(दस साल बाद की बारिश) ☔✨
इनकी मुहब्बत को दस साल बीत चुके थे।
फिर शुरू हुआ वही जुलाई का महीना…
वही पहली बारिश लेकिन इस बार दृश्य कुछ अलग थें...!
बालकनी में खड़ी एक छोटी सी नन्ही सी लड़की अपनी हथेलियाँ आसमान की तरफ फैलाए हँस रही थी , जैसे बारिश को वह अपनी मुठ्ठी में पकड़ना चाहती हो...
“मम्मा… देखो ना! बारिश फिर से आ गई!” आशा चिल्ला कर कहने लगी। वो बालकनी में ही खड़ी बारिश को देख देख कर उछल - कुद रही थी....
आईशा मुस्कुराने लगी।
उसकी आँखों में अब पहले जैसी घबराहट नहीं थी…
बस अब सुकून था।
आरिफ़ पीछे से आकर बोला,
“तुम्हें पता है आशा, तुम्हारी मम्मा से मेरी पहली मुलाक़ात भी ऐसी ही बारिश में हुई थी।”
“सच में पापा...?” आशा की आँखों में चमक आ गई ।
“हाँ… एक ही छाते के नीचे,” आशा को गले लगाते हुए आईशा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा कहा। आईशा ने आशा की हथेलियों में से बारिश की बुंदे ले कर आरिफ़ के चहरे पर छिड़क दी और दोनों मां - बेटी हंसने लगी...!
आशा शरारती अंदाज़ में बोली,
“तो आप दोनों को बारिश ने मिलवाया था?”
आरिफ़ ने हँसते हुए आशा के गालों को प्यार से छुते हुए कहा----
“और हर बार बचाया भी था...!”
तीनों बालकनी से नीचे उतर आए बारिश का मज़ा लेने ।
सड़क पर वही पुराना बस स्टॉप अब भी खड़ा था।
समय बदल गया था, लेकिन कुछ जगहें यादों की तरह अडिग रहती हैं।
आईशा ने आरिफ़ की तरफ देखा।
“याद है… यहीं से सब शुरू हुआ था?”
“और आज भी यहीं खड़े हैं,” उसने उसका हाथ थाम कर कहा ।
आशा बारिश में उछल-कूद कर रही थी।
उसकी हँसी में मासूमियत थी… और वह उनकी मोहब्बत की परछाईं भी थी ।
“पापा, आप मम्मा को फिर से प्रपोज़ करो ना!” आशा ने अचानक से कहने लगी...
दोनों हँस पड़े।
आरिफ़ ने बिना झिझक घुटनों के बल बैठते हुए कहा,
“आईशा… क्या तुम हर जन्म में मुझसे पहली बारिश में मिलोगी?”
आईशा की आँखें नम हो गईं।
“हाँ… लेकिन इस बार छाता मत लाना,” उसने मुस्कुराकर जवाब दिया।
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे भीगने से डर नहीं लगता…
क्योंकि मैं जानती हूँ, की तुम हमेशा मेरे साथ हो।”
बारिश और तेज़ हो गई।
आसमान भी जैसे उनके वादे का गवाह बन गया हो।
दस साल पहले एक अनजानी सी मुलाक़ात थी…
फिर जुदाई, शक, दर्द, इम्तिहान…
लेकिन हर बार बारिश ने उन्हें टूटने नहीं दिया।
आज वही बारिश उनकी बेटी की हँसी में बदल चुकी थी।
आरिफ़ ने आईशा के कान में धीरे से कहा,
“शुक्रिया… उस दिन छाते के नीचे रुकने के लिए।”
आईशा ने भी मुस्कुराते हुए उसका हाथ थाम कर कहा....
“शुक्रिया… हर तूफान में मेरा हाथ थामे खड़े रहने के लिए।”
और उस शाम,
बारिश सिर्फ़ एक मौसम ही नहीं थी —
वो कभी ना भूलने वाली एक याद भी बन चुकी थी,
वो एक ऐसा वादा भी बन चुका था, जो हर मुश्किल घड़ी में साथ खड़ा रहना जानता हो । उनकी मुहब्बत एक पूरा हुआ सपना बन चुका था।
कभी-कभी पहली मुलाक़ात सच में आख़िरी मंज़िल बन जाती है।
बस शर्त ये है…
कि दो लोग हर बारिश में साथ भीगने को तैयार रहें। और हर मुश्किल घड़ी में भी अपनी मुहब्बत का साथ कभी ना छोड़ें...☔❤️✨
आशा दौड़ती हुई मम्मा - पापा से लिपट कर कहने लगी....
मम्मा मासी भी यहां होती तो कितना अच्छा होता...
आरिफ़ और आईशा एक दूसरे को देखने लगें...
कितने दिन हो गए उसे देखे हुए....?
दोस्तों मेरी कहानी से जुड़े रहने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ❤️,
रिया कहां है...? किस हाल में है...?
और आने वाले दिनों में इन मुहब्बत करने वालों कि जिंदगी में कौन सा नया मोड़ आने वाला है जानने के लिए इस कहानी से जुड़े रहें...। और रेटिंग देना न भूलें, शुक्रिया आप सभी का।