अध्याय 3: साल 1991 और वो आखिरी खत'हत्या' शब्द को देखकर अमित के माथे पर पसीना आ गया। वह जिस कमरे को एक शांत कोना समझकर आया था, वह असल में एक क्राइम सीन (Crime Scene) रह चुका था। अमित ने तुरंत पेन उठाया और कांपती उंगलियों से लिखा— "हत्या? लेकिन तुम्हारी हत्या किसने की राघव? और सुचित्रा कौन है?"
कमरे में हल्की सी ठंडक फिर बढ़ी, और मेज पर रखा फाउंटेन पेन अपने आप डोलने लगा। कागज पर नीली स्याही से शब्द उभरने लगा
"सुचित्रा... इस शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन की बेटी थी। और मैं? एक मामूली लेखक, जो अखबारों में छोटी-मोटी कहानियां लिखकर गुजारा करता था। हम दोनों एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे, लेकिन सुचित्रा के पिता को हमारा यह रिश्ता मंजूर नहीं था। जब उन्होंने सुचित्रा की शादी कहीं और तय कर दी, तो हमने तय किया कि हम इस शहर से दूर भाग जाएंगे।"
अमित बिना पलक झपकाए कागज को देख रहा था। पेन आगे लिख रहा था:
"30 अक्टूबर 1991 की वो रात थी। बाहर ऐसी ही कड़कड़ाती बिजली चमक रही थी जैसी आज चमक रही है। मैंने सुचित्रा को इसी कमरे में बुलाया था। मैंने उसके लिए एक आखिरी खत लिखा था, जिसमें हमारे भागने का पूरा प्लान था। लेकिन मेरे लिखने के ठीक दस मिनट बाद, कमरे का दरवाजा जोर से टूटा। सुचित्रा के पिता के भेजे हुए गुंडे अंदर आ धमके।"
अमित ने सांस रोककर लिखा— "फिर क्या हुआ राघव?"
"उन्होंने मुझसे वो खत छीनने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसे छिपा दिया। हाथापाई में उन्होंने मेरे सिर पर लोहे की रॉड से वार किया। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। दम तोड़ने से पहले मैंने देखा कि उन्होंने मेरे शव को एक हादसे का रूप देने के लिए स्टोर रूम की इसी दीवार के पीछे छिपाने की कोशिश की... और वो खत? वो खत आज भी इसी कमरे में कहीं महफूज़ है, जिसे सुचित्रा कभी पढ़ ही नहीं पाई। उसे लगा कि मैं डरकर भाग गया।"
अमित ने चौंककर कमरे के चारों तरफ देखा। उसे समझ आ गया कि मकान मालिक ने इस मेज को छूने से मना क्यों किया था। शायद मकान मालिक भी उस काले अतीत का कोई हिस्सा थे या फिर कुछ छुपा रहे थे।
अमित ने लिखा— "लेकिन राघव, पैंतीस साल हो गए। अब वह खत ढूँढने से क्या होगा? सुचित्रा अब कहाँ होगी?"
पेन ने आखिरी लाइन लिखी, जिसने अमित के रोंगटे खड़े कर दिए:
"सुचित्रा आज भी जिंदा है अमित। वह इसी शहर के 'शांति वृद्धाश्रम' में रहती है। वह आज भी हर रोज इस उम्मीद में केंट रोड की तरफ देखती है कि राघव अपना वादा निभाएगा। मेरी आत्मा को मुक्ति तब तक नहीं मिलेगी, जब तक वह खत सुचित्रा तक नहीं पहुँच जाता। अमित, क्या तुम वो खत ढूंढकर सुचित्रा तक पहुँचाओगे? क्या तुम मुझे इंसाफ दिलाओगे?"
अमित गहरे सोच में डूब गया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं थी, एक तड़पती हुई आत्मा की पुकार थी। जैसे ही अमित ने हामी भरने के लिए पेन उठाया, अचानक कमरे की खिड़की का कांच एक जोरदार धमाके के साथ टूट गया और पूरे घर की लाइट्स फिर से चली गईं।
अंधेरे में अमित को ऐसा लगा जैसे कोई भारी कदमों से उसके कमरे की तरफ बढ़ रहा हो...
[अध्याय 3 समाप्त]
Cliffhanger: क्या अमित को वो 35 साल पुराना खत मिलेगा? और अंधेरे में अमित के कमरे की तरफ कौन बढ़ रहा है?