— ✦ —
**चैप्टर 5: इंग्लिश वाली मैडम, 'डोरेमोन' का रिज़, और कंपास की नोक**
आज के दिन की शुरुआत किसी न्यूज़ चैनल की 'ब्रेकिंग न्यूज़' जैसी हुई।
पहली खबर: क्लास के दो-तीन बच्चे आज गायब हैं।
दूसरी और सबसे सनसनीखेज़ खबर: जिन बच्चों ने आज होमवर्क नहीं किया है, उनके नाम हैं — 'करन कुंद्रा' और 'तेजा'।
रुक जाओ।
मैंने अपना लकड़ी का सिर खुजलाया — काल्पनिक रूप से।
करन और तेजा? भाई, मैं किसी स्कूल में हूँ या बिग बॉस के सेट पर? कहीं मैं ग़लती से किसी कलर्स टीवी के डेली सोप में तो नहीं आ गया?
खैर, छोड़ो। आजकल के माँ-बाप भी टीवी देखकर ही बच्चों के नाम रख देते हैं। एक दिन कोई बच्चा 'बिग बॉस' नाम से स्कूल आएगा और तब किसी को अजीब नहीं लगेगा।
**लंच ब्रेक, 'RomCom' वाली फील** ,
लंच की घंटी बजी।
टन-टन-टन!
और जैसा हर दिन होता है — पिंजरे का दरवाज़ा खुल गया।
लड़के भागे। टिफिन खुले। शोर मचा।
मैं क्लास के एक कोने में एक अलग कहानी नोटिस कर रहा था।
वो लड़का जो हमेशा किताबों में डूबा रहता था — एकदम चुप, एकदम अलग — वो क्लास की एक लड़की के पास जाकर बैठ गया था। आहिस्ता। जैसे पानी में पत्थर फेंको और लहरें न उठें।
लड़की — जिसका नाम मुझे अभी तक पता नहीं चला — उसे अपनी टिफिन से कुछ खिला रही थी।
दोनों ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे दुनिया में बस वही दो लोग बचे हों।
अरे वाह...
एकदम 'RomCom' वाला सीन। मतलब — जो anime में होता है ना, जहाँ दो बिल्कुल अलग दुनिया के लोग चुपचाप एक-दूसरे के पास आ जाते हैं, बिना किसी drama के, बिना किसी बड़े gesture के — बस एक टिफिन और एक मुस्कान।
क्लास के गुंडों, छपरियों और भविष्य के बेरोज़गार नेताओं के बीच — कम से कम कोई तो ढंग का रोमांस जी रहा था।
राइटर साहब, इस जोड़ी को बचाकर रखिएगा। दुनिया में थोड़ी मिठास भी रहनी चाहिए।
लेकिन मेरी किस्मत में तो क्रिंज देखना ही लिखा था।
**गजेंद्र का स्ट्राइक-2**
उसी लंच ब्रेक में गजेंद्र प्रताप सिंह शेखावत ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई।
वो उस प्यारी सी लड़की के पास गया।
आज लड़की घर से पराठे लाई थी। वो चुपचाप खिड़की के पास बैठकें खा रही थी, बाहर की तरफ देखते हुए। उसकी यही आदत थी हमेशा खिड़की के बाहर देखना।
जैसे उसे पता हो कि असली दुनिया कहीं बाहर है।
"तुम्हारे... तुम्हारे पराठे बहुत अच्छे लग रहे हैं।"
गजेंद्र ने बातचीत शुरू की।
गजेंद्र भाई... खाना देखकर बातचीत? ये Date नहीं, स्कूल है।
रिया ने हल्की-सी मुस्कान दी।
"हाँ, मेरी मम्मी ने बनाए हैं।"
फिर एक पल रुककर उसने कहा — "वैसे... कल तुमने अपना नाम बताया था ना? मैं भूल गई।"
वाह।
पूरे 'शेखावत साम्राज्य' को शांति से धुंध में मिला दिया। स्मार्ट मूव।
"गजेंद्र," उसने जवाब दिया।
और फिर — जैसे गजेंद्र रातभर "How To Impress A Girl" वाले YouTube Shorts देखकर आया हो — उसने कॉलर ठीक किया।
जबकि कॉलर पहले से ठीक था।
भारी आवाज़ में बोला — "पता है? मैंने कल एक बहुत खतरनाक एनीमे देखा।"
उस लड़की के आँखों में चमक आ गई।
"सच में?" उत्साह से, उसने पूछा कि ऐसा क्या देख लिया =="कौन सा? डेमन स्लेयर? जुजुत्सु कैसेन? चेनसॉ मैन?"==
गजेंद्र ने एक कूल-सी स्माइल दी।
और बोला —
"हे हे... डोरेमोन।"
...
...
सन्नाटा।
पूरा ब्रह्मांड कुछ सेकंड के लिए शांत हो गया।
उस सुंदर लड़की का चेहरा ऐसे खाली हो गया जैसे किसी ने TV का प्लग निकाल दिया हो। आँखों में जो चमक थी, वो डोरेमोन के 'Small Light' गैजेट के साथ कहीं सिकुड़ गई।
अबे बेवकूफ़!
मैं अपने अंदर चीख उठा।
तूने गेम ओवर कर दिया! डोरेमोन एनीमे है — ठीक है, मैं मानता हूँ। लेकिन किसी anime fan लड़की को इम्प्रेस करने के लिए कौन नोबिता-जियान की बात करता है भाई? तेरा रिज़ माइनस में नहीं है — तेरा रिज़ पाताल लोक पार करके किसी दूसरे Dimension में जा चुका है!
प्यारी लड़की ने चुपचाप अपना टिफिन बंद किया।
"हम्म... अच्छा है।"
और वहाँ से चली गई।
गजेंद्र अपना पराठा सूखी आँखों से चबाता रह गया।
मुझे पहली बार उसके लिए थोड़ा दुख हुआ।
और भी बहुत कुछ बचा है बताने को, पर सब के बारे में बोलूँगा तो कहानी लंबी और बोरिंग हो जाएगा।
इसी तरह लंच ब्रेक खत्म होता है— टन-टन-टन!
**द ग्रैंड एंट्री: इंग्लिश वाली मैडम**
दिन का सबसे बड़ा हाइलाइट तब आया जब लंच ब्रेक खत्म हुआ।
क्लास का दरवाज़ा खुला और...
भाई साहब।
समय जैसे धीमा हो गया।
राजस्थान की उस तपती दोपहर में — जहाँ बाहर लू चल रही थी और पंखा सिर्फ गर्म हवा को एक जगह से दूसरी जगह धकेल रहा था — नई इंग्लिश मैडम क्लास में आ चुकी थीं।
उन्होंने भूरे रंग की एक बेहद खूबसूरत साड़ी पहनी हुई थी। वो वाली साड़ी जिसे देखकर लगे कि किसी ने सुबह उठकर सोचा हो — "आज तबाही मचानी है।"
क्लास के सारे लड़कों की आँखें ऐसे खुली की खुली रह गईं जैसे उन्होंने जीवन में पहली बार 'Apple' देखा हो।
और लड़कियाँ?
उनके चेहरों पर जो भाव था, उसे बोतल में भरकर बेचा जाए तो पूरी क्लास अमीर हो जाए।
मैडम ने क्लास के नए बच्चों की तरफ देखा और एक बहुत ही मोटिवेशनल आवाज़ में कहा, "तुम सब क्लास 11 में नए आए हो। इंग्लिश से डरना नहीं है। आज बस बेसिक समझते हैं।"
उन्होंने बोर्ड पर लिखा— Noun.
"Noun मतलब जो भी चीज़ मौजूद है...
मैडम पढ़ाते-पढ़ाते मेरी बेंच के पास आईं और हल्का-सा टेक लेकर खड़ी हो गईं।
ओह माय गॉड।
मेरी लकड़ी की नसें झनझना उठीं।
मैं एक बेंच हूँ, पर मेरा दिल — जो कि है ही नहीं — तेज़ी से धड़कने लगा।
मैडम जी, आप ऐसे पास आकर मत खड़े होइए...
लेकिन तभी मेरा ज़मीर जाग गया।
अबे ओ सतोशी! क्या कर रहा है तू? कंट्रोल, मजनू, कंट्रोल! तू लकड़ी है — लकड़ी बनकर रह! अगर बेंचों को भी प्यार होने लगता तो स्कूलों में अब तक बहुत बड़ा संकट आ चुका होता!
वैसे, अगर यह कहानी चेतन भगत लिख रहा होता, तो वो पक्का इस मैडम को "हाफ-टीचर" बना देता। तीन सौ पेज की नॉवेल होती — हीरो पहले IIT जाता, फिर फेल होता, फिर मैडम के पीछे भागता, और आखिर में कोई ऐसा 'Life Lesson' सीखता जो हम सबको पहले से पता होता।
और अगर कोई आजकल का सिग्मा मेल पॉडकास्टर यह सीन देख लेता, तो तुरंत ज्ञान देना शुरू कर देता —
"ये सब मोह-माया है। मैट्रिक्स से बाहर निकलो। ग्राइंड करो।"
भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि मेरे राइटर साहब थोड़े समझदार हैं।
थोड़े।
मैडम पढ़ा रही थीं।
आगे बढ़ने से पहले में तुम्हे टेन्स की बेसिक जानकारी दे देती हूं।
Past
Present
Future —
मैं भी ध्यान से सुन रहा था। बेंच होने का मतलब यह नहीं कि मैं अशिक्षित हूँ।
तभी कॉरिडोर से भारी कदमों की आवाज़ आई।
PT सर।
जिनकी एक सीटी से पूरा स्कूल सीधा हो जाता था। जिनकी आवाज़ सुनकर लड़के चुपचाप अपनी-अपनी जगह बैठ जाते थे। जो रोज़ सुबह Assembly में माइक के बिना के भी पचास मीटर दूर तक सुनाई देते थे।
वो क्लास के दरवाज़े के पास पहुँचे।
और अचानक उनके कदम धीमे हो गए।
ठीक उसी पल मैडम का हाथ भी रुका।
मार्कर उनकी उँगलियों से फिसला।
टक!
मार्कर फर्श पर गिर गया।
मैडम ने धीरे से मुड़कर दरवाज़े की तरफ देखा।
PT सर ने भी — नज़रों के कोने से — उनकी तरफ देखा।
एक पल।
बस एक पल।
और उन दोनों के चेहरे पर एक बहुत हल्की-सी मुस्कान तैर गई — जैसे कोई पुराना गाना अचानक याद आ जाए।
मैडम ने शर्माते हुए नज़रें झुका लीं। अपने बालों की एक लट कान के पीछे कर ली।
भाई साहब...
मैं अंदर ही अंदर उछलने लगा।
यहाँ बोर्ड पर Past Tense पढ़ाया जा रहा है और बाहर Future Tense की तैयारी चल रही है! और Present Tense में क्लास का कोई बच्चा इस पर ध्यान नहीं दे रहा — बस मैं हूँ। एक खामोश बेंच। इस क्लासरूम का सबसे बड़ा gossip source।
अगर मेरे पास मुँह होता, तो अब तक सीटियाँ बजा-बजाकर पूरी क्लास इकट्ठी कर चुका होता।
PT सर आगे बढ़ गए।
लेकिन मैडम अगले दो मिनट तक बोर्ड की तरफ पीठ करके मुस्कुराती रहीं।
और वो मार्कर?
वो वहीं फर्श पर पड़ा रहा।
जैसे उसे भी पता हो कि अभी उठना कहानी के खिलाफ होगा।
**छुट्टी का वक़्त और एक उलझन**
आखिरी घंटी बजी।
टन-टन-टन!
"सब बैग पैक करो! लड़कियाँ पहले बाहर जाएँगी, लड़के अपनी जगह बैठे रहेंगे।"
सभी लड़कियाँ — वीरेंद्र, गायत्री, काव्या, और वो प्यारी लड़की — लाइन बनाकर बाहर चली गईं।
हम लड़के — और मैं, एक मेल बेंच — क्लास में इंतज़ार करते रह गए।
शायद कल किसी ने कोई कांड किया था।
पीछे कुछ लड़के खुसुर-पुसुर कर रहे थे। मेरी सुनने की range वहाँ तक नहीं थी। लेकिन मुझे पूरा यक़ीन है कि या तो किसी का cycle का टायर पंक्चर होने वाला था, या स्कूल के बाहर किसी के साथ 'settlement' होने वाला था।
दोनों की संभावना समान थी।
तभी मेरे दिमाग की बत्ती जली।
रुको एक मिनट...
वो सपना जो मुझे बार-बार आता है — वो पुराना क्लासरूम, वो धुंधले चेहरे, वो खाली सीट।
रोल नंबर 21।
उसने भी उसी खाली सीट को देखा था।
क्या ऐसा तो नहीं कि मैं सिर्फ किसी दूसरी दुनिया में नहीं आया?
क्या ऐसा तो नहीं कि ये कहीं न कहीं मेरा अपना अतीत है?
और अगर यह सच है —
तो वो खाली सीट किसकी थी?
मैं इस सवाल के साथ बैठा था कि तभी पीछे वाले लड़कों में से एक उठा।
उसने जेब में हाथ डाला।
कुछ नुकीला बाहर निकाला।
और धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगा।
चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान।
"ये नई बेंच है ना?" उसने कहा। "चलो, इस पर अपना नाम लिखते हैं।"
उसके हाथ में कंपास की नोक चमक रही थी।
अरे नहीं!
कोई बचाओ!
ये मेरी लकड़ी चीरने आ रहा है!
मैं भाग नहीं सकता।
हिल नहीं सकता।
चीख नहीं सकता।
बस इंतज़ार कर सकता हूँ।
और यही सबसे बड़ा दर्द है।
जापानी Isekai के हीरो जादुई तलवार मिलती है।
मुझे कंपास मिला है।
वो भी किसी और के हाथ में।
यही है मेरी ज़िंदगी।
वे लोग नाम लिखकर चले गए। रात को कुछ नहीं हुआ और मैंने चैन की नींद ली। शायद इस बार मुझे सपने में कुछ याद नहीं आया...
बाकी चैप्टर 6 में पढ़ना बाबू!
— ✦ —