राजस्थान की दोपहर में एक खास तरह की बेरहमी होती है.
वो तुम्हें सुबह चेतावनी देती है — हल्की गर्म हवा के जरिए, जैसे कोई कह रहा हो, संभलकर। दोपहर को वो सीधे थप्पड मारती है. और शाम को — जब सूरज तिरछा होने लगता है और रोशनी सोने जैसी हो जाती है — वो माफी माँगती है.
अभी थप्पड वाला वक्त था.
क्लास की खिडकी से लू के झोंके आ रहे थे. पंखा अपनी पूरी कोशिश कर रहा था — पर वो बस गर्म हवा को एक दीवार से दूसरी दीवार की तरफ धकेल रहा था. जैसे कोई थका हुआ आदमी एक भारी पत्थर को बिना मतलब के आगे- पीछे खिसकाता रहे.
[क्लास शुरू होने से पहले — चार लडकियाँ और एक गॉसिप]
बच्चे धीरे- धीरे क्लास में आ रहे थे.
मेरी बेंच पर चारों लडकियाँ आ चुकी थीं — वीरेंद्र, गायत्री, काव्या, और वो प्यारी सी लडकी. बैग रखे जा रहे थे, कॉपियाँ निकाली जा रही थीं — और बातें चल रही थीं.
अब, अगर आपको लगता है कि लडकियाँ सिर्फ मेकअप और सीरियल्स की बात करती हैं — तो आप इतने गलत हैं कि आपकी गलतफहमी को भी शर्म आ जाए. लडकियों की गॉसिप में जो खुफिया जानकारी होती है, वो RAW और CBI के एजेंट्स को भी पसीना ला दे.
वो प्यारी सी लडकी हँसते हुए कह रही थी —
यार, वो लडका — गजेंद्र. उसने मुझे impress करने की कोशिश की. कहता है उसने anime देखी है. मुझे लगा' Demon Slayer' की बात करेगा — पर भाई साहब' डोरेमोन' का episode बता रहे थे।
वो रुकी. फिर बोली —
डोरेमोन।
एक पल का सन्नाटा.
फिर तीनों ठहाके मारकर हँस पडीं.
गजेंद्र भाई, तुमने जो किया वो सिर्फ गलती नहीं — वो एक कला है. किसी anime fan लडकी के सामने खडे होकर' डोरेमोन इज माई फेवरेट anime' बोलना — यह वैसा ही है जैसे किसी Chess Grandmaster के सामने कहो, हाँ यार, मैंने भी लूडो खेला है. बढिया game है।
तभी गायत्री ने — जो हमेशा सीरियस रहती है, चश्मे के पीछे से दुनिया को तोलती रहती है — अपने बैग का zip बंद करते हुए कहा —
मुझे इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं. मेरे पिताजी बहुत strict हैं. मैं यहाँ सिर्फ पढने आई हूँ. अगर उन्हें कुछ भी पता चला, तो वो मेरी पढाई छुडवा देंगे।
अरे, पढाई तो ठीक है — दोस्ती तो कर सकती है ना? वीरेंद्र ने कहा. उसकी आवाज में वो सीधापन था जो सिर्फ उसी में था.
गायत्री ने जवाब नहीं दिया.
जो लोग बहुत ज्यादा समझदार होते हैं, वो कभी- कभी चुप रहना ही ठीक समझते हैं.
लेकिन तभी काव्या की आवाज बदल गई. एकदम से. जैसे किसी ने volume घुमाकर धीमा कर दिया हो.
तुम्हें पता है. उसने कहा, खिडकी के बाहर देखते हुए, कल मुझे एक लडका देखने आया था।
कमरे में एक अजीब- सी खिंचाव आ गई.
रुको. देखने?
गायत्री का चश्मा लगभग नाक से उतर गया. क्या बात कर रही है? तेरी शादी होने वाली है? तू तो अभी सिर्फ अठारह की है!
हाँ।
काव्या ने एक ठंडी साँस ली.
मैं अभी शादी नहीं करना चाहती. वो लडका मुझसे उम्र में बहुत बडा है. पर घरवाले दबाव डाल रहे हैं। एक पल रुकी. फिर — बहुत धीरे —" मैं क्या ही करूँ?
क्लास में बाकी बच्चे अभी भी आ रहे थे. शोर था. पर उन चारों के बीच एक अलग- सी खामोशी थी.
मेरी लकडी का सीना भारी हो गया.
मुझे वो पुरानी बहस याद आई — कौन जल्दी mature होता है, लडके या लडकियाँ? लडकियाँ मजबूरन जल्दी mature हो जाती हैं. उन्हें कम उम्र में ही शादी का डर समझना पडता है. आजादी छिनने का डर. जिम्मेदारियों का बोझ. वो बातें जो उनकी उम्र में होनी ही नहीं चाहिए थीं.
और हम लडके? हम maturity से भागने के लिए हँसते हैं. बेमतलब की हरकतें करते हैं. डोरेमोन का episode बताते हैं.
इसीलिए.
वीरेंद्र ने काव्या के कंधे पर हाथ रखा. कुछ नहीं बोली. बस वहाँ रही.
कभी- कभी यही सबसे बडी बात होती है — वहाँ रहना.
गायत्री ने चश्मा ठीक किया और धीरे से कहा, कुछ न कुछ रास्ता निकलेगा।
तीनों कुछ देर खामोश रहीं.
तभी घंटी बजी. टीचर आए. क्लास शुरू हो गई.
[लंच ब्रेक — मदन, राहुल और एक किताब जो उल्टी थी]
लंच की घंटी बजी — टन- टन- टन!
पिंजरे का दरवाजा खुल गया.
मेरी नजर सबसे पहले उधर गई जहाँ वो हमेशा बैठती थी.
वो प्यारी सी लडकी.
आज उसके हाथ में एक किताब थी. लंच के वक्त भी. मैंने सोचा — पढ रही है. फिर ध्यान से देखा.
किताब उल्टी थी.
वो पढ नहीं रही थी. बस थामे हुई थी — जैसे हाथों को किसी चीज की जरूरत हो.
उसी वक्त क्लास के कोने में कुछ और चल रहा था.
मदन.
लंबे बाल, बेल्ट नहीं, जूते का तस्मा हमेशा खुला — वो टाइप जिसे देखकर टीचर सोचें, ये पढता भी है? लेकिन उसकी आँखों में एक चीज थी जो बाकी सबसे अलग थी. वो हमेशा देखता था — कभी कोने से, कभी खिडकी से. जैसे वो इस क्लासरूम का दर्शक हो.
यह मेरा काम था. पर ठीक है.
अभी वो चुपचाप किसी दूसरे के बैग से टिफिन निकालकर खाना खा रहा था.
अरे!
रुक जाओ. मेरे दिमाग में अचानक वो हिंदी की कहानी कौंध गई —' नलिन विलोचन शर्मा' की' विष के दाँत। उसमें एक मदन था जो अमीरों की कार का शीशा तोड देता था. यहाँ ये वाला मदन किसी का टिफिन उठा रहा है.
Upgrade नहीं हुआ.
बस भूखा है.
वो बात अलग थी.
मैंने उसे फिर से देखा. वो खा रहा था — जल्दी- जल्दी, जैसे कोई देख न ले. लेकिन उसकी आँखों में शर्म नहीं थी. एक अजीब- सी थकान थी.
मदन, तू कौन है?
तभी दरवाजे से राहुल अंदर आया.
राहुल — क्लास का वो लडका जिसे monitor नहीं बनाया गया था, पर जो खुद ही बन गया था. टीचर्स की नजर में सबसे जिम्मेदार, बाकी सबकी नजर में सबसे ज्यादा irritating।
राहुल की नजर सीधा मदन पर पडी.
मदन की नजर राहुल पर पडी.
एक पल.
वो वाला सन्नाटा जो लडाई से पहले आता है.
लो भाई, महाभारत शुरू.
लेकिन तभी.
क्लिक- क्लॉक. क्लिक- क्लॉक.
हाई- हील्स की आवाज पूरे corridor में गूँजी. जैसे किसी ने background music बदल दिया हो.
राहुल और मदन की दुश्मनी धरी की धरी रह गई. क्लास के सारे लडकों की आँखें दरवाजे पर चिपक गईं — एक साथ, एक झटके में.
इंग्लिश वाली मैडम क्लास में आ चुकी थीं.
और आज — मैडम साडी में नहीं आई थीं.
जींस और टॉप.
क्लास में जो सन्नाटा छाया, वो किसी Natural Disaster से ज्यादा powerful था. Time Freeze हो गया था. पूरी क्लास — लडके, लडकियाँ, पंखा, शायद धूप भी — सब रुक गए.
Hi राम.
मैं एक बेंच होकर भी खुद को संभाल नहीं पा रहा था.
और मेरी नजर जब पीछे बैठे लडकों पर गई —
अबे ओ छपरियों! शर्म करो! वो तुम्हारी TEACHER हैं! जिस इंसान ने तुम्हें' Article The' का इस्तेमाल करना सिखाया है — उसके साथ ऐसा?
मैं अंदर ही अंदर जल रहा था. उनके लिए.
ठीक है, थोडा खुद के लिए भी. लेकिन वो अलग बात है. मैं एक सभ्य लकडी हूँ.
[Present Continuous Tense और एक बहुत जरूरी Word]
मैडम पढाने लगीं. Board पर लिख रही थीं — Present Continuous Tense। हर बच्चा ऐसे ध्यान दे रहा था जैसे यह grammar उनकी जिंदगी का सबसे important lesson हो.
शायद था.
मैडम ने पूरी क्लास को देखा.
Present Continuous बताता है कि कोई काम अभी हो रहा है. I am reading. She is thinking. He is.
मैडम रुकीं. किसी से पूछा.
एक पल की खामोशी.
Waiting, Ma' am, वो प्यारी सी लडकी ने कहा.
धीमी आवाज में. बिना किसी drama के. बस वो एक word।
Waiting.
मैडम ने उसकी तरफ देखा. एक पल से ज्यादा.
Correct, उन्होंने कहा.
पर उनकी नजर उस लडकी पर रुकी रही — जैसे वो उस word के पीछे कुछ और सुन रही हों.
मैं भी सुन रहा था.
वो किसका इंतजार कर रही है?
मैडम board की तरफ पलटीं — और उनके हाथ से chalk फिसल गई.
फर्श पर.
सीधे मेरी बेंच के सामने.
ओह माय गॉड.
मेरे अंदर का शैतान — जो आम तौर पर सोया रहता है — एकदम जाग गया.
मैडम. please. chalk उठाने के लिए नीचे झुकिए. मेरे लकडी के जीवन को मोक्ष मिल जाएगा. बस एक बार. इतिहास में मेरा नाम लिखा जाएगा. वो बेंच जिसके सामने एक दिन इंग्लिश मैडम ने.
मैडम झुकने वाली थीं.
और तभी —
वीरेंद्र.
मेरे ऊपर बैठी वीरेंद्र — वो tomboy जिसकी reflexes किसी भी fielder को शर्मिंदा कर दें — एक झटके में उठी.
मैडम, मैं देती हूँ!
वीरेंद्र ने झुककर chalk उठाया. मैडम के हाथ में रख दिया. एक छोटी- सी मुस्कान दी. और वापस बैठ गई.
पूरा काम तीन सेकंड में.
मेरा पूरा ब्रह्मांड उजड गया.
वीरेंद्र!
तू लडकी नहीं है, तू इस क्लास की सबसे बडी Villain है! तूने मेरे जीवन का सबसे हसीन पल छीन लिया! MOKSHA! मुझे मोक्ष मिलने वाला था! और तूने तीन सेकंड में सब बर्बाद कर दिया! तू Cricket खेलती है — तेरी reflexes इतनी तेज क्यों हैं यार! इस एक मौके पर थोडी slow हो जाती!
मेरी आँखें — जो हैं नहीं — भर आईं.
[दिन का अंत — और कुछ जो टला था, खत्म नहीं हुआ]
दिन ऐसे ही गुजर गया.
आखिरी घंटी बजी. बच्चे उठे. बैग उठाए. बाहर गए.
राहुल और मदन को मैंने देखा — दरवाजे के पास, एक पल के लिए एक- दूसरे के पास से गुजरे. राहुल ने कुछ नहीं कहा. मदन ने भी नहीं.
वो सन्नाटा जो लडाई से पहले था — वो अभी भी था. बस टाल दिया गया था.
कुछ चीजें टलती हैं, खत्म नहीं होतीं.
वो प्यारी सी लडकी आखिर में गई.
दरवाजे पर पहुँचकर वो एक पल रुकी — जैसे कुछ याद आया हो. फिर चली गई.
क्या याद आया था उसे?
शाम हुई.
राजस्थान की शाम में एक खास बात होती है — जब सूरज ढलता है, तो आसमान पहले नारंगी होता है, फिर गुलाबी, फिर बैंगनी. जैसे कोई रोज एक नई painting बनाता हो और अगली सुबह मिटा देता हो.
क्लास की खिडकी से वो रोशनी आ रही थी — मेरी लकडी पर.
मैं बस देख रहा था.
[रात — और एक चीज जो मुझे पहले दिखनी चाहिए थी]
रात गहरी हुई. School खाली हो गया.
वो सन्नाटा जो दिन भर के शोर के बाद आता है — और अजीब तरह से भारी लगता है.
मुझे नींद आ गई.
रात के करीब दो बज रहे होंगे. मैं चुपचाप अपने वजूद के बारे में सोच रहा था.
तभी मुझे अपने अंदर — यानी मेरी बेंच के drawer के अंदर — कुछ अजीब- सी हलचल महसूस हुई.
मैंने दिन भर ध्यान नहीं दिया था. लेकिन किसी ने मेरी desk के अंदर कुछ छोड दिया था.
एक बेंच होने के नाते मैं अपने अंदर रखी चीजों का वजन और आकार महसूस कर सकता था.
वो एक छोटी- सी डायरी थी.
लेकिन बात डायरी की नहीं थी. बात ये थी कि उस डायरी के cover पर उँगलियों के खुरदरे निशान थे. और वो निशान' इंसान' के नहीं लग रहे थे.
तभी drawer के अंदर से एक हल्की- सी आवाज आनी शुरू हुई.
टिक. टिक. टिक.
क्या किसी ने मेरे अंदर कोई time bomb रखा है? या फिर.
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मेरे कानों में एक फुसफुसाहट गूँजी — लेकिन इस बार वो बाहर से नहीं.
मेरी बेंच के ठीक नीचे से आ रही थी:
सतोशी. तुम वापस आ गए.
मेरा लकडी का शरीर बर्फ की तरह सुन्न पड गया.
ये आवाज. ये आवाज मुझे मेरे नाम से कैसे बुला रही है? इस दुनिया में तो कोई मेरा असली नाम नहीं जानता!
—. —