अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 9 : आखिरी पन्ने का रहस्य
पूरा पुस्तकालय अंधेरे में डूब चुका था।
कुछ क्षण पहले तक जहाँ हजारों किताबें दिखाई दे रही थीं, वहाँ अब सिर्फ काला सन्नाटा था।
अनन्या को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गहरे कुएँ में गिर रही हो।
उसके कानों में अजीब-अजीब आवाजें गूँज रही थीं।
कभी किसी बच्चे की हँसी।
कभी किसी औरत के रोने की आवाज।
कभी किसी आदमी की दर्दभरी चीख।
और फिर...
एक परिचित आवाज सुनाई दी।
"अनु..."
अनन्या का दिल धड़क उठा।
यह आवाज उसने पहले भी सुनी थी।
बहुत साल पहले।
अपने सपनों में।
अपनी धुँधली यादों में।
"अनु..."
आवाज फिर आई।
इस बार और करीब।
अनन्या ने आँखें खोलने की कोशिश की।
और अचानक उसके सामने रोशनी फैल गई।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं तो वह एक बगीचे में खड़ी थी।
चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल थे।
हल्की हवा चल रही थी।
पक्षियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
यह जगह किसी सपने जैसी लग रही थी।
और तभी उसने उसे देखा।
कुछ दूरी पर एक छोटी बच्ची खड़ी थी।
लगभग सात साल की।
सफेद फ्रॉक पहने।
उसके हाथ में एक पुरानी किताब थी।
वही किताब।
अधूरी किताब।
बच्ची मुस्कुराई।
"तुम आ गई।"
अनन्या धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।
"तुम कौन हो?"
बच्ची की मुस्कान और गहरी हो गई।
"तुम मुझे भूल गई?"
अनन्या चुप रही।
फिर बच्ची ने किताब अपनी छाती से लगाई।
"मैं अन्वी हूँ।"
यह नाम सुनते ही अनन्या के भीतर कुछ टूट गया।
अचानक उसके दिमाग में कई दृश्य चमकने लगे।
एक घर।
एक आदमी।
कहानियाँ।
हँसी।
और वही छोटी बच्ची।
अन्वी।
अनन्या लड़खड़ा गई।
उसका सिर दर्द से फटने लगा।
"नहीं..."
"यह नहीं हो सकता..."
लेकिन यादें रुक नहीं रही थीं।
उसे सब दिखाई देने लगा।
वह सिर्फ देख नहीं रही थी।
बल्कि जी रही थी।
वर्षों पहले...
आदित्य अपनी बेटी अन्वी से बहुत प्यार करता था।
हर रात वह उसे नई कहानी सुनाता।
अन्वी को कहानियाँ बहुत पसंद थीं।
वह कहती—
"पापा, आपकी कहानियाँ कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।"
और आदित्य हँसकर जवाब देता—
"मेरी राजकुमारी, मेरी कहानियाँ कभी खत्म नहीं होंगी।"
लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।
एक बीमारी ने अन्वी को उससे छीन लिया।
और उसी दुःख में...
आदित्य ने अधूरी किताब को जन्म दिया।
अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
अब उसे सब समझ आने लगा था।
आदित्य राक्षस बनकर पैदा नहीं हुआ था।
वह एक टूटा हुआ पिता था।
जिसने अपनी बेटी को खो दिया था।
"तुम सच जान गई हो।"
अन्वी ने धीरे से कहा।
"लेकिन अभी पूरा सच बाकी है।"
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
"और क्या बचा है?"
अन्वी ने किताब खोली।
उसके पन्ने अपने आप पलटने लगे।
फिर एक पन्ने पर आकर रुक गए।
वहाँ एक तस्वीर थी।
तस्वीर में आर्या दिखाई दे रही थी।
और उसके बगल में...
अनन्या।
"यह कैसे संभव है?"
अनन्या हैरान रह गई।
अन्वी ने कहा—
"क्योंकि तुम्हारी आत्मा तीन हिस्सों में बँट चुकी है।"
"एक हिस्सा आर्या बना।"
"एक हिस्सा अनन्या बना।"
"और एक हिस्सा..."
उसने अपने सीने पर हाथ रखा।
"...मैं हूँ।"
अनन्या का दिल बैठ गया।
"जब मेरे पिता ने मुझे वापस लाने की कोशिश की..."
अन्वी बोली।
"तब मृत्यु और जीवन के बीच का संतुलन टूट गया।"
"मेरी आत्मा पूरी तरह लौट नहीं पाई।"
"वह तीन हिस्सों में बँट गई।"
"और उसी दिन से अधूरी किताब भी अधूरी रह गई।"
अचानक बगीचे की जमीन काँपने लगी।
फूल सूखने लगे।
आसमान काला पड़ गया।
अन्वी का चेहरा गंभीर हो गया।
"वह आ रहा है।"
"कौन?"
अनन्या ने पूछा।
लेकिन जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ी।
क्योंकि अगले ही पल काला धुआँ पूरे बगीचे में फैल गया।
और उसके बीच से आदित्य बाहर आया।
लेकिन इस बार वह पहले जैसा नहीं था।
उसकी आँखों में क्रोध नहीं था।
बल्कि दर्द था।
बहुत गहरा दर्द।
उसने अन्वी को देखा।
और उसकी आँखें भर आईं।
"मेरी बच्ची..."
उसकी आवाज काँप गई।
अन्वी की आँखों में भी आँसू आ गए।
"पिताजी..."
सदियों बाद पिता और बेटी आमने-सामने खड़े थे।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर आदित्य धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
लेकिन तभी अधूरी किताब हवा में उठ गई।
उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और पूरे आकाश में शब्द उभरने लगे—
"कहानी समाप्त नहीं हुई है।"
"आखिरी अध्याय बाकी है।"
अचानक बगीचा टूटने लगा।
पेड़ गायब होने लगे।
जमीन फटने लगी।
और चारों तरफ वही अनंत पुस्तकालय दिखाई देने लगा।
साधु फिर सामने आ गया।
उसके चेहरे पर चिंता थी।
"समय समाप्त हो रहा है।"
उसने कहा।
"अगर आज फैसला नहीं हुआ..."
"तो अधूरी किताब हमेशा के लिए खुल जाएगी।"
"उसका मतलब?"
अनन्या ने पूछा।
साधु बोला—
"फिर हर कहानी वास्तविक बन जाएगी।"
"हर डर सच हो जाएगा।"
"और दुनिया में कल्पना और वास्तविकता का अंतर मिट जाएगा।"
यह सुनते ही सब स्तब्ध रह गए।
अगर ऐसा हुआ...
तो दुनिया का अंत निश्चित था।
अचानक अधूरी किताब का आखिरी पन्ना अपने आप खुल गया।
इस बार उस पर शब्द साफ दिखाई दे रहे थे।
सभी ने देखा।
और उनके चेहरों का रंग उड़ गया।
क्योंकि वहाँ लिखा था—
"कहानी को पूरा करने के लिए..."
"तीनों आत्माओं का एक होना आवश्यक है।"
"लेकिन उनमें से केवल एक ही जीवित बचेगी।"
पूरा वातावरण शांत हो गया।
अनन्या ने काँपते हाथों से पन्ने को देखा।
आर्या।
अन्वी।
और वह स्वयं।
तीनों में से केवल एक ही बच सकती थी।
अन्वी ने धीमे से मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा।
आर्या की आवाज कहीं दूर से गूँजी।
और आदित्य की आँखों में डर उतर आया।
क्योंकि अब पहली बार...
उन्हें समझ आ गया था कि अधूरी किताब का अंत कितना भयावह होने वाला है।
और कहानी का सबसे कठिन फैसला अभी बाकी था...