**शीर्षक: भगवान से सौदा (भाग - 1)**कभी फुर्सत मिले न, तो किसी भी बड़े मंदिर के बाहर खड़े होकर बस लोगों को आते-जाते देखना। कोई नंगे पैर चला आ रहा है, कोई सवा किलो लड्डू का डिब्बा उठाए सीढ़ियां चढ़ रहा है, तो कोई आंखें बंद किए ऐसे गिड़गिड़ा रहा है जैसे दुनिया का सारा दुख उसी के कंधों पर हो।देखने में यह सब कितनी 'सच्ची भक्ति' लगती है, है ना? लेकिन आज ज़रा इस भक्ति का पर्दा हटाकर देखते हैं। सच कड़वा है, शायद चुभेगा भी, लेकिन यही हकीकत है।आजकल हम इंसानों ने भगवान को असल में समझ क्या लिया है? कोई एटीएम मशीन? या फिर कोई ऐसा नौकर, जो बस हमारे ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है?*"हे महादेव, मेरा यह काम करवा दो, मैं ग्यारह सौ का प्रसाद चढ़ाऊंगा।"**"माता रानी, बस मेरी लॉटरी लगवा दो, मैं पैदल दर्शन करने आऊंगा।"*ज़रा अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए, क्या यह भक्ति है? नहीं... यह तो सीधा-सीधा व्यापार है, एक सौदा। हम भगवान के दर पर तभी माथा टेकते हैं जब हमारी अपनी झोली खाली होती है। काम बन गया तो प्रसाद चढ़ा दिया, और अगर कहीं कोई दुख आ गया या मांगी हुई मन्नत पूरी नहीं हुई... तो फिर क्या होता है? फिर सबसे पहली शिकायत और गाली भगवान को ही पड़ती है।*"तूने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैंने इतने व्रत रखे, इतनी पूजा की, तूने मुझे दिया ही क्या?"*लोग ऐसे हुक्म चलाते हैं जैसे भगवान उनके हाथों की कठपुतली हों। भगवान ने ऐसा नहीं किया, भगवान ने वैसा नहीं किया... बस यही शिकायतें।अब ज़रा अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को देखिए। हमारी थाली रोज़ सजती है। ताज़ी रोटियां, फल, मिठाई या फिर एक आम सी चाय। अब ईमानदारी से बताना... क्या हमने कभी, अपनी पूरी ज़िंदगी में खाने का पहला निवाला तोड़ते हुए आंखें बंद करके सच्चे दिल से यह कहा है— *"महादेव, आइए... पहले आप यह लंगर छकिए, फिर मैं खाऊंगा"*?शायद नहीं। इस करोड़ों की भीड़ में मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दें, तो किसी को यह याद ही नहीं रहता कि भगवान सिर्फ 'देने' के लिए नहीं है। उसे हमारी सवा किलो मिठाई की भूख नहीं है, उसे तो बस उस दो पल के प्यार की आस होती है। लेकिन दुनिया को तो सिर्फ अपने मतलब से प्यार है।पर रुकिए... बात सिर्फ यहाँ खत्म नहीं होती। यह तो सिर्फ वह स्वार्थ है जो हमें सामने दिखता है। असली खौफनाक खेल तो वह है, जो बंद दरवाज़ों के पीछे चलता है।कुछ मन्नतें ऐसी होती हैं जो ईर्ष्या, नफरत और जलन की आग में मांगी जाती हैं।*"हे भगवान, पड़ोसी की दुकान ठप्प करवा दे, मैं सवा मन का लंगर लगाऊंगा।"**"उसका घर बर्बाद कर दे, मैं तुझे खुश कर दूंगा।"*इंसान को लगता है कि उसने अपने लालच और ईर्ष्या की पर्ची भगवान के आगे रख दी है और भगवान उसका ये घिनौना काम कर देंगे। लेकिन... लेकिन... लेकिन... जो बात यह मतलबी दुनिया नहीं जानती, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है।इंसान यह भूल गया है कि उस ऊपर वाले की भी अपनी एक अदालत है। उसका अपना एक ऐसा सख्त कानून है, जो हम इंसानों की नज़रों से बिल्कुल ओझल है। जब कोई इंसान जलन में अंधा होकर भगवान से किसी दूसरे का बुरा मांगता है, तो उसे यह रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं होता कि उसके इस घिनौने 'ऑर्डर' के बदले, देवलोक में उसके लिए कैसी भयानक सज़ा तैयार हो रही है।भगवान की उस अदृश्य अदालत में क्या होता है? दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वालों को ऊपर वाला कैसे जवाब देता है?**(क्रमशः...)**