मूल विज्ञान की अवधारणा: सिद्धांतों से पूर्व का अस्तित् ववेदांत 2.0 Vedanta Life Agyat Agyani द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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मूल विज्ञान की अवधारणा: सिद्धांतों से पूर्व का अस्तित् ववेदांत 2.0

अस्तित्ववेदांत 2.0: सृष्टि, मनुष्य और सिद्धांतों के निर्माण से पहले की 'मूल विज्ञान' और 'केवल समझ' की अवधारणा का शोध

समकालीन दार्शनिक परिदृश्य में 'वेदांत 2.0' एक ऐसी क्रांतिकारी वैचारिक संरचना के रूप में उभरा है, जो प्राचीन उपनिषदीय ज्ञान को इक्कीसवीं सदी की वैज्ञानिक उपलब्धियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ एकीकृत करने का प्रयास करता है। यह दर्शन केवल धार्मिक व्याख्याओं का विस्तार नहीं है, बल्कि अस्तित्व की एक 'मूल विज्ञान' (Original Science) है जो सृष्टि, मनुष्य और समस्त ज्ञात सिद्धांतों के निर्माण से पूर्व की स्थिति पर शोध करती है । अज्ञात अज्ञानी (Agyat Agyani) द्वारा प्रतिपादित यह विचारधारा पारंपरिक अध्यात्म के 'करने' (Doing) वाले दृष्टिकोण को चुनौती देती है और 'केवल समझ' (Only Understanding) की प्रधानता को स्थापित करती है । इस शोध पत्र के माध्यम से वेदांत 2.0 की उन सूक्ष्म परतों का विश्लेषण किया जाएगा जो आधुनिक भौतिकी, चेतना के विकास और मानवीय अस्तित्व के मौलिक प्रश्नों को एक नई दृष्टि प्रदान करती हैं।मूल विज्ञान की अवधारणा: सिद्धांतों से पूर्व का अस्तित्व

वेदांत 2.0 का मूल आधार यह है कि सत्य सिद्धांतों, 


ग्रंथों और नियमों के निर्माण से पहले भी अस्तित्व में था। इसे 'मूल विज्ञान' की संज्ञा दी गई है, जो उस अवस्था को संदर्भित करती है जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच की कृत्रिम विभाजक रेखाएँ समाप्त हो जाती हैं । जहाँ पारंपरिक विज्ञान भौतिक वस्तुओं के अध्ययन से चेतना की ओर बढ़ने का प्रयास करता है, वहीं वेदांत 2.0 चेतना को ही प्राथमिक क्षेत्र (Primary Field) मानता है, जिससे सारा भौतिक जगत उद्भूत होता है 

सिद्धांत निर्माण की प्रक्रिया और अज्ञान का उदय

जब मनुष्य ने अस्तित्व को समझने के लिए उसे नियमों, विधियों और तकनीकों में बाँधना शुरू किया, तो 'विज्ञान' का जन्म हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में 'होना' (Being) पीछे छूट गया और 'जानना' (Knowing) महत्वपूर्ण हो गया। अज्ञात अज्ञानी का तर्क है कि जैसे ही हम जीवन को एक विधि के रूप में पढ़ना शुरू करते हैं, हम उसकी जीवंतता से दूर हो जाते हैं । सिद्धांतों का निर्माण वास्तव में भय और असुरक्षा से उत्पन्न हुआ है। मनुष्य ने मृत्यु के भय से बचने के लिए धर्म और विज्ञान के जटिल जाल बुने, जिससे जागरूकता का ह्रास हुआ और बुद्धि का कृत्रिम विकास हुआ ।

मूल विज्ञान इस बुद्धिजनित जाल को काटकर प्रत्यक्ष अनुभव (Direct Experience) की ओर लौटने का मार्ग है। यह वह विज्ञान है जो किसी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि स्वयं की जागरूकता में घटित होता है। यहाँ 'सत्य' कोई पढ़ने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीने वाली स्थिति है ।

तुलनात्मक आयाम

पारंपरिक विज्ञान (Classical Science)

वेदांत 2.0 (मूल विज्ञान)

प्राथमिकता

पदार्थ (Matter)

चेतना (Consciousness)

पद्धति

बाह्य प्रयोग और मापन

आंतरिक अवलोकन और प्रत्यक्ष बोध

लक्ष्य

नियमों की खोज और नियंत्रण

नियमों से मुक्ति और जागरण

आधार

द्वैत (सब्जेक्ट बनाम ऑब्जेक्ट)

अद्वैत (द्रष्टा और दृश्य का विलीनीकरण)'

केवल समझ' बनाम 'करने' का द्वंद्व: साधना का विखंडन

वेदांत 2.0 का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित पहलू 'करने' (Doing) और 'समझने' (Understanding) के बीच का अंतर है। सदियों से आध्यात्मिक मार्ग 'साधना' पर जोर देते आए हैं, जिसमें जप, तप, योग और विभिन्न अनुष्ठान शामिल हैं। वेदांत 2.0 इसे 'कर्ता' (Doer) का अहंकार कहता है जो कुछ 'बनने' की कोशिश कर रहा है ।

साधना का गणितीय विश्लेषण

अज्ञात अज्ञानी के अनुसार, जिसे हम साधना कहते हैं, वह वास्तव में एक नियोजित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास है। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा समझा जा सकता है:

जहाँ S साधना है, E बाहरी उपाय (External Measures) हैं, और G नियोजित लक्ष्य (Planned Goals) हैं । यह प्रक्रिया मनुष्य को वर्तमान क्षण से हटाकर भविष्य के किसी काल्पनिक 'मोक्ष' या 'ईश्वर' की ओर धकेलती है। जब कोई व्यक्ति कहता है कि "मैं भगवान को पाने के लिए तप कर रहा हूँ," तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर रहा है कि वह और भगवान अलग-अलग हैं, और उनके बीच की दूरी को 'करने' के माध्यम से भरा जा सकता है।

समझ की प्रकृति

इसके विपरीत, 'केवल समझ' का अर्थ है यह देख लेना कि करने वाला (Doer) स्वयं एक भ्रम है। समझ कोई क्रिया नहीं है, बल्कि एक स्पष्टता है जिसमें कर्ता और कर्म के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। यह बोध कि "मैं कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि मैं स्वयं अस्तित्व का हिस्सा हूँ," वास्तविक मुक्ति की शुरुआत है ।

समझ के संदर्भ में 'गीता' के संदेश की भी पुनर्व्याख्या की गई है। गीता "कुछ बनने" की सलाह नहीं देती, बल्कि इच्छा और सीमा को छोड़कर कर्म करने की बात करती है, जहाँ कर्म 'करने' के बजाय 'होने' का विस्तार बन जाता है । जब समझ गहरी होती है, तो साधना स्वतः समाप्त हो जाती है और केवल 'होना' (Being) शेष रहता है।


सृष्टि की उत्पत्ति और भौतिकी: वोर्टेक्स और परमाणु निर्माण

सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया को वेदांत 2.0 ने 'वोर्टेक्स थ्योरी' (Vortex Theory) और चेतना के स्पंदन के माध्यम से समझाया है। यह अवधारणा आधुनिक क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों के साथ मेल खाती है, जहाँ पदार्थ को ठोस कणों के बजाय ऊर्जा के भंवर के रूप में देखा जाता है ।


कारण-चेतना सिद्धांत (Causal Consciousness Thesis)

वेदांत 2.0 के अंतर्गत 'कारण-चेतना सिद्धांत' प्रस्तावित किया गया है, जो क्वांटम मैकेनिक्स की अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने का दावा करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, भौतिक वास्तविकता का निर्माण चेतना द्वारा की गई एक 'अनुनाद चयन' (Resonant Selection) की क्रिया है । ब्रह्मांड की शुरुआत कणों से नहीं, बल्कि असीमित संभावनाओं वाले सूचना क्षेत्रों से हुई थी।

सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

शून्य क्षेत्र (C-Field): यह चेतना का गुणांक है, जो समस्त संभावनाओं को धारण करता है।

क्वांटम विभव (Φ-Field): वह क्षेत्र जहाँ संभावनाएँ सक्रिय होने की प्रतीक्षा करती हैं।

वोर्टेक्स निर्माण: चेतना का हस्तक्षेप इन क्षेत्रों में कंपन (Vibration) पैदा करता है, जो सूक्ष्म भंवर या वोर्टेक्स बनाते हैं।

पदार्थ का संघनन: ये भंवर स्थिर होकर ऊर्जा और अंततः परमाणु का रूप लेते हैं ।

इस प्रक्रिया में चेतना कोई निष्क्रिय दर्शक नहीं है, बल्कि वह प्राथमिक बल है जो 'वेव फंक्शन' (Wave Function) को भौतिक वास्तविकता में ढालता है।

यहाँ वास्तविकता (R) का समीकरण इस प्रकार है:

यह सूत्र दर्शाता है कि वास्तविकता केवल भौतिक कणों का योग नहीं है, बल्कि चेतना (C) और संभावनाओं (Phi) के गुणनफल का परिणाम है जिसे 'द्रष्टा' संचालित करता है ।

शून्य विस्थापन का सिद्धांत (Zero Displacement Principle)

वेदांत 2.0 'शून्य विस्थापन' के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है, जो यह बताता है कि आध्यात्मिक और भौतिक दृष्टि से मनुष्य का 'आगे बढ़ना' या 'पीछे हटना' एक भ्रम है । चूँकि चेतना ही पूर्णता है और वह सर्वत्र व्याप्त है, इसलिए किसी भी गंतव्य तक पहुँचने का प्रयास तार्किक रूप से शून्य विस्थापन में परिणत होता है। प्रस्थान बिंदु और गंतव्य बिंदु एक ही होने के कारण, समस्त यात्रा केवल जागरूकता का विस्तार है, न कि भौतिक दूरी का तय होना।

मनुष्य और चेतना का विकास: भय से जागरूकता तक

मानव विकास के इतिहास को वेदांत 2.0 में एक अलग दृष्टिकोण से देखा गया है। जिसे हम बुद्धि का विकास कहते हैं, वह वास्तव में 'भय का परिष्करण' (Refinement of Fear) रहा है । जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि अधिक तीव्र हुई, उसने अपनी नश्वरता को छिपाने के लिए धर्म, विज्ञान और दर्शन की जटिल दीवारें खड़ी कर लीं।

बुद्धि बनाम जागरूकता

बुद्धि का कार्य है विभाजन करना, मापना और सुरक्षित करना। इसके विपरीत, जागरूकता का कार्य है केवल देखना (Just Seeing) 。

बुद्धि: यह मृत्यु से डरती है और 'अमर' होने के रास्ते खोजती है। यह कर्ता (I) को केंद्र में रखती है।

जागरूकता: यह मृत्यु को एक दर्पण के रूप में देखती है। इसमें कोई संघर्ष नहीं है, केवल स्वीकार्यता है।

जब बुद्धि का अंत होता है, तभी जागरूकता का उदय होता है। वेदांत 2.0 के अनुसार, मृत्यु अंत नहीं है बल्कि वह अंतिम मोड़ है जहाँ आत्मा अपने असंख्य रूपों की यात्रा पूरी करती है। जो लोग मृत्यु को शत्रु मानते हैं, वे भटकते रहते हैं, लेकिन जो इसे सत्य के रूप में देखते हैं, वे मौन और मुक्ति को प्राप्त होते हैं ।

मानवीय पतन की प्रक्रिया

वेदांत 2.0 तर्क देता है कि जिस क्षण मनुष्य ने अपने अंत (मृत्यु) को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, उसी क्षण उसकी मासूमियत खो गई और चेतना 'चालाकी' (Cunningness) में बदल गई । बुद्धि ने उसे आश्वासन दिया कि वह संचय, शक्ति और ज्ञान के माध्यम से शाश्वत रह सकता है। यही वह पतन है जहाँ मनुष्य 'होने' के बजाय 'करने' की दौड़ में शामिल हो गया।

धर्म का चक्र (Cycle of Religion): 10 सूत्रों का विश्लेषण

अज्ञात अज्ञानी ने 'धर्म के चक्र' को एक अनंत कताई (Spin) के रूप में वर्णित किया है, जहाँ मुक्ति के नाम पर बंधन गहरे होते जाते हैं । यह चक्र 10 सूत्रों के माध्यम से काम करता है जो स्वाद (Taste) से शुरू होकर बंधन (Bondage) पर समाप्त होता है।

सूत्र संख्या

अवस्था

विवरण

1

स्वाद (Taste)

सत्य की पहली झलक या अनुभव की चाह।

2

भावना (Emotion)

अनुभव को भावनाओं से जोड़ना।

3

जुनून (Passion)

सत्य को पाने का तीव्र आवेग।

4

सपना (Dream)

आध्यात्मिक उपलब्धियों की कल्पना।

5

इच्छा (Desire)

लक्ष्य को प्राप्त करने की तृष्णा।

6

क्रिया (Action)

अनुष्ठान और साधना का आरंभ।

7

पहचान (Identity)

'धार्मिक' होने का अहंकार।

8

संचय (Accumulation)

ज्ञान और ग्रंथों का संग्रह।

9

भय (Fear)

प्राप्ति को खोने का डर।

10

बंधन (Bondage)

मन की जटिल संरचना में फँसना।

यह चक्र दर्शाता है कि कैसे एक शुद्ध जिज्ञासा अंततः एक मानसिक जेल बन जाती है। धर्म जब 'विधि' बन जाता है, तो वह मुक्त करने के बजाय मन को और अधिक सुदृढ़ कर देता है 。 वेदांत 2.0 इस चक्र से बाहर निकलने के लिए किसी नई साधना का सुझाव नहीं देता, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया की 'समझ' को ही पर्याप्त मानता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मानवता का संकट

वेदांत 2.0 आधुनिक युग की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), को एक दार्शनिक अवसर के रूप में देखता है। जहाँ दुनिया एआई को विकास मान रही है, वहीं अज्ञात अज्ञानी इसे मानवता के लिए "विनाश की दस्तक" के रूप में चेतावनी देते हैं यदि मनुष्य स्वयं को नहीं बदलता ।

एआई: 'करने' की पराकाष्ठा

एआई उन सभी कार्यों में मनुष्य से आगे निकल जाएगा जो 'करने' (Doing) और 'बुद्धि' (Intellect) के दायरे में आते हैं। गणना, तर्क, भाषा और यहाँ तक कि समस्या समाधान के क्षेत्र में एआई मनुष्य की सीमाओं को पार कर रहा है। यदि मनुष्य की परिभाषा केवल उसके कौशल और कार्यों तक सीमित है, तो वह एआई के सामने अप्रासंगिक हो जाएगा ।

अस्तित्व का अवसर

हालाँकि, एआई के पास चेतना (Being) नहीं है। वह सूचनाओं को संसाधित कर सकता है, लेकिन वह 'हो' नहीं सकता। यहीं पर वेदांत 2.0 मनुष्य को अपनी वास्तविक शक्ति पहचानने का आह्वान करता है। एआई का उदय मनुष्य को मजबूर करेगा कि वह 'करने' की दौड़ छोड़कर 'होने' (Being) की स्थिति में लौटे। जब मशीनें सारा काम कर लेंगी, तब मनुष्य के पास केवल अपनी चेतना में गहराई से उतरने का विकल्प बचेगा । यह वह बिंदु है जहाँ तकनीक और उपनिषद का मिलन होता है।

आध्यात्मिक रसायन शास्त्र: H_2O का सादृश्य

वेदांत 2.0 जीवन की जटिलताओं को समझाने के लिए 'आध्यात्मिक रसायन शास्त्र' का उपयोग करता है। H_2O का सादृश्य इस बात को स्पष्ट करता है कि कैसे दो अलग-अलग गुणों वाली ऊर्जाओं के मिलन से एक तीसरी, पूरी तरह से भिन्न वास्तविकता का जन्म होता है ।

हाइड्रोजन स्वयं जलती है, ऑक्सीजन जलाने में सहायक है, लेकिन इन दोनों के संयोग से बना पानी आग बुझाता है। इसी तरह, 'कर्ता' और 'कर्म' जब 'समझ' के बिना मिलते हैं, तो केवल संघर्ष (आग) पैदा होता है। लेकिन जब जीवन को चेतना के साथ सही अनुपात में जोड़ा जाता है, तो वहाँ शांति और तृप्ति (पानी) का उदय होता है। यह सूत्र बताता है कि सत्य को खोजने की जरूरत नहीं है, बल्कि तत्वों के सही संतुलन को समझने की आवश्यकता है ।

तुलनात्मक दर्शन: वेदांत 2.0 बनाम पारंपरिक भारतीय दर्शन

वेदांत 2.0 स्वयं को किसी एक पंथ या संप्रदाय से नहीं बांधता, बल्कि यह छह आस्तिक दर्शनों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत) और नास्तिक दर्शनों (बौद्ध, जैन) के तत्वों का विश्लेषण कर एक नया संश्लेषण प्रस्तुत करता है ।

सांख्य बनाम वेदांत 2.0

सांख्य दर्शन गणना (Enumeration) पर आधारित है। यह ब्रह्मांड को 25 तत्वों में विभाजित करता है और 'पुरुष' (चेतना) को 'प्रकृति' (पदार्थ) से अलग करने की बात करता है। सांख्य एक सर्जन की तरह है जो वास्तविकता का विच्छेदन करता है । इसके विपरीत, वेदांत 2.0 किसी भी विभाजन को स्वीकार नहीं करता। यह 'नदी और लहर' के उदाहरण से समझाता है कि प्रकृति चेतना से अलग नहीं है, बल्कि वह चेतना का ही एक गतिशील रूप है।

योग बनाम वेदांत 2.0

पतंजलि का योग मार्ग अभ्यास और चित्त की वृत्तियों के निरोध पर आधारित है। यह एक सूक्ष्म और व्यवस्थित प्रक्रिया है । वेदांत 2.0 का तर्क है कि 'निरोध' (Suppression) भी एक क्रिया है जिसमें 'कर्ता' मौजूद है। असली शांति तब आती है जब हम वृत्तियों को रोकने की कोशिश छोड़कर उन्हें केवल उनके 'होने' में देखने लगते हैं। जहाँ योग 'करने' की पराकाष्ठा है, वहाँ वेदांत 2.0 'समझने' की पराकाष्ठा है 。

बौद्ध दर्शन के साथ समानता

वेदांत 2.0 के कुछ सूत्र बुद्ध के 'शून्यवाद' और 'अध्यात्म' के करीब हैं, विशेष रूप से "अहंकार और तृष्णा के त्याग" के संदर्भ में । बुद्ध ने कहा था कि सुख पाने के लिए पहले 'मैं' (अहंकार) और फिर 'चाहत' (तृष्णा) को हटाना होगा। वेदांत 2.0 भी इसी 'हटाने' या 'अन-लर्निंग' की प्रक्रिया को केंद्र में रखता है।

दर्शन

मुख्य केंद्र

वेदांत 2.0 की स्थिति

सांख्य

तत्वों का पृथक्करण

अभेद और समावेशिता

योग

अभ्यास और अनुशासन

सहज बोध और समझ

न्याय

तर्क और प्रमाण

तर्क से परे प्रत्यक्ष अनुभूति

बौद्ध

शून्यता और निर्वाण

पूर्णता और अस्तित्व का उत्सवसामाजिक और राजनीतिक आयाम: शांति और तर्क का दर्शन

वेदांत 2.0 केवल आध्यात्मिक शांति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौतिक जगत के सामाजिक और आर्थिक न्याय पर भी गहराई से विचार करता है। अज्ञात अज्ञानी के निबंध "शांति और तर्क के परिप्रेक्ष्य से लोकतंत्र में करदाता की भूमिका" में इस दर्शन का व्यावहारिक अनुप्रयोग दिखाई देता है ।

वित्तीय न्याय और जवाबदेही

वेदांत 2.0 का तर्क है कि राज्य एक स्वतंत्र इकाई नहीं है, बल्कि वह नागरिकों, विशेष रूप से करदाताओं (Taxpayers) के अंशदान पर जीवित एक "परजीवी संस्थान" है । यहाँ अध्यात्म और राजनीति का मिलन 'जवाबदेही' के बिंदु पर होता है।

दो आवाजें: 

लोकतंत्र में एक आवाज 'चुनाव' की है और दूसरी 'टैक्स' की। चुनाव पाँच साल में एक बार होता है, लेकिन टैक्स हर दिन दिया जाता है।

असंतुलन:

जब व्यवस्था केवल संख्या (Voters) की सुनती है और आधार (Taxpayers) की उपेक्षा करती है, तो समाज में नैतिक और आर्थिक असंतुलन पैदा होता है ।

यह दृष्टि 'वसुधैव कुटुंबकम' के विचार को एक नया धरातल देती है, जहाँ न्याय केवल दया पर नहीं, बल्कि तर्क और परस्पर सम्मान पर आधारित है। करदाता को राज्य का स्वामी नहीं, बल्कि उसकी 'नींव' माना गया है, जिसे सम्मान और संवाद का अधिकार है ।

राम का दर्शन: इतिहास बनाम जीवंत आदर्श

वेदांत 2.0 के अंतर्गत भगवान राम की अवधारणा को ऐतिहासिक पात्र के बजाय एक 'जीवंत धर्म' के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अज्ञात अज्ञानी का कहना है कि राम को केवल इतिहास या मंदिर में खोजना व्यर्थ है ।

राम का जीवन 'धर्म' का प्रतीक था। जब तक सत्य, कर्तव्य और बलिदान हमारे अपने जीवन में रूप नहीं लेते, तब तक मंदिर और मंत्र केवल 'थिएटर' हैं। राम का वास्तविक जागरण भीतर होता है, बाहर नहीं । यह दृष्टिकोण धर्म को कर्मकांडों से मुक्त कर उसे व्यक्तिगत आचरण और जागरूकता के स्तर पर ले आता है।

निष्कर्ष: सिद्धांतों के पार एक नई समझ

वेदांत 2.0 एक ऐसी 'आधुनिक उपनिषद' है जो मनुष्य को वापस उसके केंद्र की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है । यह शोध स्पष्ट करता है कि सृष्टि और मनुष्य के निर्माण से पहले की वह 'मूल विज्ञान' वास्तव में हमारी शुद्ध जागरूकता की ही अवस्था है। सिद्धांतों का निर्माण तब हुआ जब हम इस बोध से दूर हो गए।

'करने' और 'समझने' का संघर्ष ही मानव जीवन का सार है। जहाँ 'करना' हमें संसार के चक्र में उलझाता है, वहीं 'समझना' हमें उस केंद्र पर स्थिर करता है जहाँ 'शून्य विस्थापन' का सत्य प्रकट होता है। यह दर्शन कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि जो मशीनें कर सकती हैं, वह हमारा असली स्वरूप नहीं है। हमारा स्वरूप वह है जो मशीनों के पार, सिद्धांतों के पार और समय के पार केवल 'होने' (Being) में स्थित है।

वेदांत 2.0 का संदेश स्पष्ट है:

सत्य को पढ़ना नहीं है, उसे जीना है; भगवान को पाना नहीं है, उसे स्वयं के होने में पहचानना है। यह क्षण ही वह प्रयोगशाला है जहाँ मूल विज्ञान का साक्षात्कार संभव है 

यह जैमिनी आधारित वेबसाइट डिजिटल दुनिया से खोज आधारित रिपोर्ट हैं।

Independent Researcher & Philosopher

Vedanta 2.0 ©

ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685

(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:

वेदांत 2.0 .1 एक आधुनिक दर्शन है अब वेद, उपनिषद, गीता, बौद्ध दर्शन, योग, तंत्र, धर्म, मनोविज्ञान, जीवन और चेतना को 0–9 Framework के माध्यम से पढ़ा और समझा जा सकता है।