अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 11 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 11

अधूरी किताब – सीजन 2

एपिसोड 11 : अंतिम रक्षक

विशाल पुस्तकालय भय से काँप रहा था।

असंख्य किताबें हवा में तैर रही थीं।

अधूरी किताब के पन्ने अपने आप पलट रहे थे।

और उनके सामने खड़ी थी वह भयावह काली आकृति।

उसका आकार किसी इंसान जैसा नहीं था।

वह लगभग बीस फीट ऊँची थी।

उसका शरीर काले धुएँ से बना हुआ था।

आँखें जलते हुए अंगारों की तरह चमक रही थीं।

और उसकी आवाज सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे हजारों आत्माएँ एक साथ चीख रही हों।

"कोई भी कहानी बिना कीमत चुकाए पूरी नहीं होती..."

उसकी गर्जना पूरे पुस्तकालय में गूँज उठी।

अनन्या के हाथ काँप गए।

उसने साधु की ओर देखा।

"यह कौन है?"

साधु के चेहरे पर चिंता थी।

"यह अधूरी किताब का अंतिम रक्षक है।"

"अंतिम रक्षक?"

"हाँ।"

साधु ने गहरी साँस ली।

"जब भी कोई अधूरी किताब की असली शक्ति पाने की कोशिश करता है..."

"तो यह जाग जाता है।"

"इसका काम है यह तय करना कि कौन कहानी के अंत तक पहुँचने योग्य है।"

आदित्य ने गुस्से से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।

"मैं सदियों से इस किताब के साथ हूँ।"

"मुझे कोई नहीं रोक सकता।"

काली आकृति की आग जैसी आँखें उसकी तरफ घूमीं।

"तुम सबसे अयोग्य हो।"

आदित्य का चेहरा कठोर हो गया।

"क्या कहा?"

"तुमने प्रेम को स्वार्थ बना दिया।"

"तुमने अपनी बेटी के लिए संसार को खतरे में डाल दिया।"

"तुम कहानी के नायक नहीं..."

"उसके दुखद खलनायक हो।"

यह सुनकर आदित्य के चेहरे पर दर्द उभर आया।

लेकिन वह कुछ नहीं बोला।

क्योंकि कहीं न कहीं वह जानता था कि यह सच था।

अचानक रक्षक ने अपना विशाल हाथ उठाया।

पूरे पुस्तकालय में सुनहरी बिजली दौड़ गई।

और अगले ही पल...

अनन्या, आर्या, अन्वी और आदित्य चार अलग-अलग रोशनी के घेरे में कैद हो गए।

कोई भी हिल नहीं पा रहा था।

"अंतिम निर्णय से पहले..."

रक्षक बोला।

"सत्य की परीक्षा होगी।"

"जो अपने सत्य को स्वीकार करेगा..."

"वही आगे बढ़ेगा।"

सबसे पहले आर्या के चारों ओर लाल रोशनी फैल गई।

उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी उभर आई।

विवान।

उसका प्रेम।

उसकी मौत।

उसका अकेलापन।

उसकी आत्मा की कैद।

आर्या रोने लगी।

सदियों से उसने अपने दर्द को अपने अंदर दबाकर रखा था।

रक्षक की आवाज गूँजी—

"तुम्हारा सबसे बड़ा सत्य क्या है?"

आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

"मैंने कभी विवान को नहीं छोड़ा।"

"मैं आज भी उसका इंतजार कर रही हूँ।"

"मैं मुक्त नहीं होना चाहती थी।"

"मैं सिर्फ उसे वापस चाहती थी।"

पूरा पुस्तकालय शांत हो गया।

फिर रक्षक बोला—

"तुमने सत्य स्वीकार कर लिया।"

लाल रोशनी गायब हो गई।

आर्या मुक्त हो गई।

अब अन्वी की बारी थी।

सफेद रोशनी उसके चारों ओर चमकने लगी।

उसके सामने उसका बचपन दिखाई देने लगा।

अपने पिता के साथ बिताए पल।

उनकी कहानियाँ।

उनका प्रेम।

उसकी बीमारी।

उसकी मौत।

रक्षक ने पूछा—

"तुम्हारा सबसे बड़ा सत्य क्या है?"

अन्वी मुस्कुराई।

उसकी आँखों में आँसू थे।

"मैं कभी अपने पिता से नाराज़ नहीं थी।"

"मैं जानती हूँ उन्होंने जो किया प्रेम में किया।"

"लेकिन मैं कभी वापस आना नहीं चाहती थी।"

"मैं शांति में थी।"

"उन्हें ही मुझे छोड़ना नहीं आया।"

आदित्य का सिर झुक गया।

उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

रक्षक की आवाज फिर गूँजी—

"तुमने सत्य स्वीकार कर लिया।"

सफेद रोशनी भी समाप्त हो गई।

अब आदित्य की बारी थी।

काला प्रकाश उसके चारों ओर फैल गया।

उसके सामने उसका पूरा जीवन उभर आया।

उसकी बेटी।

उसकी खुशी।

उसका दुःख।

उसका पागलपन।

और वह रात...

जब उसने मृत्यु को चुनौती दी थी।

"तुम्हारा सबसे बड़ा सत्य क्या है?"

रक्षक ने पूछा।

आदित्य कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

सदियों बाद पहली बार।

"मैं अपनी बेटी को बचाना नहीं चाहता था।"

उसने काँपती आवाज में कहा।

"मैं खुद को बचाना चाहता था।"

पूरा पुस्तकालय एकदम शांत हो गया।

"मैं अकेला हो गया था।"

"मैं उसके बिना जी नहीं पा रहा था।"

"मैंने प्रेम के नाम पर स्वार्थ किया।"

"और उसी स्वार्थ ने मुझे राक्षस बना दिया।"

यह कहते ही आदित्य घुटनों पर गिर पड़ा।

उसकी आवाज टूट गई।

"मैं हार गया।"

"बहुत पहले हार गया था।"

पहली बार काली आकृति की आँखों की आग धीमी हुई।

"तुमने सत्य स्वीकार कर लिया।"

आदित्य के चारों ओर का अंधेरा गायब होने लगा।

उसका चेहरा बदलने लगा।

सदियों बाद वह फिर इंसान जैसा दिखाई देने लगा।

अब केवल अनन्या बची थी।

नीली रोशनी उसके चारों ओर चमक रही थी।

लेकिन उसके सामने कोई दृश्य नहीं उभरा।

कुछ भी नहीं।

सिर्फ खालीपन।

"यह क्या है?"

उसने घबराकर पूछा।

रक्षक कुछ क्षण उसे देखता रहा।

फिर बोला—

"तुम्हारा सत्य अभी बना नहीं है।"

"तुम अतीत नहीं हो।"

"तुम भविष्य हो।"

अचानक अधूरी किताब हवा में चमक उठी।

उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।

और एक नया संदेश उभरा—

"अंतिम चुनाव।"

"एक आत्मा।"

"एक कहानी।"

तभी पुस्तकालय के बीचोंबीच एक विशाल दरार खुल गई।

उस दरार के भीतर सुनहरी रोशनी थी।

लेकिन साथ ही भयानक अंधकार भी।

मानो दो संसार आपस में टकरा रहे हों।

रक्षक ने कहा—

"अब तीनों आत्माओं को एक होना होगा।"

"लेकिन निर्णय अनन्या करेगी।"

अनन्या का दिल बैठ गया।

"मैं?"

"हाँ।"

"तुम तय करोगी कि कौन अस्तित्व में रहेगा।"

आर्या ने उसकी तरफ देखा।

अन्वी मुस्कुराई।

आदित्य चुप खड़ा रहा।

सबकी निगाहें अब उसी पर थीं।

उसी क्षण अधूरी किताब का आखिरी खाली पन्ना भरना शुरू हो गया।

धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे—

"लेखक समाप्त हो चुका है..."

"अब नई लेखिका का चुनाव होगा..."

अनन्या की साँस रुक गई।

नई लेखिका?

क्या इसका मतलब...

अधूरी किताब उसे चुन चुकी थी?

और तभी...

उसके हाथ में अचानक एक पुरानी स्याही वाली कलम प्रकट हुई।

वही कलम...

जिससे कभी आदित्य ने कहानियाँ लिखी थीं।

रक्षक ने गंभीर स्वर में कहा—

"अब तुम जो लिखोगी..."

"वही सत्य बन जाएगा।"

पूरा पुस्तकालय स्तब्ध रह गया।

क्योंकि अब पहली बार...

अधूरी किताब का भविष्य किसी और के हाथ में था।

और अनन्या को तय करना था—

कहानी का अंत क्या होगा।