अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 3 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अमावस्या की काली रात एक खोफ या श्राप - 3

यह सुनते ही पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया। बुजुर्गों ने अपने सिर पकड़ लिए। यह महज़ पक्षियों की मौत नहीं थी, यह देवपुर के विनाश की शुरुआत थी। ग्रामीणों को समझ आ गया था कि हवेली में आए नए मेहमानों और उनके शोर ने उस सोई हुई बला को जगा दिया है।
तभी हवेली की छत पर खड़े कृष्ण और उसके दोस्तों ने नीचे मचे इस शोर को देखा। कृष्ण ने ऊपर से ही चिल्लाकर पूछा, "क्या हुआ काका? यह आदमी इतना चिल्ला क्यों रहा है?"
अध्याय: मूक चीखें और दबे पाँव आती मौत
पूरा देवपुर गाँव उस समय जैसे पत्थर का हो गया। सखू की बातें सुनकर ऐसा लगा मानो गाँव वालों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो। हर चेहरा सफेद पड़ चुका था और सबकी नज़रें सहमी हुई उस आलीशान हवेली की ओर उठ रही थीं।
वहाँ खड़ा हर ग्रामीण मन ही मन जानता था कि यह अनर्थ क्यों हो रहा है। कल रात का वह शोर, वह तेज़ संगीत और उन नए मेहमानों का वह अहंकार—इस सबने देवपुर की सदियों पुरानी शांति को भंग कर दिया था। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सामने जाकर कृष्ण या रश्मि से कुछ कह सके। आखिर विजय नारायण खुराना का रसूख इतना बड़ा था कि गाँव वाले उनके आगे ज़ुबान खोलना तो दूर, आँख उठाकर देखने से भी डरते थे।
गाँव का एक बुजुर्ग अपनी लाठी टेकते हुए बुदबुदाया, "साहब लोग तो शहर चले जाएंगे, लेकिन भुगतना तो हम गरीब ग्रामीणों को ही पड़ेगा। ये पक्षियों की मौत कोई बीमारी नहीं है, ये उस 'भूखी दुल्हन' का पहला निवाला है। उसने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है।"
गाँव के चौक पर सन्नाटा ऐसा था कि अगर एक सुई भी गिरे तो आवाज़ सुनाई दे। लोग अपने बच्चों को घरों के अंदर खींचने लगे। जो बाज़ार अभी खुला ही था, वह धीरे-धीरे फिर से बंद होने लगा। सबको लग रहा था कि आज का सूरज ढलने से पहले कुछ और भी भयानक होने वाला है।
उधर हवेली के बरामदे में खड़े कृष्ण और उसके दोस्त इस पूरे मंज़र को एक तमाशे की तरह देख रहे थे। मानव ने सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहा, "देखो यार, इन गाँव वालों को... ज़रा से पक्षी क्या मरे, जैसे कयामत आ गई हो। कितने अनपढ़ और अंधविश्वासी हैं ये लोग!"
रश्मि को थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन कृष्ण के आत्मविश्वास के आगे उसने भी अपनी शंका दबा दी।
अध्याय: कांच के टुकड़े और खूनी चीख
हवेली की तीसरी मंज़िल, जो सालों से बंद पड़ी थी, आज रोशनी से जगमगा रही थी। वहाँ ठहरे थे मानव और आकृति, जिनकी अभी सिर्फ सगाई हुई थी। वे अपनी ही धुन में मगन थे, दुनिया के डर से बेखबर। मानव ने आकृति का हाथ थामकर उसे अपने करीब खींचा, वे एक-दूसरे की आँखों में खोए हुए थे। उनके ठीक सामने दीवार पर एक विशाल, आदमकद पुराना आइना (शीशा) लगा हुआ था, जिसमें उनका अक्स साफ दिख रहा था।
जैसे ही वे एक-दूसरे के और करीब आए, अचानक कमरे का तापमान गिरकर बर्फ जैसा ठंडा हो गया। मानव को महसूस हुआ कि आइने के भीतर उनकी परछाइयों के पीछे कोई तीसरी धुंधली आकृति खड़ी है—एक औरत, जिसके सिर पर फटा हुआ लाल घूँघट था।
इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, वह विशाल आइना बिना किसी बाहरी दबाव के, एक ज़ोरदार धमाके के साथ चकनाचूर हो गया। 'तड़तड़ाहट' की वह आवाज़ इतनी तेज़ थी मानो कोई बम फटा हो। कांच के नुकीले टुकड़े गोलियों की तरह पूरे कमरे में बिखर गए।
तभी, तीसरी मंज़िल के उस कमरे से एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख निकली, जिसने नीचे बैठे कृष्ण, रश्मि और बाकी दोस्तों के खून जमा दिए। वह चीख साधारण डर की नहीं थी, उसमें असहनीय दर्द और मौत का साया था।
नीचे हॉल में सन्नाटा छा गया। कृष्ण का हाथ में पकड़ा हुआ ड्रिंक का गिलास ज़मीन पर गिरकर टूट गया। रश्मि के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे और फिर बदहवास होकर ऊपर की ओर भागे।
अध्याय: सन्नाटे की दहशत और पत्थर हुई आँखें
कृष्ण, रश्मि, सुमित और सृष्टि सीढ़ियाँ लांघते हुए जब तीसरी मंज़िल के उस कमरे में पहुँचे, तो वहाँ का मंज़र देखकर उनके कदम वहीं जम गए। कमरे का दरवाज़ा पहले से ही आधा खुला था, और अंदर का नज़ारा किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं था।
पूरे फर्श पर कांच के हज़ारों बारीक टुकड़े किसी बिछौने की तरह फैले हुए थे। कमरे के बीचों-बीच रखा भारी पलंग अपनी जगह से थोड़ा खिसका हुआ था। पलंग के एक सुदूर कोने में मानव और आकृति एक-दूसरे से चिपककर ऐसे बैठे थे, जैसे वे खुद को छोटा करके गायब कर देना चाहते हों।
मानव का चेहरा, जो हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता था, अब राख की तरह सफेद पड़ चुका था। उसकी आँखें फटी की फटी थीं और वह बिना पलक झपकाए सामने की टूटी हुई आइने वाली दीवार को घूर रहा था। आकृति का बुरा हाल था, वह मानव की बांहों में अपना चेहरा छुपाए बुरी तरह कांप रही थी, और उसके गले से सिसकियों के अलावा कोई शब्द नहीं निकल रहा था।
कृष्ण चिल्लाकर उनके पास पहुँचा, "मानव! आकृति! क्या हुआ भाई? ये कांच कैसे टूटा? तुम लोग ऐसे क्यों बैठे हो?"
उसने मानव का कंधा हिलाया, लेकिन मानव का शरीर किसी पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। ऐसा लग रहा था मानो उसने मौत को बहुत करीब से देख लिया हो और उसकी रूह अभी भी उसी खौफनाक पल में फंसी हो।
काफी देर बाद, मानव के सूखे होठों से सिर्फ एक घरघराहट भरी आवाज़ निकली, "वो... वो लाल जोड़ा... वो आइने में नहीं थी... वो हमारे पीछे खड़ी थी..."
अध्याय: झूठी तसल्ली और अनजाना खतरा
कृष्ण ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए मानव के कंधे पर हाथ रखा। उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "अरे यार मानव, तुम तो डर के मारे बिल्कुल बच्चे बन गए! देखो, यह हवेली बहुत पुरानी है। पुरानी इमारतों में हवा के दबाव (Air Pressure) या लकड़ी के ढांचे के हिलने से कांच अक्सर चटक जाते हैं। और तुम दोनों पहले से ही डरे हुए थे, इसलिए तुम्हें मतिभ्रम (Hallucination) हो गया होगा। चलो, अब ये शक्लें साफ करो, यहाँ कुछ नहीं है।"