सूर्यकुल का सूर्यास्त - 16 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 16

अध्याय 16 उच्च लड़ाकू योद्धा का उदय

दिव्य नीलामी कला केंद्र से निकलने के बाद, विराज सीधे अपने घर में आ गया। फिर सबसे पहले वह अपने घर के पीछे के आंगन में गया, यह एक बंद, सुरक्षित स्थान जहाँ चारों ओर ऊंची दीवारें थीं और ऊपर खुला आकाश था। रात के समय चाँद की रोशनी सीधे इस आंगन में आती थी, और दिन में सूरज की किरणें इस स्थान को ऊर्जा से भर देती थीं।

दो विशाल पत्थर के टब वहाँ पहले से ही रखे हुए थे, जिन्हें उसने विशेष रूप से अपने आकार और गहराई के हिसाब से बनवाया था। प्रत्येक टब इतना बड़ा था कि उसमें एक वयस्क व्यक्ति लेट सकता था, और इतना गहरा कि पानी गर्दन तक आ जाता था। टबों के नीचे ईंटों से बनी भट्टियाँ थीं, जिनमें आग जलाकर पानी को गर्म किया जा सकता था।

विराज ने अपनी भंडारण अंगूठी को खाली किया। एक-एक करके, उसने सभी औषधियों को बाहर निकाला—छोटी-छोटी गोलियाँ जो चमक रही थीं, सूखी जड़ी-बूटियाँ जिनसे मिट्टी और जंगल की गंध आ रही थी, विभिन्न रंगों के चूर्ण जो अलग-अलग प्रकार की ऊर्जाओं को समेटे हुए थे, और कुछ दुर्लभ द्रव जो कांच की छोटी शीशियों में बंद थे। उसने उन सबको अपने सामने एक लंबी मेज पर रखा, और फिर एक एक करके उन्हें मिलाना शुरू किया। 

फिर उसने कुल बीस बराबर हिस्से बनाए, प्रत्येक हिस्से को कपड़े के एक छोटे थैले में भरा, और सभी थैलों को एक तरफ रख दिया।

फिर उसने रामू को वहां बुलाया। उसके सामने उसने सबसे पहले एक टब को पानी से भरा और गर्म करने लगा।

विराज ने बीस थैलों में से एक थैला उठाया। उसने उसे खोला, और सारी सामग्री—गोलियाँ, चूर्ण, जड़ी-बूटियाँ, द्रव—एक साथ टब में डाल दी। कुछ चीजें तैरने लगीं, कुछ तुरंत पानी में घुल गईं, कुछ नीचे बैठ गईं। विराज ने एक लंबे लकड़ी के डंडे से पानी को चलाना शुरू किया—गोल-गोल, धीरे-धीरे, स्थिर गति से। उसकी पूरी दृष्टि पानी पर केंद्रित थी, वह देख रहा था कि कैसे औषधियाँ पानी में घुल रही हैं, कैसे रंग बदल रहा है, कैसे गंध और बनावट बदल रही है।

लगभग एक घंटे बाद टब का पानी अब पहले जैसा पारदर्शी नहीं रहा था। वह एक गहरे भूरे रंग का हो चुका था—लगभग चाय की पत्ती के रंग के समान, लेकिन थोड़ा गाढ़ा, थोड़ा चमकदार। पानी की सतह पर एक हल्की तैलीय परत बन गई थी, जो सूर्य की रोशनी में इंद्रधनुषी रंगों में चमक रही थी। उसमें से एक विशिष्ट सुगंध उठ रही थी—कड़वी, लेकिन अजीब तरीके से सुखद; तीखी, लेकिन आंखों को नहीं चुभने वाली।

विराज ने रामू से कहा, "हर 12 घंटे बाद इसी तरह मेरे बगल वाला टब तैयार करना होगा। और जब मैं एक टब में बैठूँ, तो पुराने टब को तुम्हें पूरी तरह से साफ कर देना होगा और उसमें उपस्थित चीजों को फेंक देना होगा।"

यह सब कहने के बाद विराज अपने सारे कपड़े उतारता है। उसके बदन पर एक भी कपड़ा नहीं बचता है।

फिर उसने पहले अपना दाहिना पैर टब में डाला—पानी गर्म था, लेकिन जलन पैदा करने वाला नहीं। फिर अपना बायाँ पैर, फिर धीरे-धीरे अपना पूरा शरीर। वह टब में लेट गया, अपनी पीठ को टब की तली पर टिकाकर, अपनी बाहों को दोनों तरफ फैलाकर, अपनी आँखों को बंद करके। पानी धीरे-धीरे उसके शरीर के प्रत्येक भाग को ढकता गया—पहले टखनों को, फिर घुटनों को, फिर छाती को। अंत में, जब वह पूरी तरह स्थिर हो गया, तो पानी उसकी गर्दन के ठीक नीचे तक था। उसकी ठुड्डी पानी से बाहर थी, उसकी नाक और मुंह पूरी तरह खुले थे। वह पानी में इस तरह लेटा था जैसे कोई नवजात शिशु माँ के गर्भ में लेटता है—पूरी तरह सुरक्षित, पूरी तरह समर्पित, पूरी तरह शांत।

फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी श्वास धीमी हो गई—लंबी, गहरी, नियंत्रित। उसने अपने शरीर के प्रत्येक अंग को, प्रत्येक मांसपेशी को, प्रत्येक कोशिका को महसूस करना शुरू किया। और फिर, उसने अपने मन में संपूर्ण सूर्य साधना तकनीक को सक्रिय किया। 

जैसे ही विराज ने तकनीक सक्रिय की, उसके शरीर के रोमछिद्र खुल गए—हज़ारों की संख्या में, जैसे कोई फूल अपनी पंखुड़ियाँ खोलता है। उसके रोमछिद्रों से आध्यात्मिक ऊर्जा का अवशोषण शुरू हो गया। पानी की प्रत्येक बूंद जो उसकी त्वचा को छू रही थी, अब एक अलग ऊर्जा केंद्र बन गई थी। उसमें मौजूद औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ, चूर्ण—सब कुछ अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को छोड़ रहा था, और वह ऊर्जा विराज के रोमछिद्रों से होकर उसके शरीर में प्रवेश कर रही थी। पहले तो यह एक हल्की सी गुदगुदी के समान था—जैसे कोई पंख त्वचा पर फेर रहा हो। फिर यह एक हल्की गर्मी में बदल गया, जैसे सर्दी की धूप। फिर यह एक तीखी जलन में बदल गया, जैसे कोई अदृश्य अग्नि उसे अंदर से जला रही हो।

इतनी अधिक मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह होने के कारण विराज के मुंह से हल्की सी आह निकल जाती है।

अगर विराज की जगह यह क्रिया कोई अन्य साधक कर रहा होता, तो उस साधक का शरीर इस दर्द को सहन नहीं कर पाता और वह दर्द के मारे अपने प्राण त्याग देता।

परंतु विराज के पास यह सब करने के दो फायदे थे।

पहला तो यह कि उसे यह क्रिया करने का संपूर्ण ज्ञान था। वह जानता था कि इस क्रिया में क्या-क्या कठिनाइयाँ आएंगी, और इन कठिनाइयों को किस तरह दूर किया जा सकता है, जिससे उसे कम से कम दर्द हो।

और दूसरा फायदा था उसकी साधना तकनीक —क्योंकि विराज संपूर्ण सूर्य साधना तकनीक का इस्तेमाल करता था।

क्योंकि संपूर्ण सूर्य साधना तकनीक कच्ची, अशोधित आध्यात्मिक ऊर्जा को भी तुरंत शुद्ध और उपयोगी ऊर्जा में बदल सकती थी। साधारण साधकों को उसी मात्रा के ऊर्जा को परिष्कृत करने में घंटों लग जाते, और उस दौरान उनका शरीर ऊर्जा के कच्चेपन से पीड़ित होता। पर विराज की तकनीक उस ऊर्जा को लगभग तुरंत ही शुद्ध कर देती थी।

इसी वजह से विराज को जो दर्द हो रहा था, वह अन्य किसी साधक के मुकाबले बहुत कम था।

परंतु फिर भी, यह दर्द बहुत अधिक था। इसके कारण विराज का शरीर अंदर से किसी भट्टी की तरह गर्म हो रहा था।

पूरे चार घंटे तक विराज इस दर्द को सहन करता है। जब उसका शरीर इस दर्द को सहने का अभ्यस्त हो गया, तब जाकर विराज ने साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश की।

विराज अभी लघु लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर पर है। वह लगभग उसके अंत में खड़ा है—जहाँ वह तीसरा चरण तो पार कर चुका है, और चौथा चरण शुरू करने वाला है। परंतु उसने अपने आप को रोक रखा है। साधक ऐसा कर सकते हैं—वह अगर साधना के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं, तो वह अपने आप को रोक लेते हैं। परंतु हर किसी को आगे बढ़ने की जल्दी होती है, इसी वजह से कोई नहीं रुकता।

विराज ने इस अवस्था में रुकना एक रणनीतिक निर्णय के रूप में लिया था। क्योंकि विराज के पास संसाधनों की कमी थी, इसीलिए उसे रुकना पड़ा।

लेकिन अब उसके पास पर्याप्त मात्रा में संसाधन हैं, इसलिए उसे रुकने की आवश्यकता नहीं है।

अभी विराज शरीर और भौतिक साधना के शरीर संशोधन अवस्था के आध्यात्मिक सागर और नस संशोधन अवस्था में है।

लघु चरण योद्धा के शून्य से लेकर तीसरे स्तर तक, आध्यात्मिक सागर बनता है, जो विराज बना चुका है।

और लघु चरण योद्धा के चौथे स्तर से दसवें स्तर को पार करने तक, आध्यात्मिक सागर और नस संशोधन अवस्था में, शरीर आध्यात्मिक सागर से पूरे शरीर के अंदर आध्यात्मिक नसें बनाता है।

एक बार जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो साधक मूल साधना में दसवाँ स्तर भी पार कर लेता है। तब वह उच्च लड़ाकू योद्धा बन जाता है।

लेकिन बाकी साधकों के लिए साधना का मार्ग आसान हो सकता था, परंतु विराज ने जो रास्ता चुना था, वह अत्यंत खतरनाक और दुर्लभ था।

यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि इस अवस्था में शरीर केवल आध्यात्मिक नसों को ही नहीं बनाता, बल्कि आध्यात्मिक सागर की दीवार को भी मजबूत करता है ।

इस स्थिति को आप ऐसे समझ सकते हैं: एक प्रतिभाशाली साधक की तुलना में, विराज 8 गुना अधिक आध्यात्मिक ऊर्जा को ग्रहण कर सकता है।

और इसके साथ-साथ, शरीर में जो आध्यात्मिक नसें पूरे शरीर में बन रही हैं, उन्हें भी अधिक से अधिक मोटा किया जा सकता है, जिससे शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का आवागमन बहुत तेजी से हो सकता है।

जैसे संकरी गलियों में यात्रा धीमी होती है, वैसे ही पतली नसों में ऊर्जा का प्रवाह सीमित होता है। लेकिन यदि नसें चौड़ी हों, तो ऊर्जा उनमें से नदी की तरह बह सकती है—तेज, अबाधित, अप्रतिरोध्य। और विराज ने तय किया था कि वह अपनी नसों को अधिकतम चौड़ाई तक विकसित करेगा, ताकि जरूरत पड़ने पर वह अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को शरीर के किसी भी कोने में तुरंत पहुँचा सके। युद्ध में यह एक निर्णायक लाभ होता है—जब आपका प्रतिद्वंद्वी ऊर्जा को अपने हाथ तक पहुँचाने में एक सेकंड लेता है, और आप उसी काम को दसवें सेकंड में कर लेते हैं, तो आप हर एक प्रहार में उससे आगे रहते हैं।

अगर हम इसकी भी तुलना एक प्रतिभाशाली साधक से करें, तो विराज की नसें उस साधक की नसों की तुलना में 5 गुना अधिक चौड़ी होंगी, और उतनी ही अधिक ताकतवर होंगी।

इस तरह की साधना करने के बाद, विराज अपने से भी कहीं अधिक ताकतवर साधकों को मौत की लड़ाई में हरा सकता है।

यही उसका लक्ष्य था। वह केवल बराबरी नहीं चाहता था, केवल प्रतिस्पर्धा नहीं चाहता था—वह विजय चाहता था। वह उन लोगों को हराना चाहता था जो उससे दस गुना या बीस गुना अधिक अनुभवी थे, जिनके पास उससे बेहतर संसाधन थे, जो उससे ऊँचे स्तर पर थे। 

क्योंकि जब वह इंदौर शहर को छोड़कर अपनी यात्रा पर निकलेगा, तो उसे सामना करने वाले योद्धा किस चरण के होंगे, और उनकी संख्या कितनी होगी, वह नहीं जानता था।

उसे हर परिस्थिति की गणना करके चलना था। हर उस संभावना के बारे में सोच कर चलना था जो उसके साथ हो सकती थी। और उसी के हिसाब से अपनी साधना को आगे बढ़ाना था।

12 घंटे बाद जब विराज पहले टब से बाहर निकलता है, तो उसका शरीर पहले से अधिक स्वच्छ दिखाई दे रहा था।

उस समय रात का समय था, और आकाश में पूर्णिमा का चाँद था—बड़ा, गोल, चमकदार। उसकी सफेद रोशनी सीधे आंगन में आ रही थी, और जब वह विराज के शरीर पर पड़ी, तो वह उससे टकराकर चारों दिशाओं में फैल गई। विराज का शरीर एक आईने की तरह काम कर रहा था—प्रकाश को परावर्तित कर रहा था, उसे चमकदार, तीक्ष्ण, और अप्रतिरोध्य बना रहा था।

लेकिन जब उसकी नजर उस टब पर पड़ती है जिससे वह बाहर निकला था, तो विराज का मन कुछ देर के लिए हल्का सा विचलित हो जाता है।

पानी अब पहले जैसा नहीं था—वह गहरे भूरे से लगभग काले रंग में बदल चुका था। उसकी सतह पर एक गाढ़ी, चिपचिपी तैलीय परत बन गई थी, जो चाँद की रोशनी में अजीबोगरीब रंग दिखा रही थी। उसमें से एक तीखी, कड़वी गंध आ रही थी—जैसे कोई पुराना, सड़ा हुआ पदार्थ।

दरअसल इस क्रिया के दौरान शरीर अपने अंदर उपस्थित गंदगियों को बाहर निकालता है, और वे भी इस टब के पानी में घुलने लगती हैं।

यह सब उसके पुराने जीवन में कई मर्तबा हुआ था, फिर भी इसे देखकर उसे हर बार घृणा आती थी।

तभी विराज की नजर दूसरी तरफ जाती है—रामू ने दूसरा टब तैयार कर दिया था।

विराज एक पल की भी देरी नहीं करता है, और दूसरे टब में जाकर फिर से लेट जाता है, और संपूर्ण सूर्य साधना तकनीक का इस्तेमाल करने लगता है।

वहीं रामू पहले वाले टब की सफाई करने लगा।

इसी तरह दस दिन बीत जाते हैं। विराज अभी आखिरी औषधि के आखिरी थैले से बने टब में बैठा हुआ था।

तभी उसके शरीर में अचानक से एक झनझनाहट होती है।

दरअसल सबसे पहले उसकी उंगलियों में यह अनुभूति शुरू हुई—हल्की झुनझुनी, जैसे कोई सुई उसकी पोरों पर रखी हो। फिर वह झुनझुनी उसके हाथों में फैल गई, फिर उसकी कलाईयों में, फिर उसकी बाँहों में, फिर उसके कंधों में। साथ ही, उसके पैरों में भी यही हो रहा था—पहले पैर की उंगलियाँ, फिर पैर, फिर टखने, फिर पिंडलियाँ, फिर जाँघें।

और फिर, जैसे कोई बाँध अचानक टूट जाता है, वैसे ही झनझनाहट ने एक बवंडर का रूप ले लिया। विराज के पूरे शरीर में एक ऐसा कंपन उठा कि टब का पानी हिलने लगा—पहले हल्की-हल्की लहरें, फिर तेजी से उबाल, मानो टब के नीचे कोई अदृश्य अग्नि भड़क गई हो। विराज की रीढ़ की हड्डी में से एक तीव्र गर्मी उठी, जैसे कोई सर्प अपनी कुंडली खोलते हुए ऊपर की ओर बढ़ रहा हो। वह गर्मी उसकी रीढ़ के निचले सिरे से शुरू हुई, फिर धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ी—कोशिका-दर-कोशिका, अंग-दर-अंग, कशेरुका-दर-कशेरुका। जब वह गर्मी उसकी गर्दन तक पहुँची, तो विराज ने अपनी आँखें बंद कर लीं—ऐसा नहीं कि वह चाहता था, बल्कि उसके शरीर ने अपने आप ऐसा किया। उसकी पलकें ऐसे बंद हुईं जैसे कोई भारी पत्थर उन पर रख दिया गया हो।

और फिर, अचानक, एक विस्फोट—लेकिन बाहरी नहीं, आंतरिक।

विराज के अंदर की कोई चीज़ फटी, और उस फटने की ध्वनि न केवल उसके कानों से, बल्कि उसके पूरे शरीर से सुनाई दी। यह एक अजीब अनुभूति थी—ध्वनि और स्पर्श और दर्द और सुख का एक अद्भुत मिश्रण। उसे लगा जैसे कोई बर्फ का टुकड़ा उसकी रीढ़ में पिघल रहा हो, और उसके पिघलने से एक ठंडी-गरम नदी बन रही हो जो उसके पूरे शरीर में बिखर रही हो। उसने अपनी बाहें फैला दीं—वह अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि अनायास ही ऐसा हुआ। उसकी बाहें दोनों तरफ खुल गईं, उसकी मुट्ठियाँ बंद हो गईं, उसकी मांसपेशियाँ सिकुड़ गईं। उसके पूरे शरीर में एक स्फूर्ति दौड़ गई—जैसे बिजली का करंट उसके हर रोमछिद्र, हर कोशिका, हर परमाणु से होकर गुजर रहा हो।

और फिर, सब शांत हो गया। जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

विराज की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। और उसने महसूस किया कि उसकी साधना लघु लड़ाकू योद्धा के चरण को पार करके उच्च लड़ाकू योद्धा के चरण में पहुँच गई थी।

उसके बाद वह टब से बाहर निकला—धीरे-धीरे, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ। उसके पैर जमीन पर टिके, उसने अपना संतुलन बनाया। उसके शरीर से अब भी थोड़ी भाप निकल रही थी, उसकी त्वचा अब भी थोड़ी लाल थी, लेकिन उसकी आँखों में एक नई रोशनी थी। उसने एक गहरी साँस ली—और वह साँस पहले से अधिक गहरी, अधिक शक्तिशाली, अधिक नियंत्रित थी। उसने अपनी मुट्ठी बाँधी और फिर खोली—उसकी उंगलियों के बीच एक हल्की सी बिजली दौड़ी, जो अब उसकी नई शक्ति का सूचक थी। उसका लक्ष्य पूरा हो चुका था।

वह अपने कमरे में गया, अपने कपड़े पहने, और फिर आंगन में वापस आया। 

फिर विराज अपनी दो उंगलियों को अपनी आँखों के सामने लाता है, और उसमें आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित करता है।

तभी उसके शरीर की आध्यात्मिक ऊर्जा ने उसके हाथ के चारों ओर घूमना शुरू कर दिया, और धीरे-धीरे उसने एक तलवार का आकार ले लिया—ठीक ढाई फीट लंबी, दो इंच चौड़ी, और किनारों पर इतनी तीक्ष्ण कि उसे देखते ही आँखों में चुभन होती थी। वह तलवार सफेद रोशनी से चमक रही थी, लेकिन उसके किनारों पर नीले रंग की आभा थी—जो उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा की तीव्रता को दर्शाती थी।

फिर विराज अपने से 50 फीट दूर एक पेड़ की डाली की तरफ उस तलवार के वार को हल्का सा हिलाता है।

वह आध्यात्मिक ऊर्जा से बनी तलवार अभी भी उसके हाथ में ही थी, परंतु आध्यात्मिक ऊर्जा से बना हुआ हमला उस पेड़ की डाली की तरफ बड़ता है।

और चंद पल में वह डाली अपनी जगह से कट जाती है।

उसके बाद विराज के चेहरे पर एक दुर्लभ दृश्य देखा गया—मुस्कान।