अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 8 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 8

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 8 : अधूरी किताब का जन्म
विशाल पुस्तकालय अब भी काँप रहा था।
हजारों किताबों के पन्ने हवा में उड़ रहे थे।
काली परछाइयाँ चारों ओर फैलती जा रही थीं।
लेकिन इस सबके बीच एक अजीब शांति थी।
क्योंकि वहाँ खड़ा वह बूढ़ा साधु किसी साधारण इंसान जैसा नहीं लग रहा था।
उसकी आँखों में ऐसी चमक थी मानो वह सदियों से सब कुछ देखता आ रहा हो।
अनन्या उसकी तरफ देख रही थी।
उसके मन में हजारों सवाल थे।
और शायद...
उन सभी सवालों के जवाब अब मिलने वाले थे।
सफेद आँखों वाला आदमी गुस्से से चीखा—
"तुम्हें मर जाना चाहिए था!"
साधु शांत खड़ा रहा।
उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।
"मैं मर चुका हूँ।"
उसने मुस्कुराते हुए कहा।
"बहुत साल पहले।"
यह सुनकर अनन्या हैरान रह गई।
"क्या?"
साधु उसकी तरफ मुड़ा।
"मैं अब जीवित नहीं हूँ, पुत्री।"
"मैं सिर्फ एक स्मृति हूँ।"
"एक वचन।"
"जिसे अधूरी किताब ने बचाकर रखा है।"
अनन्या कुछ समझ नहीं पा रही थी।
लेकिन उससे पहले कि वह कुछ पूछती...
साधु ने अपना दंड जमीन पर मारा।
ठक!
पूरे पुस्तकालय में सुनहरी रोशनी फैल गई।
अचानक हवा में एक विशाल चित्र उभरने लगा।
मानो कोई पुरानी फिल्म चल रही हो।
और फिर...
एक नई कहानी सामने आने लगी।
"बहुत समय पहले..."
साधु की आवाज गूँजी।
"जब दुनिया में लिखे हुए शब्दों को जादू माना जाता था..."
"तब एक व्यक्ति था।"
"एक लेखक।"
"इतना महान लेखक कि उसकी लिखी बातें सच हो जाती थीं।"
अनन्या ध्यान से सुन रही थी।
"उसका नाम था—आदित्य।"
"वह साधारण मनुष्य नहीं था।"
"उसके शब्दों में शक्ति थी।"
"वह जो लिखता..."
"वह वास्तविकता बन जाता।"
चित्र में एक युवक दिखाई दिया।
लगभग तीस वर्ष का।
लंबे बाल।
शांत चेहरा।
उसके सामने एक मोटी किताब खुली हुई थी।
वह कुछ लिख रहा था।
और जैसे-जैसे वह लिखता...
दृश्य बदलते जाते।
पेड़ उग जाते।
बारिश शुरू हो जाती।
नदियाँ बहने लगतीं।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"यह कैसे संभव है?"
साधु बोला—
"यही उसकी शक्ति थी।"
लेकिन फिर चित्र बदल गया।
युवक का चेहरा उदास दिखाई देने लगा।
उसकी आँखों में अकेलापन था।
"उसकी एक बेटी थी।"
साधु ने कहा।
"जिससे वह दुनिया में सबसे ज्यादा प्रेम करता था।"
"लेकिन एक दिन..."
"उसकी बेटी मर गई।"
पूरा वातावरण शांत हो गया।
चित्र में वही लेखक अपनी बेटी की कब्र के सामने बैठा रो रहा था।
दिन गुजरते गए।
महीने गुजरते गए।
लेकिन उसका दुःख कम नहीं हुआ।
फिर एक रात...
उसने वही किया जो उसे कभी नहीं करना चाहिए था।
उसने अपनी बेटी को वापस लाने की कोशिश की।
उसने अपनी किताब खोली।
और लिखा—
'मेरी बेटी फिर जीवित होगी।'
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक...
पूरी किताब काले रंग की हो गई।
उसके पन्नों से धुआँ निकलने लगा।
और एक भयानक आवाज गूँज उठी।
"मृत्यु के नियम नहीं बदले जा सकते।"
अनन्या की साँस रुक गई।
साधु आगे बोला—
"उस रात..."
"किताब बदल गई।"
"वह अब साधारण पुस्तक नहीं रही।"
"उसमें लेखक का दुःख..."
"उसका पागलपन..."
"और उसका अंधकार समा गया।"
"उसी रात जन्म हुआ..."
साधु की आवाज भारी हो गई।
"अधूरी किताब का।"
पूरा पुस्तकालय कुछ पल के लिए शांत हो गया।
अनन्या स्तब्ध खड़ी थी।
तो अधूरी किताब कोई श्राप नहीं थी।
वह एक पिता के टूटे हुए दिल से पैदा हुई थी।
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
साधु ने फिर कहा—
"धीरे-धीरे उस लेखक का दुःख उसे निगलने लगा।"
"वह वास्तविकता और कल्पना में फर्क भूल गया।"
"और फिर एक दिन..."
"उसने खुद को किताब के अंदर कैद कर लिया।"
अचानक सफेद आँखों वाला आदमी जोर से हँस पड़ा।
"कैद?"
"तुम इसे कैद कहते हो?"
उसकी हँसी पूरे पुस्तकालय में गूँजने लगी।
"मैं कैद नहीं हुआ था।"
"मैं अमर हो गया था।"
अनन्या का दिल बैठ गया।
उसने साधु की तरफ देखा।
"क्या यह..."
"वही लेखक है?"
साधु ने धीरे से सिर हिला दिया।
"हाँ।"
"यही आदित्य है।"
"अधूरी किताब का पहला लेखक।"
अब सब कुछ स्पष्ट होने लगा था।
वह आदमी कोई राक्षस नहीं था।
वह वही लेखक था जिसने वर्षों पहले किताब बनाई थी।
लेकिन अब वह इंसान नहीं रह गया था।
वह अपने ही अंधकार में बदल चुका था।
आदित्य की आँखें चमक उठीं।
"मैंने सिर्फ अपनी बेटी को वापस लाने की कोशिश की थी।"
वह गरजा।
"क्या यह गलत था?"
साधु चुप रहा।
लेकिन अनन्या ने पहली बार उसके चेहरे पर दर्द देखा।
सच्चा दर्द।
तभी आदित्य की नजर अनन्या पर पड़ी।
और उसकी आँखों में एक अजीब चमक उभर आई।
"तुम..."
वह धीरे से बोला।
"तुम्हें देखकर मुझे उसकी याद आती है।"
अनन्या घबरा गई।
"किसकी?"
आदित्य के होंठ काँपे।
"मेरी बेटी की।"
पूरा पुस्तकालय शांत हो गया।
अनन्या को अचानक कुछ अजीब महसूस हुआ।
मानो उसके सिर के अंदर कोई पुरानी याद जाग रही हो।
कुछ दृश्य।
कुछ आवाजें।
कुछ चेहरे।
और फिर...
उसे एक छोटी बच्ची दिखाई दी।
वह हँस रही थी।
एक आदमी उसे कहानी सुना रहा था।
वही आदमी।
आदित्य।
अनन्या का सिर दर्द से फटने लगा।
"नहीं..."
वह चीख उठी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह यादें उसकी हैं या किसी और की।
तभी अधूरी किताब अचानक चमकने लगी।
उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और आखिरी पन्ने पर नए शब्द उभरने लगे—
"वह लौट आई है।"
"जिसका इंतजार सदियों से था।"
साधु का चेहरा बदल गया।
आदित्य की आँखें फैल गईं।
और अनन्या के शरीर के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।
मानो उसके भीतर कोई शक्ति जाग रही हो।
तभी साधु ने भयभीत स्वर में कहा—
"नहीं..."
"यह अभी नहीं होना चाहिए था।"
अनन्या ने काँपती आवाज में पूछा—
"क्या हो रहा है?"
साधु ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में चिंता थी।
और फिर उसने वह बात कही जिसने सब कुछ बदल दिया—
"तुम सिर्फ आर्या नहीं हो..."
"तुम सिर्फ अनन्या भी नहीं हो..."
"तुम आदित्य की खोई हुई बेटी का पुनर्जन्म हो।"
अनन्या की साँस रुक गई।
पूरा पुस्तकालय एकदम शांत हो गया।
और उसी क्षण...
अधूरी किताब का आखिरी पन्ना अपने आप खुल गया।
लेकिन उस पर क्या लिखा था...
यह देखने से पहले ही चारों ओर अंधेरा छा गया।
क्रमशः...