️जहाँ पहली बार उसकी आँखें मधु की आँखों से मिली थीं।

▪️जहाँ एक मौन कहानी जन्मी थी। 

  पढ़ाई पूरी करने के बाद किशोर अपने गाँव लौट आया।पिता की खेती में हाथ बँटाने लगा।

समय के साथ उसने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की।जीवन में जिम्मेदारियाँ बढ़ने लगीं।

लेकिन हर शाम जब वह खेतों की मेड़ पर बैठकर अस्त होते सूर्य को देखता, तो उसे मधु याद आ जाती।

उसे स्वयं आश्चर्य होता।

—जिस लड़की से उसने कभी बात तक नहीं की...जिसका हाथ कभी नहीं थामा।

...जिसे अपने मन की बात कभी नहीं बताई।

...वह उसके हृदय में इतनी गहराई से कैसे बस गई .....?               शायद प्रेम का संबंध निकटता से नहीं, अनुभूति से होता है।

और कुछ अनुभूतियाँ जीवन भर साथ चलती हैं।

एक दिन गाँव के एक परिचित से उसे पता चला कि मधु का विवाह हो चुका है।

वह किसी बड़े शहर में अपने पति के साथ रहती है।

समाचार सुनते ही किशोर कुछ देर मौन बैठा रहा।

उसने मुस्कराने का प्रयास किया।

लेकिन उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।

उसने पहली बार महसूस किया कि जीवन की कुछ राहें अब सदा-सदा के लिए अलग हो चुकी हैं।

वह जानता था कि मधु पर उसका कोई अधिकार नहीं था।और कभी था भी नहीं।

फिर भी मन के किसी कोने में एक पीड़ा उठी।

जैसे कोई पुराना दीपक अचानक बुझ गया हो।

वर्ष बीतते गए।

घर वालों ने किशोर के विवाह की बात चलानी शुरू कर दी।आखिरकार उसका विवाह उसकी ही जाति की एक सुशील और संस्कारी लड़की कँवलसरिता से तय हो गया।                          कँवलसरिता सुंदर होने के साथ-साथ अत्यंत समझदार और सरल स्वभाव की युवती थी।

विवाह धूमधाम से सम्पन्न हुआ।

सारा गाँव खुश था।

माता-पिता संतुष्ट थे।

दादी अम्मा ने आँसू भरी आँखों से नववधू का स्वागत किया।               सब कुछ ठीक था।

लेकिन केवल एक व्यक्ति पूरी तरह खुश नहीं था।

और वह था—किशोर।

वह कँवलसरिता का सम्मान करता था।

उसकी परवाह भी करता था।लेकिन उसके भीतर का एक हिस्सा आज भी अतीत में अटका हुआ था।

वह अपनी पत्नी को वह प्रेम नहीं दे पा रहा था जिसकी वह अधिकारी थी।

कई बार कँवलसरिता उसे घंटों खोया हुआ देखती।

वह समझ नहीं पाती कि उसके पति की आँखों में अक्सर एक अजीब सी उदासी क्यों उतर आती है।

एक रात की बात है।

बाहर हल्की वर्षा हो रही थी।आँगन में रखे तुलसी के चौरे पर दीपक टिमटिमा रहा था।

कँवलसरिता ने धीरे से पूछा।

—"क्या मैं आपसे ......एक बात पूछ सकती हूँ ?"

किशोर ने उसकी ओर देखा।

"पूछो।"

"आप कभी-कभी बहुत दूर चले जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे आपके मन में कोई ऐसी बात है जो आज तक आपने किसी से नहीं कही।"

कुछ क्षणों तक मौन छाया रहा।

फिर किशोर ने गहरी साँस ली।और वर्षों से अपने भीतर छिपी कहानी सुनानी शुरू कर दी।

उसने मधु के बारे में बताया।

पहली मुलाकात के बारे में।

उन अनगिनत आई कॉन्टैक्ट्स के बारे में।

उस मौन प्रेम के बारे में जो कभी शब्द नहीं बन पाया।

और उस अंतिम दिन के बारे में जब दोनों ने एक-दूसरे को आखिरी बार देखा था।

किशोर बोलता गया।

कँवलसरिता सुनती रही।

रात गहराती गई।

और वर्षों से दबा हुआ दर्द धीरे-धीरे शब्दों में बहता गया।

जब कहानी समाप्त हुई तो किशोर की आँखें नम थीं।

वह बोला।

—"मुझे नहीं पता यह प्रेम था या नहीं।

लेकिन मैं उसे आज तक भूल नहीं पाया हूँ।

और शायद कभी भूल भी न पाऊँ।"

कँवलसरिता कुछ देर चुप रही।

फिर उसने धीरे से अपना हाथ किशोर के हाथ पर रख दिया।

"आपने मुझसे सच कहकर,मुझ पर बहुत बड़ा विश्वास किया है।"

किशोर ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।

"क्या तुम्हें बुरा नहीं लगा ?"

कँवलसरिता मुस्कराई।

"बुरा तब लगता यदि आप मुझसे झूठ बोलते।"

उसकी आँखों में अपनापन था।"

हर इंसान के जीवन में कुछ यादें होती हैं जिन्हें वह मिटा नहीं सकता।

 मैं आपकी पत्नी हूँ, आपकी स्मृतियों की प्रतिद्वंद्वी नहीं।"

किशोर की आँखें भर आईं।

शायद पहली बार उसे लगा कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं होता।

समझने का नाम भी होता है।

समय आगे बढ़ता रहा।

बच्चे हुए।

परिवार बढ़ा।

जिम्मेदारियाँ बढ़ीं।

जीवन की गाड़ी अपनी पटरी पर चलती रही।

लेकिन कुछ चीजें कभी नहीं बदलीं।

कभी-कभी जब किशोर किसी शहर की चमकती सड़कों से गुजरता।

...जब रात में दूर-दूर तक फैली रंगीन रोशनियाँ देखता...जब किसी कॉलेज के सामने से निकलता...तो अचानक उसे मधु याद आ जाती।

वही चेहरा।

वही आँखें।

वही मौन संवाद।

अब उसके बालों में सफेदी उतरने लगी थी।

चेहरे पर उम्र की रेखाएँ दिखाई देने लगी थीं।

लेकिन स्मृतियाँ बूढ़ी नहीं हुई थीं।

वे आज भी वैसी ही थीं जैसी वर्षों पहले थीं।

एक शाम वह अपने घर की छत पर बैठा सूर्यास्त देख रहा था।

नीचे शहर की रंगीन रोशनियाँ जगमगाने लगी थीं।कँवलसरिता उसके पास आकर बैठ गई।

दोनों कुछ देर चुप रहे।

फिर कँवलसरिता ने मुस्कराकर पूछा।

—" फिर याद आ रही है ?"

किशोर भी मुस्करा दिया।

"हाँ..."

" बहुत ?"

"अब दर्द नहीं होता।"

" फिर ?"

किशोर ने दूर टिमटिमाती रोशनियों को देखते हुए कहा।                    —"कुछ लोग जीवन में मिलकर भी नहीं मिलते।

और कुछ लोग बिना मिले ही जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।"

उस रात शहर की रंगीन रोशनियाँ दूर तक फैली थीं।

किशोर उन्हें निहार रहा था।

उसे नहीं पता था कि मधु कहाँ है।

कैसी है।

खुश है या नहीं।

शायद वह भी अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुकी होगी जहाँ स्मृतियाँ वर्तमान से अधिक प्रिय लगने लगती हैं।

            लेकिन यह जानना अब आवश्यक भी नहीं था।क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ मिलन के लिए नहीं लिखी जातीं।            "वे केवल हृदय में एक कोमल एहसास छोड़ने के लिए जन्म लेती हैं। और फिर जीवन भर स्मृतियों के दीपक की तरह जलती रहती हैं।"

मधु उसके जीवन की वही लौ थी—जिसे वह कभी पा नहीं सका,लेकिन जिसे वह कभी बुझा भी नहीं पाया।

" कुछ रिश्तों की कदर जीवित रहने में होती है। वे अधूरे होकर भी इतने पूर्ण होते हैं, कि जीवन भर हृदय में बसे रहते हैं।"

                                 💘 समाप्त 💘

पाठक मित्रों,

इस कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका

"अधूरापन" है। 

यदि किशोर और मधु मिल जाते, तो यह एक सामान्य प्रेम कहानी बन जाती। 

लेकिन केवल आँखों के मौन संवाद और जीवनभर की स्मृति ने इसे एक भावनात्मक, साहित्यिक और मार्मिक कहानी बना दिया है।

Written by H.K. Bharadwaj