दिग्विजय सिंह, रुको!"
मंत्री के कदम ठिठक गए। सुरक्षाकर्मी और आसपास खड़े नेता हैरान रह गए। अग्निश उनकी आँखों में आँखें डालकर करीब आए।
और ठंडे लहजे में बोले, "सुना है, ठीक एक हफ्ते पहले इसी क्लब में मेरे बेटे भवनीश और तुम्हारे बेटे 'अपराजित सिंह' के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ था। बात हाथापाई तक पहुँच गई थी। कहीं यह सब तुम्हारे बेटे की ही करतूत तो नहीं?"
वहाँ मौजूद हर शख्स की सांसें थम गईं। एक शक्तिशाली पिता ने दूसरे शक्तिशाली पिता पर सीधा वार किया था।
दिग्विजय सिंह के चेहरे पर एक पल के लिए शिकन आई, पर उन्होंने तुरंत खुद को संभाल लिया। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। वे पलटकर बोले, "अग्निश जी, दुख में इंसान अपनी सुध-बुध खो बैठता है,
पर आप तो बहकी-बहकी बातें करने लगे। आप मेरे बेटे पर इल्जाम लगा रहे हैं? आपको शायद जानकारी नहीं है, अपराजित तो पिछले तीन हफ्तों से बैंकॉक (Bangkok) में है। वह यहाँ था ही नहीं, तो झगड़ा कैसा और कत्ल कैसा?"
मंत्री ने अपनी घड़ी की ओर देखा और आगे बढ़ते हुए कहा, "जज्बात में आकर दुश्मनी मोल मत लीजिए। अपने बेटे की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कीजिये, जांच तो पुलिस कर ही रही है।"
मंत्री की गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई, लेकिन अग्निश वहीं खड़े रहे। उन्हें दिग्विजय की बातों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था। उन्हें शक था कि 'बैंकॉक' वाली बात सिर्फ एक कागजी झूठ (Alibi) है जिसे बहुत सफाई से गढ़ा गया।
नजीमा की रहस्यमयी खामोशी
भवनीश की चिता ठंडी हो चुकी थी, लोग अपने-अपने घरों को लौट चुके थे, लेकिन अग्निश चट्टोपाध्याय की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। उन्होंने गौर किया कि उस पूरी भीड़ में वह एक चेहरा गायब था, जो भवनीश के सबसे करीब था— नजीमा।
नजीमा न तो क्लब से मिली बदहवासी के बाद अस्पताल में दिखी, न ही वह अंतिम संस्कार में आई। यहाँ तक कि उसने शोक जताने के लिए एक फोन तक नहीं किया। वह लड़की, जो साए की तरह भवनीश के साथ रहती थी, अचानक जैसे हवा में विलीन हो गई थी।
अग्निश ने अपने वफादार आदमी, समीर को बुलाया और धीमी आवाज़ में कहा, "नजीमा कहाँ है? जो लड़की कल रात तक मेरे बेटे की लाश के पास बेसुध पड़ी थी, आज उसे जमीन खा गई या आसमान? वह न श्मशान में दिखी, न उसके घर पर कोई खबर है।"
समीर ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "सर, मैंने पता लगाने की कोशिश की। नजीमा के घर पर ताला लटका है। उसके माता-पिता भी शहर से बाहर बताए जा रहे हैं।
सबसे अजीब बात यह है कि क्लब के पास लगे उस गली के सीसीटीवी कैमरों में नजीमा को एक सफेद रंग की एसयूवी (SUV) में बैठते हुए देखा गया है, लेकिन वह गाड़ी उसकी नहीं थी।"
अग्निश के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्हें समझ आ गया कि नजीमा सिर्फ गायब नहीं हुई है, उसे गायब किया गया है या फिर वह किसी गहरे डर की वजह से छिप गई है।
वह इस कत्ल की सबसे बड़ी गवाह थी, और शायद वही जानती थी कि क्या अपराजित सिंह सच में बैंकॉक में था या उस रात उसी वीआईपी लाउंज में मौजूद था।
अग्निश ने अपनी सिगार का धुआँ हवा में छोड़ा और कहा, "पूरा कोलकाता छान मारो। नजीमा को ढूंढो। वह इस पहेली की आखिरी कड़ी है। अगर वह हाथ लग गई, तो दिग्विजय सिंह का झूठ भी बेनकाब हो जाएगा।"
हकीम साम्राज्य का रहस्य
दो दिन बीत चुके थे। नजीमा का फोन लगातार 'स्विच ऑफ' आ रहा था। अग्निश की बेचैनी अब गुस्से में बदल चुकी थी। उन्होंने अपने एक पुराने भरोसेमंद नौकर को नजीमा के लैंडलाइन पर फोन लगाने का इशारा किया।
पहली बार घंटी बजी... कोई जवाब नहीं।
दूसरी बार घंटी बजी... सन्नाटा रहा।
तीसरी बार जैसे ही घंटी बजी, दूसरी तरफ से एक भारी और ठंडी आवाज़ आई— "हेलो?"
अग्निश ने झपटकर फोन अपने हाथ में लिया और दहाड़ते हुए बोले, "अब्दुल हकीम कहाँ है? और तेरी बेटी नजीमा कहाँ छिपी है?"
सामने से जवाब देने वाला कोई मामूली नौकर नहीं था, बल्कि अब्दुल हकीम का निजी अंगरक्षक था। उसने बस इतना कहा, "साहब शहर में नहीं हैं, और नजीमा बीवी की तबीयत ठीक नहीं है।" और फोन कट गया।
अग्निश का शक यकीन में बदल गया। अब्दुल हकीम—कोलकाता का वो नाम जिसने पूरी 'सिटी ऑफ जॉय' की स्काईलाइन बदल दी थी।
अब्दुल हकीम कंस्ट्रक्शन कंपनी का मालिक, जिसकी पहुँच ज़मीन के पाताल से लेकर सत्ता के गलियारों तक थी। वह कोई साधारण बिल्डर नहीं था; उसे पता था कि शहर की किस ज़मीन के नीचे कौन सा राज़ दफन है।
अग्निश मन ही मन सोचने लगे— 'अब्दुल हकीम और दिग्विजय सिंह (मंत्री) के बीच पुराने कारोबारी रिश्ते हैं। क्या हकीम ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके अपनी बेटी को इस केस से दूर कर दिया है?
या फिर नजीमा ने उस रात कुछ ऐसा देख लिया है जो हकीम और मंत्री, दोनों के साम्राज्य को तबाह कर सकता है?'
अग्निश ने समीर की तरफ देखा और कहा, "गाड़ी निकालो। हम खुद हकीम के बंगले जाएंगे। अगर दरवाज़ा प्यार से नहीं खुला, तो चट्टोपाध्याय का तरीका शहर को पता है।"
हकीम विला: खाली महल का सन्नाटा
अग्निश और समीर की गाड़ी तेज़ रफ़्तार से अब्दुल हकीम के आलीशान बंगले के सामने रुकी। वह घर नहीं, बल्कि लोहे और कंक्रीट का एक अभेद्य किला था।
जैसे ही बड़ा स्वचालित (automatic) दरवाज़ा खुला, अग्निश बिना रुके अंदर दाखिल हुए। घर में अजीब सी खामोशी छाई थी, वैसी खामोशी जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले होती है।
वे सीधे लिफ्ट से तीसरी मंज़िल पर पहुँचे। वहाँ के आलीशान हॉल में वही नौकर खड़ा था जिससे फोन पर बात हुई थी। समीर ने आगे बढ़कर उस नौकर की गर्दन दबोच ली और उसे दीवार से सटा दिया।
अग्निश की आवाज़ में बिजली जैसी कड़क थी, "बोल! तेरा मालिक कहाँ है? और नजीमा को कहाँ छुपाया है? सच उगल, वरना आज इस आलीशान घर की दीवारें तेरे खून से रंग दी जाएंगी!"
नौकर थर-थर कांपने लगा। उसकी आँखों में खौफ साफ दिख रहा था। उसने हकलाते हुए कहा, "सा... साहब, आप गलत समझ रहे हैं।
मालिक (अब्दुल हकीम) और मालकिन तो यहाँ हैं ही नहीं। वे तो पिछले दो महीनों से अपने बिजनेस के सिलसिले में दुबई में हैं। यहाँ सिर्फ मैं और कुछ गार्ड्स ही रहते हैं।"
अग्निश का दिमाग चकरा गया। "अगर वे दो महीने से बाहर हैं, तो कल रात क्लब में नजीमा किसके साथ थी? और दो दिन पहले फोन पर तुमने क्यों कहा कि उसकी तबीयत खराब है?"
नौकर रोते हुए बोला, "साहब, मुझे डराया गया था। दो दिन पहले कुछ नकाबपोश लोग नजीमा बीवी को यहाँ लाए थे। वे बहुत ताकतवर लग रहे थे।
उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर कोई फोन आए तो वही कहना जो उन्होंने सिखाया है। उन्होंने बीवी को ऊपर के कमरे में बंद रखा था, लेकिन कल रात वे उन्हें लेकर कहीं चले गए। मुझे नहीं पता वे कौन थे, पर उनके पास सरकारी नंबर वाली गाड़ियाँ थीं।"
अग्निश समझ गए—नजीमा अपने पिता के पास नहीं, बल्कि अपने पिता के 'दुश्मनों' या 'साझेदारों' की कैद में है। और वे लोग कोई और नहीं, बल्कि दिग्विजय सिंह (मंत्री) के गुर्गे हो सकते हैं।
दिल्ली का दंगल: सच की तलाश
अग्निश का दिमाग बिजली की तरह दौड़ रहा था। नौकर की बातों ने साफ कर दिया था कि नजीमा को किडनैप किया गया है और उसे गायब करने में सरकारी तंत्र का हाथ है।
उसे पूरा यकीन था कि यह सब दिग्विजय सिंह का किया धरा है। दिग्विजय का बेटा अपराजित बैंकॉक में नहीं, बल्कि कहीं आसपास ही छिपा है और दिल्ली में बैठा उसका बाप उसे ढाल दे रहा है।
अग्निश ने समीर की ओर देखा और दहाड़ते हुए कहा, "समीर, गाड़ी एयरपोर्ट की तरफ मोड़ो। हमें अभी दिल्ली निकलना होगा।
दिग्विजय सिंह को लगता है कि वह कोलकाता पुलिस को डराकर सच छुपा लेगा, लेकिन उसे नहीं पता कि अग्निश चट्टोपाध्याय जब शिकार पर निकलता है, तो दिल्ली का सिंहासन भी कांपने लगता है।"
समीर ने तुरंत चार्टर्ड प्लेन का इंतजाम किया। कुछ ही घंटों में अग्निश दिल्ली की सड़कों पर थे। दिल्ली की ठंडी हवा में भी उनका गुस्सा उबल रहा था।