हम फिर से मिले मगर इस तरह - 28 MASHAALLHA KHAN द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हम फिर से मिले मगर इस तरह - 28

💓हम फिर से मिले मगर इस तरह 💓

🌹ऐपीसोड़ - 28🌹


अरुण इतने दिनों से जो उस एक्सीडेंट के भयानक सपने देख रहा था, अब जाकर वह उन सपनों की असलियत जान पाया था। वह कोई सपना नहीं, बल्कि एक हकीकत था—एक सच में हुआ एक्सीडेंट, जो यहीं इन पहाड़ों और जंगलों से घिरे इलाके में हुआ था। उस हादसे का शिकार वो और रूपाली हुए थे, और शायद उसने उस एक्सीडेंट में रूपाली को हमेशा के लिए खो दिया था।


​इस बात के लिए अब वह खुद को जिम्मेदार मान रहा था। 'मैं उसे बचा सकता था... मैं उसे बचा सकता था...'—यही बात उसका दिल बार-बार दोहरा रहा था। इस हादसे की खौफनाक सच्चाई को जानकर और रूपाली को एक आत्मा के रूप में देखकर अब उसे अपने आप से घिन आ रही थी।

​अरुण पूरी तरह से टूट चुका था। वह एक बेजान लाश की तरह कमरे की खिड़की के सामने खड़ा था। बाहर से आती ठंडी हवा के झोंके, पक्षियों के चहकने की आवाजें, पेड़ों के पत्तों और टहनियों पर गिरते बर्फ के छोटे-छोटे कण उस जगह की खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। यह एक ऐसा नजारा था जो किसी के भी उदास मन में खुशियों का उजाला भर दे।

​मगर इस सब से परे, अरुण को इस समय न तो किसी खूबसूरती की परवाह थी, न किसी खुशी की और न ही किसी ख्वाहिश की तमन्ना। वह उदास, बेजान, असहाय और भीतर से पूरी तरह बिखर चुका था। उसकी जिंदगी पहले ही दुखों और तकलीफों के साए में गुजरी थी। फिर उसकी जिंदगी में खुशियों की थोड़ी सी धूप आरुषि लेकर आई थी, लेकिन उसने आरुषि का भी दिल दुखाया और आरुषि ने उसका साथ छोड़ दिया। उसके बाद अंधकार से भरी उसकी जिंदगी में रूपाली नाम के उजाले ने दस्तक दी थी। उसकी जिंदगी जगमगाने लगी थी, उसका जहां खुशियों से भर गया था... मगर दुर्भाग्य देखो, उस उजाले को भी उसने अपने ही हाथों से खत्म कर दिया था।

​रूपाली इस दुनिया से जा चुकी है, इस कड़वे सच को स्वीकार करते हुए वह अब उस रूपाली के बारे में सोच रहा था जो अब एक भटकती हुई आत्मा थी। एक ऐसी आत्मा, जो अब भी उसके जीवन को अंधकार से मुक्त करने की कोशिश कर रही थी; जो उससे आज भी उतना ही प्यार करती थी, जितना वह उसके जिंदा रहते हुए करती आई थी।

​अरुण में अब इतनी हिम्मत बाकी नहीं थी कि वह रूपाली का सामना कर पाए। उसे इस रूप में देख पाना उसके लिए असहनीय था। वह खुद को रूपाली के प्यार का, उसकी खुशियों का और उसकी जिंदगी का गुनहगार मान रहा था, जिसे उसने असमय ही उससे छीन लिया था। वह खुद को इस महादोष के लिए कभी माफ नहीं कर पाएगा।

​फिर भी, न जाने कहां से थोड़ी सी हिम्मत जुटाकर अरुण रूपाली से मिलने के लिए निकल पड़ा। वह कमरे से सीधा उस शांत तालाब की ओर गया। वहां पहुंचकर उसने देखा कि रूपाली हमेशा की तरह उसी बेंच पर तालाब के सामने बैठी हुई थी। वह उस वक्त बहुत प्यारी, मासूम और किसी छोटी बच्ची की तरह लग रही थी। गिरती हुई बर्फ के कणों ने वहां मौजूद हर चीज को अपनी आगोश में ले लिया था, और रूपाली उन्हीं बर्फ के कणों से खेलने में मगन थी। वह न सिर्फ खुश नजर आ रही थी, बल्कि उसका चेहरा बुरी तरह खिला हुआ था। उस वक्त उसके चेहरे पर गम, दर्द, उदासी या परेशानी की एक शिकन तक मौजूद न थी।
​अरुण जब से उससे दोबारा मिला था, यह दूसरी बार था जब उसने रूपाली को इतना खुश देखा था। कल जब वह ऊपर पहाड़ों पर किसी बच्चे की तरह बर्फ से खेल रही थी, तब भी वह बहुत खुश थी। मगर आज की उसकी खुशी कुछ अलग ही नजर आ रही थी—जैसे उसे उस चीज की तलाश पूरी हो गई हो, जिसे वह कब से ढूंढ रही थी।

​तभी रूपाली की नजर अरुण पर पड़ी, जो उससे थोड़ी दूरी पर खड़ा चुपचाप उसे ही देख रहा था। उसे देखते ही वह भागकर उसके पास आई, उसके दोनों हाथ थामे और गोल-गोल घूमते हुए चहक कर बोली, "अरुण! अरुण! मैं आज बहुत खुश हूँ!"

​"अरे... अरे... तुम्हारी खुशी तो दिख रही है, पर पहले यह गोल-गोल घूमना बंद करो यार, मुझे चक्कर आ रहा है!" अरुण ने उसे थामते हुए अपनी उदासी को छुपाने की कोशिश की।

​रूपाली तुरंत रुकी और जीभ दांतों तले दबाते हुए बोली, "ओह, सॉरी-सॉरी! मैं कुछ ज्यादा ही एक्साइटेड हो गई थी!"

​"ज्यादा नहीं, बहुत ज्यादा!" अरुण ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "वैसे, तुम आज इतनी खुश क्यों हो?"

​रूपाली ने अपनी उंगली होंठों पर रखी, "उम्म्म्... वह मैं तुम्हें अभी नहीं बता सकती! लेकिन बहुत जल्दी बताऊंगी!"

​अरुण ने अपनी नजरें चुराते हुए कहा, "ठीक है फिर, मत बताओ। मुझे क्या करना है जानकर? जाओ, जाकर बर्फ से खेलो।"

​"वो... वो, अरुण..." रूपाली इतना ही बोल पाई थी कि अचानक उसका शरीर फिर से धुंधला पड़ने लगा। वह हवा में गायब होने लगी और फिर कुछ सेकंड बाद वापस अपनी उसी सामान्य अवस्था में आ गई।

​इस बार रूपाली ने भी इस बदलाव को गहराई से महसूस किया था, जिससे उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा तुरंत उदासी में बदल गया। लेकिन उसकी उदासी का कारण यह नहीं था कि उसका शरीर धुंधला पड़ा था—यह तो वह पहले भी कई बार महसूस कर चुकी थी। उसकी उदासी की असली वजह अरुण था, जिसने उसे इस तरह अपनी आंखों के सामने गायब होते हुए देख लिया था।

​रूपाली ने तुरंत अपने चेहरे के हाव-भाव बदले, ताकि अरुण को यह दिखा सके कि कुछ नहीं हुआ था। मगर अरुण सब देख चुका था। रूपाली को अब समझ आ गया था कि अरुण को सब पता चल चुका है, और वह सिर्फ उसकी खुशी के लिए अब तक इस सच को छिपाने का नाटक कर रहा था।

​"तो... तुम्हें सब पता चल गया है?" रूपाली ने सीधे अरुण की आंखों में देखते हुए भारी आवाज में पूछा।

​"क्या... क्या पता चल गया है?" ….अरुण ने चेहरे पर एक नकली, बेजान मुस्कान लाते हुए बात को टालना चाहा।

​रूपाली ने उसका हाथ झटकते हुए कहा, "तुम्हें इस तरह बेवजह मुस्कुराने की जरूरत नहीं है अरुण! मुझे पता है कि तुम सब जान चुके हो। हमारे साथ क्या हुआ था... मेरी यह हालत कैसे हुई... वह भयानक एक्सीडेंट... और उसके बाद..."

​"और उसके बाद मैंने तुम्हें खो दिया!" अरुण की आंखों से आंसू छलक पड़े। वह पास में ही मौजूद एक बड़े पेड़ के तने से अपनी पीठ टिकाकर जमीन पर बैठ गया और खुद को फिर से उसी गहरे गम के समंदर में डूबने दिया।
​रूपाली धीरे से उसके पास आई और सांत्वना देने के लिए उसके सिर पर अपना हाथ फेरने लगी।

​"मैंने तुम्हें खो दिया रूपाली... मैंने तुम्हें खो दिया! और इसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ! मेरी ही वजह से तुम्हारी जिंदगी खत्म हो गई।" अरुण रोते हुए चीखा, "आई एम अ कर्स टू एवरीबडी... आई एम द ब्लडी कर्सड!"

जो हर बार किसी न किसी की जिंदगी को बर्बाद कर देता है। और इस बार तो मैंने एक इतनी खूबसूरत जिंदगी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया... वह भी अपने प्यार को! रूपाली, मैं खुद को इस जन्म में कभी माफ नहीं कर पाऊंगा..." वह अपने शब्दों में अपना पूरा दर्द उड़ेल रहा था। उसकी आँखें नम थीं और दिल असहनीय दुख से फटा जा रहा था।

​रूपाली ने उसे सांत्वना देते हुए कहा…. "खुद को कसूरवार मानना बंद करो अरुण। मैंने तुम्हें अब तक यह सच इसीलिए नहीं बताया था क्योंकि मैं जानती थी कि तुम खुद को दोषी ठहराने लगोगे। इस सब में तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। कसूर तो उस वक्त का था, उस हादसे का था जिसने हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया। मैं तो आज तक उस खौफ से बाहर नहीं निकल पाई हूँ..."

​"मगर जो खौफ मुझे पल-पल तड़पा रहा है, वह कुछ और है रूपाली!" अरुण ने तड़पते हुए कहा, "अस्पताल की वह सफेद दीवारें, वे मशीनों की डरावनी आवाजें, और मेरे सामने तुम्हारा वह आखिरी सांस लेना... मैंने अपनी आंखों से तुम्हें दम तोड़ते देखा है रूपाली! तुम ही बताओ, मैं इस सच के साथ खुद को कैसे संभालूं?"

​रूपाली ने गहरी सांस ली और बड़ी संजीदगी से कहा, "मगर यह वह सच नहीं है जो तुम सोच रहे हो अरुण। मैं मरी नहीं हूँ... मैं जिंदा हूँ! और तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, देखो मुझे। असल में मैं कहीं और हूँ... मतलब, तुम पहले मेरी पूरी बात सुनो..." रूपाली उसे कुछ बेहद जरूरी बात बताना चाहती थी।

​अरुण उस पेड़ के सहारे खड़ा हुआ और साथ में रूपाली भी उठ खड़ी हुई। फिर अरुण ने अपने दोनों हाथ रूपाली के कंधों पर रखे और उसकी आंखों में गहराई से देखते हुए कहा, "बस करो रूपाली, अब बस करो। अब तुम्हें यह मान लेना चाहिए कि तुम इस दुनिया से जा चुकी हो। और यह जो तुम इस वक्त मेरे सामने हो, वह तुम्हारी आत्मा है... जो न जाने किस वजह से इस लोक में भटक रही है। शायद... शायद मुझसे अपना बदला लेने के लिए तुम अब तक यहीं रुकी हुई हो।" अरुण उसे इस कड़वी हकीकत का अहसास कराना चाहता था।

​"प्लीज, स्टॉप दिस नॉनसेंस!" रूपाली झल्ला उठी, उसकी आवाज में बेबसी थी, "कुछ भी मत बोलो तुम! भला मैं तुमसे बदला क्यों लूंगी? जब मैं तुमसे कह रही हूँ कि मैं अभी जिंदा हूँ, तो तुम्हें मुझ पर यकीन क्यों नहीं हो रहा है? क्यों अरुण, क्यों?"

​"क्योंकि मैंने तुम्हें अपनी इन आंखों से देखा है रूपाली!" अरुण ने एक लंबी और ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा, "मैंने तुम्हें अपने पापा के शरीर के आर-पार निकलते देखा है। मैंने तुम्हें अपने पापा के सामने गिड़गिड़ाते हुए देखा था जब तुम उनसे कह रही थीं कि तुम जिंदा हो, जबकि वे तुम्हें देख तक नहीं पा रहे थे। और इतना ही नहीं, मैं तुम्हारे बिना इस जंगल, इस तालाब और इस वुडन हाउस के अलावा कहीं और नहीं जा सकता। कल ही तो मैंने पहाड़ों की बर्फ के बीच तुम्हारे शरीर को धीरे-धीरे गायब होते देखा था... क्या अब भी तुम यही कहोगी कि तुम जिंदा हो? काश... काश तुम सच में जिंदा होतीं, रूपाली!"

​रूपाली की आंखों में एक अजीब सी चमक और जिद आ गई, "हाँ अरुण, हाँ! मैं बार-बार कहूँगी कि मैं जिंदा हूँ। और तुमने कहा न कि कल मैं वहां पहाड़ों पर गायब हो गई थी? तो रुको, आज मैं तुम्हें दिखाती हूँ कि असल में गायब कौन हो रहा था और सच क्या है!"

​इतना कहते ही रूपाली ने पास ही जमीन पर पड़ा हुआ लकड़ी का एक नुकीला टुकड़ा उठाया और तेजी से अरुण की तरफ बढ़ी।

​"यह... यह क्या कर रही हो रूपाली?" अरुण ने घबराकर पूछा।

​"दिखाती हूँ!" इतना कहकर, इससे पहले कि अरुण कुछ समझ पाता या खुद को संभाल पाता, रूपाली ने वह नुकीला टुकड़ा पूरे वेग से अरुण के सीने में उतार दिया और फिर......





कहानी जारी है......✍️