कलिंगेश की पत्नी अलीना ने भावुक होकर कहा, "मेरा बेटा हरमीत कुशल योद्धा ही नहीं बल्कि एक अच्छा पिता भी था. राघव ने कहा, पिता?"
कलिंगेश बोलता है, हाँ मेरे बेटे हरमीत की शादी परवास प्रदेश की राजकुमारी लीजा से हुई थी. उनका एक बेटा था. जिसका नाम वीर था. ओर उसके गले मे बचपन मे ही एक तलवार का लॉकेट पहना दिया था जो उसे उसके दादा कलिंगेश यानी मैंने दिया था.
तभी लिली ने कहा, फिर तुम दोनों ऐसे जिन्न कैसे बन गए?
तुम्हारा बेटा हरमीत और लीजा कहा है?राघव ने हैरानी से पूछा...
ये सुनकर कलिंगेश जिन्न उदासीन भाव मे कहता है "हम सभी इस हवेली मे हसीं खुशी से जीवन व्यतीत कर रहे थे कि तभी एक दिन कलिंग मे मारकेश नाम का तांत्रिक गुरु अपने कुछ तांत्रिक साथियो के साथ आता है. मारकेश ने काली तांत्रिक विद्या मे महारथ हासिल की हुई थी."
उसे किसी तरह पता चल जाता है, कलिंग के राजा के पास दिव्य अस्त्र ओर एक अलौकिक शक्तियों की विधि से भरा ग्रंथ है, इनको हासिल करने के उद्देशय से ही वह कलिंग आया था. कलिंगेश की बातो को चारो दोस्त बहुत ध्यान से सुन रहे थे.
वह बताता है कि एक दिन मारकेश ओर उसके साथी साधु का रूप धारण करके हवेली मे आ जाते है. और कहते है कि हवेली की सुद्धि के लिए हवन करना होगा. नहीं तो तुम्हारे परिवार पर संकट आ सकता है. तब तक कलिंगेश को मारकेश की सच्चाई का पता नहीं होता है, ओर हवन के लिए मान जाता है.
मारकेश रूपी साधू कहता है, इस हवन मे तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों को बैठना है. इस पर कलिंगेश की पत्नी अलीना बोलती है, "ठीक है बाबा..."उन्हें पता नहीं था कि ये तो उसकी चाल है। मारकेश रूपी साधू आगे कहता है, "हवन सामग्री और हवन मे लगने वाली सभी वस्तुओ को एकत्रित कर लेना. मैं कल आकर हवन कर दूंगा. ऐसा बोलकर मारकेश रूपी साधू अपने साथियो के साथ वापिस चला जाता है.
अगले दिन सुबह मारकेश दुबारा से साधू का रूप धारण करके अपने साथियो के साथ हवेली पहुंच जाता है. और कलिंगेश और उसकी पत्नी को बैठाकर हवन शुरू कर देता है। मारकेश ने अपनी गन्दी चाल को कामयाब करने के लिए कहा, "हवन खतम होने से पहले आंखे मत खोलना नहीं तो ये हवन भंग हो जायेगा." राघव और उसके दोस्त शांत होकर कलिंगेश की बाते सुन रहे थे.
मारकेश तभी अपने साथियो की ओर एक इशारा करता है तभी मारकेश के साथी हवन से चुप चाप उठते है, हवेली के उस कमरे को खोजते जहाँ पर धन, सम्पति और मूल्यवान वस्तुओ को रखा जाता है. मारकेश को लगा की दिव्य अस्त्र और ग्रंथ भी वही रखे होंगे, पर ऐसा नहीं था.
वे तांत्रिक रूपी साधू खजाने वाले कमरे मे चले जाते है. और उन अस्त्रों ओर ग्रंथ को ढूंढने लग जाते है कि तभी उनमे से एक साधू से कोई धातु की वस्तु नीचे गिर जाती है. जिसकी आवाज को खजाने के कमरे के पास से गुजर रहा हरमीत सुन लेता है. लीजा जोकि हरमीत की पत्नी है वह अपने बेटे वीर के साथ कमरे मे बैठी हुई थी.
वीर तब लगभग दो साल का था. हरमीत आवाज सुनकर खजाने वाले कमरे मे जाता है. वहाँ तांत्रिक रूपी साधू थे, जिनको देखकर हरमीत ने चिल्लाते हुए पूछा "तुम सब यहाँ इस कमरे मे क्या कर रहे हो? हरमीत की आवाज को लीजा सुन लेती है और वह भी उस कमरे मे पहुंच जाती है. लीजा ने हरमीत से पूछते हुए कहा, "यहाँ क्या हो रहा है, और ये साधू यहाँ क्या कर रहे है?
हरमीत ने कहा, "ये ऐसे नहीं बताएँगे हमें सैनिको को बुलाना होगा." इससे पहले की हरमीत सैनिको को बुलाता वे काली शक्तियों का इस्तेमाल करके उन दोनों को मार देते है. और फिर वे किसी दूसरे कमरे मे जाकर उन अस्त्र और ग्रंथ को ढूंढने लगते है. तभी खजाने के कमरे के पास से एक सैनिक गुजरता है. वहाँ उसे हरमीत और लीजा मरे हुए दिखाई देते है। वहाँ वीर भी अपने कमरे से निकलकर हवन के स्थान पर पहुंच जाता है.
तभी सैनिक जोर-जोर से चिलाते हुए हवन के स्थान पर आता है महाराज!महाराज! किसी ने हरमीत राजकुमार और रानी लीजा को मार दिया है. ये सुनकर कलिंगेश ने कहा, सैनिको जल्दी से जाओ और पूरी हवेली मे अच्छे से देखो कोई भी बचकर ना जा सके. राजा के ऐसा बोलते ही सैनिक पूरी हवेली मे देखने लग जाते है.
कुछ देर बाद सैनिक उन सभी साधुओ को पकडकर महाराज के पास ले आते है और कहते है महाराज ये सभी आपके कमरे मे थे, शायद कुछ ढूंढ रहे थे.
ऐसा बोलते ही मारकेश जल्दी से वीर के पास जाता है और उसे उठा कर हवेली से बाहर भागने लगता है. कलिंगेश उसका पीछा करते हुए कहता है, छोड दे वीर को नहीं तो मृत्यु दंड मिलेगा.
वह भागते-भागते हवेली से बाहर निकलता है और देखते ही देखते काली विद्या का इस्तेमाल करके कलिंगेश की आँखों के सामने से ही गायब हो जाता है. और साथ ही उसके पकडे हुए साथी भी गायब हो जाते है.
तभी कलिंगेश देखता है, वहाँ पर वही लॉकेट पडा हुआ था।जो उसने वीर को दिया था. वह उस लॉकेट को उठा कर अपने पास रख लेता है
यह सुनकर राघव ने कहा, तुम दोनो ऐसे जीन्न कैसे बन गए? इस बारे में तो कुछ पता ही नहीं चला....
कलिंगेश बोलता है, हम मारकेश के साथ जिस हवन मे बैठे थे वह कोई आम हवन नहीं था बल्कि एक तांत्रिक हवन था.
जोकि जिन्नात के सबसे शक्तिशाली जिन्न को बुलाने के लिए किया जा रहा था. उस हवन के बीच मे ही भंग होने के कारण ही हम दोनों को जिन्न का श्राप मिल जाता है.
"अच्छा तो तुम दोनों उस श्राप के कारण ही ऐसे बन जाते हो.... "राघव ने कहा। अलीना बोलती ह,ै हाँ और इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए ही हम तांत्रिक विद्या कर रहे थे और जिसके लिए हमें बलि की जरुरत थी.
ये सुनकर राघव बोलता है, इस श्राप से मुक्ति पाने का कोई दुसरा रास्ता भी तो होगा?
रास्ता है मगर वह इतना आसान नहीं है, वह रास्ता मायावी शक्तियों से भरा हुआ और जिसे पार कर पाना इतना आसान नहीं है, कलिंगेश ने बताते हुए कहा...
क्या है वह रास्ता? राघव ने दृढ़ता से पूछा ।