एक नयी सोच Dabhi Manubhai द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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एक नयी सोच

"अगर आपको पता चले आप जिन्हें  महत्व दे रहे हैं उनके लिए आपका कोई महत्व ही नहीं है।"

हर इंसान को जीवन  में एक दोस्त चाहिए। दोस्त जो हमारे साथ हमेशा खड़ा हो, हमसे दूर होकर भी उसे हमारा ख्याल हो।

हर किसी की किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती की सबको एक अच्छा दोस्त मिले । कहते हैं ना जिंदगी में एक अच्छा दोस्त हो तो किसी चीज की जरूरत नहीं पड़ती।
हर दोस्त की पहचान तब होती हैं जब हम किसी मुसीबत में पड़ जाये। सच्चा दोस्त वहीं है जो हमारी हर खुशी में खुश हो और जब दुख हो तब हमारे कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहे।
अगर कोई व्यक्ति आप के सामने हद से ज्यादा लोगों की भूराई करे और आपकी हद से ज्यादा तारीफ करे तो ऐसे व्यक्तियों को अपना दोस्त समज्ञ ने की भुल ना करें। ऐसे लोग किसी के अपने नहीं होते क्योंकि वे लोग आपका काम ना पड़ने पर आपका कभी-भी साथ छोड़ सकते हैं।
इस दुनिया में हर एक इंसान अपने स्वार्थ के दोस्ती करता और काम ख़त्म होने पर मुड़ कर कभी देखते भी नहीं।सब लोग कहते हैं कि समय सबसे कित्ती है पर मैं कहती हूं कि भावनाएं ज्यादा कित्ती है इसलिए वो समझ सके उन्हीं पर खर्च करनी चाहिए। अगर समय चला जाए तो हमें सिर्फ उस बात का अफसोस होता है मगर एक बार विश्वास तुट जाए तो उसे जोडने में पूरी जिंदगी भी निकल जाती है।
दोस्त ऐसे बनाएं की जरूरत पड़ने पर सबसे पहले आपके साथ खड़े हो।जो लाखों की भीड़ में भी आपको याद करना कभी ना भूलें।
मुझे पता है ऐसे व्यक्ति आपको शायद ही कभी मिले। कहते हैं ना एक ग़लत इंसान आपकी पुरी जिंदगी बिगाड़ सकता है।
इसलिए मेरा मानना तो यही है अगर आपको भगवान ने माता पिता के रूप में बहुत अच्छे दोस्त दिये हि है तो बाहर इस मतलबी दुनिया में ढूंढने की कोई जरूरत ही नहीं है।
मे ये जरूर कह सकता हूं कि मेरे माता-पिता मेरे दोस्त हैं में उनसे पुरी बातें शेयर कर सकते हैं। 
आपको एक बात पता है कि आपके माता-पिता को आपकी कोनसी बात से सबसे ज्यादा दुख पहुंचा होगा।
चलो मैं ही बता देता हूं। हर एक ने अपने माता-पिता को ये तो जरूर ही कहा होगा " आपको समझ में नहीं आएगा, आपने हमारे लिए किया ही क्या है ।
कई बच्चों को अपने माता-पिता को स्कूल कोलेज में ले जाने से उनके पहनावे के कारण शर्म का अनुभव होता है।
हमारे माता-पिता को तो हमसे कभी शर्म नहीं आई अगर उन्हें भी हमारे साथ चलने से शर्म आने लगे तो हमे केसा लगेगा । ये सोच के ही बहुत अजीब लग रहा है।
हमारे माता-पिता को तो हमसे कभी शर्म नहीं आई अगर उन्हें भी हमारे साथ चलने से शर्म आने लगे तो हमे केसा लगेगा । ये सोच के ही बहुत अजीब लग रहा है।
जो मां नौ महीने हमें पेट में पालती है नौ महीने हमारा वजन उठाती है और जन्म देने के बाद भी और हमारे बड़े हो जाने पर भी खुब ख्याल रखती । हम बुढ़ापे में भी उनका सहारा नहीं बन सकते,उनका बोझ नहीं उठा सकते।
दुसरी तरफ पिता जो हमारे बिना कुछ बोले हमारी हर इच्छा पूरी कर देते हैं। क्या उनकी इच्छा पूरी करना हमारा कर्तव्य नहीं।
मुझे नहीं पता कि सबके पापा ऐसे हैं या नहीं पर मेरे पापा तो ऐसे ही हैं, बच्चो को कपड़े दिलाने के लिए खुद फटे पुराने कपड़े पहनते हैं। एक बाप अपने बच्चो की खुशी के लिए कुछ भी कर सकता है।
पर क्या हम उनके यही सब करते हैं या व्रृध्धा आश्रम छोड़ आते हैं।
क्या होता अगर यही बर्ताव हमारे माता-पिता ने भी हमारे साथ किया होता हमें भी अनाथालय में छोड़ दिया होता तो सोचा है हमारी जिंदगी केसी होती । सोचना भी मुश्किल है ना मुझे पता है।
दोस्तों बस आज इतना ही फिर मिलेंगे एक नयी सोच के साथ ।
I hope you guys are agree with me .
फिर मिलेंगे एक नयी सोच के साथ 
इस बारे में आप भी क्या सोचते हैं अपनी राय जरुर बताएं।
Good bye.