अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 7 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 7


अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 7 : भूली हुई पहचान
पूरा पुस्तकालय टूट रहा था।
विशाल अलमारियाँ एक-एक करके गिर रही थीं।
हजारों किताबों के पन्ने हवा में उड़ रहे थे।
कहीं आग की लपटें उठ रही थीं तो कहीं काला धुआँ फैल रहा था।
लेकिन इस विनाश के बीच भी अनन्या के कानों में सिर्फ एक बात गूँज रही थी—
"आज से तुम्हारा नाम आर्या नहीं रहेगा..."
"आज से तुम अनन्या कहलाओगी..."
उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था।
"नहीं..."
"यह सच नहीं हो सकता।"
उसने खुद से कहा।
लेकिन भीतर कहीं न कहीं उसे महसूस हो रहा था कि वह दृश्य सिर्फ भ्रम नहीं था।
वह कोई पुरानी याद थी।
एक ऐसा अतीत...
जिसे उससे छिपाया गया था।
सफेद आँखों वाला आदमी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा।
उसके चेहरे पर अजीब मुस्कान थी।
"अब समझी?"
उसने कहा।
"तुम्हें इस किताब ने यूँ ही नहीं चुना।"
"तुम हमेशा से इसका हिस्सा थीं।"
अनन्या पीछे हट गई।
"झूठ!"
"सब झूठ है।"
आदमी हँस पड़ा।
"अगर झूठ है तो तुम्हें उन यादों से डर क्यों लग रहा है?"
अनन्या चुप हो गई।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
उसी समय वह रहस्यमयी लड़की, जो खुद को असली अनन्या कह रही थी, उसके सामने आ गई।
"उसकी बात मत सुनो।"
उसने कहा।
"वह तुम्हें भ्रमित करना चाहता है।"
लेकिन इस बार अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।
और पहली बार उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
उस लड़की की आँखों में डर था।
ऐसा डर जो सच छिपाने वाले इंसान की आँखों में होता है।
"तुम मुझसे क्या छिपा रही हो?"
अनन्या ने पूछा।
लड़की कुछ सेकंड तक चुप रही।
फिर धीरे से बोली—
"कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें जानना खतरनाक होता है।"
"लेकिन मैं अब और झूठ नहीं सुनना चाहती।"
अनन्या ने दृढ़ आवाज में कहा।
"मुझे सब जानना है।"
तभी उसके सामने एक और किताब हवा में तैरती हुई आ गई।
यह किताब बाकी सभी किताबों से अलग थी।
इसका कवर पूरी तरह काला था।
और उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"स्मृतियाँ"
जैसे ही अनन्या ने किताब को छुआ...
उसके चारों तरफ की दुनिया बदलने लगी।
वह अब पुस्तकालय में नहीं थी।
वह एक पुराने आश्रम में खड़ी थी।
बारिश हो रही थी।
चारों तरफ घना अंधेरा था।
आश्रम के अंदर कुछ लोग इकट्ठा थे।
और उनके बीच एक छोटी लड़की खड़ी थी।
लगभग दस साल की।
डरी हुई।
रोती हुई।
अनन्या ने उसे देखते ही पहचान लिया।
वह आर्या थी।
"इसे बचाना होगा।"
एक बूढ़े साधु ने कहा।
"अगर लेखक को पता चल गया कि यह जीवित है, तो सब खत्म हो जाएगा।"
एक महिला ने पूछा—
"लेकिन हम इसे कहाँ छिपाएँगे?"
साधु ने लड़की की तरफ देखा।
"इसकी पहचान बदल दो।"
"इसकी सारी यादें मिटा दो।"
"और इसे ऐसी जगह भेज दो जहाँ लेखक कभी न पहुँच सके।"
अनन्या का दिल जोर से धड़कने लगा।
क्योंकि अगले ही पल...
साधु ने उस छोटी लड़की के सिर पर हाथ रखा।
और कहा—
"आज से तुम आर्या नहीं..."
"अनन्या हो।"
दृश्य अचानक टूट गया।
अनन्या वापस पुस्तकालय में आ गई।
उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।
अब वह काँप रही थी।
क्योंकि उसने अपनी आँखों से देख लिया था।
यह कोई झूठ नहीं था।
यह सच था।
बहुत भयानक सच।
"तो मैं..."
उसकी आवाज भर्रा गई।
"मैं ही आर्या हूँ?"
पूरे पुस्तकालय में सन्नाटा छा गया।
सफेद आँखों वाला आदमी मुस्कुरा उठा।
जबकि वह लड़की, जो खुद को असली अनन्या कहती थी, चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी रही।
यह उसकी चुप्पी ही जवाब थी।
अनन्या की आँखों में आँसू भर आए।
"मेरी सारी यादें..."
"मेरा बचपन..."
"सब झूठ था?"
"नहीं।"
लड़की ने पहली बार जवाब दिया।
"तुम्हारा जीवन झूठ नहीं था।"
"लेकिन तुम्हारी पहचान छिपाई गई थी।"
अनन्या की दुनिया बिखर चुकी थी।
जिसे वह अपना अतीत समझती थी...
वह अधूरा था।
जिसे वह अपनी पहचान समझती थी...
वह पूरी नहीं थी।
और अब उसे समझ आ रहा था कि अधूरी किताब उससे इतनी जुड़ी क्यों थी।
क्योंकि वह खुद उस कहानी का हिस्सा थी।
अचानक पुस्तकालय की छत पर एक विशाल दरार उभर आई।
काले धुएँ का तूफान अंदर घुस आया।
सफेद आँखों वाला आदमी जोर से हँसा।
"अब कोई मुझे नहीं रोक सकता।"
"क्योंकि उसे सच पता चल चुका है।"
"और यही आखिरी ताला था।"
अनन्या चौंक गई।
"कौन-सा ताला?"
आदमी ने दोनों हाथ फैला दिए।
"तुम्हारी यादें।"
"जब तक तुम्हें अपनी असली पहचान याद नहीं थी, मैं कैद था।"
"लेकिन अब..."
उसकी आवाज भयानक हो गई।
"मैं आज़ाद हूँ।"
अचानक पूरी लाइब्रेरी काँपने लगी।
हजारों किताबें एक साथ खुल गईं।
उनके पन्नों से काला धुआँ निकलने लगा।
मानो हर कहानी का अंधेरा बाहर आ रहा हो।
अनन्या भय से यह सब देख रही थी।
तभी अधूरी किताब उसके सामने प्रकट हुई।
वह हवा में तैर रही थी।
उसके पन्ने अपने आप खुल गए।
और उनमें नए शब्द उभरने लगे—
"यदि लेखक मुक्त हो गया..."
"तो हर कहानी समाप्त हो जाएगी।"
"हर आत्मा नष्ट हो जाएगी।"
"और वास्तविक दुनिया भी।"
अनन्या का दिल बैठ गया।
"नहीं..."
"यह नहीं हो सकता।"
उसी समय अचानक एक नई आवाज गूँजी।
बहुत पुरानी।
बहुत शक्तिशाली।
"हो सकता है।"
सबने मुड़कर देखा।
पुस्तकालय के सबसे दूर वाले हिस्से में एक बूढ़ा व्यक्ति खड़ा था।
लंबी सफेद दाढ़ी।
सफेद वस्त्र।
हाथ में लकड़ी का दंड।
उसे देखते ही सफेद आँखों वाले आदमी का चेहरा बदल गया।
पहली बार उसके चेहरे पर डर दिखाई दिया।
"तुम..."
वह फुसफुसाया।
"यह असंभव है।"
बूढ़ा व्यक्ति शांत स्वर में बोला—
"मैंने कहा था..."
"एक दिन मैं लौटूँगा।"
अनन्या हैरान थी।
लेकिन अगले ही पल उसके होश उड़ गए।
क्योंकि उसने इस बूढ़े आदमी को पहले भी देखा था।
उसी स्मृति में।
उसी आश्रम में।
यही वह साधु था जिसने आर्या की पहचान बदलकर उसे अनन्या बनाया था।
साधु ने सीधे उसकी तरफ देखा।
और कहा—
"समय आ गया है कि तुम अधूरी किताब का सबसे बड़ा रहस्य जानो।"