💘शहर की रंगीन रोशनियाँ💘 भाग 01-
(पहली नज़र का अहसास)
✍️ Written by H. K. Bharadwaj
__________________________________________________________________________________________ उत्तर प्रदेश के बदायूँ जनपद के एक छोटे से गाँव में रहने वाला किशोर एक सीधा-सादा, शांत और संस्कारी युवक था।गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों में लहलहाती फसलें, नीम के पेड़ों की छाया और दादी-अम्मा की कहानियों के बीच उसका बचपन बीता था। उसके पिता एक साधारण किसान थे और माँ गृहिणी।इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने के बाद जब उसे आगे की पढ़ाई के लिए आसफपुर स्थित त्रिवेणी सहाय इंटर कॉलेजआसफपुर बदायूँ में प्रवेश मिला, तो पूरा परिवार बहुत खुश हुआ।
दादी अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था। —"बेटा, पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना, लेकिन अपनी मिट्टी मत भूलना।"
किशोर मुस्करा दिया था।उसे क्या मालूम था कि शहर की पढ़ाई उसे केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा एहसास भी देने वाली है जिसे वह कभी भूल नहीं पाएगा।
जुलाई का महीना था।
कॉलेज का पहला सप्ताह चल रहा था।चारों ओर नए विद्यार्थियों की भीड़ थी।कहीं परिचय चल रहे थे, कहीं पुराने मित्र गले मिल रहे थे।
किशोर अपने स्वभाव के अनुसार सबसे अलग, बरामदे के एक कोने में खड़ा था।
तभी उसकी नज़र सामने वाले गलियारे पर पड़ी।
तीन लड़कियाँ अपनी किताबें सीने से लगाए हँसते-बातें करते हुए कक्षा की ओर जा रही थीं।
उनमें से एक लड़की पर उसकी नज़र जैसे ठहर गई।
वह श्वेत-रंग का सलबार-सूट पहनें थी उसके वक्ष पर पिन किया हुआ स्वेत दुपट्टा था।
लंबे घने काले बालों की एक मोटी चोटी, जो उसकी पीठ पर दिखरही थी,
मधुर मधु भरें हल्की सी मुश्कान लिए उसके सबसे प्यारें होंठ, उसका हल्का लम्वूतरा गोरा-चिट्टा चेहरा,
सुदृढ़ नाक नक्श, कानों में शुद्ध स्वर्ण के मकराकृति के बनें गोल कुण्डल,
जो अक्सर उसके कपोलों को चूम रहें थें,।
माथे पर छोटी सी लाल पूजा की बिंदी।
और चेहरे पर एक अद्भुत शालीनता थी।
वह मधु थी।
उसके साथ उसकी सहेलियाँ आभा और मिथलेश थीं।
किशोर पहली बार उसे देख रहा था।
और शायद वह पहली बार जीवन में किसी को इस तरह देख रहा था।
कुछ क्षणों के लिए उसके आसपास का सारा शोर जैसे गायब हो गया हो।
उसे केवल मधु बोलती हुई दिखाई तो दे रही थी, पर वह क्या बोल ,रही थी ।
किशोर को उसके शब्द कुछ भी पता नहीं थें।
पर हाँ उसकी वो मधुर गुँज्जित वाणी उसके कानों से उतर कर हृदय की अथाह गहराईयों में घुलती जा रही थी।
वह तब तक उसे देखता रहा जब तक वह कक्षा के दरवाजे के भीतर नहीं चली गई।
घंटी बज चुकी थी।
लेकिन किशोर का मन अब भी उसी गलियारे में खड़ा था।उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।
किशोर रोज़ कॉलेज आने लगा, लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ उसकी निगाहें किसी और को भी अब खोजने लगीं थीं।सुबह कॉलेज पहुँचते ही वह सबसे पहले परिसर में चारों ओर नज़र दौड़ाता।
शायद कहीं मधु दिखाई दे जाए।
कभी वह बालिका-कक्ष के बाहर दिख जाती तो कभी सहेलियों के साथ मैदान की ओर जाती हुई।
कभी अपनी सहेलियों के साथ हँसती हुई।
और हर बार किशोर दूर खड़ा उसे चुपचाप देखता रहता।
वह कुछ नहीं कहता।
न उसके पास जाने की हिम्मत जुटा पाता।
न कोई पत्र लिखता।
न कोई संदेश।
उसका प्रेम केवल उसकी आँखों में था।
और उन आँखों का कोई अनुवाद नहीं था।
दिन बीतते गए।
महीने गुजरने लगे।
अब कॉलेज के अधिकांश विद्यार्थियों के अपने-अपने मित्र बन चुके थे।
लेकिन किशोर अब भी अकेला था।
उसके सहपाठी अक्सर उससे पूछते।
—"अरे यार, तू हमेशा कहाँ खोया रहता है?"
किशोर बस मुस्करा देता।
वह किसी को क्या बताता कि उसका मन किस दुनिया में रहता है।
उसे तो बस मधु को देखना अच्छा लगता था।
इतना अच्छा कि कई बार पूरा दिन उसी एक झलक के सहारे बीत जाता।
एक दिन अपने कक्षा से निकलकर किशोर बालिका कक्ष के बाहर खड़ीं मधु को दूर से देख रहा था।
मधु अपनी सहेलियों के साथ बातें कर रही थी।
अचानक उसकी नज़र किशोर पर पड़ी।
दोनों की आँखें एक क्षण के लिए मिलीं।
किशोर घबरा गया।
उसने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं।
लेकिन उस दिन पहली बार मधु ने उस गुमनाम लड़के को ध्यान से देखा था।
इसके बाद कुछ बदलने लगा।
मधु ने महसूस किया कि एक लड़का अक्सर उसे देखता रहता है।
न वह कभी उसे परेशान करता था।
न रास्ता रोकता था।
न कोई उस से बात करता था।
बस दूर से उसे देखता था।
जैसे किसी प्रेंम पुस्तक का कोई शांत पात्र हो।
जैसे कोई अधूरी कविता।
धीरे-धीरे मधु भी उसे अब पहचानने लगी।
अब जब भी वह कॉलेज के किसी कोने में किशोर को देखती, उसकी ओर एक क्षण के लिए अवश्य देखती।
और फिर आगे बढ़ जाती।
किशोर के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।
अब कभी-कभी ऐसा होता कि गलियारे के दो सिरों पर दोनों खड़े होते।
बीच में विद्यार्थियों की भीड़ होती।
लेकिन उनकी नज़रें एक-दूसरे को ढूँढ़ लेतीं।
कोई शब्द नहीं।
कोई मुस्कान नहीं।
कोई संकेत नहीं।
सिर्फ आँखों का मिलन।
और उन आँखों में अनगिनत अनकहे प्रश्न।
अनगिनत अनसुने उत्तर।
वर्ष गुजरते गए।
त्रिवेणी सहाय इंटर कॉलेज का हर कोना उनकी इस मौन कहानी का गवाह बन गया।
कक्षा के बाहर का बरामदा।
कभी दद्दा जी की प्रतिमा के नजदीक की फूलों बाली क्यारी। तो कभीदूसरी मंजिल की ओर जातीं सीढ़ियाँ।
तो कभी सभा स्थल।
विद्यालय में कोई नहीं जान पाता कि दो लोग एक-दूसरे को देखते हैं।
लेकिन मधु की दोनों सहेलियाँ जानती थीं कि वे दोनों एक दूसरें को देखतें हैं, पर उन दोनों के बीच कभी किसी नें एक दूसरे को कभी कोई शब्द भी नहीं बोला।
यह उनका प्रेम नहीं था।
दोस्ती नहीं थी।
परिचय भी नहीं था।
फिर भी उन दोनों के हृदय में कुछ था।
ऐसा कुछ,
जिसे दोनों शायद स्वयं भी परिभाषित नहीं कर सकते थे। और यही उस कहानी की सबसे बड़ी खूबसूरती थी।
"क्योंकि कई बार जीवन के सबसे गहरे रिश्ते शब्दों से नहीं, केवल नज़रों से बनते हैं "।
और उन्हीं नज़रों में एक पूरा संसार बस जाता है...क्रमशः...!
Next Part Coming Soon......
Written by H K Bharadwaj