अध्याय 17 मीनाक्षी जिंदल का आगमन
दो दिन बीत चुके थे।
विराज अपने घर के आगे के आंगन में विशाल वृक्ष की घनी छाल के नीचे आराम कुर्सी पर बैठा हुआ था। सुबह की सुनहरी धूप पत्तियों के बीच से छनकर उसके शरीर पर बिखर रही थी। मंद-मंद बहती ठंडी हवा में पक्षियों की कलरव और बगीचे के फूलों की सुगंध घुली हुई थी। उसके हाथ में कांच के ठंडे गिलास में ताजे फलों का शरबत था, जिसे रामू ने अभी-अभी बनाकर दिया था।
चूंकि उसने अत्यधिक तेजी से अपने साधना के मार्ग पर प्रगति की थी, इसीलिए अब उसके लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया था कि वह रुककर अपने स्तर को पक्का करे। यदि उसने ऐसा नहीं किया तो यह उसकी भविष्य की साधना के लिए घातक सिद्ध हो सकता था।
तभी उसके घर के मुख्य द्वार पर धीमी लेकिन स्पष्ट दस्तक हुई।
धक-धक-धक—
रामू, जो आंगन के कोने में शांति से बैठा था, झट से खड़ा हो गया और तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ा। उसने धीरे से दरवाजा खोल दिया।
दरवाजा खुलते ही उसके सामने एक दिव्य सुंदरी खड़ी थी। लगभग बीस वर्ष की वह युवती ऐसी थी मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से धरती पर उतर आई हो। उसके लंबे, घने और चमकदार काले बाल उसके कंधों से होते हुए उसकी पतली कमर तक लहराते हुए आ रहे थे। उसका चेहरा चंद्रमा के समान गोल और दीप्तिमान था, जिस पर एक अलौकिक चमक बिखर रही थी। उसका शरीर अत्यंत सुगठित और आकर्षक था।
यह लड़की और कोई नहीं बल्कि दिनेश सिंह की बेटी पल्लवी थी।
वैसे तो पल्लवी भी बहुत ज्यादा सुंदर थी, लेकिन रवीना के मुकाबले वह कुछ भी नहीं थी। जिस प्रकार दीपक के सामने जुगनू की चमक फीकी पड़ जाती है, उसी प्रकार पल्लवी की सुंदरता रवीना के समक्ष मामूली प्रतीत होती थी।
और रही बात पल्लवी के स्वभाव की, तो उसका व्यवहार अपने पिता दिनेश सिंह से बिल्कुल विपरीत था।
और पल्लवी सुरेश चौहान के परिवार से नफरत नहीं करती थी। परिवारों के बीच हो रही यह प्रतिस्पर्धा, यह आपसी द्वेष और कटुता — वह इन सबसे बिल्कुल विपरीत थी। परंतु वह अपने माता-पिता के विरुद्ध नहीं जा सकती थी। वह उनकी आज्ञाकारी पुत्री थी, और उनके प्रति उसके मन में असीम श्रद्धा थी। इसीलिए न चाहते हुए भी, अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही, वह अनिच्छा से उनका हिस्सा थी। वह चाहती थी कि यह प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो, परंतु उसके बस में यह नहीं था।
परंतु उसने सुरेश चौहान की बेटी रवीना के साथ, जो उससे उम्र में छोटी होने के कारण उसे अपनी छोटी बहन जैसी लगती थी, बहुत ही स्नेहपूर्ण और मधुर संबंध बना रखे थे।
रही बात विराज की... बेशक रवीना से उसकी शादी हो चुकी थी, फिर भी पल्लवी शुरू से ही इस शादी के खिलाफ थी। उसका मानना था कि रवीना, जो इतनी प्रतिभाशाली, सुंदर और सभ्य थी, उसके लिए कहीं अधिक योग्य वर मिल सकता था। विराज उसकी दृष्टि में रवीना की तुलना में कुछ भी नहीं था। लेकिन रवीना की खुशी की खातिर, अपनी छोटी बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए, उसने विराज को स्वीकार कर लिया था।
पल्लवी बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे आंगन में जहां विराज बैठा था, वहां पहुंच गई। उसके कदमों की आहट से विराज ने ऊपर देखा। पल्लवी सामने खड़ी थी। विराज ने बिना कुछ कहे हाथ के इशारे से उसके सामने वाली कुर्सी की ओर संकेत किया — उसे बैठने के लिए कहा।
तभी रामू तुरंत अंदर गया और कुछ ही पलों में साफ सुथरे कांच के एक और गिलास में ठंडा-ठंडा फलों का जूस भरकर ले आया। उसने आदरपूर्वक वह गिलास पल्लवी के सामने रखा और चुपचाप घर के कमरे में चला गया।
विराज ने उदासीन और निर्लिप्त भाव से कहा "आप यहां क्यों आई हो?"
यह सवाल इतना कठोर और अप्रत्याशित था कि पल्लवी स्तब्ध रह गई। बेशक विराज पहले भी कम बातें करता था — यह बात वह जानती थी। लेकिन उसने कभी भी उसे इतना उदासीन, इतना रूखा और इतना बेपरवाह व्यवहार करते हुए नहीं देखा था। आज वह जैसे कोई जीवित मूर्ति हो, जिसमें संवेदनाओं का पूर्णतया अभाव हो। अपने अंदर उठते गुस्से और आहत आत्मसम्मान को दबाते हुए उसने एक गहरी, लंबी सांस ली। उसने अपनी आंखों में एक अजीब सी चमक लाते हुए कहा "कुछ दिन पहले मैंने 'लघु चरण योद्धा' का चरण पार कर लिया है। और आज मेरा जन्मदिन भी है। इसीलिए इंदौर शहर में उपस्थित नालंदा गुरुकुल की उपशाखा के अपने सभी मित्रों और सहयोगियों को आज रात मैं एक पार्टी देने वाली हूं।"
"वैसे तो यह हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ी बात है कि नई पीढ़ी में रवीना के बाद दूसरी लड़की के रूप में मैं उच्च लड़ाकू योद्धा बन चुकी हूं," पल्लवी ने गर्व के साथ कहा, "परंतु इस समय सभी लोग दादी मां के जन्मदिन की तैयारी में इतने व्यस्त हैं कि मेरे इस उपलब्धि पर ध्यान ही नहीं दे पा रहे हैं। इसी कारण से मेरे पिताजी ने मुझसे कहा है कि — 'तुम केवल अपने दोस्तों के साथ इस बार अपना जन्मदिन मना लो, अगली बार कोई दूसरी खुशी होने पर हम उसे बहुत धूमधाम से मनाएंगे।'"
पल्लवी की आवाज में एक हल्की सी ठेस थी, यह बात उसे अच्छी नहीं लगी थी कि उसकी सफलता को इतनी आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया था।
विराज, जो अब तक चुपचाप सुन रहा था, उसकी सारी बातें सुनकर ऊब चुका था। उसने बड़ी उदासीनता से कंधा उचकाते हुए कहा "इन सब बातों से मेरा क्या लेना-देना है?"
ये शब्द तीर की तरह सीधे पल्लवी के हृदय में चुभ गए।
पल्लवी ने हल्का सा गुस्सा धरण करते हुए साफ-साफ कहा "मैंने अपनी छोटी बहन रवीना से वादा किया था कि जब मैं 'उच्च लड़ाकू योद्धा' के स्तर में कदम रख लूंगी, तो उसके पूरे परिवार को पार्टी दूंगी।"
"अब उसका पूरा परिवार मगध साम्राज्य की राजधानी के नालंदा गुरुकुल में चला गया है। और बस पीछे तुम्हें छोड़ गए हैं।"
उसने अपने पोटली में से एक लिफाफा निकाला और सामने रखी मेज पर जोर से रखते हुए कहा "बस अब तुम्हें निमंत्रण देने आई हूं।"
इतना कहकर वह तुरंत खड़ी हो गई और बिना पीछे देखे तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ चली।
पल्लवी के तेज कदमों से चले जाने के बाद आंगन में एक गहरी शांति छा गई।
विराज ने अपना जूस धीरे-धीरे पीकर पूरा खत्म कर दिया। जैसे उसे इस दुनिया की अन्य बातों से कोई मतलब ही नहीं है। फिर उसने गिलास को मेज पर धीरे से रख दिया। फिर उसकी दृष्टि मेज पर रखे उस सुनहरे लिफाफे पर गई, जिसे पल्लवी ने क्रोधित होकर रखा था।
विराज ने झुककर वह लिफाफा उठाया और उसे पढ़ने लगा। वैसे इस लिफाफे के जरिए ही वह होटल के अंदर प्रवेश कर सकता था। बिना इसके वहां प्रवेश वर्जित था।
विराज ने लिफाफे को अपने पास सुरक्षित रख लिया।
और कुछ देर बाद वह घर से बाहर निकल पड़ा, और सीधा 'दिव्य नीलामी कला केंद्र' की ओर चलने लगा।
दरअसल, वह अपने द्वारा मारे गए पहले चरण के अस्सी आध्यात्मिक जानवरों को बेचने के लिए जा रहा था। ये जानवर उसने उस समय मारे थे जब वह साधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक सामग्रियों की तलाश में था। लेकिन अब उसे उनकी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि काल मुख घाटी में मिली रहस्यमयी चीजों की वजह से उसे वे सभी दुर्लभ सामग्रियां प्राप्त हो गई थीं, जिनकी उसे भविष्य में साधना के लिए आवश्यकता थी।
परंतु उसके सामने एक समस्या थी — अब उसे पल्लवी के जन्मदिन के लिए एक उचित और मूल्यवान उपहार देना था।
पल्लवी ने भले ही उसे कठोरता से निमंत्रण दिया हो, लेकिन वह खाली हाथ नहीं जाना चाहता था। इसके अलावा, कुछ ही दिनों में चौहान परिवार की राजमाता शकुंतला चौहान का जन्मदिन भी आने वाला था। उन्हें भी एक ऐसा उपहार देना था जो उनके सम्मान और प्रतिष्ठा के अनुरूप हो।
इसलिए वह उन शिकार किए गए आध्यात्मिक जानवरों को बेचने जा रहा था।
वहीं दूसरी ओर...
दिव्य नीलामी कला केंद्र के मुख्य दरवाजे से सामान्य लोग, छोटे व्यापारी, आदि जनता अंदर प्रवेश करती थी।
लेकिन इस भव्य मुख्य दरवाजे के बिल्कुल विपरीत दिशा में, इस कला केंद्र के पीछे की तरफ, एक और दरवाजा बना हुआ था। यह दरवाजा दिखने में अत्यंत मोहक था। इसके आसपास कोई भीड़ नहीं होती थी, न ही कोई शोरगुल।
यह दरवाजा 'दिव्य नीलामी कला केंद्र' में आने वाले विशेष मेहमानों, अत्यधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों, खास लोगों, या उन सम्मानित नागरिकों के लिए ही उपलब्ध था, जिनका समाज में एक अलग स्थान हो। इसके लिए व्यक्ति के पास पहले से ही मंजूरी होनी चाहिए, या फिर केंद्र के संचालकों की ओर से विशेष निमंत्रण प्राप्त होना चाहिए।
परंतु आज इस दरवाजे के बाहर एक दुर्लभ दृश्य था।
'दिव्य नीलामी कला केंद्र' के संचालक जगदीश मित्तल स्वयं वहां खड़े थे। और उनके हाथों में विभिन्न सुगंधित पुष्पों से बनी एक बहुत बड़ी और सुंदर माला थी। उनके साथ उनके कई वरिष्ठ कर्मचारी भी खड़े थे, जो बिल्कुल सावधान मुद्रा में, किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे।
सभी की निगाहें एक ही दिशा में थी — उस सड़क की ओर, जहां से अतिथि आने वाले थे।
कुछ ही पलों बाद, दूर से घोड़े की टापों की आवाज सुनाई दी। वह घोड़ागाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी और अंततः ठीक उस विशेष दरवाजे के सामने जाकर रुक गई।
तुरंत ही जगदीश मित्तल के चेहरे पर एक विस्तृत और सम्मानपूर्ण मुस्कान बिखर गई। वह अपने स्थान से तेजी से बड़ा, माला को हाथों में थामे हुए, घोड़ागाड़ी के पास पहुंच गया। वह घोड़ागाड़ी के दरवाजे के ठीक सामने इस तरह खड़ा हो गया जैसे कोई द्वारपाल अपने स्वामी के आगमन पर खड़ा होता है।
घोड़ागाड़ी चलाने वाला नौकर तुरंत नीचे उतरा। उसने दरवाजे को खोल दिया। और अंदर से एक वृद्ध व्यक्ति बाहर निकला।
उस वृद्ध व्यक्ति के साथ ही वहां उपस्थित सभी लोगों की सांसें थम सी गईं। वह इतना अधिक बीमार था कि ठीक से अपने पैरों पर भी खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसकी देह कृश और दुर्बल हो चुकी थी, मानो उसके शरीर की सारी शक्ति को किसी रोग ने चूस लिया हो। उसकी त्वचा फीकी और पीली पड़ चुकी थी, जिस पर झुर्रियों का जाल बिछा हुआ था। उसकी आंखें धंसी हुई थीं, उसके गालों की हड्डियां बाहर निकल आई थीं। उसके हाथ अत्यंत पतले थे, जिनमें नसें साफ दिख रही थीं, मानो कोई सूखा हुआ पेड़ जो अंतिम सांसें ले रहा हो। उसके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, और वे बिखरे हुए थे।
उसके दो नौकर तुरंत आगे बढ़े, उसके दोनों ओर खड़े हो गए, और उसे सहारा देकर सावधानी से घोड़ागाड़ी से बाहर उतारा। बीमार व्यक्ति ने एक गहरी और कठिन सांस ली, मानो हर श्वास उसके लिए एक संघर्ष था।
लेकिन उस सबके बावजूद, उस बीमार वृद्ध व्यक्ति के चेहरे पर एक अद्भुत तेज था। यह उस आंतरिक शक्ति का प्रतीक था, जो उसके जीवन भर के अनुभवों, उसकी उपलब्धियों, उसकी साधना और उसकी अर्जित की गई गरिमा को दर्शाता था।
जगदीश मित्तल ने तुरंत आगे बढ़कर उस वृद्ध व्यक्ति के गले में वह पुष्पमाला डाल दी। फिर उसने आदरपूर्वक कहा "मगध साम्राज्य के सलाहकार मंत्री का इंदौर शहर के इस छोटे से 'दिव्य नीलामी कला केंद्र' में हार्दिक स्वागत है। यह हमारा सौभाग्य है कि आप जैसा प्रतिष्ठित व्यक्ति हमारी इस छोटी सी संस्था में पधारा।"
जयदेव जिंदल ने अपने कांपते होठों से धीमे किंतु स्पष्ट स्वर में कहा "अब मैं मगध साम्राज्य का सलाहकार मंत्री नहीं रहा हूं। यह बात तुम अच्छी तरह जानते हो। इस बीमारी के कारण, इस अभिशाप के कारण मैंने वह पद तीन साल पहले ही त्याग दिया था। अब तो मैं केवल एक साधारण बीमार बूढ़ा हूं, जिसका जीवन अब कुछ ही सांसों का मोहताज है।"
तभी उसके पीछे से, घोड़ागाड़ी के दरवाजे के अंदर से एक महिला बाहर निकली।
वह महिला पैंतीस वर्ष की थी। वह ऐसी मनमोहक सुंदरी थी मानो चांदी की चमकती हुई कलाई हो। उसके चेहरे पर एक अद्भुत आकर्षण था। उसकी बड़ी-बड़ी काली आंखों में एक गहरी बुद्धिमत्ता और स्नेह का अद्भुत मिश्रण था। उसकी भौहें धनुष की तरह खिंची हुई थीं। उसकी नाक सीधी और उत्तम थी, जो उसके चेहरे को एक सौम्य गरिमा प्रदान कर रही थी। उसके होंठ गुलाबी और कोमल थे, जो इस समय हल्की मुस्कान से खिले हुए थे। उसके बाल काले और घने थे, जो उसके कंधों तक लहराते हुए आ रहे थे। उसने बहुत सुंदर और साफ-सुथरे वस्त्र पहने थे।
जगदीश मित्तल ने फिर से एक और माला हाथ में उठाई और अत्यधिक आदरपूर्वक झुकते हुए उस महिला के गले में डाल दी और कहा "मगध साम्राज्य की नई सलाहकार मंत्री का मैं हार्दिक स्वागत करता हूं।"
वह महिला मीनाक्षी जिंदल ने हल्की सी मुस्कान बिखेरते हुए अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसने सरलता से कहा "मैं कोई सलाहकार मंत्री नहीं हूं, जगदीश जी। यह उपाधि अभी मुझसे बहुत दूर है।"
लेकिन जगदीश मित्तल ने अपनी चापलूसी जारी रखते हुए कहा "बेशक आज आप सलाहकार मंत्री नहीं हैं। परंतु जिस प्रकार सूर्य उदय से पूर्व ही आकाश में उसका प्रकाश फैलने लगता है, उसी प्रकार आपकी प्रतिभा और योग्यता का प्रकाश पूरे साम्राज्य में फैल चुका है। कुछ ही वर्षों में, यह निश्चित है, आपको यह पद प्राप्त होगा। तो आज ही यह कहने में क्या बुराई है?"
मीनाक्षी अभी इस चापलूसी का उत्तर देना ही चाह रही थी कि अचानक उनके दादा जयदेव जिंदल को अत्यंत भयानक खांसी का दौरा पड़ गया।
"कफ... कफ-कफ-कफ... हर्र... हर्र..."
सभी का ध्यान तुरंत इस ओर हो गया। और मीनाक्षी तुरंत एक झपट में अपने दादा के पास पहुंच गई। उसने धीरे-धीरे उनकी पीठ को थपथपाना शुरू किया। उसने बहुत कोमलता और स्नेह से उनसे कहा "चलिए दादाजी, अंदर चलिए। यहां खड़े रहना आपके लिए ठीक नहीं है।"
यह कहकर वह अपने दादा को सहारा देते हुए धीरे-धीरे अंदर की ओर चलने लगी।
जगदीश मित्तल और उसके सभी कर्मचारी भी तुरंत उसके पीछे-पीछे चलने लगे।
दरअसल जयदेव जिंदल पूर्व में मगध साम्राज्य के राजा दशानंद के तीन सलाहकार मंत्रियों में से एक थे।
लेकिन कुछ वर्षों पहले उन्हें एक अज्ञात और भयानक बीमारी ने जकड़ लिया था। जिसके कारण उनको साम्राज्य का काम करना मुश्किल हो गया, इसी कारण से, मजबूर होकर, उन्होंने अपना पद त्याग दिया और अपने परिवार के मूल स्थान — मध्य प्रांत के भोपाल शहर में वापस लौट आए।
परंतु राजा दशानंद ने उनकी जगह किसी और को यह पद नहीं दिया था। यह एक महत्वपूर्ण बात थी। क्योंकि सभी को यह अंदाज हो चुका था, कि महाराजा दशानंद यह पद जयदेव जिंदल की पोती मीनाक्षी जिंदल को देने वाले हैं।
क्योंकि मगध साम्राज्य के मध्य प्रांत की राजधानी भोपाल शहर के जिंदल परिवार में, जयदेव जिंदल के बाद, यदि सबसे अच्छी प्रतिभा, योग्यता और साधना किसी के पास थी, तो वह मीनाक्षी जिंदल के पास थी।
लेकिन महाराजा दशानंद द्वारा यह पद किसी और को न देने का एक और भी महत्वपूर्ण कारण था।
मध्य प्रांत में जिंदल परिवार सबसे ताकतवर और सबसे शक्तिशाली परिवार माना जाता था। इसके अलावा, राजधानी प्रांत के बाद यदि सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली कोई प्रांत था, तो वह मध्य प्रांत ही था।
और दुनिया का कोई भी राजा हो, वह ताकतवर लोगों को हमेशा अपने सबसे करीब और अपने पक्ष में रखना चाहता है, ताकि कभी भी कोई बगावत या विद्रोह का खतरा पैदा न हो।
कुछ समय बाद...
'दिव्य नीलामी कला केंद्र' के अंदर एक विशेष कक्ष में जगदीश मित्तल और मीनाक्षी जिंदल आमने-सामने बैठे हुए थे।
जगदीश मित्तल ने मीनाक्षी से विनम्रतापूर्वक पूछा "मोहतरमा, मेरी समझ के परे है कि आप भोपाल जैसे बड़े, समृद्ध और प्रतिष्ठित शहर को छोड़कर, इस दक्षिणी प्रांत के सबसे साधारण और तथाकथित 'बेकार' शहर इंदौर में क्या कर रही हैं।"
मीनाक्षी ने शांत स्वर में कहना शुरू किया "जैसा कि तुमने अभी अपनी आंखों से देखा, मेरे दादाजी बहुत बीमार हैं।"
"हमने पूरे साम्राज्य के इतने हकीमों को उन्हें दिखाया है, कि उन हकीमों की संख्या कितनी थी, ये भी हमें याद नहीं है, और वे हकीम उनकी बीमारी को पहचान भी नहीं पाए। केवल कुछ लक्षण बताकर हाथ खड़े कर देते हैं।"
यह कहते हुए मीनाक्षी ने एक पन्ना निकाला और जगदीश मित्तल की ओर बढ़ा दिया।
जगदीश ने पन्ना लिया और पढ़ने लगा। कुछ देर बाद, जब वह पन्ना पढ़ चुका, तो उसने उसे सामने रखी मेज पर धीरे से रख दिया।
उसका चेहरा विचारमग्न था। उसने भी जीवन में कई बीमारियों को देखा था, कई रोगियों के इलाज में सहयोग दिया था, लेकिन जयदेव जिंदल को स्वयं देखकर और उनके लक्षणों के बारे में विस्तार से पढ़कर भी उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कौन सी बीमारी है जो तीन वर्षों से इस महान व्यक्तित्व को खोखला कर रही है।
जगदीश ने मीनाक्षी से प्रश्न किया "यह तो मैं समझ गया कि आप यहां क्यों आई हैं। लेकिन इसमें मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूं? "
मीनाक्षी ने कहा "एक हकीम ने हमें बताया है कि 'काले नाग फूल' की सहायता से मेरे दादाजी का इलाज किया जा सकता है। और हमारे पूरे महाद्वीप में, यह फूल केवल एक ही स्थान पर पाया जाता है — 'त्रिलोक पहाड़ियाँ'।"
इतना सुनते ही जगदीश मित्तल की आंखें फटी की फटी रह गईं, उसका मुंह खुला रह गया। फिर उसने थोड़ा संयम बनाते हुए मीनाक्षी को तथ्यों से अवगत कराया "मोहतरमा, आपकी बात बिल्कुल सत्य है कि काले नाग फूल सिर्फ त्रिलोक पहाड़ियों पर पाए जाते हैं। परंतु त्रिलोक पहाड़ियों से आखिरी बार जो काला नाग फूल निकाला गया था, उसे भी दो दशक बीत चुके हैं।"
मीनाक्षी ने कहा "जगदीश जी, दादाजी को बचाने का यही मेरे पास अंतिम रास्ता है। मैंने सब कुछ सोच लिया है। बस तुम्हें मेरे साथ दो लोगों को भेजना है, जिन्हें उस इलाके तक पहुंचाने की सटीक जानकारी हो।"
दरअसल, त्रिलोक पहाड़ियों का इलाका कोई साधारण इलाका नहीं था। यह मगध साम्राज्य के सबसे खतरनाक और भयानक क्षेत्रों में से एक था। इस इलाके में सामान्य आध्यात्मिक ऊर्जा नहीं, बल्कि विष आध्यात्मिक ऊर्जा पाई जाती थी ।
इस विषैली आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण ही इस इलाके में रहने वाले जीव अत्यंत विषैले, जहरीले और खतरनाक होते थे। वे साधारण जीव नहीं थे, बल्कि वे 'दानव जीवों' की श्रेणी में आते थे। इन दानव जीवों का हर अंग जहर से भरा होता था — उनकी लार, उनके नाखून, उनके दांत, यहां तक कि उनकी सांस भी जहरीली होती थी।
इस इलाके में रहने वाले जीव बाहरी इलाकों में रहने वाले जीवों से अधिक ज्यादा खतरनाक होते थे। यदि उनके साधना के चरणों की तुलना की जाए तो इस इलाके का एक प्रथम चरण का दानव जीव बाहरी इलाकों के द्वितीय चरण के योद्धा को भी मात दे सकता था। उनकी शक्ति, उनकी क्रूरता और उनके हमलों की तीव्रता अद्वितीय थी।
और पूरे मगध साम्राज्य में, पूरे महाद्वीप में, ऐसे कुछ ही स्थान थे जहां विष आध्यात्मिक ऊर्जा पाई जाती थी। बेशक ये स्थान बहुत छोटे-छोटे होते थे, लेकिन उनकी शक्ति अत्यंत भयानक होती थी। इन इलाकों में पाए जाने वाले दानव जीव बाहरी इलाकों में जीवित नहीं रह पाते थे, क्योंकि वे बाहर की शुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा में सांस ही नहीं ले पाते थे — उनके लिए वह ऊर्जा जहर के समान होती थी, जैसे मछली पानी के बाहर दम तोड़ देती है।
लेकिन बाहरी इलाकों के जीव, यदि पर्याप्त रूप से शक्तिशाली हों तो वहां जा सकते थे।
अभी मीनाक्षी और जगदीश अपनी बातचीत में व्यस्त थे कि उसी कमरे के दरवाजे पर तीन बार धीमी दस्तक हुई — धक-धक-धक।
इसका अर्थ था कि कोई तत्काल संदेश है। जगदीश के चेहरे के भाव बदले नहीं, उन्होंने सहजता से कहा "अंदर आओ।"
दरवाजा खुला, और जगदीश का एक वरिष्ठ कर्मचारी अंदर आया। उसने एक बार मीनाक्षी की ओर देखा, फिर आदर से झुकते हुए जगदीश के पास जाकर उनके कान में कुछ कहा।
जगदीश ने फिर से मीनाक्षी की ओर देखा, और धीरे से कहा "मोहतरमा, मुझसे मिलने एक और आगंतुक आया है। क्या मैं उससे मिलने जा सकता हूं"
मीनाक्षी ने जगदीश की ओर देखते हुए कहा "आप उससे यही बातें कर लीजिए, मुझे कोई समस्या नहीं है, उसके बाद हम बातें कर सकते हैं"
यह सुनते ही जगदीश ने सिर हिलाया, और कर्मचारी पीछे हट गया और दरवाजे से बाहर चला गया।