भाग 2: कांटों भरा गुलाब**
सुबह की धूप जब रुद्र प्रताप सिंह के आलीशान केबिन की कांच की खिड़की से अंदर आई, तो वहाँ का नज़ारा बदला हुआ था। मेज पर बिखरे हुए कांच के टुकड़े साफ़ कर दिए गए थे, लेकिन उस वीरान केबिन में अभी भी एक चीज़ वैसी ही थी—वह गहरा लाल गुलाब, जिसकी एक पंखुड़ी पर खुरचकर लिखा था, "जल्द मिलेंगे, रुद्र..."।
रुद्र अपनी चमचमाती ब्लैक लेदर चेयर पर बैठा हुआ था। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, जो साफ़ बता रहे थे कि वह रात भर सोया नहीं था। उसके हाथ में वही गुलाब था। वह अपनी उंगलियों से उस पर लिखे नाम को छू रहा था, और उसका दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। वह सोच रहा था कि आखिर वो नकाबपोश लड़की कौन थी जो उसके इतने कड़े सुरक्षा घेरे को तोड़कर अंदर तक आ गई।
"सर..." विक्रम ने केबिन के अंदर कदम रखते हुए बेहद डरते हुए आवाज़ दी। "हमने कल रात के सारे सीसीटीवी फुटेज खंगाले। लेकिन अजीब बात यह है कि उस समय पूरे इलाके का सर्वर हैक कर लिया गया था। कैमरों में सिर्फ ब्लैक स्क्रीन दिख रही है। वह लड़की... कोई मामूली चोर नहीं है सर, वह एक प्रोफेशनल हैकर और फाइटर है। उसने हमारे पूरे सिस्टम को कुछ मिनटों के लिए ठप कर दिया था।"
रुद्र ने गुलाब को टेबल पर पटका। उसकी आँखों में गुस्सा उड़क आया। "मुझे बहानों में कोई दिलचस्पी नहीं है, विक्रम! मुझे वह लड़की चाहिए। उसने मेरे सुरक्षा घेरे को तोड़ा, मेरी गन के सामने खड़ी हुई और मुझे 'माय डियर एनिमी' कहकर चली गई! इस पूरे शहर में आज तक किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई। वह जो कोई भी है, बहुत बड़ी खिलाड़ी है।"
"हम पूरी कोशिश कर रहे हैं सर, लेकिन हमारे पास उसका कोई चेहरा या नाम नहीं है," विक्रम ने सिर झुकाकर कहा।
"चेहरा नहीं है, तो क्या हुआ? उसकी आँखें... उसकी वो जादुई और रहस्यमयी आँखें मेरे दिमाग से नहीं निकल रही हैं। जाओ और ढूंढो उसे! चाहे पाताल से ही क्यों न ढूंढ निकालना पड़े," रुद्र की दहाड़ से पूरा केबिन गूंज उठा। विक्रम तुरंत बाहर भाग गया।
रुद्र ने गहरी सांस ली और अपनी टेबल पर पड़े नए एम्प्लॉइज (कर्मचारियों) की फाइलों को देखने लगा। आज कंपनी में नए आर्किटेक्ट्स और पर्सनल असिस्टेंट्स का पहला दिन था। जैसे ही उसने तीसरी फाइल खोली, उसकी नजरें एक तस्वीर पर टिक गईं। हल्के भूरे बाल, सादगी भरा चेहरा और बड़ी-बड़ी आँखें। फाइल पर नाम लिखा था—'मायरा शर्मा'।
ठीक नौ बजे, मैं (मायरा) अपने सीधे-साधे फॉर्मल सूट में रॉयल कॉर्पोरेशन की बिल्डिंग में दाखिल हुई। मेरे चेहरे पर एक बेहद मासूम मुस्कान थी, जिसे देखकर कोई भी धोखा खा सकता था। किसी को कानों-कान अंदाज़ा नहीं था कि कल रात नीली पोशाक में रुद्र के होश उड़ाने वाली 'मिस्टीरियस क्वीन' कोई और नहीं, बल्कि मैं ही थी।
मैं सीधे रुद्र के केबिन की तरफ बढ़ी। कल रात के हादसे के बाद वहाँ का माहौल काफी कड़क था। चारों तरफ गन लिए गार्ड्स तैनात थे।
मैंने केबिन का दरवाज़ा खटखटाया, "मे आई कम इन, सर?"
रुद्र ने अपनी फाइल से सिर उठाया। जब उसकी खूंखार आँखें मुझसे मिलीं, तो मेरे दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। क्या उसने मुझे पहचान लिया? नहीं, कल रात कमरे में अंधेरा था और मेरा आधा चेहरा नकाब से ढका था।
"तो तुम हो मिस मायरा," रुद्र ने अपनी भारी आवाज़ में कहा। वह अपनी कुर्सी से उठा और धीरे-धीरे चलकर मेरे करीब आने लगा। उसकी लंबी कद-काठी का साया मुझ पर पड़ा। वह मेरे इतने पास आ गया कि मैं उसकी सांसों की गर्माहट महसूस कर सकती थी। बिल्कुल कल रात की तरह।
उसने टेबल से वही लाल गुलाब उठाया और मेरी आँखों में सीधे देखते हुए बोला, "मिस मायरा, तुम्हारी आँखें बहुत खूबसूरत हैं। लेकिन क्या तुम्हें पता है... मुझे खूबसूरत चीज़ों से ज़्यादा, उन चीज़ों में दिलचस्पी है जो अपने अंदर कोई राज़ छुपाए रखती हैं।"
उसने वह गुलाब मेरी तरफ बढ़ा दिया। गुलाब का एक कांटा मेरी उंगली में चुभ गया और खून की एक नन्ही बूंद बाहर आ गई। मैंने बिना पलक झपकाए मुस्कुराते हुए वह गुलाब ले लिया। दुश्मनी का खेल अब और भी ख़तरनाक होने वाला था।