वह अनामिका की आवाज़ थी। पर आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी टूटे हुए रिकॉर्डर से आ रही हो।
शैतानी घाटी: मेहुल का खौफनाक अंत
अनामिका की वो फटी हुई, रिकॉर्डर जैसी आवाज़ मेहुल के कानों में किसी मधुर संगीत की तरह गूँज रही थी।
खून के वो धब्बे, जो राम और सृष्टि को सिर्फ गंदगी लग रहे थे, मेहुल के लिए किसी मखमली कालीन की तरह चमक रहे थे।
मेहुल: (एक अजीब, पथराई हुई मुस्कान के साथ) "अनामिका... मैं आ रहा हूँ। देखो, वो मुझे बुला रही है! कितना सुकून है वहाँ..."
मेहुल अचानक पागलों की तरह नाचने लगा। उसकी हँसी किसी इंसान की नहीं, बल्कि किसी शैतानी खिलौने जैसी लग रही थी।
जैसे-जैसे उसके पैर ज़मीन पर पड़ रहे थे, वहाँ की सख्त मिट्टी किसी दलदल की तरह नरम होने लगी। मिट्टी के अंदर से छोटे-छोटे गड्ढे उभरने लगे और मेहुल धीरे-धीरे उनमें धंसने लगा।
सृष्टि: (चीखते हुए) "मेहुल! पागल मत बनो! वहाँ कोई नहीं है! तुम नीचे धंस रहे हो, बाहर निकलो!"
राम: "मेहुल! अपना हाथ दो, मैं तुम्हें खींचता हूँ!"
पर मेहुल को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
वो किसी अलग ही काल्पनिक दुनिया में मगन था, जहाँ शायद उसे अनामिका साक्षात दिख रही थी।
वो और ज़ोर-ज़ोर से हाथ-पैर मारने लगा, जैसे ज़मीन के अंदर कोई जन्नत छिपी हो। मिट्टी अब उसके घुटनों तक आ चुकी थी।
राम ने जैसे ही उसे बचाने के लिए दौड़ लगाई, सृष्टि ने बिजली की फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया।
सृष्टि: (रोते हुए) "नहीं राम! वहाँ मत जाओ! यह मेहुल नहीं है, यह कोई छलावा है जिसने उसे वश में कर लिया है। अगर तुम वहाँ गए, तो वो ज़मीन तुम्हें भी निगल लेगी!"
राम ने अपनी पूरी ताक़त से सृष्टि का हाथ छुड़ाने की कोशिश की। "
छोड़ो मुझे सृष्टि! मेरा दोस्त मर रहा है, मैं उसे ऐसे नहीं छोड़ सकता!" राम चिल्लाया और मेहुल की तरफ झपटा।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मेहुल अब कमर तक ज़मीन के अंदर समा चुका था। जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, उसके चेहरे पर दर्द के बजाय एक डरावना और अमानवीय 'मज़ा' दिख रहा था।
अचानक, ज़मीन के अंदर से दो काले, झुलसे हुए विशाल हाथ निकले। उन हाथों ने मेहुल के कंधों को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि उसकी हड्डियों के चटकने की आवाज़ साफ़ सुनाई दी।
"आऽऽऽऽऽऽह!"
अंत में, मेहुल के गले से एक ऐसी चीख निकली जिसने पूरी घाटी को कंपा दिया। वो मज़ा अब एक असहनीय दर्द में बदल चुका था।
उन हाथों ने उसे एक झटके में नीचे खींच लिया। मिट्टी ऐसे बराबर हो गई जैसे वहाँ कभी कोई था ही नहीं। ज़मीन ने मेहुल को पूरी तरह निगल लिया था।
मेहुल का अंत हो चुका था। सातों दोस्तों में से अब सिर्फ तीन बचे थे— राम, सृष्टि और मोनिका।
सन्नाटा और अगली आहट
मैदान में एक बार फिर वही खौफनाक सन्नाटा छा गया। राम घुटनों के बल उसी जगह बैठ गया जहाँ मेहुल धंसा था।
उसने मिट्टी को खोदने की कोशिश की, पर वहाँ सिर्फ ठंडी और बेजान राख जैसी धूल थी।
मोनिका: (शून्य में देखते हुए) "अब हम तीन... सिर्फ तीन। गिनती पूरी होने वाली है, राम।"
शैतानी घाटी: टूटता हौसला और आखिरी उम्मीद
मैदान की काली मिट्टी पर मोनिका अब हार मानकर घुटनों के बल बैठ गई थी। उसकी आँखों से गिरते आँसू उस राख जैसी धूल में मिलकर काले धब्बे बना रहे थे।
उसकी आवाज़ में अब डर नहीं, बल्कि एक गहरा खालीपन था।
मोनिका: (सिसकते हुए) "राम... सृष्टि... अब बस बहुत हो गया। गिनती पूरी होने वाली है और मुझे पता है कि अगला नंबर मेरा है। हमने अपने चार सबसे अच्छे दोस्तों को खो दिया।
और वो कालू? वो तो निर्दोष था। वो बस कुछ पैसों की चाह में हमारे साथ आया था ताकि अपने परिवार का पेट भर सके, अपने बच्चों को एक अच्छी ज़िंदगी दे सके।
उसे क्या पता था कि उसकी वो चाहत उसे मौत के इस कुएं में खींच लाएगी।"
मोनिका ने अपनी कांपती हुई उंगलियों से राम की काली पड़ चुकी चुनरी और सृष्टि के धुंधले पड़ चुके लॉकेट की तरफ इशारा किया।
मोनिका: "तुम्हारे पास कम से कम भगवान की कोई निशानी तो है। भले ही ये धुंधली पड़ गई हों, पर ये तुम्हें बचा रही हैं।
मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। मैं इस शैतान के लिए सबसे आसान शिकार हूँ। तुम लोग यहाँ से भाग जाओ... मुझे यहीं छोड़ दो, शायद मेरी मौत के बाद तुम दोनों को रास्ता मिल जाए।"
राम ने झपटकर मोनिका के कंधे पकड़े और उसे झकझोर दिया।
राम: "पागल मत बनो मोनिका! हार मत मानो। हाँ, हमारी चुनरी काली पड़ रही है, लॉकेट की चमक कम हो गई है, लेकिन माता रानी की शक्ति खत्म नहीं हुई है।
यह सिर्फ एक इम्तिहान है। कोई भी शैतानी ताकत उस ऊपर वाले से बड़ी नहीं हो सकती।"
सृष्टि: (नम आँखों के साथ) "राम सही कह रहा है, मोनिका। हम सातों साथ आए थे, और भले ही आज हम कम रह गए हों, पर हम तुम्हें यहाँ अकेला नहीं छोड़ेंगे।
हम सब साथ बचकर निकलेंगे। भगवान पर विश्वास रखो, वो हमारी रक्षा ज़रूर करेंगे। अगर हम ही अपनी हिम्मत हार गए, तो ये अंधेरा हमें जीत लेगा।"
शैतानी घाटी: महा-दानव का उदय
राम की उंगलियाँ अपनी कलाई पर बंधी उस काली पड़ चुकी चुनरी की गांठ खोल रही थीं।
उसके मन में बस एक ही विचार था—भले ही वह खुद असुरक्षित हो जाए, पर अपनी दोस्त मोनिका की कलाई पर यह रक्षा-कवच बांधकर उसकी जान बचा ले।
लेकिन कुदरत और शैतान को कुछ और ही मंज़ूर था।
इससे पहले कि राम चुनरी के दो टुकड़े कर पाता,
अचानक पूरी घाटी किसी पुराने ज्वालामुखी की तरह फटने लगी। एक ऐसा भयंकर तूफान उठा, मानो लाखों ऊँट एक साथ उस रेतीली पहाड़ी पर दौड़ रहे हों।
हवा में सिर्फ राख, सूखी मिट्टी और मौत का धुआं था। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, बस कानों को फाड़ देने वाला एक शोर था।
जैसे ही वह धूल और मिट्टी का गुबार थोड़ा छटा, राम और सृष्टि के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं और हलक से आवाज़ तक नहीं निकली।
उनके सामने खड़ा था—शैतानी घाटी का असली स्वामी!
वह एक विशालकाय, डरावना दानव था जिसका शरीर हज़ारों कटे हुए हाथों और इंसानी बालों के गुच्छों से बना था।