4: शक का दायरा**
रुद्र की उँगलियों की पकड़ मेरी कलाई पर और कस गई। उसकी आँखें पूरी तरह सिकुड़ चुकी थीं और वह बिना पलक झपकाए मेरे नीले पड़े निशान को देख रहा था। कल रात उस नकाबपोश लड़की की कलाई भी उसने इसी जगह से मरोड़ी थी। केबिन के अंदर की हवा अचानक भारी हो गई, और बाहर कड़कती बिजली ने माहौल को और भी डरावना बना दिया।
मेरा दिल एक पल के लिए गले को आ गया। लेकिन 'द मिस्टीरियस क्वीन' ऐसे मोड़ों पर घबराती नहीं है। मैंने तुरंत अपने चेहरे पर डर और मासूमियत का मिला-जुला भाव लाया, अपनी आँखों में झूठे आँसू भरे और दर्द से कराहते हुए कहा, "आह! सर, प्लीज छोड़िए... दर्द हो रहा है।"
रुद्र का ध्यान पल भर के लिए भटका, लेकिन उसने कलाई नहीं छोड़ी। उसने कड़क आवाज़ में पूछा, "मैंने जो पूछा उसका जवाब दो, मायरा। तुम्हारी कलाई पर यह चोट कैसे लगी? ठीक इसी जगह पर?"
"सर, वो... परसों रात जब मैं अपने घर लौट रही थी, तो गली के आवारा कुत्तों ने मेरा पीछा कर लिया था," मैंने रोनी सूरत बनाकर झूठ का जाल बुना। "मैं घबराहट में भागी और कॉलोनी के लोहे के गेट से टकराकर गिर गई। यह निशान उसी लोहे के सरिये की वजह से आया है। अगर आपको मुझ पर यकीन नहीं है, तो आप मेरी माँ को फोन करके पूछ सकते हैं।"
मैंने जानबूझकर 'माँ' का नाम लिया क्योंकि मैं जानती थी कि रुद्र एक प्रोफेशनल बिजनेस टाइकून होने के नाते किसी कर्मचारी की माँ को फोन करने जैसी ओछी हरकत कभी नहीं करेगा।
रुद्र ने कुछ सेकेंड तक मेरी आँखों में सच तलाशने की कोशिश की। मेरी आँखों की मासूमियत ने उसके दिमाग में उठ रहे शक के बवंडर को थोड़ा शांत कर दिया। उसने धीरे से मेरी कलाई छोड़ दी, लेकिन उसके चेहरे के भाव अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए थे।
"अगली बार से संभलकर रहा करो। मेरी कंपनी में मुझे सुस्त और घायल लोग नहीं चाहिए," रुद्र ने मुंह फेरते हुए अपनी पुरानी कड़क आवाज़ में कहा, जैसे वह अपने अंदर आते बदलावों से खुद चिढ़ रहा हो।
"जी सर, थैंक यू," मैंने कहा और चुपचाप अपनी टेबल से फाइलें उठाकर केबिन से बाहर आ गई।
बाहर आते ही मैंने राहत की गहरी सांस ली। मेरी पीठ पसीने से भीग चुकी थी। रुद्र बहुत शातिर था, उसकी नज़रों से बचना अब दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था। मुझे अपना मिशन जल्द से जल्द पूरा करना होगा, इससे पहले कि मेरा मुखौटा उतर जाए।
अगले दो दिन ऑफिस में बहुत शांति से बीते। रुद्र बिजनेस ट्रिप के सिलसिले में शहर से बाहर था, जो मेरे लिए एक सुनहरा मौका था। आज रात मुझे उस खुफिया दीवार के पीछे बने लॉकर का पासवर्ड हर हाल में हासिल करना था।
रात के ठीक एक बजे, मैं फिर से अपनी उसी नीली पोशाक और चेहरे पर मास्क लगाए रुद्र के केबिन की खिड़की से अंदर दाखिल हुई। पूरा ऑफिस अंधेरे में डूबा था। मैंने बिना समय गंवाए दीवार पर लगी पेंटिंग को हटाया। उसके पीछे एक डिजिटल लॉकर चमक रहा था।
मैंने अपना हैकिंग डिवाइस लॉकर से कनेक्ट किया। स्क्रीन पर कोड्स तेज़ी से बदलने लगे।
*30%... 60%... 90%...* और एक हल्की सी आवाज़ के साथ लॉकर का दरवाज़ा खुल गया। अंदर एक पुरानी डायरी और एक पेन ड्राइव रखी थी, जिसमें रुद्र के परिवार और मेरे परिवार की बर्बादी का सारा सच छुपा था। मैंने जैसे ही पेन ड्राइव उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, अचानक पूरे कमरे की फ्लड लाइट्स जल उठीं।
"तो आखिरकार... तुम वापस आ ही गईं, माय डियर एनिमी!"
एक भारी और जानी-पहचानी आवाज़ केबिन के मुख्य दरवाज़े से गूंजी। मैंने चौंककर पीछे देखा। दरवाज़े पर कोई गार्ड नहीं, बल्कि खुद रुद्र प्रताप सिंह दोनों हाथ अपनी जेब में डाले, चेहरे पर एक खूंखार और सैटिस्फाइड मुस्कान लिए खड़ा था। वह शहर से बाहर गया ही नहीं था, यह सब मुझे फंसाने के लिए उसका बुना हुआ जाल था!