1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 1 RAAHULL SHARMA द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 1

भाग 1: देवपुर रियासत 


सन 1926, भारत भूमि पर फिरंगियों का क्रूर शासन अपने चरम पर था। 


चारों ओर गुलामी की ज़ंजीरें जकड़ी हुई थीं, लेकिन उसी दौर में राजपूताने और जंगलों के बीच बसी एक ऐसी रियासत थी, जिसकी तरफ आँख उठाने की हिम्मत खुद गोरे साहबों की भी नहीं थी—देवपुर रियासत।



देवपुर के लोग बेहद खुशहाल, समृद्ध और निर्भीक थे। इस खुशहाली की वजह थे वहां के शासक, महाराज देववर्धन।


महाराज को पूरी जनता भगवान की तरह पूजती थी। वे जितने न्यायप्रिय थे, उतने ही स्वाभिमानी। 


अंग्रेजों ने कई बार देवपुर को अपने अधीन करने की कोशिश की, लेकिन महाराज देववर्धन के अदम्य साहस और जनता के उनके प्रति अटूट प्रेम के आगे फिरंगियों को हर बार मुंह की खानी पड़ी।



लेकिन... इतिहास गवाह है कि हाथी के दांत दिखाने के और, और खाने के और होते हैं। उजाले में जो चेहरा देवता जैसा दिखता था, अमावस की काली रातों में उसी चेहरे के पीछे एक भयानक भेड़िया छिपा था।



समय: आधी रात का सन्नाटा


राजमहल के सबसे निचले हिस्से में बना एक ऐसा तहखाना, जहां सूरज की किरण तो क्या, हवा भी रास्ता भूलकर पहुंचती थी।


दीवारों पर लगी मशालों की पीली रोशनी में वहां बनी परछाइयां किसी दानव जैसी लग रही थीं। सीलन और अजीब सी बू हवा में घुली हुई थी।



तभी तहखाने की सीढ़ियों से उतरती हुई एक पायल की खनक गूंजी। यह रूपमती थी।


रूपमती, देवपुर की सबसे बड़ी और महाराज की सबसे प्रिय रानी की बेहद खास और वफादार दासी थी। वह जितनी चतुर थी, उतनी ही रूपवान भी।



रूपमती ने डरते-डरते तहखाने के मुख्य कक्ष में कदम रखा, जहां महाराज देववर्धन पीठ घुमाए खड़े थे।



"महाराज की जय हो..." रूपमती ने धीमे स्वर में झुककर प्रणाम किया। उसकी आवाज़ में घबराहट साफ थी।



"महाराज, आपने इतनी रात को मुझे यहां इस वीरान तहखाने में बुलाया? कोई विशेष कार्य था क्या? कोई गुप्त सूचना देनी थी?"


महाराज ने कोई जवाब नहीं दिया। वे बस चुपचाप अंधेरे की तरफ देखते रहे।



रूपमती का दिल अब सीने में ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था। उसने अपनी ओढ़नी के कोने को उंगलियों में भींचते हुए दोबारा कहा, "बताइए महाराज, मेरा दिल बहुत ज़ोर से घबरा रहा है। 



आखिर ऐसी कौन सी बात है, जिसके लिए आपसे सुबह तक का इंतजार भी नहीं हुआ? इस दासी से कोई भूल हुई है क्या?"



अभी रूपमती के सवाल हवा में तैर ही रहे थे कि तभी भारी कदमों की आहट हुई। तहखाने के काले साए से निकलकर महाराज का सबसे भरोसेमंद और क्रूर मंत्री सामने आया—बुक्का सोलंकी।



बुक्का सोलंकी के चेहरे पर एक कुटिल और डरावनी मुस्कान थी। उसने रूपमती की तरफ देखा और फिर पीछे मुड़कर तहखाने का भारी, लोहे का मुख्य दरवाज़ा बंद कर दिया।


भारी कुंडी के गिरने की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी वज्रपात की तरह गूंजी।


दरवाज़ा बंद होते देख रूपमती चौंक गई। उसके बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने सहमकर बुक्का सोलंकी की तरफ देखा, 'इतनी रात को मंत्री जी का यहां क्या काम? और उन्होंने दरवाज़ा क्यों बंद किया?'



तभी, महाराज देववर्धन धीरे से घूमे। उनके चेहरे पर वह सौम्य मुस्कान नहीं थी जो प्रजा देखती थी, बल्कि उनकी आंखों में एक अजीब सी हवस और जूनून था।


महाराज धीरे-धीरे रूपमती की तरफ बढ़ने लगे। उनके कदम भारी थे। उन्होंने गहरी आवाज़ में कहा,


"रूपमती... बात ही कुछ ऐसी है कि हमसे सुबह तक का इंतजार नहीं हुआ। हम चाहकर भी खुद को रोक नहीं सके।"


रूपमती को महाराज का इस तरह करीब आना थोड़ा अजीब लगा। उसे कुछ गलत होने का आभास हुआ, लेकिन महाराज की 'न्यायप्रिय राजा' वाली छवि उसके दिमाग में इतनी गहरी थी कि उसने अपने बुरे विचारों को झटक दिया। उसने सोचा कि शायद महाराज किसी बड़ी मुसीबत में हैं।



रूपमती ने अदब से कहा, "महाराज... ऐसी क्या बात है?"


इससे पहले कि राजा कुछ बोलते, पीछे खड़े मंत्री बुक्का सोलंकी ने अपनी मूंछों पर ताव दिया और ठहाका लगाते हुए आगे आया। 


"हम बताते हैं कि बात क्या है, दासी!"


बुक्का सोलंकी ने रूपमती के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा, "दरअसल बात यह है कि... महाराज ने जब से तुम्हें देखा है, वो मन ही मन तुम्हें बेइंतहा प्रेम करने लगे हैं।



तुम्हारी ये खूबसूरती इस महल की दासियों के बीच रहने के लिए नहीं, बल्कि महाराज की बाहों में सजने के लिए है।"



मंत्री के मुंह से यह गंदी बात सुनते ही रूपमती के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हो रहा था।


उसे लगा जैसे उसके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया गया हो। जो राजा उसके लिए भगवान समान था, जिसके सामने पूरी रियासत सिर झुकाती थी, उनका मंत्री उनके सामने ऐसी घटिया बात बोल रहा था!



रूपमती ने डर और गुस्से में कांपते हुए कहा, "गुस्ताखी माफ हो मंत्री जी! पर ये आप क्या बकवास कर रहे हैं?


मेरे महाराज तो भगवान जैसे हैं, साक्षात न्याय के देवता! आप उन पर और मुझ पर ऐसा नीच इल्जाम कैसे लगा सकते हैं? 


मंत्री जी, क्या आपने मदिरा का सेवन किया है जो आपका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है?"


रूपमती को उम्मीद थी कि उसकी ये बात सुनकर महाराज अभी बुक्का सोलंकी की गर्दन धड़ से अलग करने का आदेश दे देंगे।



लेकिन तभी... तहखाने में महाराज देववर्धन के हंसने की आवाज़ गूंजी। वह हंसी किसी देवता की नहीं, बल्कि एक राक्षस की थी।


महाराज ने रूपमती के और करीब आते हुए, उसके थरथराते चेहरे को देखा और ठंडे स्वर में बोले,


"रूपमती... बुक्का जो कह रहा है, वो बिल्कुल सच कह रहा है। इसमें उसकी कोई गुस्ताखी नहीं, बल्कि हमारी ही मर्जी है।"



महाराज के मुंह से ये शब्द निकलते ही रूपमती के माथे पर पसीने की बूंदें टपकने लगीं। उसका पूरा शरीर डर के मारे कांपने लगा।


उसे समझ आ गया था कि वह किसी भयानक जाल में फंस चुकी है, और इस खौफनाक रात की शुरुआत बस अभी हुई है...


रूपमती की आँखों से आंसू बह निकले। उसने अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर महाराज के सामने रख दिया। उसका गला रुंध गया था, लेकिन अपने चरित्र की रक्षा के लिए उसने पूरी हिम्मत जुटाई।



"महाराज! भगवान के लिए अपने मुख से ऐसे वचन मत निकालिए," रूपमती रोते हुए दो कदम पीछे हटी। "मैं आपकी सबसे प्रिय रानी, महारानी रुक्मिणी की सबसे खास और वफादार दासी हूँ। 


उन्होंने मुझे दासी नहीं, हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह माना है। अगर महारानी जी को इस बात की भनक भी लगी, तो वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी?


मेरे चरित्र पर लांछन लग जाएगा महाराज! पूरी दुनिया मुझ पर उंगलियां उठाएगी।"



वह घुटनों के बल बैठ गई, उसकी ओढ़नी का एक हिस्सा फर्श पर बिखर गया। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "मेरे बूढ़े माता-पिता ने मुझे बड़े नाज़ों से पाला है।


उन्होंने मुझे ईमानदारी और धर्म के रास्ते पर चलना सिखाया है। अगर इस महल से मेरे चरित्र पर कोई दाग लगा, तो वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे? 


लोग उन्हें घृणा की दृष्टि से देखेंगे। मैं जीते जी मर जाऊंगी महाराज... मैं महारानी जी के सामने आँखें उठाने के काबिल नहीं रहूंगी। मुझ पर दया कीजिए महाराज, मुझे जाने दीजिए!"



रूपमती की यह भावुक पुकार सुनकर भी महाराज देववर्धन का दिल नहीं पसीजा। उनके चेहरे पर छाई वह झूठी दयालुता अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी। उनकी आँखों में क्रूरता साफ चमक रही थी।



उन्होंने आगे बढ़कर रूपमती की ठुड्डी को अपनी उंगलियों से कसकर पकड़ा और उसका चेहरा ऊपर की तरफ उठाया।



महाराज ने एक ठंडी और डरावनी हंसी हंसते हुए कहा, "महारानी रुक्मिणी? रूपमती, तुम शायद भूल रही हो कि रुक्मिणी इस देवपुर की महारानी बाद में है, पहले हमारी पत्नी है।


और इस रियासत में ऐसा कोई पत्ता नहीं हिलता जिसकी इजाजत हम न दें। रही बात तुम्हारे चरित्र की और तुम्हारे बूढ़े माता-पिता की..."



महाराज ने अपनी पकड़ और मजबूत की, जिससे रूपमती दर्द से कराह उठी।



महाराज आगे बोले, "अगर तुमने हमारा कहना माना, तो तुम्हारे माता-पिता को इतनी दौलत मिलेगी कि उनकी सात पीढ़ियां ऐश करेंगी।


और अगर तुमने आनाकानी की... तो बुक्का सोलंकी अच्छी तरह जानता है कि बिना किसी को भनक लगे, एक बूढ़े राजा और उसकी बूढ़ी पत्नी को इस दुनिया से कैसे गायब किया जाता है।"